हिट्स-लाइक के लिए अश्लीलता पर उतारू पत्रिका ग्रुप का पोर्टल, देखें ये हेडिंग और फोटो

एक दौर था जब लोग पत्रकारों के ईमानदार होने और निष्पक्ष पत्रकारिता के शानदार प्रयोगों के उदारहण दिया करते थे। बदलते समय के साथ साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का भी स्वरूप और लेखन बदल गया है। अब पत्रकारिता के नाम पर बड़े बैनर के वेब पोर्टल तक ज्यादा से ज्यादा हिट्स और लाइक के चक्कर में अश्लीलता परोसने में जरा भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।

कई बड़ी फिल्मों में मीडिया पार्टनर रहने वाले पत्रिका के वेब वेंचर ने कामुक और कामवासना की एक कहानी लिख दी। यह कहानी भाई-बहन के रिश्ते को लेकर लिखा गया है। क्या अब पाठक खबर की जगह ऐसी सेक्स स्टोरी पढ़ेंगे? उस पर भी खबर लिखने वाले रिपोर्टर ने स्टोरी की हैडिंग भी बड़ी ‘खूबसूरती’ से सोचने के बाद दी है, जिस पर संपादक जी ने अपनी मोहर लगाई होगी। साथ ही इस खबर के साथ जिस काल्पनिक तस्वीर का प्रयोग किया गया है, वह भी सेमी पोर्न से कम नहीं है.

लखनऊ से अक्षय कुमार की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या ‘न्यूज़ वेब पोर्टल’ विश्वसनीयता हासिल नहीं कर पा रहे हैं?

Abhishek Ranjan Singh :  न्यूज़ चैनल ‘लाइव प्रसारण’ की क्षमता से ज़िंदा हैं। बाकी मौजूदा ‘न्यूज़ वेब पोर्टल’ भ्रामक, अधूरी और एकपक्षीय ख़बरों की वजह से देश की जनता के बीच अपनी पकड़ नहीं बना पा रहे हैं। इसकी वजह विश्वसनीयता हासिल न कर पाना है। न्यूज़ चैनलों और डिजीटल मीडिया की मेहरबानी से भारत में अख़बारों और पत्रिकाओं का भविष्य पहले अधिक उज्जवल हो गया है।

एक महत्वपूर्ण बात और.. बड़े-बड़े अख़बारों के वेबसाइट्स हिट्स बढ़ाने के लिए अनाप-शनाप ख़बरें लगाते हैं। यहां अख़बारों की तरह स्वतंत्र लेखन का कोई अवसर नहीं है। वैसे अख़बारों में भी हालत कौन सी अच्छी है? हिंदी में एक आलेख का भाव आज भी 1000-1500 से अधिक नहीं है। वह भी दो-तीन महीने या उससे भी अधिक समय बाद मिलते हैं। जब ज़्यादा अख़बार, न्यूज़ चैनल और ‘मोथा घास’ की तरह उग आए ‘डिजीटल मीडिया’ नहीं था. उस वक़्त कई लेखक-पत्रकार स्वतंत्र लेखन कर अपनी जीविका चला लेते थे। मौजूदा समय में ऐसा करना संभव नहीं रह गया है।

आईआईएमसी के छात्र रहे युवा पत्रकार अभिषेक रंजन सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: