घाटे से जूझ रहे बीबीसी में होगी 1000 से अधिक कर्मियों की छुट्टी

इस समय घाटे से जूझ रहा बीबीसी (ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन) अपने एक हजार से अधिक कर्मचारियों की छंटनी करने वाला है। इसकी सुगबुगाहट से अंदर ही अंदर रोष की सूचनाएं हैं।

केरल विधानसभा में मीडिया पर हमले का विरोध

मीडिया और एक विधायक पर यूडीएफ के कार्यकर्ताओं की ओर से किए गए कथित हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ विपक्ष के सदस्यों ने केरल विधानसभा से बर्हिगमन किया। विपक्ष, मलयालम टीवी चैनल ‘रिपोर्टर’ के प्रमुख संपादक एम वी निकेश कुमार और केसीबी के विधायक के बी गणेश कुमार के पत्थनापुरम स्थित आवास पर हुए कथित हमले के मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव लाने की अनुमति चाहता था। विधायक ने हाल ही में कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी यूडीएफ से अपने संबंध तोड़ लिए थे।

रिलायंस जिओ मीडिया को टीवी कंटेंट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए मिली प्रोवीजनल मंजूरी

रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने सोमवार को कहा कि उसकी सब्सिडियरी रिलायंस जिओ मीडिया को संपूर्ण भारत में डिजीटल केबल टीवी क्षेत्र में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर के तौर पर काम करने के लिए सरकार से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

काटजू की बात पर मीडिया और सरकार दोनो खामोश क्यों, चीफ जस्टिस पर लगे आरोपों की जांच क्यों नहीं ?

”देश के चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया का मामला है । क़रीब दस महीनों से प्रधानमंत्री समेत क़ानूनी बिरादरी के महानुभावों और मीडिया में ठोकरें खा रहा है । इसकी जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए?” अपने एफबी वाल पर शीतल पी सिंह लिखते हैं – ” देश के प्रधानमंत्री ने मना कर दिया है कि वे गौतम अडानी के बारे में, उनके (प्रधानमंत्री के सरकारी घर में ) आने जाने के बारे में किसी RTI का कोई जवाब नहीं देंगे ? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काट्जू पिछले आठ महीने से सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के बारे में उन तक पहुँचे दस्तावेज़ों की जाँच की माँग करते प्रतीक्षारत हैं ? व्यावसायिक tycoon और वक़्त फ़िलहाल वांछित ललित मोदी के हवाले से देश के सबसे बड़े अख़बार ने कहा है कि महामहिम राष्ट्रपति की सबसे प्रमुख सहयोगी/सलाहकार/सचिव ओमिता पाल देश के सबसे बड़े हवाला कारोबारी की भागीदार हैं ? इससे बड़े सवाल एक साथ देश के सामने कब थे ? जस्टिस मार्कंडेय काटजू की एक गंभीर टिप्पणी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। काटजू का कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो दत्तू को भारत का मुख्य न्यायाधीश नहीं होना चाहिए। इस मामले की जांच जरूरी है। दत्तू पर लगे आरोपों की फाइल काटजू ने तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण, उनके बेटे प्रशांत भूषण, टाइम्स ऑफ इंडिया के धनंजय महापात्रा, इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के पत्रकारों को उपलब्ध करा दी थी। 

भारत के चीफ जस्टिस एचएल दत्तू एवं जस्टिस मार्कंडेय काटजू

भविष्य डिजिटल मीडिया का : एमआइसीए डॉइरेक्टर

कोलकाता : मुद्रा इंस्टीट्यूट ऑफ कम्यूनिकेशंस, अहमदाबाद (एमआइसीए) के निदेशक डॉ नागेश राव ने कहा है कि भविष्य डिजिटल मीडिया का भविष्य है। इसलिए उद्योग की मांग को देखते हुए एमआइसीए डिजिटल मार्केटिंग के विशेष कोर्स करा रहा है. डॉ नागेश राव ने पत्रकारों को बताया कि किसी ब्रांड को स्थापित करने, उसकी रणनीतिक ढंग से मार्केटिंग करने और अपनी बात को अपने टारगेट ऑडियंस तक क्रिएटिव तरीके से पहुंचाने से जुड़े पाठ्यक्रमों के क्षेत्र में एमआइसीए एक जाना-माना नाम है.

पढ़ते रहें भड़ास, लामबंद हो अब उत्पीड़ित-वंचित मीडिया बिरादरी

हम किसी भी कीमत पर इस कारपोरेट मीडिया के तिलिस्म को किरचों में बिखेरना चाहते हैं। मजीठिया के नाम पर धोखाधड़ी से जिन्हें संशोधित वेतनमान के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और अपने अपने दफ्तरों में गुलामों जैसी जिनकी जिंदगी है, बेड़ियां उतार फेंकने की चुनौती वे अब स्वीकार करें। 

 

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर छह महीने तक मीडिया से बात नहीं करेंगे

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा है कि वह छह महीने तक मीडिया से बात नहीं करेंगे। इससे पहले गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री पर्रिकर शायद ही कभी मीडिया के सवालों पर जवाब देने से कतराए हों। वह पिछले तीन दिनों से गोवा में हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके बयान की मीडिया आलोचना कर रहा है। 

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिये अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरुरत नहीं है। यह सवाल इसलिये क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुये बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जायेगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाये। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताये कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जायेगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है। 

पत्रकारिता को उसका पुराना मिशन और चेहरा दिया जगेन्द्र ने

लगता है लोगों का इतिहासबोध कमजोर पड़ता जा रहा है। पढ़ने की शगल खत्म होती जा रही है, खास तौर पर राजनीतिक जीवधारी, अब किताबों से दूर होते जा रहें हैं। राजनीति की नई कोपलें तो अपनी इतिहास और भूगोल दोनों की सामान्य जानकारी से भी दूर होती जा रही हैं। वर्तमान में जीने वाली पीढ़ी अतीत से शायद कुछ सीखना ही नहीं चाहती। जबकि पहले के राजनेता अध्ययन में रूचि लेते थे और देश व दुनिया के इतिहास और आंदोलन की कहानी पढ़ते थें, पढ़ते ही नहीं थे, बल्कि अध्ययन से अपनी विचारधारा को भी परिपक्व और पुष्ट करते थें। गाँधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी, दीन दयाल उपाध्याय आदि अनेक राजनेता और ‘जननायक’ स्वअध्ययन में गहरी रूचि लेने वाले थे।

क्यों मीडिया को शीशे के घर में कैद करना चाहती है सत्ता?

साल भर पहले जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द इस्तेमाल किया तो संकेत तभी मिल गये थे कि सत्ता बदलते ही सत्ता के निशाने पर मीडिया तो होगा। लेकिन उस वक्त यह अंदेशा बिलकुल नहीं था कि मीडिया नामक संस्थान की साख को भी खत्म करने की दिशा में कदम बढेंगे। क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में राडिया कांड से चंद बडे नाम वाले पत्रकारों के संग क्रोनी कैपटलिज्म का खेल जब खुलकर उभरा तो मीडिया की साख पर बट्टा तो लगा लेकिन यह भरोसा भी जागा की देश में सत्ता बदलेगी तो मीडिया के भीतर पत्रकारों की अहमियत बढ़ेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द कहकर दागी पत्रकारों को संकेत दे दिये हैं। लेकिन नई सत्ता ने साल भर के भीतर ही खुले संकेत दे दिये कि मीडिया की निगरानी सत्ता को बर्दाश्त नहीं है। 

पूंजी-पोषित नेता और सत्ता-पोषित मीडिया : क्षमा करना जागेंद्र सिंह, इस चक्रव्यूह में हम अकेले !

शाहजहांपुर के जगेंद्र सिंह हत्याकांड से थोड़ा हटकर, मौजूदा पूरे मीडिया परिवेश पर सोचें तो साफ साफ लगता है कि टकराव पत्रकारिता और सियासत के बीच नहीं, बल्कि दो जरायम वर्गों के बीच है। भ्रष्ट सत्ता-पोषित मीडिया खबर की धौंस में यदि राजनेताओं या उनकी पार्टियों की लूट में हिस्सेदारी के बूते अपना कारपोरेट चेहरा चमकाना चाहता है और पत्रकारों का एक बड़ा तबका पुलिस, प्रशासन, नेता, माफिया ठिकानों पर चौथ-कर्मकांडों से उपकृत होते रहना चाहता है, तो मान लेना चाहिए कि इस टकराव की जड़ें कहीं और हैं। स्थितियां बहुत ही भयानक हैं। जगेंद्र हत्याकांड में तो उसकी मद्धिम सी आहट भर सुनाई देती है। 

यूपी : मीडिया सलीब पर और इंसाफ मुजरिमों की मुट्ठी में !

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि उनके मंत्रियों को फंसाया जा रहा है, साथ ही कहना है कि सरकार पर दबाव बनाये रखने के लिए विरोधी दलों के नेता आये दिन मंत्रियों के त्याग पत्र मांगते रहते हैं। आरोप यह भी है कि समाजवादी पार्टी पर मीडिया हमलावर रहता है। समाजवादी पार्टी के नेताओं की इस दलील का आशय यह है कि उनकी सरकार में सब कुछ ठीक है एवं सभी मंत्री संवैधानिक दायरे में रह कर ही कार्य कर रहे हैं, जिन्हें सिर्फ बदनाम किया जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट होना शेष है कि समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित संविधान के दायरे में रहने की बात करते हैं, या समाजवादी पार्टी का कोई और संविधान है?

मीडिया पर भारी पड़ सकता है महाराष्ट्र सरकार का हलफनामा

एक जनहित याचिका के जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है। उसमें कोर्ट को बताया गया है कि आरोपी और पीड़ित की निजता बनाए रखने के लिए पुलिस को दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें आरोपी का नाम, उसकी तस्वीर और उससे जुड़ी कोई भी जानकारी मीडिया को देने के लिए मना किया गया है। सवाल उठ रहे हैं कि कहीं ये महाराष्ट्र में मीडिया ट्रायल के नाम पर मीडिया पर पाबंदी की कोशिश तो नहीं है? 

उत्तरांचल में क्रशर माफिया के हाथों की कठपुतली बना इलैक्ट्रॉनिक मीडिया

क्रशर माफिया से जूझ रहे उत्तरांचल के ग्रामीणों पर लाठीचार्ज हुआ। सीता देवी, हेमंती देवी, दस-दस दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठीं, लेकिन अपने को जनता का हितैषी बाताने वाले श्रीनगर, गढ़वाल, उतराखंड के इलैक्ट्रानिक मीडिया ने अपने कैमरे कभी भी इन पीड़ित ग्रामीणों की ओर नहीं घुमाये। घुमाये भी तो उसे प्रसारण के लिए नहीं भेजा। भेजें भी कैसे, नगर के अधिकांश इलैक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार क्रशर माफिया के मित्र जो ठहरे। जी हां  श्रीनगर से लगे टिहरी जिले के मलेथा गांव में जल-जगंल-जमीन के खिलाफ पिछले आठ महीने से एक आन्दोलन चल रहा है।

ब्रह्माकुमारी संगठन के पैसे से माउंट आबू में मीडिया चिंतन

ब्रह्माकुमारी संगठन हर वर्ष मीडिया पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए देश भर से पत्रकारों को माउंट आबू में आमंत्रित करता है। जमकर सेवा सत्कार होती है। इस तरह मीडिया को अपने अपने पाले में पालने पोषने के और भी कई तरह के जतन देश में जारी हैं। पत्रकारों को ऐश कराकर अपनी बातें कहलवाने, प्रसारित कराने का ये वहीं तरीका है, जो प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राजनेताओं, अफसरशाहों आदि के साथ सरकारी पैसे पर आयोजित यात्राओं पर होता है।

एक ऐसे वक्त में : आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर पाबंदी और ये मीडिया की दुकानें

आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगी पाबंदी पर अरुंधति रॉय का बयान : कार्यकर्ता-लेखिका अरुंधति रॉय ने यह बयान आईआईटी मद्रास द्वारा छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगाई गई पाबंदी (नामंजूरी) के संदर्भ में जारी किया है. एक दूसरी खबर के मुताबिक, एपीएससी को लिखे अपने पत्र में भी उन्होंने यही बात कही है कि ‘आपने एक दुखती हुई रग को छू दिया है – आप जो कह रहे हैं और देख रहे हैं यानी यह कि जातिवाद और कॉपोरेट पूंजीवाद हाथ में हाथ डाले चल रहे हैं, यह वो आखिरी बात है जो प्रशासन और सरकार सुनना चाहती है. क्योंकि वे जानते हैं कि आप सही हैं. उनके सुनने के लिहाज से आज की तारीख में यह सबसे खतरनाक बात है.’ 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले दो, सवाल एक मीडिया बड़ा या न्याय पालिका !

भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया। लेकिन कई एक ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगे हैं कि अभी तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब भारतीय मीडिया भी  डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है। मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिय़ा तो उसे कत्तई अनसुना कर दिया गया। इस समय मीडिया कर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं। इस पूरे मामले ने ये साफ कर दिया है कि भारतीय मीडिया को न्यायपालिका के आदेशों की परवाह नहीं है। इस तरह वह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला मखौल उड़ा रहा है। इतना ही नहीं, लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक होने के नाते उसकी यह धृष्टता भारतीय न्याय-व्यवस्था के प्रति आम आदमी की अनास्था को प्रोत्साहित भी करती है। मीडिया कर्मियों को मजीठिया वेतनमान देने की बजाए कई बड़े मीडिया घराने तो पुलिस की मदद से मीडिया कर्मियों का गुंडों की तरह उत्पीड़न करने लगे हैं। इसी दुस्साहस में वह सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक और आदेश को ठेंगा दिखाते हुए सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो छापने से भी बाज नहीं आ रहा है। भारतीय मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दोनो) यह साबित करने की लगातार कुचेष्टा कर रहा है कि उसकी हैसियत देश के सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है।

मीडियाकर्मियों पर पद की अवमानना का आरोप, स्पीकर ने सदन में आने पर रोक लगाई

पश्चिम बंगाल विधानसभा में मीडियाकर्मियों को सत्र शुरू होने के कुछ देर बाद सदन की पत्रकार दीर्घा में प्रवेश नहीं करने के स्पीकर के आदेश के मामले ने तूल पकड़ लिया। विपक्ष ने एक सुर से स्पीकर विमान बनर्जी के फैसले पर सवाल उठाए। 

डकैतों का मीडिया इंटरव्यू : मलखान से निर्भय तक

आज बदनामशुदा अपराधियों के इंटरव्यू छापने से भी मीडिया को परहेज नहीं है क्योंकि भले ही उनके महिमा मंडित होने की वजह से समाज का भीषण अहित होता हो लेकिन उनका इंटरव्यू सेलेबिल होता है और व्यावसायिक पत्रकारिता के दौर में खबर को प्रमुखता देने का मानक यही है कि उसमें ग्राहक को आकर्षित करने की क्षमता कितनी है लेकिन जब पंजाब और जम्मू कश्मीर का आतंकवाद नहीं आया था जिसकी धमक अपने-अपने राज्यों तक सीमित नहीं रही बल्कि देश की राजधानी और शीर्ष सत्ता केंद्रों को भी इस आतंकवाद ने अपनी चपेट में लेने का दुस्साहस किया, तब तक क्राइम की इवेंट के रूप में राष्ट्रीय स्तर तक चंबल के डकैतों से जुड़ी समाचार कथाओं की न्यूज वैल्यू सबसे ज्यादा मानी जाती थी। 

सोशल मीडिया का राजा फेसबुक, 380 करोड़ लोग हुए इसके दीवाने

फेसबुक सोशल मीडिया का नया राजा बन गया है. वर्चुअल वर्ल्ड में फेसबुक की लोकप्रियता ने दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की की है. ऐसी कामयाबी सोशल मीडिया में दुनिया में किसी को अब तक हासिल नहीं हुई. फेसबुक स्मार्टफोन पर अपने सभी प्रतिद्वंद्वी ऐप्स में बढ़ते यूज़र्स के कारण अव्वल दर्जे का हीरो बन गया है. फेसबुक के यूज़र्स की संख्या 3.8 बिलियन यानी 380 करोड़ तक पहुंच गई है, जो कि दुनिया की जनसंख्या का 50 फीसदी है.

उद्योगपतियों के मीडिया-प्रभुत्व से पत्रकारिता की गरिमा तार-तार : अम्बिका चौधरी

उत्तर प्रदेश के काबिना मंत्री अम्बिका चौधरी ने हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर मीडिया को आईना दिखाते हुये कहा कि अपनी आंतरिक व वाह्य बुराइयों को खत्म करने के लिये मीडिया कर्मियों को संगठित होकर आगे आना होगा। विकलांग व पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री चौधरी उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बलिया इकाई से सम्बद्व प्रेस क्लब बिल्थरा रोड के बैनरतले हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित ‘ वैश्विक परिवेश में पत्रकारिता और चुनौतियां‘ विषयक संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। 

समारोह में अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट करने की एक झलक

मीडिया सेंटर खाली करने वाले के लिए तो नहीं रुका जन संपर्क अधिकारी का तबादला!

बैतूल (म.प्र.) : प्रदेश सरकार के सुशासन की पोल तब खुल कर रह गई जब एक सहायक सूचना अधिकारी को सूचना अधिकारी के रूप में पदोन्नति मिलने के बाद उसे दतिया भेजने के बजाय उसका तबादला निरस्त करवा दिया गया। भोपाल में बैठे अधिकारी इसे कलक्टर, विधायक, जनप्रतिनिधि तथा पत्रकारों की अनुशंसा बता रहे हैं। 

टीवी मीडिया तो विकसित होने से पहले ही पसर गया, बस सेठजी की रखैल टाइप खबर आना रहा बाकी

व्यावहारिक पत्रकारिता में कई आयाम एक साथ काम करते हैं। उसमें संपादकीय टीम की दृष्टि, ध्येय, प्रस्तुतिकरण और प्रतिबद्धता के साथ भाषा का मुहावरा भी शामिल है। इनसे मिलकर ही एक मुकम्मल सूचना उत्पाद बनता है, जिसे आप प्रारंभिक तौर पर अखबार या मैगजीन के रूप में पहचानते हैं। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत के समय हर अखबार और मैगजीन का कलेवर, विषयों का चयन, प्रस्तुतिकरण और भाषा का व्याकरण अलग-अलग था। यहां तक कि फॉन्ट और ले आउट भी, जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान या दिनमान और रविवार। आज भी इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू या इकोनॉमिक्स टाइम्स और बिजिनेस स्टेण्डर्ड देख कर इसे समझा जा सकता है ।

जनता और सरकार के बीच की कड़ी हैं पत्रकार, विश्वास न तोड़ें : आईपीएस तृप्ति भट्ट

ऋषिकेश : यहां 31 मई को नगरपालिका स्वर्ण जयंती सभागार में पत्रकारिता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में आइपीएस तृप्ति भट्ट ने कहा कि मीडिया जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए इस क्षेत्र में संवेदनशील होकर काम करने की जरूरत है।

सोशल मीडिया कहते हैं इसे, ‘शोषण मीडिया’ तो नहीं!

आधुनिक युग में सोशल मीडिया को एक अहम स्थान हासिल है। लेकिन निजी, राजनीतिक और धार्मिक लड़ाइयों की जंग भी विभिन्न सोशल मीडिया साइट्स पर शुरू हो गई है जिससे सोशल मीडिया को लोग अब शोषण मीडिया के रूप में भी देखने लगे हैं। 

हमे मीडिया हरा देता है, इससे आजाद हो ताजा हवा में सांस लेना चाहते हैं : अमिताभ बच्चन

मुंबई : बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्‍चन का कहना है कि आप मीडिया से कभी नहीं जीत सकते. हाल ही में अमिताभ फिल्‍म ‘पीकू’ से दर्शकों से काफी वाहवाही लूट चुके हैं. फिल्‍म 100 करोड़ के कल्‍ब में शामिल हो गई है. फिल्‍म में दीपिका पादुकोण और इरफान खान भी थे.

क्या ग़ज़ब के लिखते हो, बात ही नहीं करते हो

प्राइम टाइम के लिए रोज़ाना कई लेखों से गुज़रना पड़ता है । इन लेखों से अब बोर होने लगा हूं। कई बार लगता है कि अख़बारों के संपादकीय पन्नों पर छपने वाले इन लेखों की संरचना( स्ट्रक्चर) का पाठ किया जाना चाहिए। ज़्यादातर लेखक एक या दो तर्क या सूचना के आधार पर ही तैयार किये जाते हैं।  पहले तीन चार पैराग्राफ को तो आप आराम से छोड़ भी सकते हैं। भूमिका में ही सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है। लेखक माहौल सेट करने में ही माहौल बिगाड़ देता है । आप किसी भी लेख के आख़िर तक पहुंचिये, बहुत कम ही होते हैं जिनसे आप ज्यादा जानकर निकलते हैं। नई बात के नाम पर एक दो बातें ही होती हैं। हर लेख यह मानकर नहीं लिखा जा सकता कि पढ़ने वाला पाठक उससे जुड़ी ख़बर से परिचित नहीं है इसलिए भूमिका में बता रहे हैं।  ख़ुद मैं भी इस ढांचे का कैदी बन गया हूं, कई बार लगता है कि कैसे ख़ुद को आज़ाद करूं।

झीरम घाटी : अंदाजा नहीं था इतनी बड़ी घटना है, हम लगातार खबर अपडेट कर रहे थे

रायपुर (छत्तीसगढ़) : ऐसी खबरें आती रहती थीं! कोई नई बात तो नहीं थी नक्सली हमला. सितंबर के महीने से मई तक लगभग नौ माह गुजार ही लिए थे रायपुर में. एक हिंदी साइट के लिए पूरे छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी निभाते हुए एक अच्छा नेटवर्क भी बन ही गया था. नक्सली हमलों की खबर पर सबसे ज्यादा नजर रखनी होती थी.