गोविंद ठाकरे जबलपुर पात्रिका के संपादक बने

रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पत्रिका में कार्यरत सिटी चीफ गोविंद ठाकरे को जबलपुर पत्रिका का स्थानीय संपादक नियुक्त किया गया है। वे पत्रिका में पिछले पांच सालों से कार्यरत हैं। 

इससे पहले वह नवभारत और दैनिक भास्कर में भी काम कर चुके हैं। अपनी कड़ी मेहनत और धारदार कलम के बूते उन्होंने यह बड़ा मुकाम हासिल किया है। वर्ष 2002 में उन्होंने बालाघाट (मध्यप्रदेश) के नवभारत ब्यूरो से करियर की शुरुआत की थी। 2004 में उनका चयन भास्कर अकादमी भोपाल में ट्रेनिंग के लिए हुआ। इसके बाद सितम्बर 2010 तक वे दैनिक भास्कर रायपुर में सीनियर रिपोर्टर रहे। वे पात्रिका में सिटी चीफ/न्यूज एडिटर रहे। इस दौरान उन्होंने शिक्षा जारी रखते हुए अकादमिक उपलब्धि भी हासिल की। 2011 में उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) पत्रकारिता विषय क्वालीफाई की। एक रिपोर्टर से संपादक के पद पर पहुंचने से पत्रकारिता के नए कलमकारों को प्रेरणा मिली है।

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पत्रिका के पत्रकारों के साथ और अधिक कठोर हुए गुलाब कोठारी

राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी का रवैया अपने ही स्टॉफ के प्रति दिनोदिन और अधिक कठोर होता जा रहा है। अपने खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में अवमानना के छह मामलों का सामना करने के बावजूद उनके रुख में मामूली सा भी बदलाव आने की बजाए मजीठिया मामले पर अवाज उठाने वालों के साथ उनकी सख्ती बढ़ती जा रही है। ताजा हालात खुद ब खुद बयान करती है ‘मददगार’ की विस्तृत रिपोर्ट –

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राजस्थान पत्रिका के भ्रामक और भड़काऊ संपादकीय के खिलाफ सामाजिक संगठन HRD ने की पुलिस में रिपोर्ट

जयपुर। राजस्थान पत्रिका के 30 मर्इ, 2015 के जयपुर संस्करण के सम्पादकीय में आरक्षण के बारे में भ्रामक और भड़ाकाने वाला सम्पादकीय लिखकर प्रकाशित करने पर हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रूपचन्द मीणा के साथ पुलिस थाना मोती डूंगरी, जयपुर में उपस्थित होकर लिखित रिपोर्ट पेश की है और राजस्थान पत्रिका के विरुद्ध आपराधिक और देशद्रोह का अभियोजन चलाने एवं राजस्थान पत्रिका के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है।

रिपोर्ट में लिखा है कि पुलिस को अवगत करवाया जाता है कि आज 30 मर्इ, 2015 के राजस्थान पत्रिका, जयपुर, शनिवार, के सम्पादकीय में निम्न असत्य, मूल अधिकार एवं संविधान विरोधी, आरक्षित वर्गों के विरुद्ध अनारक्षित वर्गों को भड़काने वाली और संविधान सभा एवं संविधान में आस्था रखने वालों का अपमान करने वाली समाग्री प्रकाशित की गयी है। सम्पादकीय में लिखी गयी आप़त्तिजनक पंक्तियों और उनके बारे में डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने संवैधानिक वास्तविकता को दर्शाते हुए रिपोर्ट में लिखा गया है कि-

सम्पादकीय पहली आपत्तिजनक पंक्ति-

‘‘..एक तरफ हम नौरियों में दस साल के लिए लागू किए गए आरक्षण को हर दस साल बाद बढाते जा रहे हैं…’’

इसके बारे में डॉ. मीणा ने रिपोर्ट में लिखा है कि-जबकि वास्तविकता यह है कि अजा एवं अजजा वर्गों के लिये सरकारी नौकरियों में प्रारम्भ से ही जो आरक्षण लागू उसके बारे में संविधान में दस साल का कोर्इ उल्लेख ही नहीं है, बल्कि कड़वी संवैधानिक सच्चार्इ यह है कि अजा एवं अजजा के लिये सरकारी नौकरियों में लागू आरक्षण संविधान के अनुच्छेद-16 (4) के अनुसार प्रारम्भ से स्थायी संवैधानिक व्यवस्था है। जिसे आज तक कभी भी नहीं बढाया गया है।

सम्पादकीय दूसरी आपत्तिजनक पंक्ति-

‘‘…आरक्षण हमेशा गरीबों के उत्थान के नाम पर दिया जाता है लेकिन उसका लाभ उठाते हैं सम्पन्न।’’

इसके बारे में डॉ. मीणा ने रिपोर्ट में लिखा है कि-जबकि वास्तविकता यह है कि अजा एवं अजजा वर्गों को प्रदान किया गया आरक्षण सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रदान किया गया है, न कि आर्थिक आधार पर। जिसका मकसद गरीबों का उत्थान नहीं, बल्कि अजा एवं अजजा वर्गों को राज्य के अधीन प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान करना है। सुप्रीम कोर्ट भी इस तथ्य की अनेक बार पुष्टि कर चुका है कि अजा एवं अजजा के आरक्षण का आधार सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन है, न कि आर्थिक पिछड़ापन।

सम्पादकीय तीसरी आपत्तिजनक पंक्ति-

‘‘…राजनेताओं ने नौकरियों में तो आरक्षण दिया ही, संसद और विधानसभाओं में भी आरक्षण दे डाला।…’’

इसके बारे में डॉ. मीणा ने रिपोर्ट में लिखा है कि-जबकि वास्तविकता यह है कि अजा एवं अजजा वर्गों को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण राजनेताओं ने नहीं दिया, बल्कि संविधान सभा ने मूल संविधान के अनुच्छेद-334 में पहले दिन से प्रदान किया हुआ है।

सम्पादकीय चौथी आपत्तिजनक पंक्ति-

‘‘…ये सब देखकर देश की जनता भले शर्मसार होती है लेकिन राजनेता हैं कि उन्हें हर हाल में सत्ता सुख चाहये।’’

इसके बारे में डॉ. मीणा ने रिपोर्ट में लिखा है कि-जबकि वास्तविकता यह है कि अजा एवं अजजा वर्गों को सरकारी शिक्षण संस्थानों, सरकारी नौकरियों और संसद और विधानसभाओं में जो आरक्षण प्रदान किया गया है, वह देश की जनता की ओर से ही मूल संविधान में प्रदान किया गया है। क्योंकि संविधान के पहले पृष्ठ, अर्थात् प्रस्तावना की पहली पंक्ति में ही लिखा है कि-
‘‘हम भारत के लोग……संविधान को अंगीकृत,
अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’
अर्थात् देश की समस्त जनता के द्वारा जो संविधान स्वीकृत किया गया, उसी के लिये जनता को शर्मसार होने की बात लिखना सीधे-सीेधे जनता को अजा एवं अजजा के विरुद्ध भड़काना और संविधान सभा का अपमान करना सम्पादकीय का दुराशय है।

सम्पादकीय पांचवीं आपत्तिजनक पंक्ति-

‘‘…यह खेल यूं ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश में दो वर्ग आमने-सामने होंगे और वो भी खुलकर। मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ 1990 के आरक्षण विरोधी उग्र आंदोलन को लोग अभी भूले नहीं हैं।…’’

इसके बारे में डॉ. मीणा ने रिपोर्ट में लिखा है कि- सम्पादकीय की उपरोक्त पंक्ति में जिन बातों के चलते रहने का उल्लेख किया गया है, वे सब संविधान की मूल भावना और संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं, जिनको लागू और क्रियान्वित करना प्रत्येक लोकतान्त्रिक सरकार का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इसके उपरान्त भी, बनावटी, असत्य, असंवैधानिक एवं निराधार बातों को संवैधानिक बतलाकर सम्पादकीय में जानबूझकर अनारक्षित लोगों को आरक्षित वर्गों के विरुद्ध भड़काने वाली आपराधिक भाषा का उल्लेख किया गया है।

उपरोक्त आपत्तियों का उल्लेख करने के साथ हक रक्षक दल सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा की ओर से पेश की गयी रिपोर्ट में आगे लिखा है कि इस प्रकार उक्त सम्पादकीय की उक्त पंक्तियॉं सीधे -सीधे अजा एवं अजजा के विरुद्ध खुला अपराध व राष्ट्र के विरुद्ध राजद्रोह हैं, यही नहीं यह देश की कानून और व्यवस्था के विरुद्ध आम लोगों को उकसाने और भड़काने वाली आपराधिक भाषा हैं और इसमें संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान के मौलिक प्रावधानों के खिलाफ आम लोगोंं को भ्रमित करके संविधान का अपमान करने के लिये आम लोगों को उकसाने वाली भाषा का उपयोग किया गया है। जिससे अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों तथा संविधान में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों की भावनाएँ आहत हुर्इ हैं। इस प्रकार राजस्थान पत्रिका का उपरोक्त सम्पादकीय आपराधिक कृत्य एवं राजद्रोह से कम नहीं है। अत: आग्रह है कि नियमानुसार राजस्थान पत्रिका के जिन-जिन भी संस्करणों में उक्त सम्पादकीय प्रकाशित हुआ है, उनके प्रकाशकों, मुद्रकों एवं सम्पादकों के विरुद्ध तत्काल सख्त विधिक कार्यवाही कर, सभी को दण्डित करने हेतु अभियोजित किया जावे और इस प्रकार के अपराधी एवं देशद्रोही समाचार-पत्र के प्रकाशन को तत्काल प्रतिबन्धित किये जाने की कार्यवाही की जावे।

यहां यह उल्लेखनीय है कि 28 मर्इ, 2015 के एचआरडी न्यूज लैटर में हक रक्षक दल सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने इस बात का खुलाशा किया था कि सरकारी शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अजा एवं अजजा को प्रदान किया गया आरक्षण संविधान  में सथायी व्यवस्था है, जिसे हर दस वर्ष बाद बढाने के बारे में भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है। इसके दो दिन बाद ही राजस्थान के सबसे बड़े कहलाने वाले समाचार-पत्र में इस संविधान विरोधी और आरक्षण तथा सभी आरक्षित वर्गों के विरुद्ध जहर उगलने वाला सम्पादकीय लिखा जाना अत्यन्त चिन्ता का विषय है। जिसकी कड़े शब्दों में भ्रर्त्सना की जाती है और हक रक्षक दल सामाजिक संगठन ऐसे विषयों पर चुप नहीं रहने वाला है, लेकिन ऐसे विषयों पर आरक्षित वर्गों का सक्रिय सहयोग जरूरी चाहिये।

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पत्रिका के संपादकों और मैनेजरों में मजीठिया के लिए केस करने वालों को तोड़ने की होड़

खबर है कि राजस्थान पत्रिका उदयपुर के मैनेजर नायर ने मजीठिया वेज बोर्ड के लिए केस करने वाले पांच कर्मचारियो को तोड़ लिया है. अखबार मालिक निहार कोठारी अपने सभी मैनेजरों और संपादकों पर दबाव डाले हुए हैं कि वे मजीठिया के लिए केस करने वाले कर्मियों को किसी तरह समझाएं और पटाएं. संपादकीय प्रभारी राजेश कसेरा पर भी यही दबाव है. सूत्रों के मुताबिक कसेरा को तीन बार मुख्यालय बुलाकर मजीठिया की मांग करने वालों को अपने पाले में करने के लिए दबाव बनाया गया.

डेस्क इंचार्ज महेश ओझा को तोडऩे का श्रेय हरीश पराशर को जाता है क्योंकि चेन्नई तबालदा करने की सूचना उन्होंने ही दी थी. ओझा के रिक्वेस्ट करने पर पराशर ने अहसान जताते हुए फिलहाल तबादला रुकवा दिया. मुकेश जैन को चीफ रिपोर्टर आनन्द शर्मा ने तोड़ा. चर्चा है कि कसेरा सिटी डेस्क इन्चार्ज विकास बोकडिय़ा को तोडऩे के लिए उसको सस्पेंड करवा दिया. अब बोकडिया ने नोटिसों का ऐसा कानूनी जवाब दिया है कि प्रबंधन फंसता नजर आ रहा है. मैनेजर नायर ने तीन चपरासियों अम्बालाल, लक्ष्मीलाल व दलीचंद को तोड़ऩे में सफलता हासिल की.

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विलासपुर से वरुण के बारे में सूचना

खबर विलासपुर पत्रिका से है। यहां रायपुर पत्रिका के सिटी प्रमुख वरुण श्रीवास्तव को स्थानीय संपादक बनाया गया है।

वरुण विलासपुर में रहेंगे। फिलहाल उन्हें राजेश लाहोटी के बीमार होने के चलते भेजा गया है, लेकिन पत्रिका छत्तीसगढ़ के राज्य संपादक जिनेश जैन वरुण की स्थाई नियुक्ति कर सकते हैं। 

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खंडवा में पत्रिका के खिलाफ एकजुट पत्रकारों के संघर्ष का बिगुल बजा, सीएम के नाम एसडीएम को ज्ञापन

खंडवा में मई दिवस पर एसडीएम को मजीठिया वेतनमान से संबंधित ज्ञापन देते पत्रकार

खंडवा : पत्रिका अखबार के जो कर्ता-धर्ता अपने आप को जनता का तथाकथित हितैषी बताकर नई-नई मुहिम चलवाते हैं और मुद्दे उठवाते हैं उसकी सच्चाई आप भी जान लीजिए। पत्रकारों के हक में लागू मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक प्रमुख समाचारपत्रों को एक निर्धारित राशि से वेतनमान देने के आदेश दिए गए हैं। इसके खिलाफ पत्रिका सहित कुछ अखबार वाले कोर्ट गए। बाद में कोर्ट ने पत्रकारों के हक में फैसला दे दिया। फिर क्या था। पत्रिका अखबार ने अपनी मनमानी शुरू कर दी। पत्रकारों से एक फॉर्मेट पर साइन करवाए गए कि हमें मजीठिया के मुताबिक सैलरी नहीं चाहिए। जिन पत्रकारों ने फॉर्मेट पर हस्ताक्षर कर दिए, उन्हें तो बख्श दिया बाकी को एन-केन-प्रकारेण प्रताड़ित कर बाहर करने की साजिशें रची गईं। यहां-वहां ट्रांसफर किए गए।

पूरे मामले से अवगत कराते हुए पत्रकार शेख वसीम ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के नाम शिकायती आवेदन एडीएम एसएस बघेल को सौंपा। पत्रिका की साजिश का शिकार रिपोर्टर शेख वसीम को भी बनाया गया। पत्रिका मालिकों के इशारे पर खंडवा में संपादकीय प्रभारी मुकेश सक्सेना और यूनिट प्रभारी ने दबाव बनाया। सक्सेना ने प्रताड़ित करते हुए खरगोन ट्रांसफर कर दिया। पूरे मामले से अवगत कराते हुए पीड़ित शेख वसीम ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के नाम एडीएम एसएस बघेल को शिकायती पत्र सौंपा। 

इस दौरान खंडवा में श्रमजीवी पत्रकार संघ अध्यक्ष देवेंद्र जायसवाल, राज एक्सप्रेस ब्यूरो चीफ देवेंद्र जायसवाल, एंटी क्राइम एंड करप्शन अपडेट के संपादक अनूप खुराना, राष्ट्रीय हिंदी मेल के ब्यूरो चीफ सुशील विधाणी, इमरान खान, सतीश शर्मा, रहीम बख्श खान, सुमित काले, बसंत राठौर (मोंटी), दुर्गाप्रसाद रघुवंशी, सचिन तिवारी, अमित दुबे सहित बड़ी संख्या में खंडवा सहित ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार शामिल हुए। एडीएम बघेल ने आवश्यक सहयोग के लिए आश्वस्त किया। 

खंडवा में पत्रिका अखबार में सिटी रिपोर्टर के रूप में काम करते हुए शेख वसीम ने स्पेशल मुहिम धोखे का जल, नर्मदा जल का निजीकरण निरस्त हो, अवैध स्लाटर हाउस बंद करो, जैसे दर्जनों मुद्दों पर सफल संचालन किया है। दबंग और रसूखदारों के खिलाफ खबर अभियान चलाने के दौरान वसीम के साथ धमकी और हमले की घटनाएं भी हुईं। बेहतर समाचार अभियान के लिए पत्रिका संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। करीब आधा दर्जन से अधिक प्रशंसा पत्र ग्रुप एडिटर, स्टेट एडिटर और स्थानीय संपादकों द्वारा प्रदान किए गए। संस्थान में रहने के दौरान वसीम ने रिकार्ड संख्या के साथ बाइलाइन स्टोरी स्टिंग ऑपरेशन, एक्सपोज, पड़ताल, एक्सक्लूसिव, लाइव रिपोर्ट और ह्यूमन एंगल स्टोरी पर काम किया है। कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुई। पत्रिका सतना एडिशन लांचिग के लिए चयनित विशेष रिपोर्टर्स की टीम में रहते हुए वसीम ने जबर्दस्त खबर अभियान और स्पेशल स्टोरी पर काम किया। इसके बावजूद पत्रिका अखबार के मालिक और तथाकथित स्थानीय संपादक मुकेश सक्सेना ने प्रताड़ित कर मजीठिया भुगतान से वंचित कर दिया। 

इससे पूर्व मजीठिया की मांग को लेकर वसीम ने पत्रिका के मालिक व प्रधान संपादक गुलाब कोठारी, एमडी निहार कोठारी सहित आधा दर्जन जिम्मेदार लोगों को श्रम विभाग के माध्यम से नोटिस पहुंचाया, लेकिन मोटी चमड़ी वालों पर कोई असर नहीं पड़ा। जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों के डेढ़ दर्जन से अधिक पत्रकार वसीम के समर्थन में आगे आए और एडीएम को शिकायत करने के दौरान पूरे समय उपस्थित रहे। प्रताड़ना मामले की शिकायत करने पत्रकारों के साथ ·लेक्टोरेट पहुंचे शेख वसीम ने कहा कि कुछ भी हो जाए, मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतन भुगतान का हक लेकर ही रहूंगा। खंडवा के सभी वरिष्ठ पत्रकारजों ने भी लड़ाई में साथ देने का आश्वासन दिला है।

शेख वसीम से संपर्क : 9479430111

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मजीठिया वेतनमान : भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए झूठे जवाब

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट में देश भर के पत्रकारों के भविष्य से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड के मामले  महत्वपूर्ण सुनवाई की तिथि अब चार-पांच दिन दूर है। इसके साथ ही मीडिया मालिकों ने पेशबंदी तेज कर दी है। पत्रकारों का हक मारने के लिए वे कानूनी स्तर पर तरह तरह की कागजी फरेब में लगे हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक गत दिनो सुप्रीम कोर्ट में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने अपने झूठे जवाब दाखिल करते हुए अदालत को बताया है कि उन्होंने अप्रैल 2014 से अपने यहां मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कर दी हैं। उन्होंने यह भी सफेद झूठ बयान किया है कि मजीठिया की धारा 20-जी के अनुसार उनके संस्थान के सभी मीडिया कर्मियों ने प्रबंधन को लिख कर दे दिया है कि वे पुराने वेतनमान से संतुष्ट हैं। इसके पीछे मंशा ये साबित करने की है कि जो मीडिया कर्मी कोर्ट नहीं गए हैं, उन्हें मजीठिया वेतनमान नहीं मिलेगा। बाकी कर्मचारियों का काम प्रबंधकीय प्रकृति का है, इसलिए वे मजीठिया वेतनमान के हकदार नहीं हैं।

 

….और ये रहा राजस्थान पत्रिका के सफेद झूठ का दावा 

सूत्रों के मुताबिक अपने दाखिल जवाब में दोनो अखबार मालिकों ने ये भी कहा है कि मजीठिया वेतनमान दिलाने का काम सुप्रीम कोर्ट का नहीं है। यह काम तो लेबर कोर्ट का है। इसलिए याचिकाकर्ता वहीं से अपने मामले पर फैसला लें। उल्लेखनीय है कि राजस्थान पत्रिका की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल उपरोक्त जवाब में गुलाब कोठारी और निहार कोठारी को पार्टी बनाया गया है। यह नियमतः गलत है। कम्पनी के ऐसे सभी कामों के लिए एच पी तिवाड़ी जिम्मेदार हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में देश भर के पत्रकारों के आर्थिक हितों की लड़ाई लड़ रहे संगठनों ने आह्वान किया है कि ‘साथियों, अब जवाब तैयार करना है। जवाब सभी को मिलकर तैयार करना है। आप सभी के सहयोग की जरूरत पड़ेगी। किसी भी कीमत पर पीछे न हटें। मालिकान को ये लड़ाई हारनी ही हारनी है। बताया गया है कि गुलाब कोठारी और निहार कोठारी को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और जेल जाने से बचाने के लिए एचपी तिवाड़ी को बलि का बकरा बनाया गया है। राजस्थान पत्रिका का जवाब झूठ के पुलिंदे के सिवा और कुछ नहीं। पत्रकारों ने इसका भी करारा जवाब देने की तैयारी कर ली है। पत्रिका प्रबंधन कुछ एक कर्मचारियों को 20 प्रतिशत वेतन वृद्धि से फुसलाकर उनके हक मार जाना चाहता है लेकिन वह अपनी चाल में कामयाब होने से रहा।   

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पत्रिका वाले कोठारी बाप-बेटा का कारनामा : हक के लिए कोर्ट जाने पर रामकुमार सिंह और राकेश वर्मा को निकाला

राजस्थान पत्रिका समूह से खबर है कि इस अखबार के मालिक पिता पुत्र इन दिनों पूरी तरह क्रूर हो चुके हैं. मजीठिया वेज बोर्ड के पैमाने पर सेलरी देने की मांग को लेकर जो-जो भी पत्रकार या गैर-पत्रकार सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य कोर्ट / उपक्रम में गए हैं, उन्हें बिना किसी नियम कानून की परवाह किए हुए संस्थान से बाहर निकाले जाने की कार्रवाई हो रही है.

ताजी सूचना के अनुसार जेड प्लस फिल्म के कहानीकार और पत्रिका समूह से संबद्ध रामकुमार सिंह को पत्रिका प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है. इनके अलावा पत्रिका समूह में वरिष्ठ पद पर कार्यरत राकेश वर्मा को भी हटाए जाने की सूचना है. इसके पहले विनोद पाठक को कोठारी पिता-पुत्र कोर्ट जाने के कारण बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं.  ज्ञात हो कि बुजुर्ग गुलाब कोठारी बड़े बड़े नैतिकतावादी आलेख अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर छापने के लिए कुख्यात हैं वहीं इनके बेटे निहार कोठारी पत्रकारों को दलाल बनाकर अपना हित साधने के लिए कुचर्चित हैं.

अब इन बाप बेटा की जोड़ी मिलकर उन सबको ठिकाने लगाने में जुटी है जो कोर्ट जाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुशंसित व आदेशित मजीठिया वेज बोर्ड के पैमाने के हिसाब से सेलरी मांगने को लेकर न्यायालय की शरण ले रहे हैं. इसे ही कहते हैं चिराग तले अंधेरा. जो मीडिया कंपनियां चीख चीख कर सरकार नैतिकता घपला घोटाला शोषण अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का ड्रामा करते हैं, अब वही अपने इंप्लाइज के न्याय मांगने पर उन्हें अनैतिक तरीके से ठिकाने लगा रहे हैं.

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पत्रिका में 12 का टर्मिनेशन और 40 का आउट ऑफ स्टेट ट्रांसफर

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पत्रिका में 12 का टर्मिनेशन और 40 का आउट ऑफ स्टेट ट्रांसफर

: सुब्रत राय की तरह पत्रिका के कोठारीज को भी भेजा जाए जेल : पत्रकारों के लिए मजीठिया की लड़ाई स्वतंत्रता संग्राम की तरह हो गई है। जिस तरह अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने वालों का दमन कर दिया जाता है, वैसे ही राजस्थान पत्रिका मैनेजमेंट के खिलाफ कोर्ट में जाने वालों के खिलाफ पत्रिका ने दमनकारी नीति शुरू कर दी है। 28 अप्रैल से पहले पत्रिका ने मजीठिया आंदोलन को पुरजोर तरीके से दबाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। मजीठिया आंदोलन लीड कर रहे पत्रकारों को पत्रिका प्रशासन ने रातों-रात टर्मिनेट करना शुरू कर दिया ताकि आंदोलन की कमर तोड़ सके।

राजस्थान पत्रिका के जयपुर मुख्यालय से संपादक स्तर के पत्रकार और सालों एडिट व जैकेट पेज देख रहे राकेश वर्मा को टर्मिनेट कर दिया गया है। रात को घऱ जाने के बाद उन्हें मैनेजमेंट ने फोन किया कि आपके सेवाओं की अब जरूरत नहीं है इसलिए आफिस आने की जरूरत नहीं है। इसी तर्ज पर जयपुर से फ्रंट पेज इंचार्ज विनोद पाठक, उदयपुर से वरिष्ठ पत्रकार विवेक भटनागर, भरतपुर के संपादक और सवाईमाधोपुर के इंचार्ज कौशल मूंदड़ा, अजमेर से सीनियर एकाउंटेट कैलाश नारायण शर्मा को राजस्थान से टर्मिनेशन की सूचना मैनेजमेंट द्वारा फोन पर दी गई और कहा गया कि आपका लेटर और हिसाब आपके घर पहुंच जाएगा। यह सब राजस्थान में हुआ है। कुल कुल 12 पत्रकारों को पत्रिका ने टर्मिनेट कर दिया है। इसके अलावा जयपुर से वरिष्ठ पत्रकारों को जो मजीठिया को लेकर कोर्ट गए उनको काले पानी की सजा देते हुए ट्रांसफर कर दिया गया है। इनमें विमल जैन, सत्यनारायण खंडेलवाल, महेश गुप्ता, अशोक शर्मा जैसे नाम शामिल हैं।

पत्रिका मैनेजमेंट का फंडा है कि कैसे भी करके इस आंदोलन में शामिल लोगों को तोड़ा जाए इसलिए धड़ाधड़ टर्मिनेशन और ट्रांसफर हो रहे हैं। वहीं पत्रिका ने अफवाह फैला रखी है कि ट्रांसफर होने वाले वरिष्ठ पत्रकारों ने मैनेजमेंट को माफीनामा लिखकर अपना ट्रांसफर कैंसल करवाने के लिए निवेदन किया है ताकि दूसरे शहरों के पत्रकार भी केस वापस लेने के लिए साइन कर दे। लेकिन सत्यनारायण खंडेलवाल ने माफीनामा के बदले अपना इस्तीफा मैनेजमेंट को सौंप दिया है। वहीं 3 पत्रकारों ने मैनेजमेंट के दबाव में केस वापसी पर साइन कर दिए हैं। पत्रिका की एक माह से ज्यादा की कवायद में चार सौ पत्रकारों में से प्रबंधन केवल 4 से ही केस वापसी पर साइन और माफीनामा लिखवाने में सफल रहा।

पत्रिका की इस दमनकारी नीति से मजीठिया के लिए कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का इरादा और मजबूत हो गया है। हर पत्रकार रोज अपने ट्रांसफर और टर्मिनेशन की राह देख रहा है। लेकिन अब पत्रकारों ने संकल्प लिया है इस दमनकारी नीति को कोर्ट में चुनौती दिया जाएगा और सहारा के सुब्रतो राय की तरह इस बाप-बेटे की जोड़ी गुलाब-निहारी कोठारी को जेल भेज कर अपना हक लेंगे। पत्रिका के कई लोग मजीठिया को लेकर कोर्ट में नहीं गए, अब ये सोच रहे है कि इन आंदोलकारियों को पैसा मिलेगा तो हमें भी मिल जाएगा। लेकिन इनकों यह नहीं पता कि यह मीडिया माफिया किसी एक का नहीं है। एक दिन सबका नम्बर आना है। इनका ट्रांसफर और टर्मिनेशन होना तय है। लेकिन नपुंसकों की तरह मालिकों के तलवे चाटने की आदत अभी तक इस बिरादरी में बरकरार है।

जय पत्रकार एकता
हमारा हक मजीठिया

पत्रिका में कार्यरत एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई, भविष्य की रणनीति और लड़ने का आखिरी मौका… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : सुप्रीम कोर्ट से अभी लौटा हूं. जीवन में पहली दफे सुप्रीम कोर्ट के अंदर जाने का मौका मिला. गेट पर वकील के मुहर लगा फार्म भरना पड़ा जिसमें अपना परिचय, केस नंबर आदि लिखने के बाद अपने फोटो आईडी की फोटोकापी को नत्थीकर रिसेप्शन पर दिया. वहां रिसेप्शन वाली लड़की ने मेरा फोटो खींचकर व कुछ बातें पूछ कर एक फोटो इंट्री पास बनाया. पास पर एक होलोग्राम चिपकाने के बाद मुझे दिया. जब तक कोर्ट नंबर आठ पहुंचता, केस की सुनवाई समाप्त होने को थी.

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में भड़ास यानि Bhadas4Media.com की पहल पर दायर सैकड़ों याचिकाओं की सुनवाई आज थी. जो साथी छुपकर लड़ रहे हैं, उनको मैं रिप्रजेंट कर रहा हूं. कोर्ट नंबर आठ में आइटम नंबर तीन था. दूसरे कई पत्रकार साथी और उनके वकील भी आए हुए थे. मामले की सुनवाई शुरू होते ही टाइम्स आफ इंडिया की तरफ से आए एक वकील ने कहा कि उनके खिलाफ जिस कर्मचारी ने याचिका दायर की थी, उसने वापस लेने के लिए सहमति दे दी है. इस पर कर्मचारी के वकील ने विरोध किया और कहा कि ये झूठ है. इसको लेकर न्यायाधीश ने लड़-भिड़ रहे दोनों वकीलों को फटकार लगाई और इस प्रकरण को अपने पास रोक लिया. इसी तरह वकील परमानंद पांडेय के एक मामले में जब दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि मजीठिया मांगने वाला कर्मी इसके दायरे में आता ही नहीं तो न्यायाधीश ने परमानंद पांडेय से पूछ लिया कि क्या ये सही है. पांडेय जी फाइल देखने लगे. तुरंत जवाब न मिलने पर न्यायाधीश ने इस मामले को भी होल्ड करा लिया. बाकी सभी मामलों में  कोर्ट ने सभी मालिकों को नोटिस भेजने का आदेश दिया है. इस नोटिस में कहा गया है कि क्यों न अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा शुरू किया जाए. मामले की सुनवाई की अगली तारीख 28 अप्रैल है.

दोस्तों, एक मदद चाहिए. सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े चाहिए. जो साथी इसे मुहैया करा सकता है वह मुझे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करे. अखबार मालिक अपने बचाव के लिए जो नई चाल चल रहे हैं, उसका काउंटर करने के लिए ये आंकड़े मिलने बहुत जरूरी हैं ताकि आम पत्रकारों को उनका हक दिलाया जा सके. मालिकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत तल्ख है. आज की सुनवाई से यह लग रहा है कि 28 अप्रैल की डेट पर सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कड़ा आदेश जारी कर सकता है. अगली डेट पर मालिकों की तरफ से क्या क्या नई चाल चली जाने वाली है, इसके कुछ डिटेल हाथ लगे हैं. उसी के तहत आप से सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े मांगे जा रहे हैं. आप लोग जिन-जिन अखबारों में हो, उन उन अखबारों के उपरोक्त डिटेल पता लगाएं. मैं भी अपने स्तर पर इस काम में लगता हूं.

दोस्तों बस कुछ ही दिनों का खेल है. जी-जान से सबको लग जुट जाना है. ये नहीं देखना है कि उसका वकील कौन है मेरा वकील कौन है. जो भी हैं, सब अच्छे हैं और सब अपने हैं. जो साथी अब तक इस लड़ाई में छुपकर या खुलकर शरीक नहीं हो पाए हैं, उनके लिए अब कुछ दिन ही शेष हैं. आप सिर्फ सात हजार रुपये में सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बनने वाली अपनी सेलरी व अपना एरियर का हक पाने के लिए एडवोकेट Umesh Sharma​ के मार्फत केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

आज यानि 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा ने जो कुछ मुझे बताया, उसे मैंने अपने मोबाइल से रिकार्ड कर लिया ताकि आप लोग भी सुनें जानें और बूझें. क्लिक करें इस लिंक पर: https://www.youtube.com/watch?v=KTTDbkReQ1k

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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भड़ास की पहल पर दायर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार, 27 मार्च को होगी सुनवाई

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दिल्ली से हिंदी की मासिक पत्रिका ‘द्वंद्व’ का प्रथम संस्करण लांच

दिल्ली : यहां से विगत पंद्रह मार्च को लांच हुई हिंदी की सुपठनीय मासिक पत्रिका ‘द्वंद्व’ का प्रथम संस्करण बाजार में आ चुका है। पत्रिका की सीएमडी हैं सुजाता सिंह और दस वर्षों तक न्यूज चैनल में काम कर चुके दिनेश कुमार इसके संपादक हैं। 

हिंदी की मासिक पत्रिका ‘द्वंद्व’ के प्रथम संस्करण का मुखपृष्ठ

इसके ताजा अंक की कवर स्टोरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ‘राजनीतिक द्वंद्व’ पर फोकस है। इस विषय पर केंद्रित इस अंक में ‘राजनीतिक द्वंद्व’ की पंच लाइन है- ‘बाबा विश्वनाथ ने एक को बनाया पीएम तो एक को सीएम।’

अरविंद केजरीवाल ने जब वाराणसी जाकर नरेंद्र दामोदर दास मोदी को चुनौती दी थी तो हर कोई उनके फैसले पर उंगली उठा रहा था लेकिन इसे शायद बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद ही कहेंगे कि उन्होंने दोनो मुख्य प्रतिद्वंद्वियों को सत्ता सुख से नवाजा है। उन्होंने एक को प्रचंड बहुमत से देश का प्रधानमंत्री बना दिया तो दूसरे को देश के शीर्ष प्रदेश दिल्ली का मुख्यमंत्री। 

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मजीठिया वेज बोर्ड संघर्ष : पत्रिका और भास्कर ने उत्पीड़न तेज किया, बर्खास्तगी और इस्तीफे का दौर

हिंदी पट्टी के दो बड़े अखबारों राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर से खबर है कि यहां मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी मांगने वालों का प्रबंधन ने उत्पीड़न तेज कर दिया है. भास्कर प्रबंधन तो बौखलाहट में ऐसे ऐसे कदम उठा रहा है जिसे देख सुनकर सभी लोग दांतो तले उंगलियां दबा रहे हैं. पत्रिका प्रबंधन ने मजीठिया मांगने वाले एक मीडियाकर्मी को बर्खास्त कर दिया है. उन्हें जो पत्र भेजा गया है उसमें लिखा गया है कि– ”आपको कंपनी के क्लाज 3 के अनुसार तीन महीने का एडवांस नोटिस व एडवांस वेतन देकर सेवा से मुक्त किया जाता है. आपकी सेवाओं की अब कंपनी को जरूरत नहीं है. आप 27 फरवरी से खुद को सेवा से मुक्त समझें.”

इस तरह पत्रिका प्रबंधन अपने उन कर्मियों को नौकरी से निकालने में लगा है, जो मजीठिया वेज बोर्ड की मांग करते हुए कोर्ट गए हैं. ऐसा ही एक प्रकरण और है जिसमें कर्मी ने रिजाइन लेटर पर साइन करने से इनकार कर दिया. पत्रिका अजमेर के वरिष्ठ लेखाधिकारी कैलाश नारायण शर्मा ने प्रबंधन पर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर केस कर रखा है. कैलाश नारायण शर्मा को पत्रिका प्रबंधन के लोगों ने जयपुर आफिस बुलाकर दुर्व्यवहार किया और इस्तीफे के पत्र पर जबरन हस्ताक्षर कराने की कोशिश की. शर्मा तीस वर्षों से पत्रिका में हैं लेकिन मैनेजमेंट उन्हें इनाम देने की जगह उन्हें प्रताड़ित करने में जुटा है.

उधर, भास्कर प्रबंधन अपने कदमों से जता रहा है कि उसे इस देश के किसी कानून, किसी संस्था, किसी नैतिकता, किसी मान्यता की कोई परवाह नहीं है. वह हर हाल में पैसे और सिर्फ पैसा के लिए काम कर रहा है, भले ही पैसे बचाने के चक्कर में सारी संस्थाएं, सारी मान्यताएं, सारे कानून, सारी नैतिकताएं ध्वस्त हो जाएं. खबर ये भी है कि मजीठिया से बचने के लिए भास्कर ने डीबी इन्फोमीडिया नामक कंपनी बना दी है. यह कंपनी वेब कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी है, जो मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आती. इसका मुख्यालय भोपाल बनाया गया है. डीबी कार्प एक प्रकाशन कंपनी है, जो मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में आती है. सूत्रों के मुताबिक डीबी कार्प के कम तनख्वाह वालों से इस्तीफा लेकर उन्हें नई कंपनी में ज्वाइन कराया जा रहा है.

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राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के साइड इफेक्ट : डीए सालाना कर दिया, सेलरी स्लिप देना बंद

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं

जब से मजीठिया वेज बोर्ड ने कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने का कहा व सुप्रीम कोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी तब से मीडिया में कार्य रहे कर्मचा‍रियों की मुश्किलें बढ रही हैं. इसी कड़ी में राजस्‍थान पत्रिका की बात बताता हूं। पहले हर तीन माह में डीए के प्‍वाइंट जोड़ता था लेकिन लगभग दो तीन वर्षों से इसे सालाना कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तनख्‍वा बढ़ी तो जहां 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी थी तो मजीठिया लगने के बाद कर्मचारियों की तनख्‍वाह में मात्र 1000 रुपए का ही फर्क आया। किसी किसी के 200 से 300 रुपये की बढ़ोतरी।

इसके बाद बारी आई सालाना वेतन वृद्धि की जो इंक्रीमेंट के साथ डीए आदि मिलाकर देखा जाए तो कम से कम भी 1500 रुपये के लगभग बढती थी। राजस्‍थान पत्रिका में सालाना वेतन वृद्धि जनवरी एवं जुलाई में होती है। आज सालाना वेतन वृद्धि के बढ़ी हुई सैलेरी मिली लेकिन सैलेरी लेकर हंसी आ रही थी व दुख हो रहा था। अब डीए भी बंद व तनख्‍वाह बढी मात्र 200 रुपए यानि एक माह का सोलह रुपए 67 पैसा और एक दिन का हुआ लगभग 22 पैसा।

इतना वेतन एक साथ बढ़ने से मैं तो धन्‍य हो गया। अब तो मेरे बच्‍चे हमारे शहर की सर्वोच्‍च शिक्षण संस्‍था में पढ सकेंगे। मैं छुट्टियों के दौरान घूमने के लिए विदेश भी जा सकूंगा। अपने लिए एक गाड़ी व घर भी ले सकूंगा। आखिर लूं भी क्‍यों ना सकूंगा। आखिर एक साल में 200 रुपए की वेतन वृद्धि जो हुई है जो मैंने कभी सपने में नहीं सोचा था। खैर व्‍यंग्य को छोड़ दें।

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं ताकि दूसरे भाईयों का शायद कुछ भला हो जाए मेरा तो जो होगा देखा जाएगा बाकि पूरा परिवार साथ में होगा तो पीछे की चिंता भी नहीं रहेगी। एक बात और यदि सैलेरी के लिए पैसे कम हो तो कर्मचारियों से कह देना वो शायद चंदा इकठा करके आपके ऐशो आराम की जिंदगी जीन का प्रबंध कर ही देंगे इतने बुरे भी नहीं है कर्मचारी।

इसके अलावा राजस्‍थान पत्रिका ने सैलेरी स्लिप भी देना बंद कर दी। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसमें गुलाब कोठारी जी का संपादकीय छपता है। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसके संस्‍थापक कुलिश जी ने उधार रुपए लेकर अखबार की शुरुआत की। लेकिन कुलिश जी ने कभी कर्मचारियों का बोनस नहीं रोका अब तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं खुद तो ले रहे हैं लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकने का प्रयास किया जा रहा है। यह सत्‍य भी कि यदि कुलिश जी उधार के पैसे से अखबार चला सकते हैं कर्मचारी उधार रुपए लेकर क्‍या अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकते क्‍योंकि सबको पता है कि पत्रिका के कर्मचारी को दिया उधार वो चुकाएगा कैसे।

यहां एक बात का ओर उल्‍लेख करना चाहता हूं कि वितरण विभाग में जो टैक्सियों का पेमेंट होता है उसमें टेक्सियों का बिल तो ज्‍यादा बनता है लेकिन उनके चैक को पत्रिका के वितरण विभाग के कर्मचारी साथ जाकर कैश करवाते हैं व उसमें से लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर का पैसा गुलाब जी के घर पहुंचता है जो हर ब्रांच से कम से कम 10 लाख बनता है। ये है इनकी सच्‍चाई।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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राजस्थान पत्रिका के दस मीडियाकर्मियों ने सभी निदेशकों को भेजा लीगल नोटिस

राजस्थान पत्रिका से खबर है कि यहां के दस मीडियाकर्मियों ने सुप्रीम कोर्ट के एक वकील से संपर्क साधकर मालिकों को लीगल नोटिस भिजवाया है. लीगल नोटिस भिजवाने की पहल की है राजस्थान पत्रिका, उदयपुर के ललित जैन ने. ललित जैन 13 वर्षों से पत्रिका में जूनियर मेंटनेंस आफिसर के पद पर कार्यरत हैं. जैन के नेतृत्व में दस मीडियाकर्मियों ने पत्रिका जो लीगल नोटिस भिजवाया, उसे पत्रिका समूह मुख्यालय की तरफ से रिसीव भी कर लिया गया है.

इस तरह मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में एक और पन्ना जुड़ गया है. ललित जैन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वकील धर्मेंद्र सिंह चौधरी और अमित सिंह राठौर ने जो लीगल नोटिस पत्रिका प्रबंधन को भेजा है, उसकी एक कापी भड़ास के पास है, जिसे यहां प्रकाशित किया गया है.

ज्ञात हो कि भड़ास की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा भी देश के सभी प्रिंट मीडिया हाउसों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर और सेलरी देने के लिए लीगल नोटिस भेज रहे हैं. सात दिनों बाद सभी प्रिंट मीडिया हाउसों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा कर दिया जाएगा. भड़ास के साथ सैकड़ों पत्रकार गोपनीय रूप से लड़ रहे हैं तो दर्जनों पत्रकार खुलकर लड़ाई लड़ रहे हैं.

भड़ास के साथ जो-जो साथी खुलकर लड़ रहे हैं, वे 31 जनवरी को अंतिम रूप से दिल्ली पहुंचकर वकालतनामा और याचिका पर हस्ताक्षर कर दें. 31 जनवरी को दिल्ली में आईटीओ के पास दीनदयाल रोड स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में 12 बजे से 2 बजे तक बैठक होगी. इसमें वकालतनामा और याचिका पर हस्ताक्षर कराए जाएंगे. जो भी साथी इसमें शिरकत करने को आएं, वे अपने साथ अपने सारे डाक्यूमेंट्स की फोटोकापी और वकील के खाते में जमा किए छह हजार रुपये की रसीद लेते आएं.

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7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

Majithia Wage Board Recommendations : legal issues and remedies

 

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पत्रिका ग्रुप ने अपने कई पत्रकारों को सम्मानित किया

जयपुर। प्रतिवर्ष होने वाली पंडित झाबरमल्ल स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन रविवार सुबह 10.30 बजे राजस्थान पत्रिका के के सरगढ़ कार्यालय में किया गया। इस अवसर पर पत्रिका की ओर से सृजनात्मक साहित्य व पत्रकारिता पुरस्कार दिया गया। इस अवसर पर पत्रिका समूह के प्रधान संपाधक गुलाब कोठारी ने लोकतंत्र में मीडिया के घटते प्रभाव पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल चुनावों के समय मीडिया को सिर-आंखों पर चढ़ा लेते हैं लेकिन इसके बाद वह उन्हें बोझ लगने लगता है। जनता के लिए बना लोकतंत्र अब सरकार के लिए हो गया है। सरकारें मीडिया को दबंगई दिखाने लगी हैं।

उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को जितना बहुमत मिलता है वह उतना ही अहंकार दिखाती है। मोदीजी ने भी सरकार बनने के बाद अपने साथियों को मीडिया से दूरी बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जनता सरकार का पेट पालती है लेकिन उसे अपना काम कराने के लिए रिश्वत भी देना पड़ता है। हम उनको सत्ता में ला रहे है लेकिन घूस भी दे रहे हैं। ऎसा होने का क्या कारण है। इसका जवाब मीडिया को देना होगा। आज हम जो बोते हैं उसका फल खुद ही खाना चाहते हैं, यह कैसे संभव है। ऎसा होने पर तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और तानाशाही आ जाएगी। इस अवसर पर पत्रकारिता के मूल्यों को बनाए रखते हुए खबरें देने और साहस से सच का साथ देने वाले “कलम के सिपाहियों” को उनको पुरस्कृत किया गया।

सर्वश्रेष्ठ स्पेशल कवरेज – संदीप उपाध्याय
सर्वश्रेष्ठ ओपीनियन – लोकेन्द्र चौहान
सर्वश्रेष्ठ एक्सक्लूजिव न्यूज – विकास जैन
सर्वश्रेष्ठ मानवीय स्टोरी – भरतपुर ब्यूरो
सर्वश्रेष्ठ शाखा अभियान – सूरत
सर्वश्रेष्ठ भागीदारी अवार्ड – जयपुर
सर्वश्रेष्ठ ब्यूरो अभियान – जितेन्द्र सारण
सर्वश्रेष्ठ फोटो -हाबूलाल शर्मा
सर्वश्रेष्ठ कार्टून – सुधाकर सोनी
सर्वश्रेष्ठ ग्राफिक्स – अभिषेक शर्मा

सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों के तहत इस साल कहानी में प्रथम पुरस्कार जयपुर के कथाकार प्रबोध कुमार गोविल, दूसरा पुरस्कार राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनोज कुमार शर्मा और कविता में प्रथम पुरस्कार उज्जैन के हेमंत देवलेकर तथा दूसरा पुरस्कार विनोद पदरज को दिया गया।

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राजस्थान पत्रिका के इंप्लाई रहे सुमित ने मालिकों-संपादकों को पत्र लिखकर मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से भुगतान मांगा

नैतिकता और नीतियों की दुहाई दे देकर खुद का घर भरने वाले अखबारों के मालिकों की चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि इन्हें अब किसी से भय नहीं लगता. राजनीति, नौकरशाही और न्यायपालिका को अपनी मुट्ठी में कर चुके ये लोग अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं. पर इनकी अकूत ताकत से हार न मानते हुए कुछ ऐसे वीर सामने आ जाते हैं जो इन्हें खुली चुनौती दे डालते हैं. ऐसे ही एक वीर का नाम सुमित कुमार शर्मा (मोबाइल- 07568886000) है.

 

सुमित राजस्थान पत्रिका के बीकानेर एडिशन में सरकुलेशन इंचार्ज हुआ करते थे. इन्होंने इस्तीफा दिया तो इनका हिसाब पुराने तरीके से किया गया जबकि इन्हें कायदे से मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पेमेंट मिलना चाहिए था. इसको लेकर उन्होंने राजस्थान पत्रिका के मालिकों को एक खुला पत्र लिखा है. पत्र यहां दिया जा रहा है.

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पत्रिका के कार्यक्रम ‘हमराह’ को लेकर नवज्योति के मालिक दीनबंधु चौधरी का इगो टकरा गया!

राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति की लड़ाई इतवार 14 दिसंबर की सुबह अजमेर की सड़कों पर नजर आई। पत्रिका का कार्यक्रम और नवज्योति के मालिक दीनबंधु चौधरी का इगो टकरा गया। पत्रिका ने पिछले कुछ दिनों से एक कार्यक्रम शुरू किया है, ‘हमराह’, इसके लिए इतवार की एक सुबह के लिए एक ऐसी सड़क का कुछ मीटर हिस्सा तय किया जाता है जहां दो घंटे सुबह 7 से 9 बजे तक शहर के लोग आकर बेलौस अंदाज में अपनी गतिविधियों, प्रतिभाओं का प्रदर्शन कर सकें।

पत्रिका ने इसके लिए चुना आनासागर झील के किनारे चौपाटी वाले रोड को। बजरंगगढ़ से चौपाटी के सिरे को इसके लिए चुना गया। शायद इसलिए भी कि इस सड़क का एक वैकल्पिक मार्ग जवाहर रंगमंच से होता हुआ वापस बजरंगगढ़ पहुंच जाता है। दो तीन दफा तो यह कार्यक्रम हो गया परंतु 14 दिसंबर को सबकुछ ठीकठाक नहीं रहा। जिस सड़क के छोटे से हिस्से पर यह कार्यक्रम होता है, उसी पर आनासागर झील के सामने नवज्योति के मालिक और प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी का भी मकान है। प्रतिद्वन्द्वी अखबार और उनके आंगन में उछलकूद मचवाए और अपना नाम कमाए। छोटा सा शहर है, सो कुछ छिपा नहीं रह पाता। पता लगा दीनू जी ने शहर के पुलिस कप्तान को इस आयोजन की अनुमति नहीं देने की एक लिखित शिकायत, बड़ी न्यूसेंस होती है, कहते हुए करवा दी। जिन लोगों से शिकायत करवाई गई वे पिछले आयोजन के फोटो में कुछ प्रभावशाली लोगों के पीछे हाथ बांधे खडे नजर आ रहे थे।

खबर तो यह भी है कि पुलिस कप्तान को फोन भी किया गया जवाब में उन्होंने यह कहते हुए कि हमने किसी को अनुमति ही नहीं दी है, मामला टाल दिया। अगले दिन इस बात पर भी बड़ा एतराज करवाया गया कि ट्रैफिक डाइवर्ट क्यों किया जा रहा है। पुलिस ने फिर टका सा जवाब दे दिया कि हम कहां डाइवर्ट कर रहे हैं, हम तो खडे़ हुए हैं। पत्रिकावाले खुद डाइवर्ट मे लगे हुए हैं। चौपाटी शहरवासियों के लिए घूमने की जगह भी है, पता लगा कि उसके गेट पर ताला लगवा दिया गया। लोगों ने बड़ा एतराज किया। कुछ ने गुस्से में आकर ताला वाला तोड़कर फेंकफांक दिया। सुबह की सैर को आए लोगों ने दीनू जी के घर के बाहर ही उनकी हाय हाय के नारे लगा डाले।

अगले दो दिन के नवज्योति में ‘हमराह’ को ‘शहर की अराजकता’ जैसा संदेश देने वाले समाचार छपे। खैर हमराह तो हो हवा गया परंतु मुसीबत तो नगर निगम और विकास प्राधिकरण की है। पत्रिका अब खबर छाप रहा है कि चौपाटी पर ताला किसने लगाया। नगर निगम और विकास प्राधिकरण क हुक्मरान कह रहे हैं कि हमने नही लगवाया, लगा था तो गलत है, पता नहीं किसने लगवाया। दोनों अखबारों की लड़ाई में उनकी शामत आई हुई है। बात चली है तो आपको बताते चले कि हमराह जिस हिस्से पर आयोजित हुआ, वही हिस्सा है जिसपर पूरे शहर में मात्र इसी हिस्से पर करीब एक दशक तक एकतरफा यातायात रहा। यह किसके आदेश से होता था और क्यों, इसका जवाब हर शहरवासी की जबान पर है। सवाल तो और भी बहुत सारे हैं चौपाटी, आनासागर, टापू, काउंसिल, प्रेस क्लब वगैरह-वगैरह, बोलता कोई नहीं है। किसकी जीत-किसकी हार के बीच खबर यह है कि पत्रिका अगला हमराह 21 दिसंबर की सुबह शहर के दूसरे कोने में स्थित चंदबरदाई खेल स्टेडियम में आयोजित करने जा रहा है। 

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: rajendara_hada@yahoo.co.in

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पत्रिका में उठापटक का दौर : ज्ञानेश उपाध्याय, उपेंद्र शर्मा, संतोष खाचरियवास, अमित वाजपेयी के बारे में सूचनाएं

राजस्थान पत्रिका में इन दिनों जोरदार उठापटक का दौर है। दौलत सिंह चौहान को पत्रिका जयपुर का संपादक बनाए जाने के ठीक पहले के ये हालात हैं। करीब आठ महीने पहले ही अजमेर के स्थानीय संपादक बनकर आए बिहार मूल के ज्ञानेश उपाध्याय यहां अपने पैर जमा भी नहीं पाए थे कि उन्हें जोधपुर का स्थानीय संपादक बनाकर भेज दिया गया। उनकी जगह जयपुर से भीलवाड़ा मूल के उपेन्द्र शर्मा को अजमेर का स्थानीय संपादक बनाया गया है।

पिछले दस सालों से अजमेर में उप संपादक संतोष खाचरियावास को जयपुर में नए बन रहे डिजिट्लाइज संस्करण में तबादला कर दिया गया है। कोटा के स्थानीय संपादक अमित वाजपेयी को भी जयपुर में फिर से बन रहे स्टेट ब्यूरो में जिम्मेदार पद पर लगा दिया गया है। खबर है कि अभी कई संस्करणों में काफी फेरबदल होने वाले हैं। पांच सात सालों से एक ही जगह जमे लोगों की सूची तैयार हो चुकी है। मजीठिया से निजात पाने की जुगत का शायद एक तरीका हो।

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: rajendara_hada@yahoo.co.in

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पत्रिका समूह में तबादलों की बयार, कई संपादक इधर उधर हुए

खबर है कि राजस्थान पत्रिका ने कई संपादकों को इधर उधर किया है. तबादले के दायरे में आए कुछ संपादकों को छह से नौ महीने पहले ही तैनात किया गया था. आखिर इतने कम महीनों में ही क्यों हटाना पड़ा है, यह सवाल चर्चा में है. नौ महीने पहले लगाए गए कोटा में अमित वाजपेयी, जोधपुर में राजेश नैन, उदयपुर में रमेश शर्मा को हटा दिया गया है. अमित वाजपेयी और राजेश नैन को जयपुर मुख्यालय में तलब किया गया है.

सीकर में चार महीने पहले लगे अनिल कैले को भी मुख्यालय बुलाया गया है. उदयपुर के रमेश शर्मा को रतलाम भेजा गया है. रतलाम के संपादक राजेश त्रिपाठी को सात महीने पहले ही लगाया था. उनको भी हटा कर सीकर भेजा गया है. अजमेर के मनीष उपाध्याय को जोधपुर भेजा गया है. वे भी आठ महीने पहले ही भेजे गए थे. उदयपुर में पत्रिका की हालत खराब होने के कारण नीहार कोठारी ने अपने खास आदमी राजेश कसेरा को उदयपुर भेजा है. अजमेर में उपेन्द्र शर्मा को भेजा गया है. खंडवा के मुधेश सक्सेना को और सतना के प्रदीप पांडे को भी हटा दिया गया है. पांडे को कोटा भेजा गया है. सक्सेना अभी ठंडे बस्ते में रहेंगे. पत्रिका समूह की तरफ से पहले ही अपने छह संपादकों को संपादक से मैनेजर बनाया जा चुका है.  इसी समूह के न्यूज टुडे से शैलेंद्र तिवारी का तबादला कर दिया गया है.

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राजस्थान पत्रिका, जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर, गुलाब और नीहार कोठारी को भेजा गया गोपनीय पत्र

यशवंत जी, यह पत्र दो सप्ताह पहले राजस्थान पत्रिका के प्रमुख गुलाब कोठारी और नीहार कोठोरी को भेजा गया था… इस आशा के साथ कि यह पत्र मिलने के बाद कोई ठोस कार्यवाही होगी… लेकिन जैसे खबरें दबाई जाती हैं, वैसे ही इस पत्र को दबा दिया गया… आखिर में यह पत्र आपको भेजा जा रहा है… व्हिसल ब्लोअर का नाम उजागर नहीं करना पत्रकारिता का धर्म है और बात रही सत्यता की एक भी बात असत्य नहीं है… हर कर्मचारी पीड़ित है…

7 नवम्बर को भेजा गया पत्र
व्यक्तिगत एवं गोपनीय        
सेवा में
गुलाब कोठारी
प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

व्यक्तिगत एवं गोपनीय
सेवा में
नीहार कोठारी
संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

विषय : राजस्थान पत्रिका जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर

श्रीमान गुलाब जी कोठारी और श्री निहारी जी कोठारी

यह पत्र आपका ध्यान राजस्थान पत्रिका के जोधपुर संस्करण के सूरत-ए-हाल बताने के लिए लिखा जा रहा है। आपसे उम्मीद है कि आप इन मामलों पर संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही करेंगे। जोधपुर संस्करण में गत कई माह से हालत बद से बदत्तर हो गए हैं। संपादकीय विभाग में जातिवाद पूरी तरह हावी हो गया है और अपने लोगों को हर तरह से सपोर्ट किया जा रहा है, इतना ही नहीं पत्रिका की साख पर दाग लग रहा है और वह भी भ्रष्टाचार का। शहर में पत्रिका पर पैसे लेकर खबर लगाने और रोकने के कई आरोप लग रहे हैं।  भास्कर के कर्मचारियों से लेकर शहर प्रतिष्ठित लोगों में इन दिनों चर्चा का विषय है। इससे पत्रिका की 50 वर्षों की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है।

केस -1

संपादक ने की लाखों की डील

जोधपुर संस्करण के संपादकीय प्रभारी पर पैसे लेकर एक राजनेता को फेवर करने के गंभीर आरोप हैं। इसकी जानकारी कई लोगों ने मौखिक और लिखित रूप से जयपुर मुख्यालय को दी है। संपादकीय प्रभारी राजेश नैन पर भाजपा के स्थानीय नेता राजेन्द्र गहलोत से दो से पांच लाख रूपए लेने का आरोप है। यह चर्चा शहर भर में है। राजेन्द्र गहलोत की विधानसभा चुनाव के दौरान मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग की खबर लोकसभा चुनाव में पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित की गई  थी और भास्कर में यह समाचार नहीं था। इस मुद्दे को लेकर कई खबरें प्रकाशित करने की कार्ययोजना बनीं थी, लेकिन उसके बाद एक भी खबर प्रकाशित नहीं हुई ।

पत्रिका ने राजेन्द्र गहलोत को जमकर फेवर किया, इसका प्रमाण प्रकाशित खबरें हैं । इतना ही नहीं कई रिपोर्टर्स के माध्यम से गहलोत को ऑबलाइज किया गया। इसकी पुष्टि संबंधित रिपोर्टर और चीफ रिपोर्टर से की जाती है। इस डील में दलाली का काम पत्रिका के रिपोर्टर रामेश्वर बेड़ा ने किया। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय शिक्षक भर्ती सुपर घोटाले के बारे में पत्रिका ने प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। बताया जा रहा है कि विवि पीआरओ रामनिवास चौधरी (जाट भाई) अपने जाट भाई राजेश नैन से मिला और कुलपति आवास पर मिटिंग करवाई। इसमें चैनल 24 के इंचार्ज अजय अस्थाना भी शामिल है और संपादक के साथ डील कर ली। जिसके बाद पत्रिका में खबरों का प्रकाशन कम हो गया।

केस- 2

रिपोर्टर ने खुलेआम लिया एप्पल का फोन

राजेश नैन ने जातिवाद को इतना हावी कर रखा है कि सजातीय भाई रामेश्वर बेड़ा की हर गलती को नजरअंदाज करते हैं और कई गंभीर गलतियों के बारे में जयुपर को अवगत तक नहीं कराया। रामेश्वर बेड़ा के पास एक एप्पल का आई-फोन आया। सभी रिपोर्टर्स को पूर्ण रूप से मालूम है कि बेड़ा की इतनी हैसियत नहीं है कि वह एप्पल का नया या पुराना फोन ले सके। इन दिनों ऑफिस में चर्चा है कि एप्पल का फोन खरीदा नहीं गया है, बल्कि यह किसी से लिया गया है। पुष्ट सूत्रों के अनुसार  रामेश्वर ने यह फोन शिक्षक नेता शंभूसिंह मेड़तिया से लिया है। इसकी तस्दीक भी हो चुकी है। इतना ही नहीं स्कूली शिक्षा की बीट आने के बाद रामेश्वर बेड़ा ने  मेड़तिया को खबरों के माध्यम से इतना ऑब्लाइज किया है कि दूसरे शिक्षक संगठन पत्रिका से नाराज हैं । इसकी शिकायत कई संगठनों ने स्थानीय संपादक से लेकर जयपुर तक की है।

केस -3

धर्मेन्द्र बनाम संपादक

वर्तमान में न्यूज टुडे में कार्यरत धर्मेन्द्र सिंह ने जोधपुर नियुक्ति के दौरान संपादक राजेश नैन पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि इसकी लिखित शिकायत भी जयपुर तक पहुंची, जिसके बाद धर्मेंद का स्थानांतरण जोधपुर से न्यूज टुडे में कर दिया गया।

 
केस -4

पत्रिका बना जाटिस्तान

राजेश नैन के आने के बाद पत्रिका में जातिवाद इतना हावी हो गया है कि लोग इसे पत्रिका कार्यालय कम और जाटिस्तान ज्यादा कहते है।  जोधपुर कार्यालय में जितने भी जाट भाई कार्यरत हैं, उनका एक ग्रुप बन गया है। इनमें विकास चौधरी, रामेश्वर बेड़ा, श्यामवीर सिंह, रामलाल जैसे अन्य साथी शामिल है। इसका प्रमाण यह भी है कि राजेश नैन ने पदभार ग्रहण करने के बाद सभी साथियों से उनके सरनेम पूछे थे। इतना ही नहीं पत्रिका ने जिस खींवसर विधायक हनुमान बैनीवाल का बहिष्कार कर रखा है, उसे कार्यालय में बुलाकर चाय-नाश्ता कराया गया। कई जाट नेताओं को संपादक से मिलाया जाता है, जाट समाज के नेताओं का आना आम है। संपादक ने विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जाट उम्मीदवार को पर्दे के पीछे से फेवर किया था। जाट संपादक को जाट नेताओं से मिलाने का जिम्मा विकास चौधरी का है। विकास चौधरी बड़े जाट नेता के जोधपुर आने पर लाइनअप कर संपादक से मिलाता है। विकास चौधरी क्राइम रिपोर्टर है और अधिकारियों, नेताओं और पुलिसवालों से इसकी सेटिंग है। जाट पुलिसवालों को विकास जमकर फेवर करता है।

केस -5

चरित्रहीनों की ढाल बना संपादक

पत्रिका की परम्पराओं के अनुसार महिला साथी के साथ दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाता है। लेकिन पत्रिका जोधपुर कार्यालय में संपादक ऐसे चरित्रहीनों की ढाल बने हुए हैं । गत दिनों एक महिला साथी ने रामेश्वर बेड़ा की शिकायत राजेश नैन से की थी, जिसमें कहा गया था कि बेड़ा रात में उसे फोन कर अश्लील बातें करता है। ऑफिस के बाहर अकेले में मिलने के लिए कहता है । इसके अलावा ऐसी ही कई अन्य बातें हैं, जिनका जिक्र भी नहीं किया जा सकता है। जब राजेश नैन से महिला साथी ने बेड़ा की शिकायत की तो उनसे मिले जवाब से वह बहुत आहत हुई और नौकरी छोड़ने का मानस बना रही है। इससे पहले एक महिला साथी के जन्मदिन पर बेड़ा उसके घर पर मिठाई और गिफ्ट लेकर पहुंच गया था। एक ट्रेनी महिला साथी को भी बेड़ा ने इतना परेशान किया कि वह संस्था छोड़कर चली गई। बेड़ा के खिलाफ महिला कांस्टेबल से लेकर जिला परिषद की महिला सदस्यों को कॉल करने तक की शिकयतें है। राजेश नैन को जब इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने कुछ शिकायतों को अपने कार्यकाल का न बता कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

केस -6

मानसिक प्रताड़ना झेल रहे कर्मचारी

राजेश नैन की हिटलरशाही, जातिवाद, गुस्सा, कुतर्क से (जाट भाई छोड़कर) संपादकीय  साथी परेशान हैं। कई साथियों को राजेश नैन ने दुर्भावनावश इतना परेशान किया कि उनका मनोबल गिर गया है और वे अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे हैं । कई कर्मचारी नौकरी छोड़ने का मानस बना रहे हैं। ताजा उदाहरण धर्मेंद सिंह का है, जिसने मानसिक प्रताड़ना का लिखित में आरोप लगाया था।

केस -7

भ्रष्टाचारियों की हो रही भर्ती

राजेश नैन ने  संपादकीय विभाग जोधपुर में अपने जैसे भ्रष्टाचारियों की सेना खड़ी करनी तैयार कर दी है । जिन रिपोर्टर्स पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन्हें पत्रिका में लिया जा रहा है । उदाहरण के तौर पर गजेन्द्र सिंह दहिया जिस पर अपने पूर्व कार्यकाल में लैपटॉप लेने का आरोप है, जिसकी वजह से पहले पत्रिका ने उसका स्थानान्तरण जोधपुर से अलवर कर दिया था। इसके बाद उसने नौकरी छोड़ दी । तीन साल बाद हाल ही में उसे वापस ले लिया गया है। दूसरा उदाहरण सौरभ पुरोहित का।  पत्रिका जोधपुर से स्थानान्तरण के बाद सौरभ ने भास्कर जॉइन किया और एक लाख से ज्यादा रुपए के गबन के आरोप में उसे भास्कर से निकाल दिया गया। पत्रिका में सौरभ की वापसी की कवायद तेजी से चल रही है। तीसरा उदाहरण प्रॉपर्टी डीलर चैनराज भाटी का है।  पाली से बिना बताए छोड़कर गए चैनराज को पत्रिका ने वापस ले लिया। जोधपुर में पत्रिका के नाम पर प्रॉपर्टी का काम देख रहा है। चैनराज का शानो-शौकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चैनराज के पास कार से आता है और रिपोर्टिंग करता है। जबकि उसकी सैलरी मात्र 18 हजार है । इतना ही नहीं रामेश्वर बेड़ा संपादक को मंडी से सब्जी, घी, तेल सहित अन्य सामानों की सप्लाई सीधे घर तक करता है।

धन्यवाद

कर्मचारी

राजस्थान पत्रिका, जोधपुर

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राजस्थान पत्रिका ने दीपावली पर गिफ्ट नहीं दिया कर्मचारियों को, बोनस में हजार रुपये कटौती

जयपुर से खबर है कि राजस्थान पत्रिका ने इस बार दीपावली लक्ष्मी पूजन के बाद अपने अखबार के कर्मचारियों को कोई गिफ्ट नहीं दिया. इस कारण से सभी कर्मचारियों को निराश होकर लौटना पड़ा. दरअसल पत्रिका समूह अपने कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों में से लगातार कटौती कर रहा है. पिछले कई दिनों का सीसीएल काफी महीनों बाद जमा करवाया गया.

पिछले साल से इस साल एक हजार रुपये बोनस भी कम दिया गया है. उधर, इस दिवाली राजस्थान पत्रिका ने विज्ञापन से कमाई टारगेट से अधिक की है. अधिक कमाई और कर्मचारियों पर कम खर्च, यह फंडा पत्रिका समूह अपना रहा है. इस कारण यह अखबार भी धीरे धीरे शोषण का केंद्र बनता जा रहा है.

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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पत्रिका, इंदौर में उठापटक जारी

पत्रिका इंदौर का संपादक विजय चौधरी को बनाने के बाद उठापटक जारी है. ताजी सूचना है कि सतना से शिशिर मिश्र को बुलाया गया है. इन्हें सिटी में दो सीनियर रिपोर्टर के ऊपर बैठा दिया गया है. संपादक के रूप में विजय चौधरी के आते ही पहले 3 महीने में 6 रिपोर्टर पत्रिका छोड़ चुके हैं.

पहले सुचेन्द्र मिश्रा को न्यूज़ टुडे भिजवाया. फिर दिनेश चौबे ने इस्तीफा दिया. फिर सिद्धार्थ मछिवाल, फिर तन्मय साकल्ले और अब ब्रजेन्द्र वर्मा ने भी नौकरी छोड़ दी. चर्चा है कि संपादक की हिटलरशाही के खिलाफ तीन रिपोर्टर पत्रिका को अलविदा कहने वाले हैं.

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