मुंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी और रंगमंच

अमेरिकी नाटककार व रंग-चिन्तक डेविड ममेट ने अपनी किताब “सत्य और असत्य” (true and false : heresy and common sense for the actors) में लिखा है कि “आपका काम नाटक को दर्शकों तक पहुंचना है, इसलिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा लेने या विद्वता मात्र से काम नहीं बनेगा।” वैसे कुछ अति-भद्रजनों को शीर्षक से आपत्ति हो सकती है कि मंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी के साथ रंगमंच की बात! तो अर्ज़ है कि मुंगौड़ी, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी खाने की लजीज़ चीज़ें हैं और रंगमंच खेलने और देखने की। जब हम कोई चीज़ खेलते हैं तो सब कुछ भूलकर उसी में मस्त हो जाते हैं, भूख-प्यास तक गायब हो जाती है। इंसान की बनावट ऐसी है कि वह खाए और खेले बिना ज़्यादा दिन तक नहीं रह सकता है। खाना और खेलना आदिम प्रवृति है। जो बिना खाए और बिना खेले जीवित रहते हैं वह निश्चित रूप से किसी और ही ग्रह के प्राणी होगें। उन्हें भ्रम है कि वो इंसान हैं। खैर, बात को जलेबी की तरह गोल गोल घुमाने से अच्छा है कि सीधे-सीधे मुद्दे की बात की जाय।