मारुति-सुज़ुकी वाले अक्षरधाम Nexa Showroom का नाम Unfair Deal ज़रूर कर लें

Om Thanvi : मारुति-सुज़ुकी जैसी नामी कंपनी, बड़ा हाइ-फाइ Nexa Showroom, डीलर का नाम – Fair Deal Cars; दिल्ली में अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन के ठीक नीचे। अच्छा होता कि नाम रखते – Unfair Deal Cars! हुआ यह कि अक्तूबर 2015 में हमने उक्त शोरूम जाकर ग्यारह हजार रुपये दे एक बलेनो कार बेटे के लिए बुक करवाई। पर चंद रोज बाद और खरीदारों की राय जान बेटे को लगा कि आजमाई हुई श्कोडा ही बेहतर होगी।

ओम थानवी जेएनयू के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में गेस्ट फेकल्टी बने

Om Thanvi : चलिए, आपको कुछ खबर दें! जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर आज मैंने विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज जॉइन किया है, गेस्ट फेकल्टी (विजिटिंग स्कॉलर) में। मेरे दादा शिक्षक रहे, मेरे पिताजी, चाचाजी, मामाजी … घर-परिवार में पुराना सिलसिला है। सोचा, जेएनयू जैसे शिक्षालय के परिवेश का थोड़ा अनुभव मुझे भी …

सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए

Om Thanvi : मुझे बहुत खुशी होगी, अगर सम-विषम प्रयोग सफल होता है। लेकिन सरकार को भी चाहिए कि आवागमन के वैकल्पिक, प्रदूषण रहित, साधनों की उपलब्धि में जी-जान लगा दे। दिल्ली की छाती पर एनसीआर हलकों में धुँआ उगलते वाहनों पर नियंत्रण के लिए पड़ोसी राज्यों की सरकारों से सहयोग की गुजारिश करनी चाहिए। एक और समस्या, जिसे तुरंत हल किया जाना चाहिए। रेडियो टैक्सी एक बेहतर सुविधा के रूप में विकसित हो रही है। लेकिन अपनी सफलता पर इतरा कर कंपनियां बेजा फायदा भी उठाने लगी हैं। मसलन ऊबर (Uber) को लें। “पीक आवर” अर्थात ज्यादा भीड़ के घंटों में चार-छः गुणा किराया झटकने लगे हैं। यह किसी की मजबूरी का फायदा उठाना है, सरासर ब्लैकमेलिंग है। दूसरी कंपनियां – जैसे मेरु (Meru) – तो ऐसा नहीं करतीं। कुछ टैक्सी संचालकों को लूट की यह आजादी क्यों?

ओम थानवी पर भी मानहानि का मुकदमा कर चुके हैं जेटली

Om Thanvi : अखबारी काम-काज में मुझ पर दर्जनों मुकदमे हुए। सब मानहानि के। एक तो अरुण जेटलीजी ने ही किया था, जो रजामंदी में वापस हो गया। फिर भी संपादक के नाते मैंने कोई पच्चीस-तीस मुकदमों में तो जमानत करवाई होगी। तीन-चार बार गैर-जमानती वारंट भी जारी हुए, क्योंकि तय तारीखों पर अदालत न …

…सुलह होगी पंकजजी, यहां नहीं तो वहां : ओम थानवी

Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।

लो, लो, सेल्फी लो… लेते रहो, तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा! : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ अपनी स्व-छवि एकाधिक बार ली। एंगल जंचा नहीं तो घूम कर दुबारा आ गए। इस पर भीड़ घटाने की गरज से सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो एक बार सेल्फी ले चुके हों, कृपया दुबारा न लें। तब, अनुराग के अनुसार, मोदीजी ने उन्हें टोका – अरे, लेने दो। किसी को न रोको। दुबारा चाहते हैं, दुबारा लो। लो, लो, लो … लेते रहो। तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा!

पीएम के साथ सेल्फियाने वाले पत्रकारों को दाद मिलनी चाहिए। बेशरमी में परदा तो नहीं करते। उनसे बेहतर हैं जो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

ओम थानवी को दस करोड़ रुपये मिलने की अफवाह किस वामपंथी कवि ने फैलाई?

Om Thanvi : बड़ी आनंद दायक खबर है। मुझे दस करोड़ रूपया मिला है। एक सांसद के जरिए, पहली नवम्बर को मावलंकर हॉल में प्रतिरोध के आयोजन के लिए। यानी मेरी तंगहाली तो रातोंरात दूर हो गई। अशोक वाजपेयी और एमके रैना को ज्यादा मिला होगा, क्योंकि वे बड़े नाम हैं। हालाँकि उन्हें मुझ सरीखी जरूरत शायद न हो!

पांडिचेरी घूमकर लौटे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने साझा किया यात्रा वृत्तांत

Om Thanvi : पुदुचेरी (तमिल में पुदु=नया, चेरी=नगर) भले ही पांडिचेरी का बदला हुआ नाम हो, पर यहाँ आपको दोनों नाम चलन में मिलेंगे। बस अड्डे पर कंडक्टर अब भी “पौंडी-पौंडी” की पुकार लगाते हैं। जबकि देश में और जगहों पर पुराने नाम अब उपेक्षा – बल्कि घृणा – के घेरे में चले गए हैं। प्रसंगवश, ध्वनिप्रेम में मुझे पांडिचेरी नाम ज्यादा भाता है। मैंने वहां इसे ही अपनाया। शायद ही किसी ने इस पर उंगली उठाई होगी।

व्यापमं में उलझे शिवराज का मकसद था मोदी को खुश करना : थानवी

भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने विश्व हिंदी सम्मेलन को वैभवशाली बनाए जाने पर कहा है कि इस सम्मेलन को वैभव देकर और पूरे शहर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से रंगकर व्यापम घोटाले में फंसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मोदी को खुश करने की कोशिश की है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में चल रहे 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेने आए पत्रकार ओम थानवी ने कहा, “इस सम्मेलन की मुश्किल यह हो गई कि शुरुआत से ही इसका मकसद यह हो गया कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज प्रधानमंत्री मोदी को प्रभावित करेंगे, क्योंकि वे खुद व्यापम घोटाले में फंसे हैं और अगर अपने माई-बाप को प्रभावित करते हैं तो थोड़ा सा तो बचाव है।”

हिंदी सम्मेलन और भोपाल के अखबारों का मोदीकरण शर्मनाक है : ओम थानवी

Om Thanvi : भोपाल पहुँच कर देखा – हवाई अड्डे से शहर तक चप्पे-चप्पे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीरों वाले विशाल पोस्टर लगे हैं, खम्भों पर भी मोदीजी के पोस्टर हैं। इनकी तादाद सैकड़ों में होगी। यह विश्व हिंदी सम्मलेन हो रहा है या भाजपा का कोई अधिवेशन? अधिकांश पोस्टर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से हैं – शहर में मोदीजी के स्वागत वाले। अनेक में चौहान की अपनी छवि भी अंकित है।

कृष्‍णनाथ जी नहीं रहे…

‘नए जीवन दर्शन की संभावना’ एक बार पढि़ए तब समझ आएगा वे कितना पढ़ते थे, कितने मौलिक थे, कितने विराट थे…

Om Thanvi : दिल्ली में उतरते ही फोन पर रंजना कुमारी का संदेश मिला कि कृष्णनाथजी नहीं रहे। मेरे लिए सदमे से कम नहीं यह खबर। कृष्णनाथजी सुलझे हुए समाजवादी विचारक और अर्थशास्त्र के विद्वान ही नहीं थे, अनूठे यायावर और गद्यकार थे। लद्दाख में राग-विराग, स्पीति में बारिश, हिमाल यात्रा, पृथ्वी परिक्रमा आदि उनके यात्रावृत्त हिंदी साहित्य की अनमोल कृतियाँ हैं। वे राममनोहर लोहिया के सहयोगी थे। उन्होंने ‘कल्पना’ ‘जन’ और ‘मैनकाइंड’ का संपादन भी किया।

ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

Mohammad Anas : ओम थानवी जी की मदद की अपील —- दोस्तों, हम सबके बेहद प्रीय जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी अब नौकरी से रिटायर हो गए हैं. उन्होंने केके बिरला फाउंडेशन द्वारा अपनी किताब के लिए बाबरी विध्वंस के आरोपी कल्याण सिंह के हाथ से एक लाख रुपए का पुरूस्कार लिया है. कल्याण न सिर्फ बाबरी विध्वंस के आरोपी हैं बल्कि उन पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के लिए हेट स्पीच, दंगा भड़काने, घोटाले तक के आरोप लगे हुए हैं. जैसे तालिबान का मुल्ला उमर वैसे ही भाजपा के कल्याण सिंह. फेसबुक पर श्री ओम थानवी जी ने लिखा है कि पुरूस्कार लेने से मेरे दुश्मनों को दिक्कत हो गई है.

Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

कल्याण के हाथों पुरस्कार लेने का विरोध करने वालों को ओम थानवी ने दुश्मन करार दिया

Om Thanvi : दुश्मनों के पेट में फिर बल पड़ गए। कहते हैं, महाकवि बिहारी के नाम पर दिया जाने वाला केके बिड़ला फाउंडेशन का पुरस्कार मैंने कल्याण सिंह के हाथों क्यों ले लिया? अगर मुझे चुनाव की सुविधा होती तो आयोजकों से कहता किसी लेखक के हाथों दिलवाइए। इसके बावजूद, सच्चाई यह है कि पुरस्कार मैंने कल्याण सिंह के हाथों नहीं, राज्यपाल के हाथों लिया है; राज्यपाल जो संविधान की सत्ता का प्रतीक होता है, संविधान का प्रतिनिधि और कार्यपालक होने के नाते। राजभवन कल्याण सिंह या भाजपा की मिल्कियत नहीं है।

कल्याण सिंह के हाथों पुरस्कार लेने पर ओम थानवी सोशल मीडिया पर घिरे

Neelabh Ashk : मत छेड़ फ़साना कि ये बात दूर तलक जायेगी. ओम तो गुनहगार है ही, हिन्दी के ढेरों लोग किसी न किसी मौक़े पर और किसी न किसी मात्रा में गुनहगार हैं. इस हमाम में बहुत-से नंगे हैं. पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है. मैंने साहित्य अकादेमी का पुरस्कार लौटा दिया था. मेरी मार्क्स की पढ़ाई ने मुझे पहला सबक़ यह दिया था कि कर्म विचार से प्रेरित होते हैं. 55 साल बाद तुम चाहते हो मैं इस सीख को झुठला दूं. ओम की कथनी और करनी में इतना फ़र्क़ इसलिए है कि सभ्यता के सफ़र में इन्सान ने पर्दे जैसी चीज़ ईजाद की है. ईशोपनिषद में लिखा है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन के नीचे छुपा है. तुम सत्य को उघाड़ने की बजाय उस पर एक और सोने का ढक्कन रख रहे हो. ये ओम के विचार ही हैं जो उसे पुरस्कार>बिड़ला>राज्यपाल>कल्याण सिंह की तरफ़ ले गये. मैं बहुत पहले से यह जानता था. मुझे कोई अचम्भा नहीं हुआ. मैं ओम की कशकोल में छदाम भी न दूं. और अगर यह मज़ाक़ है तो उम्दा है, पर हिन्दी के पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार-सम्मान-लोभी जगत पर इसका कोई असर नहीं होगा.

ओम जी की युवा चपलता उन्‍हें रि‍टायर होने भी नहीं देगी

Rahul Pandey :  मैं कभी जनसत्‍ता में नहीं छपा। बल्‍कि शायद मैं कहीं नहीं छपा। तो अगर कोई ये सोचे कि आेम जी का मेरा परि‍चय कुछ छपने छपाने को लेकर हुआ तो उसे नि‍राशा ही हाथ लगेगी। मुरादाबाद में एक दि‍न मैने ओम जी की वॉल पर कुछ सीक्‍योरि‍टी ब्रीचेस देखे तो बेलौस उन्‍हें मैसेज कर दि‍या। तुरंत उनका जवाब भी आया, चीजें शायद ठीक की गईं या नहीं, याद नहीं, लेकि‍न हमारी डि‍जि‍टल दोस्‍ती तो ठीक ठाक शुरू हो गई।

सम्पादकजी क्या वाकई इतनी महिलाओं के साथ सोए भी होंगे या सिर्फ बहबही में झूठ बोले!

परसों पूरे देश में राष्ट्रीय शोक था। संयोग से परसों ही साहित्य के राष्ट्रीय धरोहर नामवर सिंह जी का जन्मदिन भी था। राजकमल प्रकाशन द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन को डॉ कलाम के शोक से बड़ा साबित करते हुए एक रंगीन और तरल-गरल पार्टी रख दिया गया। कई पहुंचे, क्या पत्रकार एवं क्या साहित्यकार। शायद नामवर जी नहीं पहुंचे या पहुंचे भी हों तो थोड़े समय के लिए ही पहुचे हों। 

अफवाहें उड़ाने वालो, देख लेंगे, तुम्हारे दुष्प्रचार में ताकत है या हमारे सच में : ओम थानवी

कुछ समय पहले बदमाशों ने, न सुहाने वाले एक आलोचक – जो टीवी पर भी बेबाक रहते हैं – के बारे में अफवाह उड़ाई कि उनकी पत्नी भाग गई हैं। अफवाह ऐसी कि कोई उनसे पुष्टि भी करना चाहे तो कैसे करे लेकिन कल मेरे बारे में उन लोगों ने थोड़ी रियायत बरती, सो मित्रों ने मुझे फोन कर बता भी दिया। उन कुछ के श्रीमुख से देशद्रोही, गद्दार, विदेशी एजेंट आदि जुमले तो रोज सुनते हैं; सो इसमें भी हैरानी नहीं हुई कि अब वे शराबी-कबाबी-व्यभिचारी कहें; कौन जाने कल बलात्कारी-हत्यारा या तस्कर भी कहने लगें। ऐसे गलीज तत्त्वों से कोई गिला नहीं। 

चार दिनों बाद यानी 31 जुलाई से ओम थानवी जनसत्ता के संपादक पद से अवकाश ले लेंगे

इंडियन एक्सप्रेस इसलिए नहीं पढ़ा जाता रहा है कि उसमें ढूंढ़-ढूंढ़ कर स्टोरी लाई जाती थीं बल्कि उसकी प्रतिष्ठा इसलिए थी क्योंकि उसका चरित्र व्यवस्था विरोधी (एंटी इस्टैबलिशमेंट) रहा है। बाद में एक्सप्रेस ने तो खैर अपना चरित्र बदला भी मगर जनसत्ता दृढ़ रहा। प्रभाष जी के बाद भी जनसत्ता का यह चरित्र यथावत बना रहा तो यकीनन इसका श्रेय ओम थानवी को जाता है। प्रभाष जोशी बड़ा नाम था इसलिए उनके वक्त तक जनसत्ता में काम कर रहे दक्षिणपंथी पत्रकार खुलकर सामने नहीं आए थे मगर ओम थानवी के समय ऐसे तत्व खुलकर अपने दांव चलने लगे थे इसके बावजूद जनसत्ता का चरित्र नहीं बदला। ऊपर से प्रबंधन ने ओम थानवी को वह स्वायत्तता भी नहीं दी जैसी कि प्रभाष जी के वक्त तक संपादक को प्राप्त थी।

ललित मोदी के वकील की प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाने का मतलब नायाब मीडिया मैनेजमेंट!

Om Thanvi : सुषमा स्वराज की इसके लिए दाद देनी चाहिए कि उन्होंने अपनी गलती तुरंत स्वीकार की। लेकिन मोदी गुट के अमित शाह और संघ उनके हक में खड़े दिखाई दे रहे हैं तो क्या यह संदेह नहीं खड़ा होता कि काला दाल में नहीं, दाल ही काली है? क्या सुषमा स्वराज किसी षड्यंत्र का शिकार हुई हैं? क्या सुषमा स्वराज के निर्णय के पीछे सचमुच कोई पारिवारिक कारण हैं या ‘मानवीय आधार’ पर पार्टी या सरकार में वे इस्तेमाल हुई हैं; जिन्होंने उन्हें इस अनाचार इस्तेमाल किया, उन्हें भय है कि स्वराज को इस मामले में किनारे करने पर उनका भांडा फूट जाएगा? वरना मोदी दूसरे मोदी के नाम पर अपनी सरकार को बदनाम क्यों होने देंगे?

दिल्ली पुलिस की अफरातफरी और राजनीति का गंदा खेल : वक्त बताएगा किसने क्या खोया और क्या पाया…

Om Thanvi : किसी एफआइआर पर पुलिस मंत्री क्या पार्षद के खिलाफ भी इतनी अफरातफरी में हरकत में नहीं आती। तोमर पर लगे आरोप नए नहीं हैं, अदालत में मामला पहले से है। अगर उन्होंने फर्जीवाड़ा किया है तो निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए, मंत्री पद से छुट्टी तो होनी ही चाहिए। वैसे आप सरकार भी इसकी दोषी तो है कि अब तक न भीतरी लोकपाल नियुक्त किया है न बाहरी। तोमर की ‘असली’ डिग्रियां पेश करने का वादा भी अब तक पूरा नहीं किया गया है। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली पुलिस की आज की नाटकीय गतिविधि संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल आती। सवाल यह है कि कल कोई एफआइआर शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी पर डिग्री (यों) वाले उनके फर्जी हलफनामों के लिए दर्ज होती है तो क्या पुलिस इसी जोशोखरोश में पेश आएगी?

अभिनेत्री रह चुकीं मंत्री ने सीधे सवाल को महिला-मुद्दा बनाकर स्टूडियो में मौजूद ‘जनता’ को ‘आजतक’ के खिलाफ भड़काया

Om Thanvi : सीधे सवाल पर ड्रामा जवाब से भागती ईरानी का, उलटा आरोप पत्रकार पर! अशोक सिंघल ने आजतक पर स्मृति ईरानी से पूछा कि मोदी ने आपको क्या खूबी देख कर (केबिनेट) मंत्री बनाया। स्मृति का हुनर देखिए कि जिस सवाल पर पहले कोई हैरान नहीं हुआ था, जवाब देने की जगह अभिनेत्री रह चुकीं मंत्री ने उस सवाल को महिला-मुद्दा बनाकर स्टूडियो में मौजूद ‘जनता’ के बीच कुछ इस अंदाज से उछाला कि लोग भड़क गए, इतना कि मंच पर पत्रकार पर हमला तक करने जा पहुंचे। तब मंत्री ने उठकर पत्रकार को बचाने जाने का उपक्रम भी प्रदर्शित किया! गौर करने की बात है कि आमंत्रित की गई भीड़ ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगा रही थी।

एक साल की नाकामियों को उपलब्धियों में बदला जा सकता है!

डीएनए अखबार में प्रकाशित मंजुल का कार्टून

Om Thanvi :  महंगे और सुनियोजित प्रचार से जैसे चुनाव जीता जा सकता है, वैसे ही एक साल की नाकामियों को उपलब्धियों में क्यों नहीं बदला जा सकता? पूरे एक सप्ताह से टीवी और बाकी मीडिया में हम जो गाजे-बाजे सुन-देख रहे हैं, वे अभी एक सप्ताह और चलेंगे – तब तक जब तक जनता का दिमाग साफ (ब्रेन-वाश) न हो जाय या उसके कान पक न जाएं! मथुरा में तो रैलियों की शुरुआत भर हुई है।

ओम थानवी ने भी कह दिया- केजरीवाल अहंकारी

आशुतोष की किताब के आयोजन में केजरीवाल का अहंकार देखकर मैं दंग रह गया था। न राजदीप-शेखर गुप्ता के सवालों का जवाब उन्होंने जिम्मेदारी से दिया, न हॉल में बड़ी संख्या में मौजूद बुद्धिजीवियों का लिहाज किया। उनका कहना था – बस मैं जैसा हूँ, लोग इससे खुश हैं। भावार्थ यह निकलता था कि मैं बाकी सबको ठेंगे पर रखता हूँ। मीडिया की ओर साफ इशारा भी कर दिया था।

प्रतिबंध लगाना और थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है : ओम थानवी

Om Thanvi : प्रतिबंध लगाना, थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है। कोई किस वक्त कौनसी फिल्म देखे, राज्य तय कर रहा है। क्या खाएं, यह भी। अभी सिर्फ शुरुआत है, आगे देखिए। गौमांस के निर्यात में हम, अमेरिका को भी पीछे छोड़, भारी विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं; मगर देश में राज्य गौमांस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। वह भी सभी राज्य नहीं लगा रहे। महाराष्ट्र और गोवा दोनों जगह भाजपा का राज है, पर गोवा – जिसका हाईकोर्ट मुंबई में है – प्रतिबंध से बरी है। वजह महज इतनी है कि महाराष्ट्र में प्रतिबंध से वोट बैंक मजबूत होगा, गोवा में कमजोर!

केजरीवाल से आज फिर निराश हुए ओम थानवी

Om Thanvi : केजरीवाल को पहली बार किसी सभा में आमने-सामने सुना। आशुतोष की किताब का लोकार्पण था। राजदीप ने वे सारे मुद्दे कुरेदे जो जरूरी थे। जो सब भुला बैठे उन्हें अंत में भूपेंद्र चौबे और शेखर गुप्ता ने पूछ लिया। लेकिन केजरीवाल सबसे दाएं-बाएं ही हुए। सिर्फ साले-कमीने की भाषा के इस्तेमाल पर इतना कहा कि उन्हें ऐसा नहीं बोलना चाहिए था। पर इसमें कोई अफसोस का भाव जाहिर न था।

भाजपा सांसद श्यामा चरण गुप्त दलाल है!

Padampati Sharma : श्यामा चरण गुप्त इलाहाबादी को कौन नहीं जानता. 250 करोड़ के कारोबारी हैं.. वे कहते हैं कि बीड़ी में औषधीय गुण हैं. वे खुद बीड़ी किंग हैं. कई जातिवादी दलों में घूम फिर कर फिर से भाजपा का दामन थामा है. उम्मीद कुछ मोदी से ही है. कांग्रेस की रेप्लिका बन चुकी भाजपा से नहीं. पता नहीं, नमों पार्टी को सुधार पाएंगे कि पार्टी उन्हें ही तार देगी.. आने वाला समय तय करेगा… लेकिन सिगरेट निर्माता कंपनी की दलाली कर रहे हैं भाजपा सांसद, यह तय है…

केजरीवाल पर संपादक ओम थानवी और नरेंद्र मोदी पर पत्रकार दयानंद पांडेय भड़के

Om Thanvi : लोकपाल को वह क्या नाम दिया था अरविन्द केजरीवाल ने? जी, जी – जोकपाल! और जोकपाल पैदा नहीं होते, अपने ही हाथों बना दिए जाते हैं। मुबारक बंधु, आपके सबसे बड़े अभियान की यह सबसे टुच्ची सफलता। अगर आपसी अविश्वास इतने भीतर मैल की तरह जम गया है तो मेल-जोल की कोई राह निकल आएगी यह सोचना मुझ जैसे सठियाते खैरख्वाहों की अब खुशफहमी भर रह गई है। ‘साले’, ‘कमीने’ और पिछवाड़े की ‘लात’ के पात्र पार्टी के संस्थापक लोग ही? प्रो आनंद कुमार तक? षड्यंत्र के आरोपों में सच्चाई कितनी है, मुझे नहीं पता – पर यह रवैया केजरीवाल को धैर्यहीन और आत्मकेंद्रित जाहिर करता है, कुछ कान का कच्चा भी।

इंडियन एक्सप्रेस में छपा रिबेरो का लेख हर पाठक को हिला गया : ओम थानवी

1989 में जब मैंने चंडीगढ़ जनसत्ता का कार्यभार संभाला, जूलियो रिबेरो आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब में राज्यपाल के सलाहकार थे। राष्ट्रपति राज में राज्यपाल और उनके सलाहकार ही शासन चलाते थे। राजभवन के एक आयोजन में जब मैं रिबेरो से मिला, वे कहीं से ‘सुपरकॉप’ नहीं लगते थे; उनमें अत्यंत सहजता और विनम्रता थी, खीज या उत्तेजना उनसे कोसों दूर नजर आती थी। मेरी जिज्ञासा पर अपने पर हुए एक जानलेवा हमले का किस्सा उन्होंने हंसते हुए सुनाया था।

ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।