पंकज पचौरी की मूर्खता बनाम रवीश कुमार का अहंकार

रवीश बाबू, इतना स्मार्ट बनना और अपमानित करना गुड बात नहीं

-दयानंद पांडेय-

एक समय मैं रवीश कुमार के अनन्यतम प्रशंसकों में से एक था। उन की स्पेशल रिपोर्ट को ले कर उन पर एक लेख भी लिखा था सरोकारनामा पर कभी। रवीश तब मेरे इस लिखे पर न्यौछावर हो गए थे। मुझे भी अच्छा लगा था उन का यह न्यौछावर होना । यह लेख अब मेरी एक किताब में भी है। मेरी मातृभाषा भी भोजपुरी है इस नाते भी उन से बहुत प्यार है। लेकिन बीते कुछ समय से जिस तरह सहजता भरे अभिनय में अपने को सम्राट की तरह वह उपस्थित कर रहे हैं और लाऊड हो रहे हैं , एकतरफा बातें करते हुए और कि अपने अहमक अंदाज़ में लोगों का भरपूर अपमान हूं या हां कह कर कर रहे हैं और कि एक ढीठ पूर्वाग्रह के साथ अपने को प्रस्तुत कर रहे हैं जिस का कि किसी तथ्य और तर्क से कोई वास्ता नहीं होता वह अपनी साख, अपनी गरिमा और अपना तेवर वह बुरी तरह गंवा चुके हैं।

अब समझ में आ गया है कि उन की सहजता और सरलता एक ओढ़ी हुई और एक बगुला मुद्रा है। इस बगुले में एक भेड़िया छुपाने की दरकार उन्हें क्यों है, यह समझ में बिलकुल नहीं आता। उन्हें सोचना चाहिए कि अगर वह सौभाग्य या दुर्भाग्य से एक सफल एंकर न होते तो होते क्या? उनकी पहचान भी भला तब क्या होती? उनका ब्लॉग ‘कस्बा’ भी कहां होता? पर एक एंकर की यह संजीदा गुंडई और इस कदर ज़िद उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ बर्बाद करती है। किसी भी संवाददाता या एंकर का काम पूर्वाग्रह या पैरोकारी नहीं ही होती। उस के अपने निजी विचार या नीति और सिद्धांत कुछ भी हो सकती है पर रिपोर्टिंग या एंकरिंग में भी वह झलके या वह इसी ज़िद पर अड़ा रहे यह न उस के लिए, न ही उस के पाठक या दर्शक या श्रोता के लिए भी मुफ़ीद होता है। रवीश से पहले इसी एन डी टी वी पर एक समय पंकज पचौरी भी थे । बड़ी सरलता और सहजता से वह भी पेश आते थे। हां,  रवीश जैसी शार्पनेस उन में बिलकुल नहीं थी। तो भी उनका हुआ क्या? मनमोहन सिंह के सूचना सलाहकार बन कर जिस मूर्खता और जिस प्रतिबद्धता का परिचय उन्होंने दिया, अब उन्हें लोग किस तरह याद करेंगे भला? रवीश कुमार को भी यह जान लेना चाहिए कि वह भी कोई अश्वत्थामा नहीं हैं। न ही भीष्म पितामह। विदा उन्हें भी लेना है। पर किस रूप में विदा लेना है यह तो उन्हीं को तय करना है। लेकिन उन्हें इतिहास किस रूप में दर्ज कर रहा है यह भी लोग देख ही रहे हैं , वह भले अपने लिए धृतराष्ट्र बन गए हों। उनकी गांधारी ने भी आंख पर भले पट्टी बांध चुकी हो।

लेकिन समय का वेदव्यास उन की मुश्किलों और उन की होशियारियों को जस का तस दर्ज कर रहा है। नहीं होशियार तो अपने को शकुनी और दुर्योधन ने भी कम नहीं समझा था। तो बाबू रवीश कुमार इतना स्मार्ट बनना इतनी गुड बात नहीं है। आप की कुटिलता अब साफ झलकने लगी है, लगातार, निरंतर और सारी सहजता और सरलता के बावजूद। समय रहते छुट्टी ले लीजिए इस कुटिलता से। नहीं बरखा दत्त की केंचुल आप के सामने एक बड़ी नजीर है। बाकी तो आप समझदार भी बहुत हैं और शार्प भी। पर आप की समझदारी और शार्पनेस पर आप का पूर्वाग्रह बहुत भारी हो गया है। या कि आप की नौकरी की यह लाचारी है यह समझना तो आप ही पर मुन:सर है।

क्यों कि रवीश बाबू नौकरी तो हम भी करते हैं सो नौकरी की लाचारी भी समझते हैं। पर अपनी अस्मिता को गिरवी रख कर नौकरी हम तो नहीं ही करते, न ही हमारा संस्थान इस के लिए इस कदर कभी मजबूर करता है। जिस तरह आप मजबूर दीखते हैं बार-बार। और अपनी सहजता – सरलता और शार्पनेस के बावजूद आप लुक हो रहे हैं लगातार। अटल जी के शब्द उधार ले कर कहूं तो यह अच्छी बात नहीं है। इतने दबाव में नौकरी नहीं होती। मुझे जो इस वैचारिक दबाव और क्षुद्रता में नौकरी करनी हो तो कल छोड़नी हो तो आज ही छोड़ दूं। क्यों कि बाकी दबाव तो नौकरी में ठीक हैं, चल जाती हैं । मैं ही क्या हर कोई झेलता है जब तब। हम सभी अभिशप्त हैं इसके लिए। साझी तकलीफ है यह। घर-परिवार चलाने के लिए यह समझौते करने ही पड़ते हैं, मैं भी नित-प्रतिदिन करता हूं । पर अपनी आइडियोलाजी, अपने विचार, अपनी अस्मिता के साथ समझौता तो किसी भी विचारनिष्ठ आदमी के लिए मुश्किल होती है। मुझे भी। आप को भी होनी चाहिए। हां, कुछ लोग कंडीशंड हो जाते हैं। आप भी जो हो गए हों तो बात और है।


31 मई 2012 को रवीश कुमार के बारे में दयानंद पांडेय ने जो कुछ लिखा अपने ब्लाग पर वह इस प्रकार है….

क्या बात है रवीश जी! बहुत खूब!!

-दयानंद पांडेय-

क्या बात है रवीशजी! हालांकि हमारे ही क्या अधिसंख्य लोगों के घर आप अकसर आते ही रहते हैं। तो भी हमारी आप की वैसी मुलाकात नहीं है| पर मैं तो सच कहूं आप से अकसर मिलता ही रहता हूं। आप से आप की आवाज़ से। आप की आवाज़ जैसे बांध सी लेती है। कई बार आप को सुनते हुए लगता है कि मैं एक साथ मोहन राकेश, निर्मल वर्मा और मनोहर श्याम जोशी को पढ रहा होऊं। ऐसा आनंद देते हैं आप और आप का नैरेशन। सच कहूं तो मुझे ओम पुरी, कमाल खान और रवीश कुमार की आवाज़ बहुत भाती है। निधि कुलपति की साड़ी और उनका सहज अंदाज़ जैसे सुहाता है। पुण्य प्रसून वाजपेयी का खबरों को कथा की तरह बल्कि किसी फ़िल्म की तरह पेश करने का अंदाज़ भी मुझे भाता है। कई बार लगता है जैसे गुरुदत्त की कोई फ़िल्म देख रहा होऊं।

प्रसून जी से एक बार फ़ोन पर मैंने कहा भी कि आप को फ़िल्म बनानी चाहिए। तो वह हंसने लगे। इस चीख पुकार और भूत-प्रेत, अपराध, क्रिकेट, धारावाहिकों की छाया और लाफ़्टर शो के शोर के भूचाली दौर में आप लोग ठंडी हवा के झोंके सा सुकून देते हैं। देते रहिए। नहीं अब तो आप का एनडीटीवी इंडिया भी कभी- कभी इस फिसलन का संताप देता ही है, देने ही लगा है। खासतौर पर जिस तरह एक शाम हेडली की तसवीर चीख-चीख कर सस्पेंस की चाशनी में भिगो-भिगो कर परोसी है कि बड़े-बड़े तमाशेबाज़ पानी मांग गए। बाज़ार की ऐसी मार कि बाप रे बाप जो कहीं भूत होता-हवाता हो तो वह भी डर जाए। यहां तक कि रजत शर्मा और उनका चैनल भी। आजतक वाले भी। कौवा चले हंस की चाल तो सुनता रहा हूं पर हंस भी कौआ की चाल चलने लगे यह तो हद है। ब्योरे और भी बहुतेरे हैं पर क्या फ़ायदा?

ऐसे में रवीश कुमार, कमाल खान, पुण्य प्रसून वाजपेयी और हां, निधि कुलपति की नित-नई सलीकेदार साड़ी और उनका अंदाज़ मन को राहत-सी देते हैं। गोया अपच और खट्टी डकार के बीच पुदीन हरा या हाजमोला मिल गया हो। और हां, कभी मन करे तो इस पर भी कभी कोई स्पेशल रिपोर्ट ज़रूर करने की सोचिएगा कि चैनलों में इतने साक्षर, जाहिल और मूर्ख लोग कैसे और कहां से आकर बैठ गए। पर क्या कहें, आज- कल आप भी तो स्पेशल रिपोर्ट कहां करते दिखते हैं। बाज़ार की मार है यह कि रूटीन में समा जाने की नियति?

न मन करे तो मत बताइएगा। पर ऐसे तो आपकी लोच बिला जाएगी ! फिर कैसे कोई इसी ललक के साथ बुलाएगा कि फिर आइएगा। क्योंकि यह दुनिया बडी ज़ालिम है। अरहर की दाल सौ रूपए किलो भूल चली है। गांधी को भूल गई। चैनल और कि अपना समाज भी भगत सिह को भूल अमर सिंह को याद रखने लगा। अमर सिंह की दलाली भी लगता है, अवसान पर है। तो उन्हें भी हम जल्दी ही भूल जाएंगे। वैसे भी इस कृतघ्न समाज में संबंध अब पर्फ़्यूम से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो चले हैं। कि महक आई और गई। लोग मां-बाप भूल जा रहे हैं तो यह तो रिपोर्टिंग के संबंध हैं। आप, आप की आवाज़, आप का नैरेशन, स्पेशल रिपोर्ट छोटे परदे से गुम हो गई, जिस दिन गुम हुई, आप भी गुम। फिर संस्मरण,डायरी और आत्मकथा के हिस्से हो जाएंगे यह सब।

मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा होगा!

इब्राहिम अल्काज़ी को जानते ही होंगे आप। उन के पढाए सिखाए बहुतेरे अभिनेताओं को पद्म पुरस्कार कब के मिल गए। ओम शिवपुरी, मनोहर सिंह, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी सुरेका सीकरी, उत्तरा बवकर, नीना गुप्ता से लगायत जाने कितने नामी-बेनामी लोगों ने क्या-क्या पा लिया। पर नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के संस्थापक इब्राहिम अल्काज़ी जैसे थिएटर और पेंटिंग के श्लाका पुरूश को अब पद्म पुरस्कार मिला है। छॊडिए अपने बिहार में महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री को याद कीजिए।उन को भी अब पद्मश्री मिली तो वह बिफर गए। अपमान लगा उन को यह।

खैर छोडिए भी मैं भी कहां भूले बिसरे लोगों की याद में समा गया। अभी तो आप हैं आप की आवाज़ है, कोने- कोने से मिल रहे आमंत्रण हैं। मज़ा लीजिए। क्यों कि बच्चन जी लिख ही गए हैं कि इस पार प्रिये तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा !

हां, पर स्पेशल रिपोर्ट ले कर आइएगा ज़रूर। हम भी देखेंगे घर में अपने रजाई ओढ कर अगर बिजली आती रही तो! आमीन!

लेखक दयानंद पाण्डेय की लिखीं कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.

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पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

आज पता चला कि वे अचानक हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के ”मीडिया सलाहकार” बन गए हैं। उनका नाम अमित आर्य है। जागरण की साइट पर आज इस आशय की एक ख़बर है जिसमें उन्‍होंने हिमाचल की छात्र राजनीति में एबीवीपी के अपने अतीत को इस फल का श्रेय दिया है और जेपी नड्डा को ससम्‍मान याद किया है। संयोग से आज ही हरियाणा पुलिस ने मीडिया को भर हिक पीटा है। सोच रहा हूं कि ”सिर मुंड़ाते ओले पड़ना” का उदाहरण क्‍या इससे बेहतर कुछ होगा?

अच्‍छे दिनों की ऐसी कहानियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, आज शाम एनडीटीवी इंडिया के पैनल पर जो लोग बाबा प्रकरण पर जिरह करने बैठे थे, उनमें एक के नाम के नीचे परिचय लिखा था ”धर्म गुरु”। इस शख्‍स का नाम है आचार्य शैलेश तिवारी, जो भारतीय जनसंचार संस्‍थान यानी IIMC का कुछ साल पुराना हिंदी पत्रकारिता का छात्र है। पत्रकारिता पढ़ कर पांच साल में धर्म गुरु बन जाना हमारे देश में ही संभव है। ज़ाहिर है, अच्‍छे दिनों का असर रवीश कुमार जैसे ठीकठाक आदमी पर भी पड़ ही जाता है, जिन्‍होंने प्राइम टाइम पर अपनी रनिंग कमेंट्री के दौरान आज मार खाने वाले पत्रकारों के नाम गिनवाते हुए ”एबीपी” चैनल को ‘एबीवीपी” कह डाला। बहरहाल, जितने पत्रकारों को आज मार पड़ी है, उनमें मुझे इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़ और इंडिया न्‍यूज़ का कोई व्‍यक्ति नहीं दिखा। किसी को पता हो तो नाम ज़रूर गिनवाएं।

Abhishek Srivastava : ‘पाखी’ पत्रिका के दफ्तर में साढ़े तीन घंटे तक चले अपने सामूहिक साक्षात्‍कार के दौरान कुमार विश्‍वास ने दिल्‍ली के खिड़की एक्‍सटेंशन और सोमनाथ भारती वाली कुख्‍यात घटना का जि़क्र करते हुए अफ्रीकी नागरिकों को ‘नीग्रो’ कहकर संबोधित किया। जब मैंने इस पर प्रतिवाद किया, तो उन्‍हें अव्‍वल यह बात ही समझ में नहीं आई कि आपत्ति क्‍यों की जा रही है। तब मैंने उन्‍हें एक और उदाहरण दिया कि कैसे कमरे में प्रवेश करते वक्‍त उन्‍होंने अपूर्व जोशी को ‘पंडीजी’ कह कर पुकारा था। इस पर वे कुछ बैकफुट पर तो आए, लेकिन अपने इन जातिसूचक और नस्‍लभेदी संबोधनों पर उन्‍होंने कोई खेद नहीं जताया। यह प्रकरण प्रकाशित साक्षात्‍कार में गायब है। ऐसे कई और सवाल हैं, प्रतिवाद हैं जिन्‍हें संपादित कर के हटा दिया गया। ज़ाहिर है, इतने लंबे संवाद से कुछ बातें हटनी ही थीं लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हटा दी गईं जिनसे कुमार विश्‍वास के एक रचनाकार, राजनेता और सार्वजनिक दायरे की शख्सियत होने के कारणों पर शक़ पैदा होता हो।

अपने देश-काल की औसत और स्‍वीकृत सभ्‍यता के पैमानों पर कोई व्‍यक्ति अगर खरा नहीं उतरता, तो यह बात सबको पता चलनी ही चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जो लोग लिखे में ‘पॉपुलर’ का समर्थन कुमार विश्‍वास की पूंछ के सहारे कर रहे हैं, उन्‍हें शायद समझ में आए कि दरअसल वे अंधेरे में अजगर को ही रस्‍सी समझ बैठे हैं। ‘पॉपुलर’ से परहेज़ क्‍यों हो, लेकिन कुमार विश्‍वास उसका पैमाना कतई नहीं हो सकते। मेरा ख़याल है कि अगर साढ़े तीन घंटे चले संवाद की रिकॉर्डिंग जस का तस सार्वजनिक की जाए, तो शायद कुछ धुंध छंटने में मदद मिले। जो प्रश्‍न औचक किए गए लग रहे हैं, जो बातें संदर्भहीन दिख रही हैं और कुमार को जो ”घेर कर मारने” वाला भाव संप्रेषित हो रहा है, वह सब कुछ पूरे साक्षात्‍कार के सामने आने के बाद परिप्रेक्ष्‍य में समझा जा सकेगा। उसके बाद पॉपुलर बनाम क्‍लासिकी पर कोई भी बहस विश्‍वास के समूचे व्‍यक्तित्‍व को ध्‍यान में रखकर और उन्‍हें इससे अनिवार्यत: बाहर रखकर की जा सकेगी।

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार को मिलेगा छत्रपति सम्मान-2014

साहित्यिक संस्था संवाद, सिरसा द्वारा छत्रपति सम्मान-2014 एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार को दिया जाएगा। सम्मान समारोह शहीद पत्रकार छत्रपति की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में 22 नवम्बर को आयोजित किया जाएगा। इस संबंध में ‘संवाद’ की एक बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता ‘संवाद’ के अध्यक्ष परमानंद शास्त्री ने की। इस संबंध में संस्था के सचिव डा. हरविंद्र सिंह ने बताया कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति 21 नवम्बर को शहीद हुए। उनकी स्मृति में ‘संवाद’ द्वारा छत्रपति सम्मान प्रत्येक वर्ष देश की किसी महान शख्सियत को दिया जाता है।

इस बार सम्मान समारोह का आयोजन 22 नवम्बर को होगा। समारोह में एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार को छत्रपति सम्मान-2014 दिया जाएगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता बठिंडा के केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. चमन लाल करेंगे। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के लिए स्थान का निर्धारण शीघ्र ही कर लिया जाएगा। इसके अलावा बैठक में विभिन्न सदस्यों को कार्यभार सौंपा गया।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व छत्रपति सम्मान से ब्रिटेन में भारत के पूर्व राजनयिक एवं चिंतक पत्रकार कुलदीप नैयर, प्रख्यात लेखक विष्णु नागर, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटककार एवं रंगकर्मी प्रो. अजमेर सिंह औलख, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त मूर्धन्य साहित्यकार प्रो. गुरदयाल सिंह को नवाजा जा चुका है। बैठक में ‘संवाद’ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरभगवान चावला, लेखराज ढोट, डा. राम जी, गुरबख्श मोंगा, अंशुल छत्रपति, पूर्व सरपंच शिवराम सिंह, राजकुमार शेखूपुरिया आदि मौजूद थे

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जीपी भगत यानि आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था : रवीश कुमार

रवीश कुमार

: चल गईलू नू बड़की माई : सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।

सड़े गले शौचालय के पीछे का वृद्ध आश्रम। निम्नतम मध्यमवर्गीय इलाका। नियो मिडल क्लास नामकरण गरीबों के साथ धोखा है। जिसके पास किसी तरह से स्कूटर या कूलर आ जाए और उसके पास कच्चा पक्का सा मकान हो हमने उसे गरीब कहना छोड़ दिया है। नियो मिडिल क्लास कहते हैं ताकि लगे कि गरीबी खत्म हो गई है। मगर इनकी गरीबी उन पैमानों से भी खूब झांकती है। खैर मैं आश्रम के  बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए अंदर आता हूं। जो देखा ठिठक गया। बहुत सारे वृद्ध। बेहतरीन साफ सफाई। डिमेंशिया और अलज़ाइमर के शिकार वृद्धों को नहलाया जा रहा था। फर्श की चमाचम सफाई हो चुकी थी। सबको कुर्सी पर बिठाया गया था। इज्जत और प्यार के साथ। कैमरा लगातार रिकार्ड किये जा रहा था।

इस संस्था के संस्थापक जी पी भगत कुछ दिन पहले दफ्तर आए थे। कहा कि आपको सम्मानित करना चाहते हैं। मैंने यूं ही पूछ लिया कि काम क्या करते हैं। सुना तो कहा सम्मान छोड़िये। बहुत मिल चुका सम्मान, अब उस तरफ देखने का मन भी नहीं करता। आपका काम अच्छा है तो कभी आऊंगा मगर बताकर आऊंगा। मैं गया बिना बताये। शायद यही वजह है कि उस जगह की कुछ गहरी छाप पड़ गई। तिरासी के साल में जे एन यू से कंप्यूटर साइंस में एम फिल करने वाले जी पी भगत ने अपनी जिंदगी बुजुर्गों के लिए लगा दी है। वो उनका पखाना और पेशाब अपने हाथों से साफ करते हैं। उनके साथ काम करने वाले भी हाथ से साफ करते हैं। भगत ने बताया कि कई बुजुर्ग तो ऐसी अवस्था में दिल्ली की सड़कों से मिले कि उनमें कीड़े पड़े हुए थे। उन्हें उठाकर लाना, नहाना, साफकर दवायें लगाना ये सब करते करते एक बुजुर्ग के पीछे साल गुज़र जाते हैं तब वे कुछ सम्मान जनक स्थिति में पहुंच पाते हैं। फिर तो उसके बाद अनुभवों का जो पन्ना खुलते गया मैं सुन सुनकर नया होने लगा। जो कुछ भी भीतर बना था वो सब धाराशाही हो गया।

भगत बताये जा रहे थे। जितिन भुटानी का कैमरा रोल था। हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा की आंखें भर आ रही थीं। मैं खुद हिल गया। फर्श की सफाई किसी अच्छे अस्पताल से भी बेहतर की गई थी। सबको प्यार से डायपर पहनाकर कुर्सी पर बिठा दिया गया था।  दो चार लोग दिल्ली के घरों से फेंक दिये गए, कुछ बुजुर्ग भटक कर लापता हो गए।  मैंने त्याग और करुणा का सर्वोच्च रूप देखा। भगत ने कहा कि लोगों को घिन आती है। पखाना पेशाब साफ करने में। इसलिए सड़कों पर छोड़ देते हैं। अस्पताल के बाहर छोड़ देते हैं। कई बुजुर्ग तो इस अवस्था में भी मिले कि उनके अंगूठों पर नीली स्याही के निशान ताज़े थे। ऐसा कई केस आ चुका है। संपत्ति के दस्तावेज़ पर अंगूठा लगवाकर इन बुजुर्गों को लोग फेंक देते हैं। स्याही सूखने का इंतज़ार भी नहीं किया।  कई लोग तो फोन कर छोड़ देते हैं कि दस बारह हज़ार का महीना ले लो लेकिन अपने पास रख लो। भगत ने कहा कि मैं काफी समझाता हूं कि अपने पास रखिये फिर उनके सामने कड़ी शर्तें रखता हूं कि मिलने नहीं दूंगा मगर कोई यह नहीं कहता कि दूर से भी देख लेने देना। मां बाप को छोड़ कर जाते हैं तो दोबारा नहीं आते। एक बेटी से कहा कि फिर नहीं आओगी तो उसने कहा मंज़ूर है। फिर कहा कि देखो अगर तुम्हारी मां गुज़र गईं तो अंतिम संस्कार भी नहीं करने दूंगा तो उस पर भी वो मान गई। ऐसे तमाम बेटों की कहानी है कि पता चल गया कि मां बाप यहां हैं। कोई लंदन है कोई लुधियाना तो कोई अफसर मगर कोई लेने नहीं आता।

भगत के पास समाज की जो हकीकत है वो न तो ओबामा के पास है न मोदी के पास न किसी पत्रकार के पास। उनका अनुभव बोले जा रहा था। बुजुर्ग औरतें और पुरुष भगत और उनके सहयोगियों को बहुत प्यार करते हैं। सोहन सिंह को हिन्दू महिला सोहन कहती है तो मुस्लिम हैदर। सोहन ने बताया कि जो नाम याद आता है इन्हें बुला लेती हैं। भगत ने कुर्सी पर कोने में दुबके पांडे जी से कहा कि ये सिर्फ केला खाते हैं। मैंने कहा कि ये कैसे पता चला। तो कहने लगे कि महीनों तजुर्बा करते करते समझ आ गया। जो डिमेंशिया या अलज़ाइमर  के मरीज होते हैं  उन्हें अपने बच्चों के नाम याद रह जाते हैं। पोते पोतियों के नाम याद रह जाते हैं। जाति याद नहीं रहती मगर धर्म याद रहता है और हां स्वाद याद रहता है। इसलिए बाकी लोग स्वादिष्ट दलिया और हार्लिक्स पी रहे हैं मगर पांडे जी केला खा रहे हैं। आश्रम के सेवक कुछ औरतों को खैनी खिला रहे थे। कहा कि इसकी आदत है नहीं दो तो रोने लगती हैं।

भगत ने अमीरी गरीबी का भी भेद खोल दिया। कहा कि कई अमीर हैं जो अपने मां बाप की खूब सेवा करते हैं। तब पता चलता है जब वे उनके गुजरने के बाद महंगी मशीने और डायपर लेकर आते हैं। दान देने के लिए। मगर अमीर ही अपने मां बाप को सड़कों पर छोड़ देते हैं। हां लेकिन गरीब अपने मां बाप को नहीं फेंकता है। वो सेवा कर लेता है। कहा कि दान मांग कर और खुलकर मांग कर इनकी सेवा करता हूं। ऐसा हिसाब लगा रखा है कि पैसा बचेगा ही नहीं। बचने से समस्या पैदा होती है। मैंने खुद देखा। बेहतरीन साफ सफाई के साथ खाना बन रहा था। सबको अच्छे कपड़े दिये गए थे। हैदर ने बताया कि एक बार  घिन आ गई तो किसी बुजुर्ग के पखाने को ब्रश से साफ कर दिया। भगत जी तो भगाने लगे कि भागो यहां से। ब्रश से जख्म हो जाएगा। हाथ से साफ करो। अब सामान्य ही लगता है सबकुछ।

उस आश्रम में अनगिनत किस्से हैं। हर किस्सा आपको गिरा कर नए सिरे से खड़ा कर देता है। भगत जी ने कहा कि हम सबका धर्म के हिसाब से संस्कार करते हैं। हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं। अब तो मेरे पास चार आदमी हैं मगर जब यह काम शुरू किया था तब अपने हाथ से उठाकर मृत शरीर को गली के बाहर तक ले जाता था। मुझे तो हिन्दू मां भी बेटा कहती है तो मैं हिन्दू हो गया, मुस्लिम मां भी बेटा कहती है तो मुसलमान हुआ जब मां मुसलमान है तो बेटा भी मुसलमान हुआ, ईसाई मां ने बेटा कहा तो ईसाई हो गया। उनकी इस बात ने छलका दिया मुझे। हम किन वहशी लोगों के गिरफ्त में आ जाते हैं। धर्म पहचान कर अलग कर देते हैं। आश्रम की तख्ती पर कुरान की आयतें, गुरु नानक देवजी, ईसा मसीह के बगल में दुर्गी जी, कबीर,रविदास जी।  सब एक साथ। ये होती है इंसानियत की इबादत। इंसानों को भगवान मानकर सेवा की तब भगवान एक से लगने लगे।

जो देखा खुद को काफी भरोसा देने वाला था। भगत ने कर के दिखाया है। उनके नब्बे साल के पिता ने कहा कि मैं नहीं भी रहा तो भगत के मां बाप हमेशा दुनिया में रहेंगे। इतने लोग  इसे बेटा बेटा कहते हैं तो कभी होगा ही नहीं कि इसकी कोई मां नहीं होगी, इसका कोई पिता नहीं होगा। मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ। इस कहानी ने भीतर तक तर कर दिया। सहयोगी सुशील बहुगुणा ने कहा कि फुटेज देखकर रोना आ गया। मैं यही सोचता हुआ दफ्तर से निकला कि इसे कहते हैं आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था जब आप पखाने में उतरकर उसकी सेवा कर दें। कार में बैठा ही था कि कई मिस्ड काल नज़र आने लगे तो सुबह आए होंगे। सूचना मिली कि मेरी अपनी बड़की माई गुज़र गईं हैं। दो बुजुर्गों की दुनिया में बंट गया। हमारे बाबूजी को बहुत प्यार करती थी, कहती थीं मेरा देवर होता तो ये कर देता वो कर देता। छठ के समय बड़किया का बनाया रसियाव आज तक याद है। बचपन की स्मृतियों का आधार है। कसार अब नहीं खा सकेंगे। वो चली गई। इस वक्त जब मैं यह लिख रहा हूं मेरे बड़े भैया उन्हें अग्नि दे चुके हैं। बता रहे थे कि हम सब घाट पर हैं। अगर भगत से नहीं मिला होता तो इस खबर से मैं टूट जाता । मगर भगत के माता-पिता की कहानी सुनकर लगता है कि मेरी बड़किया किस्मत वाली है। उसकी बहू ने खूब सेवा की, बेटे ने भी की।  संपन्न बेटी- दामादों ने की या नहीं मालूम नहीं। किया ही होगा। बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिए मगर भगत की बातें सुनकर बिना जाने यकीन भी नहीं होता। अपने रिश्तेदारों से न के बराबर संपर्क रखता हू। भगत का स्केल देखकर ऐसा लग रहा था कि हमने भी अपने बाबूजी की कम सेवा की। मां की कम सेवा करता हूं। मुझे लगता है कि बहुत ख्याल रखता हूं मगर कोई भगत के भाव की बराबरी नहीं कर सकता है।

बड़का बाबूजी भी कमज़ोर हो गए हैं। दोनों एक दूसरे को खूब प्यार करते हैं। चंद दिनों पहले पटना के अस्पताल में बड़किया भरती थीं। उन्होंने मेरी भाभी से कहा कि तुम लोग हमको जिया दोगे आ बेतिया में हमार बुढऊ के कुछ हो जाई त। ले चलो वहां। बेतिया में बड़का बाबूजी ने खाना बंद कर दिया था कि मेरी बुढ़िया को पटना ले गए हैं। नहीं बच पाई तो। क्या लव स्टोरी है। आज बड़किया का देवर बहुत याद आ रहा है।

एनडीटीवी इंडिया के चर्चित एंकर और पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा- आपने मार्क्स को पढ़ा है क्या?

Rakesh Srivastava : रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा कि आपने कहीं मार्क्‍स को तो नहीं पढ़ा है जो मजदूरों के प्रति संवेदनशील हैं,  तो ढोलकिया ने कहा कि मैंने चौथी तक पढ़ाई की है और रोज़ ही बस जिंदगी की किताब पढ़ता हूं .. और, ऐसा कहते हुए ढोलकिया किसी विचारधारात्‍मक डिफेंस में नहीं थे .. वह बहुत सहज और प्राकृत थे और इस इंटरव्‍यू में उनके एक- एक शब्‍द में ईमानदारी और प्रामाणिकता की ध्‍वनि थी .. रवीश कुमार भी बहुत जल्‍द बने- बनाए फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर सहज हो लिए ..

हरि कृष्‍णा एक्‍सपोर्ट के ढोलकिया ने अपने जिन 1200 कर्मचारियों को दीवाली के उपहार में कारें, जेवर और फ्लैट दिए हैं उनके चयन का अपना एक वस्‍तुनिष्‍ठ आधार बनाया है .. एक अदना कर्मचारी से 6000 करोड़ के व्‍यवसाय की यात्रा में उन्‍होंने मजदूरों की कीमत समझी है और सोशल बिजनेस की अपनी संवेदना को अमेरिका से पढ़कर आए अपने भतीजे की सहायता से अधिक फॉर्मुलेट करते हैं .. 28 सदस्‍यों वाले संयुक्‍त परिवार में ढोलकिया मुखिया हैं पर उनका रूझान एकतरफा पितृसत्‍तात्‍मक नहीं है और कह गए कि श्रमिकों के श्रम में उनकी पत्नियों की भूमिका को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते .. सभी सरकारी सहायता लेते हैं सरकार को टैक्‍स देते हैं पर सरकारी बैसाखी आवश्‍यक नहीं मानते ..

भारतीय सामाजिक जीवन में ऐसे नायक मिलते हैं जिन्‍होंने अपने जीवन अनुभवों की पृष्‍ठभूमि में परंपरा और आधुनिकता की गजब की फाइन ट्यूनिंग बनाई होती है .. जिनकी विश्‍व दृष्टि परंपरा और नएपन दोनों से कतिपय तत्‍वों को लेकर बनी होती है पर जो पूरी तरह इंसानियत की जमीन पर टिकी होती है. ऐसी समृद्धि खूबसूरत है जिसमें आत्‍मा का विकास और भौतिक उपलब्धियां समानुपातिक है.

राकेश श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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आज बहुत दिनों बाद एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार दिखे। अच्छा लगा। रवीश अपने विषय पर पूरी स्टडी करते हैं और कहीं भी नहीं लडख़ड़ाते। इसी तरह उनकी टीम भी उम्दा होती है। अभय कुमार दुबे हिंदी के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जिनकी जिनकी जमीनी समझ लाजवाब है। अभय जी के अपने कुछ पूर्वाग्रह हो सकते हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि अभय जी राष्ट्रीय राजनीति को समझने में निष्णात हैं। वे हर जटिल से जटिल समस्या का भी ऐसा समाधान पेश कर देते हैं कि लगने लगता है अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। आज भी उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा के ढोल की पोल खोल दी। भाजपा लगातार एक देश एक जाति एक धर्म की बात करती है जबकि भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी और बहु संस्कृति वाले देश में ऐसा नामुमकिन है। यही कारण है कि भाजपा अपनी पूरी ताकत लगाकर भी महाराष्ट्र में मोदी के व्यक्तित्व को तेज हवा में भी नहीं बदल सकी। इतने धुंआधार प्रचार के बावजूद कोई ऐसी लहर नहीं पैदा कर सकी कि बहुमत के करीब तक पहुंच पाती। उसे जो भी सीटें मिली हैं वे मोदी की सोच और तैयारी के मुकाबले बहुत कम हैं। यहां तक कि वह लोकसभा में जो सीटें जीती थी वह भी नहीं जीत पाई। नीलांजल मुखोपाध्याय और संजय कुमार भी अपनी बात ढंग से रख सके तथा भाजपा कोटे से आर बालाशंकर भी और भाजपा के प्रच्छन्न चिंतक सुधींद्र कुलकर्णी भी। आज रवीश के आने पर प्राइम टाइम देखा और उनकी टीम का वाक् कौशल सुनकर अच्छा लगा। कल से लगातार टीवी पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन 50 मिनट के इस कार्यक्रम से ही पता चला कि हकीकत क्या है बाकी में तो प्रवचन ही चल रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार के बहाने कुछ अपनी कहानी

Nadim S. Akhter : मीडिया संस्थान के दफ्तर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना यानी पत्रकारिता करना अलग बात है और किसी पत्रकारिता संस्थान के छात्रों को हैंडल करना, उनके सवालों के जवाब देना, उनका कौतूहल शांत करना, उनके सपनों की हकीकत बताना, उन्हें मीडिया की निर्दयी दुनिया से रुबरु कराना और पत्रकारिता के तथाकथित मिशन से जान-पहचान कराना एकदम अलग बात.  मैं खुद को नसीब वाला मानता हूं कि भविष्य के पत्रकारों से संवाद करने का मौका मुझे मिल रहा है. नई पीढ़ी को समझने और गढ़ने का भी. लेकिन मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की तरह एक सवाल मुझे भी परेशान करता है कि नई पीढ़ी पत्रकार बनने आई है या स्टार !!! शायद ये चाह और ललक उस समय हमलोगों में भी रही होगी जब वर्ष 2001 में मैं और मेरे बाकी साथी IIMC से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेकर नौकरी ढूंढने निकल पड़े थे.

तब इतने सारे चैनल तो नहीं थे लेकिन पत्रकारिता के -स्टार- उस वक्त भी थे. -आज तक- पूरी तरह चौबीस घंटे के चैनल में तब्दील होने जा रहा था, स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) तब आया नहीं था और आज के दूसरे तमाम चैनलों का भी तब कहीं कोई अता-पता नहीं था. ले-देकर हमारे पास एक ही हिंदी का न्यूज चैनल था- जी न्यूज और तब इसके मुखिया शाजी जमां साहब हुआ करते थे और वे IIMC भी आते थे, पढ़ाने के लिए. मैं प्रिंट पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन इंटर्नशिप के लिए मैंने किसी अखबार की बजाय टीवी माध्यम को चुना और पहुंच गया जी न्यूज. वहां की कहानी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा. लेकिन जी न्यूज के जिन चेहरों को अब तक मैं स्क्रीन पर स्टार की तरह देखता था (उस समय की अपनी समझ के मुताबिक) उन्हें न्यूज रूम में दौड़ते-भागते देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था. कई मिथक टूट रहे थे और खबरों की दुनिया से मैं जुड़ता चला जा रहा था. कामकाज के दौरान ही जब जी न्यूज के उस दौर के एक स्टार एंकर ने मुझसे पूछा कि आप कहां से आए हैं तो मैंने कहा- IIMC. उन्होंने तुरंत कहा कि अच्छा, आप वहां से हो तभी तो इतने bright हो. आप तो स्टार हो !!!

ये कहकर वो तो चले गए लेकिन स्टार वाली बात मेरे जेहन में अटक गई. यानी जिसे कल तक मैं स्टार समझता था, वो खुद मुझे स्टार कह रहा था. बड़ा अजीब लग रहा था तब. खैर. तभी वो दौर आया, जब मैंने पहली बार किसी मीडिया संस्थान में सत्ता परिवर्तन देखा. शाजी जमा जी न्यूज से जा रहे थे और उनकी जगह संजय पुगलिया एंड टीम (सौरभ सिन्हा, जहां तक मुझे नाम याद है) आ चुके थे. न्यूज रूम में बदलाव मैं महसूस कर रहा था. कई सीनियर चेहरों पर तनाव दिख रहा था. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा था और वो पहले की ही तरह खबरों से जूझ रहे थे.

मैं इस बात के लिए भी खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि बॉस का बदलना और उसके बाद संस्थान में होने वाले बदलाव को मैंने अपने कैरियर के बिलकुल शुरुआती दिनों में देख लिया था. थोड़ा बहुत समझ भी लिया था. ऐसी ही एक घटना से प्रिंट में काम करते वक्त उस समय दो-चार हुआ जब नवभारत टाइम्स में मुझे पता चला कि अपने सम्पादक यानी रामकृपाल जी नभाटा छोड़कर जा रहे हैं और शायद -आज तक- ज्वाइन करेंगे. तब नभाटा में कोई सोच भी नहीं सकता था कि रामकृपाल जी यूं ही अचानक हम सबको छोड़कर चले जाएंगे. पर यह सच था. मुझे यह खबर कहीं से पता चली थी लेकिन तब मुझे मालूम नहीं था कि नभाटा में सम्पादकीय के वरिष्ठ लोगों को भी इसका भान नहीं था.

मैंने ये खबर एक वरिष्ठ को बताई जो एक डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे. वो नाराज हो गए और छूटते ही कहा कि क्या बोल रहे हो?? नौकरी चली जाएगी. रामकृपाल जी के जाने की झूठी अफवाह फैला रहे हो !! मैं हतप्रभ था, मुझे लगा कि उन्हें पता होगा. तब ये नहीं जानता था कि सम्पादक अचानक से, ऐसे ही चले जाते हैं और नीचे वालों को अंतिम समय में पता लगता है. मैं चुप हो गया.

फिर शायद उसी दिन शाम को या एक दिन बाद अचानक से रामकृपाल जी ने सम्पादकीय टीम को बताया कि वे नवभारत टाइम्स छोड़कर जा रहे हैं. ये खबर पाते ही वे वरिष्ठ मुझसे पूछने लगे कि यार, तम्हें ये बात पहले कैसे पता लग गई?? कहां से पता चली. तमाम सवाल. अब उन्हें क्या बताता कि कहां से पता चली थी, बस मालूम चल गया था. खैर. मैं रामकृपाल जी से मिलने गया. वहां उनके साथ दूसरे सम्पादक (विचार) मधुसूदन आनंद भी बैठे थे. मैं थोड़ा सकुचाया लेकिन रामकृपाल जी ने बिठा लिया. वो काफी देर तक मुझसे बात करते रहे, समझाते रहे. मुझे बताया कि मेरे यहां होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. आनंद जी हैं, सम्पादक तो आते-जाते रहते हैं. अखबार निकलते रहना चाहिए. आप मन लगाकर काम करते रहिए. उन्होने आनंद जी को भी मेरे बारे में बताया. मधुसूदन आनंद जी चुपचाप सब सुनते रहे.

उसके बाद तो कई सम्पादकों की विदाई देखी. और सब अचानक ही गए. इस विदाई के बाद पूर्व सम्पादक की टीम का हश्र भी देखा.

खैर, तो मैं बात कर रहा था टीवी पत्रकार रवीश कुमार और पत्रकारिता के छात्रों की. पत्रकारिता के छात्रों का एक -मामूली- व्यवहार रवीश को चुभ गया और इसी बात को लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है. रवीश इस बात से परेशान हैं कि भविष्य के पत्रकार उन्हें इतना भाव क्यों दे रहे हैं. बात सही भी है. आखिर रवीश भी तो मामूली पत्रकार हैं, शुरुआती दिनों में डेस्क पर चिट्ठियां छांटा करते थे. टीवी पर दिखने से ही क्या कोई स्टार हो जाता है??!! और जिन्हें आज वे स्टार समझ रहे हैं, हो सकता है कल वो उनसे कई कदम आगे निकल जाएं. अपनी ईमानदारी और मेहनत के दम पर उनसे भी बड़े तथाकथित स्टार बन जाएं!! क्यों, ऐसा संभव नहीं है क्या !!!

रवीश का लिखा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

: स्टार यार पत्रकार! : ”सर, असली काम आप लोगों ने किया और फोटो लोग मेरे साथ खींचा रहे हैं। सब कुछ दिखने तक ही है सर।” क्लास रूम से निकलती भीड़ और दरवाज़े की दहलीज़ पर दबे अरुण कुमार त्रिपाठी से मैं इतना ही कह पाया। वरिष्ठ पत्रकार अरुण जी ने भी इतना ही कहा कि एन्जाय कीजिए। और भी कुछ कहा होगा पर अब ध्यान नहीं। उसके बाद वे अंदर चले गए और बीस पचीस छात्र मेरे साथ साथ बाहर तक आ गए। बारह पंद्रह घंटे तो बीत ही चुके हैं इस बात को लेकिन मुझे कुछ खटक रही है।

मैं कनाट प्लेस में होता या किसी सिनेमा हाल में तो कोई बात नहीं थी। लोग घेर ही लेते हैं और तस्वीरें खींचा लेते हैं। वहां भी अच्छा नहीं लगता मगर अब दांत चियार देता हूं क्लिक होने से पहले। दर्शक और पाठक की इस उदारता से आप यह सीख सकते हैं कि आपकी बात करने के तरीके में क्या खूबी है या क्या कमी। फिर भी संकोच होता है और लगता है कि मेरी निजता या अकेलापन अब घर में ही सुरक्षित है। बाहर नहीं। साथ चलने वाले मित्र भी मेरे कहीं होने की स्थिति को पहचानने और नहीं पहचानने में विभाजित करने लगते हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता है। मैं यही चाहूंगा कि मैं चुपचाप लोगों को देखता रहूं, समझता रहूं, और लिखता रहूं। लेकिन टीवी में रहकर और वो भी रोज़ रात घंटा भर दिखकर इस सुविधा का मांग करना ही माध्यम से नाइंसाफी है। टीवी से इतनी शिकायत है तो मुझे किसी और माध्यम में रहना चाहिए। पर क्या करें टीवी ही जानता हूं और शायद कुछ हद तक इश्क जैसा भी है।

पर जो पत्रकार बनने वाले हैं उनके बीच घिरे होने से क्या तकलीफ हो गई। हो गई। पत्रकार अगर किसी व्यक्ति से इतना प्रभावित हो सकता है कि वो क्लास रूम छोड़ कर बाहर निकल आए, उसे इतनी भी फिक्र नहीं कि कोई वरिष्ठ पत्रकार अंदर गया है जो उसी के लिए कहीं से आया होगा तो मुझे दिक्कत है। मेरे लिए यह गंभीर मामला है। एक युवा पत्रकार किससे मिलना चाहता है। स्टार से या पत्रकार से। मेरे कहने पर भी लड़के नहीं लौटे। फिर मैं यह समझ कर बात करने लगा कि शायद इनके मन में मेरे किसी काम का गहरा प्रभाव होगा जिसके किसी घेरे से वे कहने के बाद भी निकल नहीं पा रहे हैं। कुछ चेहरे मुझे सवालों के साथ देख रहे थे और यह मुझे ठीक लगा मगर ज्यादातर अति प्रभावित होकर, जो मुझे ठीक नहीं लगा। क्लास रूम से दोनों ही प्रकार के छात्र बाहर आ गए थे। वे मुझसे गंभीर ही सवाल कर रहे थे लेकिन फिर भी मेरा मन अरुण त्रिपाठी के क्लास रूप में होने और इन छात्रों के बाहर होने के बीच कहीं फंसा रहा। क्लास रूम में कुछ पत्रकारों की सांसे तेज़ हो रही थीं जब वे मुझसे सवाल पूछ रहे थे। एक किस्म के प्रदर्शन का भी भाव था। किसी के सवाल में मुझे उधेड़ देने का भी और किसी के सवाल में एक विद्यार्थी की तरह कुछ जानने का भी भाव नज़र आया। मैं उस हाल को एक टीवी सेट की तरह देख रहा था। अलग अलग किरदारों की भूमिका में विद्यार्थी मुझे नाप रहे थे। मैं उनको नाप रहा था। मैं सारे सवालों का जवाब जानता हूं ऐसा भ्रम मुझे कभी नहीं रहा है। मेरे सारे जवाब सही होंगे इस भ्रम से तो मैं और भी दूर हूं।

जिस तरह से मुझे कुछ दिखाई देता है उस तरह से सुनाई भी। बात होती रही। बीच बीच में मेरी कार का माडल का नाम किसी ने लिया, किसी ने भीतर भी घूरा ही होगा, किसी ने कहा ड्राईवर नहीं है, किसी ने उम्र पूछ दिया तो किसी ने कहां के हैं सर। आप सिम्पल रहते हैं। सुबह ही किसी मित्र ने फोन पर कह दिया था कि तुम ब्रांड हो। शाम को इन छात्रों की बातों सुनकर लगा कि मैं डालडा का कोई टिन हूं जिसे दुकान पर लोग घूर घूर कर मुआयना कर रहे हैं। फिर मैं कब मैं रहूंगा। क्या मुझे ब्रांड बने रहने के लिए कुछ नकली भी होना पड़ेगा। ख़ुद को किसी स्लोगन की तरह पेश करना होगा। जो भी मुझे देख रहा है किसी न किसी रैपर के साथ देख रहा है। शायद कोई एक्सपायरी डेट भी पढ़ने की कोशिश करता होगा। मुझे उन छात्रों की यह सहज दिलचस्पी ठीक नहीं लगी। मैं कोई शर्वशक्तिमान बिस्कुट नहीं हूं। यह मैंने क्लास में भी कहा। इतना काफी था पत्रकारिता के छात्रो की तंद्रा या कोई मोहजाल तोड़ने के लिए। पर यह काफी साबित नहीं हुआ।

कई छात्रों के सवाल रूटीन टाइप ही थे। एक ने सही सवाल किया। आपने जो किया सो किया, अब अगर हम कुछ नया करना चाहें तो किस तरफ देख सकते हैं। ये वो सवाल था जो मैं अपने नज़दीक आने वाले किसी छात्र से कहता ही हूं। हम नया क्या कर सकते हैं, दो तीन छात्रों ने इसी के आस-पास सवाल पूछे जो मुझे बहुत पसंद आए। काश वक्त रहता तो घंटों इस पर उनके साथ दिमाग भिड़ाता। इसी तरह जाते जाते एक लड़की ने कहा कि घटना स्थल पर पत्रकार को बचाना चाहिए या शूटिंग करनी चाहिए। टीवी के पत्रकारों से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं फिर भी एक पेशेवर के नाते ये ज़रूरी सवाल हैं। मेरे जवाब से शायद वह संतुष्ठ नहीं हुई लेकिन मैं इतना कह कर निकल गया कि इस सवाल पर कई तरह के जवाब हैं। जिसका अलग अलग संदर्भों में कुछ घटनाओं के साथ मूल्यांकन करना चाहिए। ऐसे कुछ सवाल थे जो मुझे भी नए सिरे या फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रहे थे। दरअसल नए पत्रकारों के साथ इसी तरह का संवाद होना चाहिए। उन्हें मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उन्हें उन लोगों की तलाश करनी चाहिए जो मेरी तरह टीवी पर कुछ भी करते हुए नहीं दिखते हैं बल्कि गंभीर काम करते हैं। इससे उनकी ही जानकारी का दायरा बढ़ेगा। मैं अपने घर, दफ्तर, दोस्तों और हमपेशा लोगों के बीच सामान्य ही होना चाहूंगा। ये आपकी गलती है कि आप मुझे मूर्ति बनाते हैं फिर पूजते हैं फिर किसी दिन खुंदक में आकर तोड़ देते हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मैं यह बात अपने लिए नहीं, आपके लिए लिख रहा हूं। मुझे सही में कोई फर्क नहीं पड़ता सिवाय इस बात के कि आपने मेरे काम में कोई सार्थक गलती निकाली है।

पर क्या मैं अपने पाठकों दर्शकों और सह-पत्रकरों से यह सवाल पूछ सकता हूं कि वो एक पत्रकार में स्टार क्यों देखना चाहते हैं। इसके लिए तो न जाने कितने नाम रोज़ अंडा ब्रेड के ब्रांड के साथ आते ही रहते हैं। ऐसा क्या किया है मैंने कि कोई मेरे साथ क्लास रूम से बाहर निकल जाए। फिर तो मुझे वे सारे सवाल खोखले नज़र आने चाहिए जो छात्रों ने क्लास रूम में पूछे। यह तो नहीं हो सकता कि अंदर आप किसानों और गांवों या हाशिये के लोगों की पत्रकारिता में कम होती जगह पर सवाल पूछे और क्लास रूम से निकलते ही मेरे पीछे पीछे ऐसे दौड़े चले आएं जैसे मैं कर्ज़ फिल्म का टोनी हूं। दरवाज़े पर एक वरिष्ठ पत्रकार फंसा हो और लोग पन्ने बढ़ा दें कि आटोग्राफ दे दें। ठहरकर देखने और मुझे मेरी सीमाओं के साथ समझने की आदत तो होनी ही चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि क्लास रूम में बैठे लोग उन्हीं को पहचानते हैं जो रोज़ रात टीवी में बकवास करते हैं और कभी कभी सरोकार टाइप पर अखबारों में लिख देते हैं।

उस बड़े से हाल में कुछ लड़कियां भी थीं। तीसरी या चौथी कतार में। मुझसे पूछने के लिए समेट ही नहीं पाईं।  लड़के तुरंत सहज हो गए और एक दूसरे से होड़ करते हुए पूछने लगे। अगर इस लेख को कोई युवा पत्रकारिन पढ़ रही है तो मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि उसे इस पेशे में आकर एक दिन इसी तरह के स्पेस में जद्दोज़हद करनी पड़ेगी। किसी प्रेस कांफ्रेंस में अपना सवाल पूछने के लिए और दफ्तर की मीटिंग में कुछ कहने के लिए। उसे भी अपने कंधों को टकराने देना चाहिए। आवाज़ बुलंद कर लेनी चाहिए। बिना इसके ये गढ़ टूटेगा नहीं जो दिखता तो नहीं है मगर होता है। जिस लड़की ने मुझसे यह सवाल किया कि पत्रकार को मौके पर क्या करना चाहिए मैंने देखा कि पूछने से पहले अपने चेहरे पर काफी कुछ समेट कर लाई थी। सांसे थोड़ी तेज़ थीं और लड़कों की भीड़ में जगह बनाते हुए चेहरा थोड़ा सुर्ख। वो गुस्से में थी कि किसी टीवी चैनल ने एक पंचायत में डायन बताकर किसी महिला के वस्त्र उतारने की आधे घंटे की रिपोर्ट दिखाई थी। जल्दबाज़ी में जितना समझ सका वो यह कि उस चैनल ने कथित रूप से तस्वीरों को धुंधला नहीं किया और इतनी देर तक पत्रकार शूटिंग करता रहा तो क्या उसे रोकना नहीं चाहिए था। पुलिस नहीं बुलानी चाहिए थी। इस सवाल का जवाब हां या न में नहीं दिया जा सकता था, वो भी सारी बातों को जाने बगैर। मगर मुझे उसके चेहरे की उत्तेजना पसंद आई। इतने बच्चों के बीच किसी के चेहरे पर पत्रकार दिखा। शायद यही वजह थी कि भीड़ से घिरे होने के बाद भी जाते-जाते उसके सवाल पर कुछ बोलता रहा। उसकी तरफ देखता रहा। वो तब तक दूर बैठ चुकी थी । मैं ज़ोर ज़ोर से उस तक पहुंचने का प्रयास कर रहा था। उसके चेहरे की आग बची रहे बाकी सब भी बच जाएगा।

ऐसे ही कुछ अच्छे लड़के भी मिले। मैं भी उनके साथ कुछ समेट कर बांटने का प्रयास कर रहा था। बहुत ज्यादा किसी आदर्श स्थिति के होने के संदर्भ में सवाल पूछने की बचकानी हरकत के बजाए हम सबको अपने अपने लघुस्तरों पर संघर्ष करते रहना पड़ेगा कि हम पत्रकारिता में आदर्श स्थिति पैदा करते रहें। समंदर न सही तालाब ही। तालाब नहीं तो कुआं ही सही। यह आपका व्यक्तिगत प्रयास है। समाज सवाल करता रहेगा मगर सवाल कंपनी से नहीं करेगा आपसे करेगा। आपकी हालत सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता सी रहेगी जिसे नहीं मालूम कि सरकार क्या करेगी लेकिन उसे सरकार और पार्टी दोनों का बचाव करना है। पत्रकारिता में आदर्श स्थिति कभी नहीं रही है। पर यही लक्ष्य है जिसके लिए न जाने कितने ही पत्रकार संघर्ष कर रहे होंगे जो कभी प्राइम टाइम पर नहीं आते होंगे। इसके लिए ज़रूरी है कि अपने कौशल के निरंतर विकास को ज़रूरी काम मानें। अपने लिखने का सख्त मूल्यांकन करें। लगातार प्रयोग करें। पढ़ाई करते रहें और अपने काम को जितना गंभीरता से लें उससे ज्यादा खुद को भी। यह बात उनके लिए है जिनका जीवन लक बाई चांस नहीं कटता है। जिनका कट जाता है उन्हें मेरा लिखा कूड़ा करकट पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं। ज्यादातर लोगों का जीवन कट ही जाता है। कुलमिलाकर अच्छा लगा। बस मुझे ज्यादा भाव देने की बात खटक गई। आप कह सकते हैं कि मैं अति विनम्रता का प्रदर्शन कर रहा हूं। आप कुछ भी कह सकते हैं जैसे मैं भी कुछ भी कह सकता हूं। मुझे लगा कि यह कहना चाहिए तो कह दिया।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े पत्रकार हैं. उनका यह लेख उनके ब्लाग कस्बा से साभार लिया गया है.

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अच्छा अखबार जनसत्ता और अच्छा एंकर रवीश कुमार

Shambhu Nath Shukla : एक अच्छा संपादक वह नहीं है जो अपने ही अखबार में धुंधाधार लिखता रहे। संपादक को अपना ही लेखन पढ़ाने की जरूरत नहीं पढ़ती और उसके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए संपादकीय तो हैं ही, एक अच्छा संपादक वह है जो अच्छे लेखक तैयार करे। जो लोगों को लिखने के लिए विवश करे। जनसत्ता का योगदान यही है कि उसने लिखने और पढऩे वालों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।

आज भी तमाम जगह मुझे ऐसे आईएएस और आईपीएस मिल जाते हैं जो अब विभिन्न सरकारी विभागों में सचिव या इसके ऊपर के स्तर के अधिकारी हैं अथवा पीएसयू में ईडी, सीएमडी हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी परीक्षा की तैयारी जनसत्ता पढ़कर की थी। मगर अब हिंदी अखबार ऐसा वर्ग नहीं तैयार कर रहा। यह एक दुखद अध्याय है। ठीक इसी तरह न्यूज चैनलों का एक अच्छा एंकर वह है जो खुद कम बोले अपने अतिथियों को बोलने का मौका ज्यादा दे। यकीनन Ravish Kumar इस मामले में अव्वल हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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