रवीश कुमार ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू कराने की बात कहकर भाजपा नेता विजय गोयल की बोलती बंद कर दी

भाजपा के बड़बोले नेता विजय गोयल प्राइम टाइम में Ravish Kumar से उखड़ गए और बोले कि आप पत्रकार लोग भी तो मोटी तनखा लेते हो लेकिन जब रवीश ने कहा कि पहले मजीठिया तो लागू करवाइए तो चुप साध गए। अगर माकपा सांसदों को छोड़ दिया जाए तो आज तक भाजपा, कांग्रेस, सपा-बसपा-राजद व जदयू ने कभी नहीं कहा होगा कि अरे हमें तो भरपूर पैसा मिलता है, कृपया हमारी तनखा न बढ़ाएं। हर साल उनकी तनखा व वेतन भत्ते बढ़ जाते हैं लेकिन आज तक किसी सांसद ने यह नहीं बताया कि जब भी संसद में गंभीर बहस होती है वे बाथरूम या वाशरूम क्यों भाग जाते हैं। तनखा लेते हो तो अपने दायित्व भी स्वीकार करिए। और हिसाब दीजिए कि हर पांच साल में आपका बैंक एकाउंट बढ़ता क्यों रहता है।

रवीश कुमार की सलमान खान के नाम चिट्ठी और शो-बिज़नेस की मजबूरियों का तकाज़ा

Abhishek Srivastava : कोई व्‍यक्ति कब, क्‍या और क्‍यों करता है, एक पत्रकार के लिए यह बहुत मायने रखता है। पत्रकारिता के धंधे में सबसे पुराना परखा नुस्‍खा किसी घटना की टाइमिंग और वैधता का है। इसीलिए सलमान खान के नाम रवीश कुमार के लिखे इस खुले पत्र को पढ़कर मैं बिलकुल हैरत में नहीं हूं, बल्कि रवीश के बारे में मेरी बनी-बनायी धारणा और पुष्‍ट हुई है। इस देश में बहुत से लोगों को भले और सामाजिक कामों के चलते गंभीर दंड दिए गए हैं। नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए प्रोफेसर साई बाबा जेल में मर रहे हैं। वे शिक्षक हैं और आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं।

केजरी द्वारा ‘मीडिया का पब्लिक ट्रायल’ कराने के आइडिया से असहमत क्यों हैं एनडीटीवी वाले रवीश कुमार

खतरनाक है ‘पब्लिक ट्रायल’ का विचार…. मीडिया को जरूर अपने अंदर झांकना चाहिए. लेकिन, यह सवाल उठाने के लिए केजरीवाल के पास अनेक तरीके हैं. वे खत लिखने से लेकर अखबारों में लेख तक लिख सकते हैं. अपने खिलाफ उठते आरोपों से निपटने का काम पब्लिक को सौंप देने के विचार से सभी को सतर्क रहना चाहिए. मीडिया को लेकर नेताओं की सहनशीलता आये दिन कम होती जा रही है, जो लोकतंत्र और एक सभ्य समाज के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है.

आम आदमी पार्टी के आशुतोष को रवीश कुमार का खुला पत्र

आशुतोष जी,

मैं आज दिल्ली में नहीं था। देवेंद्र शर्मा के साथ रिकॉर्डिंग कर रहा था कि किसानों की इस समस्या का क्या कोई समाधान हो सकता है। हम गेहूं के मुरझाए खेत में एक मायूस किसान के साथ बात कर रहे थे। हमने किसान रामपाल सिंह से पूछा कि आपके खेत में चलेंगे तो जो बचा है वो भी समाप्त हो जाएगा। पहले से मायूस रामपाल सिंह ने कहा कि कोई बात नहीं। इसमें कुछ बचा नहीं है। अगर आपके चलने से दूसरे किसानों को फायदा हो जाता है तो मुझे खुशी होगी। वैसे भी अब इसका कोई दाम तो मिलना नहीं है, कुछ काम ही आ जाए। ये उस किसान का कहना है जो चाहता है कि उसकी बर्बादी के ही बहाने सही कम से कम समाधान पर बात तो हो। शायद गजेंद्र ने भी इसी इरादे से जान दे दी जिस इरादे से रामपाल सिंह ने हमारे लिए अपना खेत दे दिया।

सफलता के मुहावरे गढ़ते हैं आईआईएमसीएन… कभी इश्क़ की बात कभी खबरों से मुलाक़ात…

Amarendra A Kishore : बात की शुरुआत करने के पहले राजकमल प्रकाशन परिवार को बधाई– आज उसकी प्रकाशन यात्रा के ६६ वर्ष पूरे करने पर। जब भी किसी बड़े पुरस्कार या सम्मान की घोषणा होती है तो अमूमन भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) का नाम उभर कर सामने आता है– चाहे गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की बात हो या रामनाथ गोयनका सम्मान की– आईआईएमसी एक अनिवार्यता बन जाता है।

मालचन्द तिवाड़ी व रवीश कुमार को सृजनात्मक गद्य के लिए पुरस्कार

विश्व पुस्तक मेले के आठवें दिन राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा राजकमल प्रकाशन सृजनात्मक गद्य सम्मान (वर्ष 2014-15) के लिए चयनित कृतियों के नामों की घोषणा की गयी। इस साल 28 फरवरी को राजकमल प्रकाशन के 66वें स्थापना दिवस के अवसर पर यह पुरस्कार संयुक्त रूप से मालचन्द तिवाड़ी की कथेतर कृति ‘बोरूंदा डायरीः अप्रतिम बिज्जी का विदा-गीत’ व रवीश कुमार के नैनो फिक्शन के सचित्र चयन ‘इश्क़ में शहर होना’ को दिया जाएगा।

रवीश कुमार का लेखन मनुष्यता बचाने का प्रयास है : निधीश त्यागी

विश्व पुस्तक मेला के तीसरे दिन युवाओं ने शहर से खूब इश्क फरमाया। मौका था लप्रेक श्रृंखला की पहली पुस्तक ‘इश्क़ में शहर होना’ पर चर्चा का। प्रगति मैदान के हॉल न. 6 के सेमिनार हॉल में युवाओं की भीड़ इस कदर उमड़ी की उन्हें खड़े होकर कार्यक्रम देखना पड़ा। वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार लिखित ‘इश्क़ में शहर होना’ पर अपनी बात रखते हुए लेखक-पत्रकार निधीश त्यागी ने कहा “इस किताब ने जिस तरह से युवाओं में हिन्दी के प्रति आकर्षण पैदा किया है, वह एक शुभ संकेत है। रवीश अच्छे वाक्य लिखते हैं। इनके लिखे को पढ़ते हुए आप वैसे ही सांस लेते हैं जैसे इसे लिखते समय लेखक ने ली होगी। मनुष्यता बचाने का प्रयास है यह। हिन्दी के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि वह नए सिरे से सांस ले रही है।’’ 

रवीश की यही समझ उन्हें बड़ा बनाती है

Shambhunath Shukla : टीवी न्यूज चैनलों में Ravish Kumar एक शानदार एंकर ही नहीं है या वे महज न्यूज चयन में सतर्कता बरतने वाले बेहतर टीवी संपादक ही नहीं अथवा आम आदमी के सरोकारों के प्रति आस्था जताने वाले पत्रकार ही नहीं है वरन उनकी असल खूबी है उनकी सामाजिक सरोकारों के प्रति आस्था। एक ही उदाहरण काफी होगा जब कल उन्होंने एक वृद्घ से बात करते हुए कहा कि बेटियां न होतीं तो क्या होता! इस एक वाक्य ने हम पति-पत्नी को भिगो दिया। मुझे खुशी हुई यह सुनकर।

अवसरवादी होना अच्छा है, सिद्धांतहीन अवसरवादी ठीक नहीं हैं : रवीश कुमार

एनडीटीवी इंडिया ने गुरुवार को अपनी विशेष पेशकश में, अपने फेसबुक पेज पर एक लाइव चैट आयोजित की। इस लाइव चैट में हमने,विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यमों जैसे ट्विटर, फेसबुक और गूगल प्लस पर जुड़े हमारे पाठकों और टेलीविज़न के दर्शकों की बातचीत करायी सीधे-सीधे रवीश कुमार से। ये बातचीत रवीश कुमार के किरण बेदी के इंटरव्यू के बाद लोगों के माँग पर की गई। बातचीत इतनी अच्छी रही कि ये तयशुदा आधे घंटे के समय से बढ़कर 45 मिनट तक चली। इस पूरे दरमयान रवीश कुमार खुद अपने पाठकों और दर्शकों के सवालों का जवाब देते रहे। यहाँ पेश है उसी लाईव चैट के कुछ प्रमुख अंश-

किरन बेदी का झूठ बोलना सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा, भाजपा को तगड़ा झटका

किरन बेदी ने करीब साल भर पहले तक अपने ट्विटर प्रोफाइल पर लिख रखा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री की कार उठवाई थी. अब यह लाइन उन्होंने हटा दिया है. लेकिन पहले लिखे गए झूठ को लोगों ने शेयर करना शुरू कर दिया है और पूछ रहे हैं कि आखिर किरन बेदी इतने दिनों तक झूठ क्यों बोलती रहीं. दिल्ली में भाजपा की मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी किरन बेदी के बारे में एक किस्सा प्रचलित रहा है कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कार को क्रेन से उठवाया था.

किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज़ देखकर मैं हैरान था : रवीश कुमार

सुबह के 5 बज रहे थे तभी सुशील का फोन आया कि बैकअप प्लान किया है आपने। सुशील मेरे शो के इंचार्ज हैं। बैक अप प्लान? हो सकता है कि आधा घंटा न मिले। इंटरव्यू के लिए तैयार होकर चाय पी ही रहा था कि सुशील के इस सवाल ने डरा दिया। प्राइम टाइम एक घंटे का होता है और अगर पूरा वक्त न मिला तो बाकी के हिस्से में क्या चलाऊंगा। हल्की धुंध और सर्द भरी हवाओं के बीच मेरी कार इन आशंकाओं को लिए दफ्तर की तरफ दौड़ने लगी।

रवीश कुमार का ब्लॉग हैक

गाजियाबाद से खबर है कि वैशाली सेक्टर-5 में रहने वाले एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार का ब्लॉग हैक कर लिया गया। आरोप है कि हैकर्स ने उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी है। इसके अलावा ब्लॉग पर कुछ आपत्तिजनक धार्मिक तस्वीरें भी पोस्ट की गई हैं। इस संबंध में रवीश ने इंदिरापुरम थाने में शिकायत की। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर क्राइम ब्रांच को जांच सौंप दी है। एसपी क्राइम अभिलाष त्रिपाठी ने बताया कि मामले की गहनता से जांच की जा रही है।

रवीश की किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ का हुआ लोकार्पण

जयपुर साहित्य महोत्सव में लप्रेक-फ़ेसबुक श्रृंखला की पहली पुस्तक इश्क में शहर होना का लोकार्पण अनूठे अंदाज में संपन्न हुआ। चारबाग मंडप में आयोजित ‘कहानी की नई करवट’ सत्र में इस पुस्तक का लोकार्पण जयपुर के युवा विद्यार्थियों ने किया। इस सत्र में लप्रेककार रवीश कुमार से कथाकार अनु सिंह चौधरी ने बातचीत की। रवीश कुमार ने अपनी किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ से कई लघु कथाओं का पाठ किया।

एनडीटीवी प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को पूरी तरह घेर लिया

Shambhunath Shukla : एक अच्छा पत्रकार वही है जो नेता को अपने बोल-बचन से घेर ले। बेचारा नेता तर्क ही न दे पाए और हताशा में अंट-शंट बकने लगे। खासकर टीवी पत्रकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बीस जनवरी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को ऐसा घेरा कि उन्हें जवाब तक नहीं सूझ सका। अकेले कोहली ही नहीं कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश अग्रवाल भी लडख़ड़ा गए। नौसिखुआ पत्रकारों को इन दिग्गजों से सीखना चाहिए कि कैसे टीवी पत्रकारिता की जाए और कैसे डिबेट में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संचालन कर रहे पत्रकार के साथ सही और तार्किक मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। पत्रकार इसी समाज का हिस्सा है। राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति उसे भी प्रभावित करेगी। निष्पक्ष तो कोई बेजान चीज ही हो सकती है। मगर एक चेतन प्राणी को पक्षकार तो बनना ही पड़ेगा। अब देखना यह है कि यह पक्षधरता किसके साथ है। जो पत्रकार जनता के साथ हैं, वे निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं।

रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव ने फेसबुक को अलविदा कहा!

Shambhunath Shukla : नया साल सोशल मीडिया के सबसे बड़े मंच फेस बुक के लिए लगता है अच्छा नहीं रहेगा। कई हस्तियां यहाँ से विदा ले रही हैं। दक्षिणपंथी उदारवादी पत्रकारों-लेखकों से लेकर वाम मार्गी बौद्धिकों तक। यह दुखद है। सत्ता पर जब कट्टर दक्षिणपंथी ताकतों की दखल बढ़ रही हो तब उदारवादी दक्षिणपंथियों और वामपंथियों का मिलकर सत्ता की कट्टर नीतियों से लड़ना जरूरी होता है। अगर ऐसे दिग्गज अपनी निजी व्यस्तताओं के चलते फेस बुक जैसे सहज उपलब्ध सामाजिक मंच से दूरी बनाने लगें तो मानना चाहिए कि या तो ये अपने सामाजिक सरोकारों से दूर हो रहे हैं अथवा कट्टरपंथियों से लड़ने की अपनी धार ये खो चुके हैं। इस सन्दर्भ में नए साल का आगाज़ अच्छा नहीं रहा। खैर 2015 में हमें फेस बुक में खूब सक्रिय साथियों- रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव की कमी खलेगी।

अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर चुके थे, मुंबई ने उन्हें रोक लिया!

Nadim S. Akhter :  Times Now वाले अर्नब गोस्वामी को मैं पसंद करता हूं. आप उन्हें अच्छा कहें या बुरा कहें या जो कहें, मुझे लगता है कि तमाम सीमाओं के बावजूद (एक बार फिर दोहरा रहा हूं, बाजार और सियासत की तमाम सीमाओं के बावजूद) वो अपना काम शिद्दत से कर रहे हैं. हां, अफसोस तब होता है जब रवीश कुमार के अलावा हिंदी चैनलों में मुझे अर्नब जैसा passionate एक भी पत्रकार नहीं दिखता.

पंकज पचौरी की मूर्खता बनाम रवीश कुमार का अहंकार

रवीश बाबू, इतना स्मार्ट बनना और अपमानित करना गुड बात नहीं

-दयानंद पांडेय-

एक समय मैं रवीश कुमार के अनन्यतम प्रशंसकों में से एक था। उन की स्पेशल रिपोर्ट को ले कर उन पर एक लेख भी लिखा था सरोकारनामा पर कभी। रवीश तब मेरे इस लिखे पर न्यौछावर हो गए थे। मुझे भी अच्छा लगा था उन का यह न्यौछावर होना । यह लेख अब मेरी एक किताब में भी है। मेरी मातृभाषा भी भोजपुरी है इस नाते भी उन से बहुत प्यार है। लेकिन बीते कुछ समय से जिस तरह सहजता भरे अभिनय में अपने को सम्राट की तरह वह उपस्थित कर रहे हैं और लाऊड हो रहे हैं , एकतरफा बातें करते हुए और कि अपने अहमक अंदाज़ में लोगों का भरपूर अपमान हूं या हां कह कर कर रहे हैं और कि एक ढीठ पूर्वाग्रह के साथ अपने को प्रस्तुत कर रहे हैं जिस का कि किसी तथ्य और तर्क से कोई वास्ता नहीं होता वह अपनी साख, अपनी गरिमा और अपना तेवर वह बुरी तरह गंवा चुके हैं।

पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

रवीश कुमार को मिलेगा छत्रपति सम्मान-2014

साहित्यिक संस्था संवाद, सिरसा द्वारा छत्रपति सम्मान-2014 एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार को दिया जाएगा। सम्मान समारोह शहीद पत्रकार छत्रपति की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में 22 नवम्बर को आयोजित किया जाएगा। इस संबंध में ‘संवाद’ की एक बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता ‘संवाद’ के अध्यक्ष परमानंद शास्त्री ने की। इस संबंध में संस्था के सचिव डा. हरविंद्र सिंह ने बताया कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति 21 नवम्बर को शहीद हुए। उनकी स्मृति में ‘संवाद’ द्वारा छत्रपति सम्मान प्रत्येक वर्ष देश की किसी महान शख्सियत को दिया जाता है।

जीपी भगत यानि आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था : रवीश कुमार

रवीश कुमार

: चल गईलू नू बड़की माई : सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।

रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा- आपने मार्क्स को पढ़ा है क्या?

Rakesh Srivastava : रवीश कुमार ने सावजी भाई ढोलकिया से पूछा कि आपने कहीं मार्क्‍स को तो नहीं पढ़ा है जो मजदूरों के प्रति संवेदनशील हैं,  तो ढोलकिया ने कहा कि मैंने चौथी तक पढ़ाई की है और रोज़ ही बस जिंदगी की किताब पढ़ता हूं .. और, ऐसा कहते हुए ढोलकिया किसी विचारधारात्‍मक डिफेंस में नहीं थे .. वह बहुत सहज और प्राकृत थे और इस इंटरव्‍यू में उनके एक- एक शब्‍द में ईमानदारी और प्रामाणिकता की ध्‍वनि थी .. रवीश कुमार भी बहुत जल्‍द बने- बनाए फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर सहज हो लिए ..

पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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रवीश कुमार के बहाने कुछ अपनी कहानी

Nadim S. Akhter : मीडिया संस्थान के दफ्तर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना यानी पत्रकारिता करना अलग बात है और किसी पत्रकारिता संस्थान के छात्रों को हैंडल करना, उनके सवालों के जवाब देना, उनका कौतूहल शांत करना, उनके सपनों की हकीकत बताना, उन्हें मीडिया की निर्दयी दुनिया से रुबरु कराना और पत्रकारिता के तथाकथित मिशन से जान-पहचान कराना एकदम अलग बात.  मैं खुद को नसीब वाला मानता हूं कि भविष्य के पत्रकारों से संवाद करने का मौका मुझे मिल रहा है. नई पीढ़ी को समझने और गढ़ने का भी. लेकिन मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की तरह एक सवाल मुझे भी परेशान करता है कि नई पीढ़ी पत्रकार बनने आई है या स्टार !!! शायद ये चाह और ललक उस समय हमलोगों में भी रही होगी जब वर्ष 2001 में मैं और मेरे बाकी साथी IIMC से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेकर नौकरी ढूंढने निकल पड़े थे.

नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

: स्टार यार पत्रकार! : ”सर, असली काम आप लोगों ने किया और फोटो लोग मेरे साथ खींचा रहे हैं। सब कुछ दिखने तक ही है सर।” क्लास रूम से निकलती भीड़ और दरवाज़े की दहलीज़ पर दबे अरुण कुमार त्रिपाठी से मैं इतना ही कह पाया। वरिष्ठ पत्रकार अरुण जी ने भी इतना ही कहा कि एन्जाय कीजिए। और भी कुछ कहा होगा पर अब ध्यान नहीं। उसके बाद वे अंदर चले गए और बीस पचीस छात्र मेरे साथ साथ बाहर तक आ गए। बारह पंद्रह घंटे तो बीत ही चुके हैं इस बात को लेकिन मुझे कुछ खटक रही है।

अच्छा अखबार जनसत्ता और अच्छा एंकर रवीश कुमार

Shambhu Nath Shukla : एक अच्छा संपादक वह नहीं है जो अपने ही अखबार में धुंधाधार लिखता रहे। संपादक को अपना ही लेखन पढ़ाने की जरूरत नहीं पढ़ती और उसके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए संपादकीय तो हैं ही, एक अच्छा संपादक वह है जो अच्छे लेखक तैयार करे। जो लोगों को लिखने के लिए विवश करे। जनसत्ता का योगदान यही है कि उसने लिखने और पढऩे वालों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।