रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा- आपने मार्क्स को पढ़ा है क्या?

Rakesh Srivastava : रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा कि आपने कहीं मार्क्‍स को तो नहीं पढ़ा है जो मजदूरों के प्रति संवेदनशील हैं,  तो ढोलकिया ने कहा कि मैंने चौथी तक पढ़ाई की है और रोज़ ही बस जिंदगी की किताब पढ़ता हूं .. और, ऐसा कहते हुए ढोलकिया किसी विचारधारात्‍मक डिफेंस में नहीं थे .. वह बहुत सहज और प्राकृत थे और इस इंटरव्‍यू में उनके एक- एक शब्‍द में ईमानदारी और प्रामाणिकता की ध्‍वनि थी .. रवीश कुमार भी बहुत जल्‍द बने- बनाए फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर सहज हो लिए ..

हरि कृष्‍णा एक्‍सपोर्ट के ढोलकिया ने अपने जिन 1200 कर्मचारियों को दीवाली के उपहार में कारें, जेवर और फ्लैट दिए हैं उनके चयन का अपना एक वस्‍तुनिष्‍ठ आधार बनाया है .. एक अदना कर्मचारी से 6000 करोड़ के व्‍यवसाय की यात्रा में उन्‍होंने मजदूरों की कीमत समझी है और सोशल बिजनेस की अपनी संवेदना को अमेरिका से पढ़कर आए अपने भतीजे की सहायता से अधिक फॉर्मुलेट करते हैं .. 28 सदस्‍यों वाले संयुक्‍त परिवार में ढोलकिया मुखिया हैं पर उनका रूझान एकतरफा पितृसत्‍तात्‍मक नहीं है और कह गए कि श्रमिकों के श्रम में उनकी पत्नियों की भूमिका को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते .. सभी सरकारी सहायता लेते हैं सरकार को टैक्‍स देते हैं पर सरकारी बैसाखी आवश्‍यक नहीं मानते ..

भारतीय सामाजिक जीवन में ऐसे नायक मिलते हैं जिन्‍होंने अपने जीवन अनुभवों की पृष्‍ठभूमि में परंपरा और आधुनिकता की गजब की फाइन ट्यूनिंग बनाई होती है .. जिनकी विश्‍व दृष्टि परंपरा और नएपन दोनों से कतिपय तत्‍वों को लेकर बनी होती है पर जो पूरी तरह इंसानियत की जमीन पर टिकी होती है. ऐसी समृद्धि खूबसूरत है जिसमें आत्‍मा का विकास और भौतिक उपलब्धियां समानुपातिक है.

राकेश श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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आज बहुत दिनों बाद एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार दिखे। अच्छा लगा। रवीश अपने विषय पर पूरी स्टडी करते हैं और कहीं भी नहीं लडख़ड़ाते। इसी तरह उनकी टीम भी उम्दा होती है। अभय कुमार दुबे हिंदी के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जिनकी जिनकी जमीनी समझ लाजवाब है। अभय जी के अपने कुछ पूर्वाग्रह हो सकते हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि अभय जी राष्ट्रीय राजनीति को समझने में निष्णात हैं। वे हर जटिल से जटिल समस्या का भी ऐसा समाधान पेश कर देते हैं कि लगने लगता है अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। आज भी उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा के ढोल की पोल खोल दी। भाजपा लगातार एक देश एक जाति एक धर्म की बात करती है जबकि भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी और बहु संस्कृति वाले देश में ऐसा नामुमकिन है। यही कारण है कि भाजपा अपनी पूरी ताकत लगाकर भी महाराष्ट्र में मोदी के व्यक्तित्व को तेज हवा में भी नहीं बदल सकी। इतने धुंआधार प्रचार के बावजूद कोई ऐसी लहर नहीं पैदा कर सकी कि बहुमत के करीब तक पहुंच पाती। उसे जो भी सीटें मिली हैं वे मोदी की सोच और तैयारी के मुकाबले बहुत कम हैं। यहां तक कि वह लोकसभा में जो सीटें जीती थी वह भी नहीं जीत पाई। नीलांजल मुखोपाध्याय और संजय कुमार भी अपनी बात ढंग से रख सके तथा भाजपा कोटे से आर बालाशंकर भी और भाजपा के प्रच्छन्न चिंतक सुधींद्र कुलकर्णी भी। आज रवीश के आने पर प्राइम टाइम देखा और उनकी टीम का वाक् कौशल सुनकर अच्छा लगा। कल से लगातार टीवी पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन 50 मिनट के इस कार्यक्रम से ही पता चला कि हकीकत क्या है बाकी में तो प्रवचन ही चल रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार के बहाने कुछ अपनी कहानी

Nadim S. Akhter : मीडिया संस्थान के दफ्तर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना यानी पत्रकारिता करना अलग बात है और किसी पत्रकारिता संस्थान के छात्रों को हैंडल करना, उनके सवालों के जवाब देना, उनका कौतूहल शांत करना, उनके सपनों की हकीकत बताना, उन्हें मीडिया की निर्दयी दुनिया से रुबरु कराना और पत्रकारिता के तथाकथित मिशन से जान-पहचान कराना एकदम अलग बात.  मैं खुद को नसीब वाला मानता हूं कि भविष्य के पत्रकारों से संवाद करने का मौका मुझे मिल रहा है. नई पीढ़ी को समझने और गढ़ने का भी. लेकिन मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की तरह एक सवाल मुझे भी परेशान करता है कि नई पीढ़ी पत्रकार बनने आई है या स्टार !!! शायद ये चाह और ललक उस समय हमलोगों में भी रही होगी जब वर्ष 2001 में मैं और मेरे बाकी साथी IIMC से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेकर नौकरी ढूंढने निकल पड़े थे.

तब इतने सारे चैनल तो नहीं थे लेकिन पत्रकारिता के -स्टार- उस वक्त भी थे. -आज तक- पूरी तरह चौबीस घंटे के चैनल में तब्दील होने जा रहा था, स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) तब आया नहीं था और आज के दूसरे तमाम चैनलों का भी तब कहीं कोई अता-पता नहीं था. ले-देकर हमारे पास एक ही हिंदी का न्यूज चैनल था- जी न्यूज और तब इसके मुखिया शाजी जमां साहब हुआ करते थे और वे IIMC भी आते थे, पढ़ाने के लिए. मैं प्रिंट पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन इंटर्नशिप के लिए मैंने किसी अखबार की बजाय टीवी माध्यम को चुना और पहुंच गया जी न्यूज. वहां की कहानी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा. लेकिन जी न्यूज के जिन चेहरों को अब तक मैं स्क्रीन पर स्टार की तरह देखता था (उस समय की अपनी समझ के मुताबिक) उन्हें न्यूज रूम में दौड़ते-भागते देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था. कई मिथक टूट रहे थे और खबरों की दुनिया से मैं जुड़ता चला जा रहा था. कामकाज के दौरान ही जब जी न्यूज के उस दौर के एक स्टार एंकर ने मुझसे पूछा कि आप कहां से आए हैं तो मैंने कहा- IIMC. उन्होंने तुरंत कहा कि अच्छा, आप वहां से हो तभी तो इतने bright हो. आप तो स्टार हो !!!

ये कहकर वो तो चले गए लेकिन स्टार वाली बात मेरे जेहन में अटक गई. यानी जिसे कल तक मैं स्टार समझता था, वो खुद मुझे स्टार कह रहा था. बड़ा अजीब लग रहा था तब. खैर. तभी वो दौर आया, जब मैंने पहली बार किसी मीडिया संस्थान में सत्ता परिवर्तन देखा. शाजी जमा जी न्यूज से जा रहे थे और उनकी जगह संजय पुगलिया एंड टीम (सौरभ सिन्हा, जहां तक मुझे नाम याद है) आ चुके थे. न्यूज रूम में बदलाव मैं महसूस कर रहा था. कई सीनियर चेहरों पर तनाव दिख रहा था. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा था और वो पहले की ही तरह खबरों से जूझ रहे थे.

मैं इस बात के लिए भी खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि बॉस का बदलना और उसके बाद संस्थान में होने वाले बदलाव को मैंने अपने कैरियर के बिलकुल शुरुआती दिनों में देख लिया था. थोड़ा बहुत समझ भी लिया था. ऐसी ही एक घटना से प्रिंट में काम करते वक्त उस समय दो-चार हुआ जब नवभारत टाइम्स में मुझे पता चला कि अपने सम्पादक यानी रामकृपाल जी नभाटा छोड़कर जा रहे हैं और शायद -आज तक- ज्वाइन करेंगे. तब नभाटा में कोई सोच भी नहीं सकता था कि रामकृपाल जी यूं ही अचानक हम सबको छोड़कर चले जाएंगे. पर यह सच था. मुझे यह खबर कहीं से पता चली थी लेकिन तब मुझे मालूम नहीं था कि नभाटा में सम्पादकीय के वरिष्ठ लोगों को भी इसका भान नहीं था.

मैंने ये खबर एक वरिष्ठ को बताई जो एक डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे. वो नाराज हो गए और छूटते ही कहा कि क्या बोल रहे हो?? नौकरी चली जाएगी. रामकृपाल जी के जाने की झूठी अफवाह फैला रहे हो !! मैं हतप्रभ था, मुझे लगा कि उन्हें पता होगा. तब ये नहीं जानता था कि सम्पादक अचानक से, ऐसे ही चले जाते हैं और नीचे वालों को अंतिम समय में पता लगता है. मैं चुप हो गया.

फिर शायद उसी दिन शाम को या एक दिन बाद अचानक से रामकृपाल जी ने सम्पादकीय टीम को बताया कि वे नवभारत टाइम्स छोड़कर जा रहे हैं. ये खबर पाते ही वे वरिष्ठ मुझसे पूछने लगे कि यार, तम्हें ये बात पहले कैसे पता लग गई?? कहां से पता चली. तमाम सवाल. अब उन्हें क्या बताता कि कहां से पता चली थी, बस मालूम चल गया था. खैर. मैं रामकृपाल जी से मिलने गया. वहां उनके साथ दूसरे सम्पादक (विचार) मधुसूदन आनंद भी बैठे थे. मैं थोड़ा सकुचाया लेकिन रामकृपाल जी ने बिठा लिया. वो काफी देर तक मुझसे बात करते रहे, समझाते रहे. मुझे बताया कि मेरे यहां होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. आनंद जी हैं, सम्पादक तो आते-जाते रहते हैं. अखबार निकलते रहना चाहिए. आप मन लगाकर काम करते रहिए. उन्होने आनंद जी को भी मेरे बारे में बताया. मधुसूदन आनंद जी चुपचाप सब सुनते रहे.

उसके बाद तो कई सम्पादकों की विदाई देखी. और सब अचानक ही गए. इस विदाई के बाद पूर्व सम्पादक की टीम का हश्र भी देखा.

खैर, तो मैं बात कर रहा था टीवी पत्रकार रवीश कुमार और पत्रकारिता के छात्रों की. पत्रकारिता के छात्रों का एक -मामूली- व्यवहार रवीश को चुभ गया और इसी बात को लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है. रवीश इस बात से परेशान हैं कि भविष्य के पत्रकार उन्हें इतना भाव क्यों दे रहे हैं. बात सही भी है. आखिर रवीश भी तो मामूली पत्रकार हैं, शुरुआती दिनों में डेस्क पर चिट्ठियां छांटा करते थे. टीवी पर दिखने से ही क्या कोई स्टार हो जाता है??!! और जिन्हें आज वे स्टार समझ रहे हैं, हो सकता है कल वो उनसे कई कदम आगे निकल जाएं. अपनी ईमानदारी और मेहनत के दम पर उनसे भी बड़े तथाकथित स्टार बन जाएं!! क्यों, ऐसा संभव नहीं है क्या !!!

रवीश का लिखा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

: स्टार यार पत्रकार! : ”सर, असली काम आप लोगों ने किया और फोटो लोग मेरे साथ खींचा रहे हैं। सब कुछ दिखने तक ही है सर।” क्लास रूम से निकलती भीड़ और दरवाज़े की दहलीज़ पर दबे अरुण कुमार त्रिपाठी से मैं इतना ही कह पाया। वरिष्ठ पत्रकार अरुण जी ने भी इतना ही कहा कि एन्जाय कीजिए। और भी कुछ कहा होगा पर अब ध्यान नहीं। उसके बाद वे अंदर चले गए और बीस पचीस छात्र मेरे साथ साथ बाहर तक आ गए। बारह पंद्रह घंटे तो बीत ही चुके हैं इस बात को लेकिन मुझे कुछ खटक रही है।

मैं कनाट प्लेस में होता या किसी सिनेमा हाल में तो कोई बात नहीं थी। लोग घेर ही लेते हैं और तस्वीरें खींचा लेते हैं। वहां भी अच्छा नहीं लगता मगर अब दांत चियार देता हूं क्लिक होने से पहले। दर्शक और पाठक की इस उदारता से आप यह सीख सकते हैं कि आपकी बात करने के तरीके में क्या खूबी है या क्या कमी। फिर भी संकोच होता है और लगता है कि मेरी निजता या अकेलापन अब घर में ही सुरक्षित है। बाहर नहीं। साथ चलने वाले मित्र भी मेरे कहीं होने की स्थिति को पहचानने और नहीं पहचानने में विभाजित करने लगते हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता है। मैं यही चाहूंगा कि मैं चुपचाप लोगों को देखता रहूं, समझता रहूं, और लिखता रहूं। लेकिन टीवी में रहकर और वो भी रोज़ रात घंटा भर दिखकर इस सुविधा का मांग करना ही माध्यम से नाइंसाफी है। टीवी से इतनी शिकायत है तो मुझे किसी और माध्यम में रहना चाहिए। पर क्या करें टीवी ही जानता हूं और शायद कुछ हद तक इश्क जैसा भी है।

पर जो पत्रकार बनने वाले हैं उनके बीच घिरे होने से क्या तकलीफ हो गई। हो गई। पत्रकार अगर किसी व्यक्ति से इतना प्रभावित हो सकता है कि वो क्लास रूम छोड़ कर बाहर निकल आए, उसे इतनी भी फिक्र नहीं कि कोई वरिष्ठ पत्रकार अंदर गया है जो उसी के लिए कहीं से आया होगा तो मुझे दिक्कत है। मेरे लिए यह गंभीर मामला है। एक युवा पत्रकार किससे मिलना चाहता है। स्टार से या पत्रकार से। मेरे कहने पर भी लड़के नहीं लौटे। फिर मैं यह समझ कर बात करने लगा कि शायद इनके मन में मेरे किसी काम का गहरा प्रभाव होगा जिसके किसी घेरे से वे कहने के बाद भी निकल नहीं पा रहे हैं। कुछ चेहरे मुझे सवालों के साथ देख रहे थे और यह मुझे ठीक लगा मगर ज्यादातर अति प्रभावित होकर, जो मुझे ठीक नहीं लगा। क्लास रूम से दोनों ही प्रकार के छात्र बाहर आ गए थे। वे मुझसे गंभीर ही सवाल कर रहे थे लेकिन फिर भी मेरा मन अरुण त्रिपाठी के क्लास रूप में होने और इन छात्रों के बाहर होने के बीच कहीं फंसा रहा। क्लास रूम में कुछ पत्रकारों की सांसे तेज़ हो रही थीं जब वे मुझसे सवाल पूछ रहे थे। एक किस्म के प्रदर्शन का भी भाव था। किसी के सवाल में मुझे उधेड़ देने का भी और किसी के सवाल में एक विद्यार्थी की तरह कुछ जानने का भी भाव नज़र आया। मैं उस हाल को एक टीवी सेट की तरह देख रहा था। अलग अलग किरदारों की भूमिका में विद्यार्थी मुझे नाप रहे थे। मैं उनको नाप रहा था। मैं सारे सवालों का जवाब जानता हूं ऐसा भ्रम मुझे कभी नहीं रहा है। मेरे सारे जवाब सही होंगे इस भ्रम से तो मैं और भी दूर हूं।

जिस तरह से मुझे कुछ दिखाई देता है उस तरह से सुनाई भी। बात होती रही। बीच बीच में मेरी कार का माडल का नाम किसी ने लिया, किसी ने भीतर भी घूरा ही होगा, किसी ने कहा ड्राईवर नहीं है, किसी ने उम्र पूछ दिया तो किसी ने कहां के हैं सर। आप सिम्पल रहते हैं। सुबह ही किसी मित्र ने फोन पर कह दिया था कि तुम ब्रांड हो। शाम को इन छात्रों की बातों सुनकर लगा कि मैं डालडा का कोई टिन हूं जिसे दुकान पर लोग घूर घूर कर मुआयना कर रहे हैं। फिर मैं कब मैं रहूंगा। क्या मुझे ब्रांड बने रहने के लिए कुछ नकली भी होना पड़ेगा। ख़ुद को किसी स्लोगन की तरह पेश करना होगा। जो भी मुझे देख रहा है किसी न किसी रैपर के साथ देख रहा है। शायद कोई एक्सपायरी डेट भी पढ़ने की कोशिश करता होगा। मुझे उन छात्रों की यह सहज दिलचस्पी ठीक नहीं लगी। मैं कोई शर्वशक्तिमान बिस्कुट नहीं हूं। यह मैंने क्लास में भी कहा। इतना काफी था पत्रकारिता के छात्रो की तंद्रा या कोई मोहजाल तोड़ने के लिए। पर यह काफी साबित नहीं हुआ।

कई छात्रों के सवाल रूटीन टाइप ही थे। एक ने सही सवाल किया। आपने जो किया सो किया, अब अगर हम कुछ नया करना चाहें तो किस तरफ देख सकते हैं। ये वो सवाल था जो मैं अपने नज़दीक आने वाले किसी छात्र से कहता ही हूं। हम नया क्या कर सकते हैं, दो तीन छात्रों ने इसी के आस-पास सवाल पूछे जो मुझे बहुत पसंद आए। काश वक्त रहता तो घंटों इस पर उनके साथ दिमाग भिड़ाता। इसी तरह जाते जाते एक लड़की ने कहा कि घटना स्थल पर पत्रकार को बचाना चाहिए या शूटिंग करनी चाहिए। टीवी के पत्रकारों से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं फिर भी एक पेशेवर के नाते ये ज़रूरी सवाल हैं। मेरे जवाब से शायद वह संतुष्ठ नहीं हुई लेकिन मैं इतना कह कर निकल गया कि इस सवाल पर कई तरह के जवाब हैं। जिसका अलग अलग संदर्भों में कुछ घटनाओं के साथ मूल्यांकन करना चाहिए। ऐसे कुछ सवाल थे जो मुझे भी नए सिरे या फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रहे थे। दरअसल नए पत्रकारों के साथ इसी तरह का संवाद होना चाहिए। उन्हें मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उन्हें उन लोगों की तलाश करनी चाहिए जो मेरी तरह टीवी पर कुछ भी करते हुए नहीं दिखते हैं बल्कि गंभीर काम करते हैं। इससे उनकी ही जानकारी का दायरा बढ़ेगा। मैं अपने घर, दफ्तर, दोस्तों और हमपेशा लोगों के बीच सामान्य ही होना चाहूंगा। ये आपकी गलती है कि आप मुझे मूर्ति बनाते हैं फिर पूजते हैं फिर किसी दिन खुंदक में आकर तोड़ देते हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मैं यह बात अपने लिए नहीं, आपके लिए लिख रहा हूं। मुझे सही में कोई फर्क नहीं पड़ता सिवाय इस बात के कि आपने मेरे काम में कोई सार्थक गलती निकाली है।

पर क्या मैं अपने पाठकों दर्शकों और सह-पत्रकरों से यह सवाल पूछ सकता हूं कि वो एक पत्रकार में स्टार क्यों देखना चाहते हैं। इसके लिए तो न जाने कितने नाम रोज़ अंडा ब्रेड के ब्रांड के साथ आते ही रहते हैं। ऐसा क्या किया है मैंने कि कोई मेरे साथ क्लास रूम से बाहर निकल जाए। फिर तो मुझे वे सारे सवाल खोखले नज़र आने चाहिए जो छात्रों ने क्लास रूम में पूछे। यह तो नहीं हो सकता कि अंदर आप किसानों और गांवों या हाशिये के लोगों की पत्रकारिता में कम होती जगह पर सवाल पूछे और क्लास रूम से निकलते ही मेरे पीछे पीछे ऐसे दौड़े चले आएं जैसे मैं कर्ज़ फिल्म का टोनी हूं। दरवाज़े पर एक वरिष्ठ पत्रकार फंसा हो और लोग पन्ने बढ़ा दें कि आटोग्राफ दे दें। ठहरकर देखने और मुझे मेरी सीमाओं के साथ समझने की आदत तो होनी ही चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि क्लास रूम में बैठे लोग उन्हीं को पहचानते हैं जो रोज़ रात टीवी में बकवास करते हैं और कभी कभी सरोकार टाइप पर अखबारों में लिख देते हैं।

उस बड़े से हाल में कुछ लड़कियां भी थीं। तीसरी या चौथी कतार में। मुझसे पूछने के लिए समेट ही नहीं पाईं।  लड़के तुरंत सहज हो गए और एक दूसरे से होड़ करते हुए पूछने लगे। अगर इस लेख को कोई युवा पत्रकारिन पढ़ रही है तो मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि उसे इस पेशे में आकर एक दिन इसी तरह के स्पेस में जद्दोज़हद करनी पड़ेगी। किसी प्रेस कांफ्रेंस में अपना सवाल पूछने के लिए और दफ्तर की मीटिंग में कुछ कहने के लिए। उसे भी अपने कंधों को टकराने देना चाहिए। आवाज़ बुलंद कर लेनी चाहिए। बिना इसके ये गढ़ टूटेगा नहीं जो दिखता तो नहीं है मगर होता है। जिस लड़की ने मुझसे यह सवाल किया कि पत्रकार को मौके पर क्या करना चाहिए मैंने देखा कि पूछने से पहले अपने चेहरे पर काफी कुछ समेट कर लाई थी। सांसे थोड़ी तेज़ थीं और लड़कों की भीड़ में जगह बनाते हुए चेहरा थोड़ा सुर्ख। वो गुस्से में थी कि किसी टीवी चैनल ने एक पंचायत में डायन बताकर किसी महिला के वस्त्र उतारने की आधे घंटे की रिपोर्ट दिखाई थी। जल्दबाज़ी में जितना समझ सका वो यह कि उस चैनल ने कथित रूप से तस्वीरों को धुंधला नहीं किया और इतनी देर तक पत्रकार शूटिंग करता रहा तो क्या उसे रोकना नहीं चाहिए था। पुलिस नहीं बुलानी चाहिए थी। इस सवाल का जवाब हां या न में नहीं दिया जा सकता था, वो भी सारी बातों को जाने बगैर। मगर मुझे उसके चेहरे की उत्तेजना पसंद आई। इतने बच्चों के बीच किसी के चेहरे पर पत्रकार दिखा। शायद यही वजह थी कि भीड़ से घिरे होने के बाद भी जाते-जाते उसके सवाल पर कुछ बोलता रहा। उसकी तरफ देखता रहा। वो तब तक दूर बैठ चुकी थी । मैं ज़ोर ज़ोर से उस तक पहुंचने का प्रयास कर रहा था। उसके चेहरे की आग बची रहे बाकी सब भी बच जाएगा।

ऐसे ही कुछ अच्छे लड़के भी मिले। मैं भी उनके साथ कुछ समेट कर बांटने का प्रयास कर रहा था। बहुत ज्यादा किसी आदर्श स्थिति के होने के संदर्भ में सवाल पूछने की बचकानी हरकत के बजाए हम सबको अपने अपने लघुस्तरों पर संघर्ष करते रहना पड़ेगा कि हम पत्रकारिता में आदर्श स्थिति पैदा करते रहें। समंदर न सही तालाब ही। तालाब नहीं तो कुआं ही सही। यह आपका व्यक्तिगत प्रयास है। समाज सवाल करता रहेगा मगर सवाल कंपनी से नहीं करेगा आपसे करेगा। आपकी हालत सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता सी रहेगी जिसे नहीं मालूम कि सरकार क्या करेगी लेकिन उसे सरकार और पार्टी दोनों का बचाव करना है। पत्रकारिता में आदर्श स्थिति कभी नहीं रही है। पर यही लक्ष्य है जिसके लिए न जाने कितने ही पत्रकार संघर्ष कर रहे होंगे जो कभी प्राइम टाइम पर नहीं आते होंगे। इसके लिए ज़रूरी है कि अपने कौशल के निरंतर विकास को ज़रूरी काम मानें। अपने लिखने का सख्त मूल्यांकन करें। लगातार प्रयोग करें। पढ़ाई करते रहें और अपने काम को जितना गंभीरता से लें उससे ज्यादा खुद को भी। यह बात उनके लिए है जिनका जीवन लक बाई चांस नहीं कटता है। जिनका कट जाता है उन्हें मेरा लिखा कूड़ा करकट पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं। ज्यादातर लोगों का जीवन कट ही जाता है। कुलमिलाकर अच्छा लगा। बस मुझे ज्यादा भाव देने की बात खटक गई। आप कह सकते हैं कि मैं अति विनम्रता का प्रदर्शन कर रहा हूं। आप कुछ भी कह सकते हैं जैसे मैं भी कुछ भी कह सकता हूं। मुझे लगा कि यह कहना चाहिए तो कह दिया।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े पत्रकार हैं. उनका यह लेख उनके ब्लाग कस्बा से साभार लिया गया है.

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अच्छा अखबार जनसत्ता और अच्छा एंकर रवीश कुमार

Shambhu Nath Shukla : एक अच्छा संपादक वह नहीं है जो अपने ही अखबार में धुंधाधार लिखता रहे। संपादक को अपना ही लेखन पढ़ाने की जरूरत नहीं पढ़ती और उसके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए संपादकीय तो हैं ही, एक अच्छा संपादक वह है जो अच्छे लेखक तैयार करे। जो लोगों को लिखने के लिए विवश करे। जनसत्ता का योगदान यही है कि उसने लिखने और पढऩे वालों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।

आज भी तमाम जगह मुझे ऐसे आईएएस और आईपीएस मिल जाते हैं जो अब विभिन्न सरकारी विभागों में सचिव या इसके ऊपर के स्तर के अधिकारी हैं अथवा पीएसयू में ईडी, सीएमडी हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी परीक्षा की तैयारी जनसत्ता पढ़कर की थी। मगर अब हिंदी अखबार ऐसा वर्ग नहीं तैयार कर रहा। यह एक दुखद अध्याय है। ठीक इसी तरह न्यूज चैनलों का एक अच्छा एंकर वह है जो खुद कम बोले अपने अतिथियों को बोलने का मौका ज्यादा दे। यकीनन Ravish Kumar इस मामले में अव्वल हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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