पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन चेतावनी भरा रहा, आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे

: मीडिया को पुनर्जीवित करने का अभियान : मीडिया में अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। पूरे के पूरे अख़बार, सप्लीमेंट्स ही पेड हो गए हैं। छोटे- बड़े , कई – कई यही काम कर रहे हैं। चैनलों के ब्यूरो के ब्यूरो खुले आम नीलाम हो रहे हैं। पैसा लाओ , जो छापना है छापो; जो दिखाना है दिखाओ। राजनीतिक दल और सरकारें भी मीडिया को गुलाम बनाने पर तुली हैं। नाहक नहीं है कि प्रेस कौंसिल के चेयरमैन कह रहे हैं कि मीडिया आम अवाम की आवाज दबाने की साज़िश का हिस्सा हो गया है। इस सन्दर्भ में एक रपट…

आवाज न उठी तो फिर फिरौती, डकैती, लूट और पक्षधरता ही पत्रकारिता के मूल्य और मानक होंगे

बुधवार को श्री एन.के सिंह ने देश के सारे संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को एक बहुत नाराजगी भरा एसएमएस भेजा। उन्होंने कहा कि हमारी पत्रकारिता को क्या हो गया है कि श्री बी.जी. वर्गीज जैसे बड़े संपादक का निधन होता है, और सारी खबर बहुत सरसरे ढंग से चंद लाइनों में निबटा दी जाती है। वे इतने गुस्से में थे कि उन्होंने कहा कि ऐसे ही हालात रहे तो शायद आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे। पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन बहुत चेतावनी भरा रहा।

श्री एन.के. सिंह मेरी और मुझसे बड़ी पीढ़ी के देश के सबसे सशक्त पत्रकार हैं। उन्होंने नई दुनिया से पत्रिकारिता शुरू की। इंडियन एक्सप्रेस में रहे, इंडिया टुडे में रहे, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक रहे और ऐसे पत्रकार हैं, जिनके चरित्र, जिनके स्वभाव और जिनकी मानवीय संवेदना को मानक माना जाता है। वे ओल्ड स्कूल के पत्रकार हैं, लेकिन आधुनिक जरूरतों और तकाजों से भी खूब वाकिफ हैं। उनकी गुरुता और गंभीरता अद्भुत है। मुझे भी 2000 से 2003 तक दैनिक भास्कर, भोपाल में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। ऐसी सादगी, ऐसा संयम, ऐसी जानकारी और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति उनके जैसी निष्ठा, सजगता और तत्परता बहुत कम देखने को मिलती है। पत्रकारिता का बहुत संयमित और मर्यादित ढांचा बनाने और उसे चलाने में उनका जवाब नहीं।

परसों सुबह उनसे बात हुई। गुस्सा थोड़ा कम हुआ था, उसकी जगह चिंता ने ले ली थी। श्री वर्गीज के निधन की खबर को समुचित महत्व न मिला तो उसका एक बड़ा कारण तो डेस्क पर बैठे पत्रकारों की ना जानकारी भी हो सकता है। ध्यान बदल गया है, पत्रकार छोटे-बड़े नेताओं और सतही विषयों की चर्चा में मशगूल हैं, और इसी को पत्रकारिता मान बैठे हैं; तो उन महामना लोगों पर उनका ध्यान कैसे जाये, जिन्होंने पत्रकारिता को सींचा है, और सींचते चले जा रहे हैं। उन पर ध्यान जाने की भी बात तो तब होती जब पत्रकारिता के मूल्यों और मानकों पर चलना होता। इसलिए अंगे्रजी में न सही, हिंदी में बहुतों को पता भी न हो कि श्री बी.जी वर्गीज कौन, तो यह भी कोई अचरज की बात नहीं। और यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ती जाये, इसमें भी कोई अनहोनी नहीं होगी। एक संकट और है। मराठी के एक पत्रकार से बात की तो उन्होंने कहा, श्री बर्गीज तो अंग्रेजी के पत्रकार थे, मराठी के होते तो हम महत्व देते।

मीडिया जिस शेप में है, और होता जा रहा है, उसके बुनियादी कारण हैं। पे्रस काउंसिल पूरी तरह डिफंक्ट हो गयी है,और सरकारों के सूचना विभाग पत्रकारिता को संजोने के बदले, पत्रकारिता को बिगाड़ने का काम ज्यादा कर रहे हैं। कौन निकाल रहा है अखबार, उसकी बुनियादी योग्यता क्या है,किस कारण निकाल रहा है, उस बारे में न तो रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स के यहां कोई सोच है और न ही सूचना विभागों के पास। सरकारी विज्ञापनों को हासिल करने का एक खेल हो गया है। इसी तरह अनेक चैनल और अखबार वसूली के लिए निकाले जा रहे हैं, उनमें से कई शुद्ध-शुद्ध अपराध कर रहे हैं; और इन पर निगरानी रखने की कोई संस्था नहीं। फिरौती, डकैती, वसूली सब पत्रकारिता के धंधे हो गये हैं; और पत्रकारों की जो पौध आ रही है, उसे भी नौकरी के नाम पर इस काम में उतार दिया जा रहा है। नौकरी चाहिए, तो यह सब करने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं है। और ऐसे ही ह्यसिद्धह्ण लोग बड़े पैसेवाले और प्रभाव वाले बनकर घूम रहे हैं; तो, तो मानक का असल संकट तो खड़ा है। और सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो वसूली और बेईमानी, लूट और डकैती ही मानक बनने जा रहे हैं। श्री एन.के. सिंह जी ने बहुत सही वक्त पर आवाज उठायी है। लेकिन करना क्या चाहिए, इस पर बाद में। पहले श्री बी.जी. वर्गीज की बात –

श्री बीजी वर्गीज हमारे समय के प्रखरतम पत्रकारों में से एक रहे हैं। बहुत ही निष्ठावान, और बहुत ही चरित्रवान। बहुत ही सजग और तत्पर। बहुत ही विनम्र। पूरे तौर पर सिद्धांतवादी। वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़कर आये थे, और टाइम्स ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की शुरुआत की। 1966-69 तक वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रहे। 1969 में वे हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक बने, और आपातकाल लगने तक उसके संपादक रहे। आपातकाल का बहुत सारे पत्रकारों ने विरोध किया था। नई दुनिया जैसे अखबारों ने संपादकीय खाली छोड़ दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी से रिश्तों के बावजूद श्री वर्गीज ने आपातकाल का खुलकर विरोध किया। नौकरी भी छोड़नी पड़ी। लेकिन वे झुके नहीं। विरोध को आगे बढ़ाते हुए 1977 में उन्होंने लोकसभा चुनाव तक लड़ा। नागरिक अधिकारों के वे प्रखर प्रवक्ता थे, और विकास की पत्रकारिता करने में उनकी लगन थी। ऐसे ही उत्कृष्ट लेखन और सिद्धांतप्रियता के लिए उन्हें 1975 में रमन मैगसेसे सम्मान मिला। 1982-86 तक वे इंडियन एक्सप्रेस में भी संपादक रहे। बाद के दिनों में वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े रहे। एडिटर्स गिल्ड के सदस्य के रूप में उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों की भी जांच की।

डेवलपमेंट ईशूज पर उन्होंने खूब लिखा। वॉटर्स ऑफ होप (1990), विनिंग द फ्यूचर (1994) में उन्होंने हिमालय क्षेत्र में पानी की व्यवस्था के बारे में लिखा। नार्थ ईस्ट को लेकर भी उनकी किताब ह्यइंडियाज नॉर्थ इस्ट रिसर्जेंटह्ण खूब चर्चित रही। 2010 में उनकी जीवनी भी आयी – ह्यफर्स्ट ड्रॉफ्ट : विटनेस टू मेकिंग ऑफ मार्डन इंडियाह्ण। उनकी यह जीवनी अद्भुत है। इसमें उन्होंने इंदिरा जी के और राजीव गांधी के जमाने में लोकतांत्रिक संस्थाओं को जो नुकसान पहुंचा उसके बारे में बहुत विस्तार से लिखा है। नागरिक अधिकारों के वे इतने प्रबल समर्थक थे, कि उनकी जरा भी अवमानना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।

श्री बीजी वर्गीज से मेरा परिचय श्री प्रभाष जोशी के कारण हुआ। प्रभाष जी जनसत्ता के संपादक। और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति निरंतर सजग रहने वाले। अभियान चलाने और कुर्बानी देने दोनों के लिए तैयार रहने वाले। उनकी श्री वर्गीज से खूब निकटता थी। बरसों से पत्रकारिता में दो भारी खलल चलते रहे हैं। एक तो, सरकारों की मंशा मीडिया पर कब्जा करने की रहती है। इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाये जाते हैं। पीवी नरसिम्हाराव सरकार के आखिरी दिनों में कुछ मंत्री यत्र-तत्र मीडिया पर दबाव बनाने में लगे थे। तब तक संपादकों के बदले विज्ञापनकर्मियों को महत्व देने के परिणाम भी उभर आये थे। संपादकीय संस्थान जगह-जगह दरकिनार हो रहे थे।

दूसरे, मीडिया पर कब्जा करने की भाजपा की मंशा बहुत पुरानी रही है। जनता सरकार में श्री लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब पार्टी कार्यकर्ताओं को जगह-जगह घुसाने की कोशिशें हुईं। इसके बाद यह काम पूरे योजनाबद्ध ढंग से होने लगा। जहां भी जैसे भी मौका मिले, कार्यकर्ता घुसाओ। ये कार्यकर्ता आम तौर पर तो पत्रकार बने रहते, लेकिन जरूरत के वक्त पार्टी कार्यकर्ता हो जाते। 94-95 तक उन्होंने पूरी मीडिया को घेर लिया। तब अखबार निकालने की ताकत उनके लोगों में नहीं थी। बाद में ताकत आयी तो अब तो प्रतिष्ठान के प्रतिष्ठान उनके लोगों के मालिकाने के हैं। सेंध लगाने से लेकर पत्रकारिता हथियाने तक की यह कहानी बहुत विस्तार से लिखने की मांग करती है। उसका विवरण फिर कभी।

1995-96 में जनसत्ता के कई लोगों को लगा कि इन मुद्दों पर बोलना जरूरी है। प्रभाष जोशी की प्रेरणा बनी हुई थी। हमने कांस्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर सभागार में इस विषय पर विचार करने के लिए सभा बुलायी। हाल खचाखच भरा। प्रभाष जी थे ही, मृणाल पांडे, कुलदीप नैय्यर, बीजी वर्गीज, जसवंत सिंह यादव, न्यायमूर्ति सावंत – दिल्ली का कोई सुधी पत्रकार ऐसा नहीं था, जो नहीं आया, और जिसने साथ चलने का संकल्प नहीं लिया। संयोजन का जिम्मा मेरे ऊपर आया। अभियान का नाम बना – पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान। अभियान लोगों से अपील करता कि मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा मत कीजिए। सूचनाएं प्रदूषित हो गयी हैं। उन्हें जान-समझ कर ग्रहण कीजिए। मुंबई में कार्यक्रम हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों के छात्र संघ ने अभियान में शिरकत की। बीएचयू में तो सात घंटे तक बैठक चलती रही। कुलपति महोदय ने कहा कि 17 साल बाद मालवीय सभागार में ऐसी कोई सभा हुई है। यही हाल इलाहाबाद के छात्र संघ भवन का था। भोपाल, जयपुर, लखनऊ – हर जगह अभियान को समर्थन मिला। अनेक जगहों पर चर्चा हुई कि देश में अपने किस्म का यह अलग आंदोलन खड़ा हो रहा है।

बाद में हम लोग ही कुछ अनमने हुए और आंदोलन रुका। लेकिन उस वक्त उसने अनेक कारगुजारियों को रोका,और इस संभावना को ख़ड़ा किया कि मीडिया के लोग संगठित होकर मूल्यों और मानकों के मुद्दे पर आम जनता को भी सहभागी बना सकते हैं। श्री बीजी वर्गीज को उस दौर में ही थोड़ा जाना। एक-एक समस्या को ठीक से समझने वाले। एक-एक घटना के परिणाम को ठीक से समझने वाले। हमारे समय के एक अच्छे ऋषि। वे नहीं रहे, उन्हें बहुत-बहुत नमन।

आगे की बात के पहले एक बार फिर श्री प्रभाष जोशी की बात। सूचना का अधिकार दिलाने में उनकी और जनसत्ता की बड़ी भूमिका रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वे अकेले पत्रकार रहे, जिन्होंने बिना रुके लगातार संघ और उसकी मंशा का विरोध किया। इसी तरह विदेशी निवेश और विदेशी मालिकाने के सवाल पर भी वे कभी नहीं झुके। डंकल ड्राफ्ट के खिलाफ श्री रामबहादुर राय के साथ मैंने, इरा झा और अनंत मित्तल ने राष्ट्रपति तक जाकर जो प्रतिरोध दर्ज करवाया, उसमें दिल्ली से 900 से ज्यादा पत्रकारों की आवाज थी। सुबह गिरफ्तारी के समय हम 25-30 लोग ही इकट्ठा हुए। राय साहब कहते रहे- हम और आप हैं न । आंदोलन पूरा मानिए। वहीं शाम को सैकड़ों लोग जुटे। पेड न्यूज के खिलाफ श्री प्रभाष जोशी अंत तक लड़ते रहे। यह अफसोस है कि उनकी बात जनसत्ता के हम लोगों ने ही जल्द बिसार दिया। उनकी पुण्यतिथि पर या उनके जन्मदिन पर इन बातों की हम लोग भले चर्चा करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि व्यवहार में कुछ नहीं करते।

जानने की बात है कि श्री एन.के. सिंह श्री प्रभाष जोशी के सबसे प्रिय लोगों में से एक हैं। वे पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी निरंतर लड़ते रहे हैं। उन्होंने, श्री शलभ भदौरिया ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के हित की कई जानी-मानी लड़ाइयां लड़ी हैं। उनके चलते कई संस्थानों में पत्रकारों और पत्रकारिता के हित की बातें हुई हैं। श्री शलभ भदौरिया का संगठन मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ मध्यभारत में सर्वत्र फैला हुआ है। वह एक बड़ी ताकत है। उसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री एन.के. सिंह की साख और विश्ववसनीयता बड़ी और मानी हुई है।

पत्रकारिता में आज जो जंगल राज हो गया है, एक बहुत विश्वसनीय आवाज ही वॉर्निंग सिग्नल का काम कर सकती है। श्री एन के सिंह बहुत सहज रूप से वैसी ही एक धुरी बन सकते हैं, जैसे कि श्री प्रभाष जोशी थे। मेरे जैसे अनेक पत्रकार उनके पीछे चलने में गौरव महसूस करेंगे। और पत्रकारिता की भी यह सच्ची सेवा होगी। जैसे पत्रकारिता श्री प्रभाष जोशी से अपेक्षा करती थी,वैसे ही पत्रकारिता श्री एन.के. सिंह जी से भी अपने मूल्यों और मानकों को सुरक्षित रखने के काम को आगे बढ़ाने की अपेक्षा करती है।

कृपया इस निमंत्रण को स्वीकार करें। देश में एक मंच तो हो, जहां से पत्रकारिता की यथास्थिति पर बात तो हो। जो कुछ हो रहा है, अवाम भी उसे जानता चले। ऐसा न हुआ तो होगा खबरों को बेचने का धंधा; लेकिन फिरौती, छिनैती,लूट और डकैती ही मानक न बन जाएं, इसकी जद्दोजहद तो हमें करनी होगी। अंकुश लगानेवाली संस्थाओं को भी निगहबानी पर लगाया जा सके तो प्राथमिक काम हो जायेगा। होगा उसी तरीके से, श्री राम बहादुर राय के हवाले से जिसका मैंने उल्लेख किया –

हम दो हैं, तीन हैं, पांच हैं, सात हैं, दस हैं – हम हैं, यही दुनिया को दस्तूर पर लाने के लिए काफी होगा। वाणी मिथ्या नहीं जाती। यदि विश्वास से बोली गई हो तो। डंकल ड्रॉफ्ट के मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री को लिखा – दिल्ली के एक हजार पत्रकार बोल रहे हैं। इनकी चिंताएं हैं। सरकार सारे मामले पर फिर एक बार विचार करे। – इसके पहले राय साहब और मैंने बात रखी। राष्ट्रपति महोदय ने केवल एक शब्द पूछा – आप दोनों लोग कहां के हैं। बताया, राय साहब गाजीपुर के। मैं आजमगढ़ का। जाने के लिए उठ खड़े हुए राष्ट्रपति बैठ गए। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा- ओह, आपके इलाके ने आजादी की लड़ाई के लिए बहुत संघर्ष किया है। उस इलाके के लोगों का दर्द मैं समझता हूं। उनकी चिंताएं कभी वृथा नहीं हो सकतीं।

और मावलंकर सभागार में श्री कुलदीप नैयर बोल कर आए थे कि केवल पांच मिनट रुकेंगे। फिर आए तो पूरे समय बैठे। बोले, भरोसा नहीं था कि सारी बिरादरी यहां बैठी होगी, इसलिए जल्दी जाने को बोला था।

मान्यवरो! निवेदन सुनें, अभ्यर्थना सुनें।

मीडिया को पुनर्जीवित करने के अभियान की खासियतें थीं –

-जनसता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंसियल एक्सप्रेस के साथियों के 100-100 रुपये के चंदे से ही कार्यक्रमों की शुरुआती व्यवस्था हो जाती थी।

-कार्यक्रम के सभागार के बाहर चद्दर बिछा दी जाती थी, और हर कोई कुछ न कुछ आर्थिक योगदान देता ही था।

-विश्वविद्यालय छात्र संगठन और समाजसेवी संस्थाएं खुद आगे बढ़कर साथ खड़ी होती थीं।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के तमाम बुद्धिजीवियों, समासेवियों, साहित्यकारों और सुधी लोगों ने शिरकत न की हो।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के सारे के सारे सुधी पत्रकार न आएं हों और उन्होंने मंच की बात लोगों तक न पहुंचायी हो।

लेखक ओम प्रकाश सिंह एब्सल्यूट इंडिया अखबार, मुंबई के संपादक हैं. उनसे संपर्क omprakash@absoluteindianews.com के जरिए किया जा सकता है.


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मीडिया में एक बड़े आंदोलन की जरूरत : अब न्यूज ही पेड नहीं हैं, अखबार और चैनल भी पेड हैं

ओम प्रकाश सिंह


मीडिया जिस मुकाम पर है, उसमें अब धमचक भी है, और आंतरिक विस्फोट भी जल्द होने वाले हैं। एक बड़े आंदोलन की जरूरत उठ खड़ी हुई है। जनसत्ता में पत्रकार रहे और अब एक बड़े लेखक श्री दयानंद पांडेय कहते हैं – मीडिया को कारपोरेट स्वार्थों, और भांड़ों और भड़ैतों ने घेर लिया है। जी हां, केवल भांड़ों और भड़ैतों ने ही नहीं, मिरासियों और बाई जी लोगों ने भी। जैसे नृत्य, संगीत आदि एक निश्चित किस्म के लोगों से घिर गये थे, वैसी ही हालत मीडिया की भी हो रही है।

राजस्थान पत्रिका के संपादक श्री गुलाब कोठारी ने दो साल पहले राजस्थान पत्रिका में प्रथम पृष्ठ पर एक संपादकीय लिखा – भ्रष्ट भी धृष्ट भी। उन्होंने कहा कि सरकारी सुविधाओं को लूटकर कुछ पत्रकार मनमानेपन और आवारागर्दी पर उतारू हैं; और सरकारें भी ऐसे ही पालतू साड़ों को पाल रही हैं। राजस्थान पत्रिका के खिलाफ कुछ पहलवानों ने धरने-प्रदर्शन भी किये। पर अब प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी चेतावनी जारी की है कि किस तरह उत्पाद बेचे जा रहे हैं, और पब्लिक को बरगलाया जा रहा है, उस पर हमारी खूब नजर है। फिल्म छाप रहे हैं, खेल छाप रहे हैं, और गैर-मुद्दों को मुद्दा बना रहे हैं, जाति और संप्रदाय की नफरत फैला रहे हैं, लूट और ब्लैकमेल कर रहे हैं। अवाम सचेत न हो, वह अपने हित-अनहित न सोचने लगे, इसलिए लोगों को भरमाया जा रहा है। हम बोलेंगे बच्चू लोगों, सब देख रहे हैं।

और, श्री बी.जी. वर्गीज के स्मरण से पत्रकारिता के तकाजे पर बात लेख पर भी खूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। मुंबई से युवा पत्रकार श्री फहीम अब्बाद फराही ने लिखा है – आज पत्रकारिता को ऐसी जिंदगी चाहिए, जो पूंजीपति वर्ग के हस्तक्षेप से मुक्त हो। इसके बगैर पत्रकारिता लगभग एक तरह की गुलामी है।

और, मुंबई के एक और बहुत सुधी युवा पत्रकार मेरे इन बॉक्स में लिखते हैं – रास्ता क्या है? जो अच्छा लिखने-पढ़ने वाले हैं, वे मीडिया में दरकिनार हैं। इसके बदले मालिकान उन्हें प्रोमोट करते हैं, जो विज्ञापन या जिस किसी और तरीके से संभव हो, पैसे लाकर कंपनी के खाते में जमा कराते हैं। मालिकों के बिजनेस इंटरेस्ट को प्रोमोट करते हैं। आप सोच सकते हैं कि आम पत्रकार किस परिस्थिति और किस मानसिकता में जी रहा है। इन भांड़ और भड़ैतों से छुट्टी कैसे मिले? इन युवा पत्रकार का नाम मैं जान-बूझकर नहीं दे रहा हूं,ताकि ये किसी घेरेबंदी में न फंसें। लेकिन शुद्ध कीचड़ के भीतर से उन्होंने ऐसी आवाज उठायी है, इसके लिए समूचे अंतर्मन से उनकी अभ्यर्थना कर रहा हूं।

निर्भय पथिक के संपादक श्री अश्विनी मिश्र ने कहा है – बाजार और बाजारीकरण हाबी हो गया है। इसलिए बाजारू पत्रकार भी हाबी हो गये हैं। यह देखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि जो अखबार निकाल रहा है, वह किस इरादे से निकाल रहा है। पैसा कमाना है इसलिए हर हथकंडे इस्तेमाल किये जा रहे हैं। कई आम पत्रकार भी इसी में अपना कैरियर तलाश रहे हैं। और ज्यादातर लोगों के पास ऐसे लोगों की गुलामी करने के सिवा चारा ही क्या है? सबको घर-परिवार चलाना है। जीना है।

और दक्षिण मुंबई के संपादक श्री सुमंत मिश्र कहते हैं -पत्रकारों में आपसी संवाद नहीं है, एकता नहीं है, इसलिए मीडिया दुर्दशा की शिकार है।

जनसत्ता की टीम तो ऐसे किसी आंदोलन से जुड़ती ही है। श्री अंबरीश कुमार इस आलेख को अपनी वेबसाइट जनादेश डॉट कॉम पर डाल रहे हैं। इंदौर से रुपेंद्र सिंह और भोपाल से राजेंद्र सिंह जादौन भी ऐसा ही कर रहे हैं। बहुत सुधी पत्रकार सुधीर सक्सेना ने अपनी पत्रिका इन दिनों में छापने के लिए मांगा है। और फहीम अब्बाद फराही ने तो अपने सेकुलर संदेश के लिए इसे पहले ही चुन लिया है। जनसत्ता के बहुत सुधी पत्रकार संजय कुमार सिंह ने लिखा है –

मीडिया में श्री वर्गीज के निधन को महत्व ना मिलने का एक कारण आपने यह भी बताया है कि डेस्क पर बैठे (कनिष्ठ, नवसिखुए) पत्रकारों को शायद श्री वर्गीज के बारे में जानकारी ना हो – इससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है पर कनिष्ठों के माथे ठीकरा फोड़ने भर से काम नहीं चलेगा। मुझे याद है प्रभाष जोशी ऐसे मौकों पर दफ्तर में (अपने कमरे में नहीं, डेस्क पर हम लोगों के बीच होते) थे और उनका दुख, उनकी चिंता साफ झलक रही होती थी। वो लोगों से चर्चा करते थे और खुद जरूर कुछ ना कुछ लिखते थे। आज के संपादकों में कितने लोग जॉर्ज वर्गीज के बारे में लिख सकते हैं, लिखने को कुछ होता तो लिखे ही होते। बाकी विज्ञापन बटोरने और दारू पीने से फुरसत मिले तो सेटिंग गेटिंग के बाद समय कहां मिलता है। जूनियर को सिखाना होता है जो लगभग बंद सा है। इसका असर धीरे-धीरे दीखने लगा है। जो नुकसान वर्षों में हुआ है उसकी भरपाई मुझे नहीं लगता कि सिर्फ चिंता करने से दूर होगी।

और श्री दयानंद पांडेय के दो कहे को और देख लीजिए – ”चौथा खंभा तो बस एक कल्पना भर है। और सच्चाई यह है कि प्रेस हमारे यहां चौथा खंभा के नाम पर पहले भी पूंजीपतियों का खंभा था और आज भी पूंजीपतियों का ही खंभा है। हां, पहले कम से कम यह जरूर था कि जैसे आज प्रेस के नाम पर अखबार या चैनल दुकान बन गए हैं, कारपोरेट हाऊस या उसके प्रवक्ता बन गए हैं, यह पहले के दिनों में नहीं था। पहले भी अखबार पूंजीपति ही निकालते थे पर कुछ सरोकार, कुछ नैतिकता आदि के पाठ हाथी के दांत के तौर पर ही सही थे। पहले भी पूंजीपति अखबार को अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए ही निकालते थे, धर्मखाते में नहीं। पर आज? आज तो हालत यह है कि एक से एक लुच्चे, गिरहकट, माफिया आदि भी अखबार निकाल रहे हैं, चैनल चला रहे हैं और एक से एक मेधावी पत्रकार वहां कहांरों की तरह पानी भर रहे हैं या उन के लायजनिंग की डोली उठा रहे हैं। और सेबी से लगायत, चुनाव आयोग और प्रेस कौंसिल तक पेड न्यूज की बरसात पर नख-दंत-विहीन चिंता की झड़ी लगा चुके हैं। पर हालात मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की सरीखी हो गई है। नौबत यह आ गई है कि अखबार या चैनल अब काला धन को सफेद करने के सब से बड़े औज़ार के रूप में हमारे समाज में उपस्थित हुए हैं। और इन काले धन के सौदागरों के सामने पत्रकार कहे जाने वाले पालतू बन गए हैं। पालतू बन कर कुत्तों की वफादारी को भी मात दिए हुए हैं यह पत्रकार कहे जाने वाले लोग। संपादक नाम की संस्था समाप्त हो चुकी है। सब से बुरी स्थिति तो पत्रकारिता पढ़ रहे विद्यार्थियों की है। पाठ्यक्रम में उन्हें गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, पराडकर, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर आदि सरीखों की बात पढ़ाई जाती है और जब वे पत्रकारिता करने आते हैं तो गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी या पराडकर, जोशी या माथुर जैसों की जगह रजत शर्मा, बरखा दत्त, प्रभु चावला आदि जैसों से मुलाकात होती है और उनके जैसे बनने की तमन्ना दिल में जागने लगती है। अंतत: ज़्यादातर फ्रस्ट्रेशन के शिकार होते हैं। बिलकुल फिल्मों की तरह। कि बनने जाते हैं हीरो और एक्स्ट्रा बन कर रह जाते हैं। सो इन में भी ज्यादातर पत्रकारिता छोड़ कर किसी और रोजगार में जाने को विवश हो जाते हैं। ”

श्री दयानंद पांडेय का ही दूसरा कहा देखिए –

”अब तो हालत यहां तक आ गई है कि अखबार मालिक और उस का सो काल्ड प्रबंधन संपादकों और संवाददाताओं से खबर नहीं बिजनेस डिसकस करते हैं। सब को बिजनेस टारगेट देते हैं। मतलब विज्ञापन का टारगेट। अजीब गोरखधंधा है। विज्ञापन के नाम पर सरकारी खजाना लूट लेने की जैसे होड़ मची हुई है अखबारों और चैनलों के बीच। अखबार अब चुनावों में ही नहीं बाकी दिनों में भी खबरों का रेट कार्ड छाप कर पैसा वसूल रहे हैं। बदनाम बेचारे छोटे-मोटे संवाददाता हो रहे हैं। चैनलों तक में यही हाल है। ब्यूरो नीलाम हो रहे हैं। वेतन तो नहीं ही मिलता सेक्यूरिटी मनी लाखों में जमा होती है। तब परिचय पत्र जारी होता है। मौखिक संदेश होता है कि खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। और खा पी कर मूस की तरह मुटा कर ये अखबार या चैनल कब फरार हो जाएं कोई नहीं जानता। तो पत्रकारिता ऐसे हो रही है। संवाद सूत्रों की हालत और पतली है। दलितों और बंधुआ मजदूरों से भी ज्यादा शोषण इन का इतनी तरह से होता है कि बयान करना मुश्किल है। ये सिक्योरिटी मनी भी जमा करने की हैसियत में नहीं होते तो इन्हें परिचय-पत्र भी नहीं मिलता। कोई विवादास्पद स्थिति आ जाती है तो संबंधित संस्थान पल्ला झाड़ लेता है और बता देता है कि उस से उस का कोई मतलब नहीं है। और वह फर्जी पत्रकार घोषित हो जाता है। अगर हाथ पांव मजबूत नहीं हैं तो हवालात और जेल भी हो जाती है। इन दिनों ऐसी खबरों की भरमार है समूचे देश में। राजेश विद्रोही का एक शेर है कि, ‘बहुत महीन है अखबार का मुलाजिम भी/ खुद खबर है पर दूसरों की लिखता है।’ दरअसल पत्रकारिता के प्रोडक्ट में तब्दील होते जाने की यह यातना है। यह सब जो जल्दी नहीं रोका गया तो जानिए कि पानी नहीं मिलेगा। इस पतन को पाताल का पता भी नहीं मिलेगा।”

— तो समाधान क्या है? रास्ता क्या है? उपाय क्या है? परिदृश्य तो ये है। आम जन के मुद्दे भी मीडिया से गायब हैं। उसके बदले अवाम को अफीम परसी जा रही है, या बेईमानी दिखाई जा रही है। जन विश्वास का भ्रष्ट से भ्रष्ट दुरुपयोग किया जा रहा है।

पहले एक उल्हासनगर फिनामिनन था – हर कोई, एैरा-गैरा सरकारी तंत्र से अपना काम करवाने के लिए चार पन्ने का एक साप्ताहिक,पाक्षिक या मासिक पत्रिका निकाल लेता था। सरकारी अधिकारियों तक दांत निपोरने तक की पहुंच भी बनती थी, और अधिकारी भी संबंधित व्यक्ति की किसी नंगई-लुच्चई से डरते थे। लेकिन अब वह माजरा बड़े पैमाने पर है। जानिए – एक बड़े अखबार समूह को, जिसके पास चैनल भी है, कॉमनवेल्थ गेम्स में पब्लिसिटी का ठेका चाहिए था। सुरेश कलमाड़ी ने ना-नुकर की और पैसा चाहा। नतीजे में उस समूह ने कलमाड़ी के खिलाफ अभियान छेड़ा। उन्हें जेल तक पहुंचाया। और सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे हरेक को बताया कि बात न मानने पर यह होगा। यह समूह देश के सबसे बड़े पत्रकारिता समूहों में से एक है। उसी तरह आदर्श घोटाला उजागर करने की भी बोली लगी थी। श्री अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री पद से हटवाना था। वह सुपारी भी इसी अखबार समूह ने ली। – यह माजरा ऊपर का – और नीचे – चार पन्ने का एक अखबार खबर छापकर खड़ा होता है कि आपने अपनी झोपड़ी दो फुट ऊपर उठा ली है। इसकी शिकायत कर रहा हूं। अब इस चार पन्ने के अखबार मालिक से समझौते पर बैठिए। – नीचे से ऊपर तक मीडिया के नाम पर आम तौर पर इन दिनों यही चलन खड़ा हो गया है। – याद है नीरा राडिया टेप- बरखा दत्त केंद्रीय काबीना में मंत्री बनवा रही थीं, विभागों का बंटवारा करा रही थीं। – और इन लोगों में ऐसी मुकम्मिल गठजोड़ है कि किसी भी बड़े अखबार या चैनल ने टेप्स को नहीं छापे या दिखाये-सुनाये। सुधीर चौधरी का प्रकरण सभी को याद है। वे सीईओ के सीईओ बने हुए हैं। कई चैनलों से कामकाज करने वाली लड़कियों के शोषण की भी खबरें आती रहती हैं, जो दबी की दबी रहती हैं। मीडिया में कहीं भी किसी की भी नौकरी का तो कोई भरोसा ही नहीं। हकीकत यह है कि मालिक जब चाहे निकाल दे। ऐसे-ऐसे कांट्रैक्ट बनाये जाते हैं, जो सिरे से ही अपराध साबित हों। लेकिन पत्रकार नौकरी की चाहत में उन पर दस्तखत करने को मजबूर होते हैं। मीडिया का ताम-झाम एक ओर तो उत्पाद बनकर रह गया है। और उन्हें चलाने वाले, मालिक, संपादक सभी सेल्समैन। दूसरी ओर, उसे बनाना, चलाना निहित स्वार्थों के भी हवाले हो गया है। चौथा खंभा एक बड़ा धोखा बनकर रह गया है। आम और ईमानदार पत्रकार इसमें बुरी तरह पिस रहा है।

1995-96 में पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान के दौरान अनेक सुधी लोगों ने इस सवाल पर बार-बार विचार किया था। और श्री रामबहादुर राय का एक प्रस्ताव प्रशंसित भी हुआ था – कि पत्रकार मिलकर एक विश्वसनीय मीडिया खड़ा करें। काम सरल और सहज है; 1997 में मैंने स्वयं मुंबई में इसका एक प्रयोग भी किया। पर खर्च की वजह से असफल रहा। अब जब सोशल और डिजीटल मीडिया भी सामने हैं, तो ऐसे प्रयोग कम खर्च पर किये जा सकते हैं; और बहुत आसानी से सफल होंगे। भड़ास डॉट कॉम जैसे उदाहरण दिए जा सकते हैं; लेकिन यह बात बड़ी- उससे भी सरल उपाय हैं –

1. असल पत्रकार अपने अखबारों, चैनलों में वास्तविक खबरों को तरजीह दें। उन्हें मेहनत भी करनी होगी। और कई बार जिल्लत भी उठानी पड़ेगी। लेकिन कुछ अंशों में वास्तविक पत्रकारिता की कमी दूर होगी।

2. यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न जरूर पूछा होगा। यह कि ब्राह्मण मरा क्यों?

युधिष्ठिर ने जवाब दिया होगा – इसलिए कि उसे गंदगी से घेर दिया गया था। और वह उसे हटा न पाया।

तो, चाहे कैसी भी गंदगी से घिरे हों हम, उसे हटाना होगा। हो सकता है कि प्रतिष्ठानों के भीतर हम ठठाकर न हंस पायें। लेकिन प्रतिष्ठानों के बाहर तो हम स्वतंत्र हैं। जब भी कोई बुरा पत्रकार सामने हो, आप उसे इग्नोर तो कर सकते हैं। दरअसल इन सबकी महत्ता इसलिए कायम हो गयी है कि अच्छे लोगों ने उनके सामने सिर झुका लिया है। अच्छे लोग केवल माथा उठा लें – और पूरे ईमान से बुरे को बुरा कहें तो गंदगी दूर हो जाएगी। याद रखें, चोर और गुनहगार के पास पैसे हो सकते हैं, साधन हो सकते हैं, कलेजा नहीं होता।

3. माथे उठे हुए लोग माथे उठे हुए लोगों को जोड़ें। दुर्भाग्य है कि बुरे लोगों के गिरोह बन गये हैं। और अच्छे लोग अपने-अपने भीतर कैद हैं। यह इकट्ठा होना जरूरी है।

4. जो अच्छे रहे हैं, और चुप हैं; उन्हें बोलने के लिए कोंचें। बातचीत करें। गोष्ठियां करें, सबको बुलायें। अच्छाई को बचाने के लिए अच्छाई को चर्चा में बनाये रखना भी जरूरी है। साल में एक संवाद कर लें, बहुत लोग न जुटें, केवल न्यौता ही बांट दें – तो भी बहुत सारी बुराई कमजोर हो जायेगी। समाज ही खुलकर अच्छा-बुरा कहने लगेगा।

5. सत्ता प्रतिष्ठान में भी कुछ ही लोग होते हैं,जो बुरे लोगों को प्रोमोट करते हैं। इन लोगांे से भी चंद अच्छे लोग कभी-कभी संवाद कर लें कि आप जो कर रहे हैं, उस पर हमारी भी निगाह है। अधिकांश लोग बुरा इसलिए कर पा रहे हैं, क्योंकि अच्छे लोग चुप हैं।

अच्छे पत्रकारों की सभा बनाइए। अच्छी पत्रकारिता को फिजां में फैलाइए। जो सक्रिय पत्रकारिता में न हों, किन्ही दबावों में न हों, वे तो यह काम आसानी से कर सकते हैं।

उपाय और भी हैं –

1. पूरी जानकारी हो तो प्रेस काउंसिल को सूचना दीजिए। खुद न कर सकें तो किसी माध्यम को तलाशें।

2. पुलिस को भी सूचना दी जा सकती है।

3. चुनाव आयोग को सूचना दी जा सकती है।

4. मुख्यमंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक बोलना शुरू तो कीजिए – बोलें तो- परिणाम आयेंगे ही।

5. सरकारों से कहें कि पत्रकारों और अखबार मालिकों को मिलनेवाली सुविधाएं बंद की जायें। अब उनकी भूमिका दूसरी है तो सरकार उन पर पब्लिक फंड क्यों लुटाये?

6. इन सब बोलने का नतीजा यह होगा कि लोग भी आपके साथ चलेंगे।

जान लीजिए, अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। यानी अखबार ही पेड अखबार हो गये हैं। इसलिए प्रिय पाठकों बोलना तो होगा – इंतजार कीजिए, बोलना शुरू हो।

संकेत शुभ हैं। श्री एन.के. सिंह भी मामले पर विचार कर रहे हैं। शलभ भदौरिया जी का भी संदेश आया है। जनसत्ता के तमाम साथियों को मैं खुद संदेश भेज रहा हूं। नहीं होगा तो पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान का एक शुरुआती सम्मेलन मुंबई में ही हो जायेगा। जाति, संप्रदाय, भ्रष्टता और अफीमवाली बाजारू पत्रकारिता के खिलाफ बात तो करनी होगी।

जनसत्ता के संजय कुमार सिंह कहते हैं : ”मालिक की तो छोड़िए, एक समय टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन कहा करते थे कि प्रधानमंत्री के बाद उनका पद सबसे महत्वपूर्ण है। और प्रधानमंत्री का चुनाव तो देश की सवा सौ करोड़ जनता करती है (चलिए मान लेते हैं जो वोटर हैं वहीं) पर टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादक तो लाला चाहे किसी को भी बना सकता है। और यही करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक का ये हाल हुआ कि कौन है – किसी को पता नहीं होता। मालिकानों की ताकत भी इसी हिसाब से कम हुई है। कोई माने या ना माने लालाजी को जरूर अहसास होगा भले तिजोरी भर रही है इसलिए मगन हों।”

लेखक ओम प्रकाश सिंह एब्सल्यूट इंडिया अखबार, मुंबई के संपादक हैं. उनसे संपर्क omprakash@absoluteindianews.com के जरिए किया जा सकता है.

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