प्रूफ रीडरों की जरूरत तो अनंतकाल तक रहेगी

लोकमत में जब नौकर हुआ, तब काम करने की त्रिस्तरीय व्यवस्था थी। पहले खबर लिखो, उसे इंचार्ज देखते थे। इंचार्ज के खबर को संपादित करने के बाद उसे कंपोजिंग में भेज दिया जाता था। कंपोजिटर उसे कंपोज करने के बाद प्रूफ रीडर को दे देता था। प्रूफ रीडर उसे पूरी तरह पढ़ते थे। पढ़ने का उनका स्टैंडर्ड गजब का था। शब्द उनके, तथ्य हमारे। वो दरअसल थे तो प्रूफ रीडर लेकिन मैं मानता हूं कि वे रीयल एडीटर थे।