ऐसी ‘राजजात’ से तो तौबा…

इस बार की नंदा राजजात यात्रा को हर किसी ने अपने चश्में से देखा। कईयों की आस्था थी तो कई आस्था के नाम पर मौजमस्ती कर मालामाल हो गए। इस यात्रा में डरते-डरते मैं भी अपने साथी, विनोद उपाध्याय, आंनद खाती, संजय पांडे, पूरन जोशी, दीपक परिहार के साथ जाने के लिए तैंयारी की। मैं इससे पहले कई बार इस पूरे ट्ैकिंग रूट से वाकिफ रहा हूं। तो भीड़ के दबाव को सोचते हुए सिर्फ रूपकुंड तक ही जाने का प्रोगाम बनाया। दो टैंट तथा राशन आदि तैंयार कर हम 31 को वेदनी को फुर्र हो लिए……… दो दिन वेदनी बुग्याल का हाल देख हमारी हिम्मत फिर इस भयानक भीड़ के कारनामें आगे को देखने की नहीं पड़ी। वेदनी से कुछ आगे जाकर हम शोरगुल की दहशत से ऑली बुग्याल की शांत फिंजा में चले गए। यहां भेड़-बकरियों के छौनों की मीठी पुकार थी। दूर-दूर तक प्रकृति का शांत आंचल फैला था….. हवा की सरसराहट में मधुर संगीत था। टैंट वहीं लगा धरती के सीने में  हम सभी पसर गए……