संस्थागत धर्म आधुनिक इंसान को बार्बेरियन युग में खींच ले जाने का प्रमुख स्रोत

धर्म ने इंसान को इंसानियत के कितने निचले पायदान पर पहुँचा दिया है, इसका अंदाज़ा सांप्रदायिक दंगों में बरती जाने वाली हिंसा के तरीकों को देखकर लगाया जा सकता है. प्रतिपक्ष धर्म के लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों के प्रति प्रयुक्त हिंसा का यह तथ्य स्थापित करता है कि एक दूसरे के प्रति उगले/निगले प्रचारित सांप्रदायिक ज़हर का रुप कितना भयंकर होगा? महिलाओं का सामूहिक बलात्कार, उनके कौमार्य भंग, जला देना, गला रेत देना, बच्चों को जला देना, काट देना यकायक यूँ ही नहीं हो जाता. यह कोई एकदम से घटने वाली परिघटना नहीं होती. इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अगर अध्ययन करें तो निश्चय ही पता लगेगा कि एक बड़े दंगे को अंज़ाम देने के लिये जिस खास विकृत मनोदशा की जरुरत होती है, जिसके नशे में इंसान हैवान बन कर दूसरे इंसान को अपना शिकार बनाता चला जाता है, उसके पीछे वर्षों की तैयारी काम कर रही होती है.