वाराणसी के सांस्कृतिक पत्रकार शायद सांस्कृतिक थे भी नहीं और हो भी न पाएंगे!

प्रिय भड़ास, कहीं से सुना की आपके ब्लॉग पर यदि भड़ास निकली जाये तो उसे गंभीरता से ले लिया जाता है कभी-कभार. तो उत्साहित हो उठा. मैं बनारस का एक रंगकर्मी हूँ जो अब बनारस के रंगकर्म से खिन्न होकर विदा ले चुका है. कारण बहुत से हैं. हमारा वाराणसी जितना धार्मिक रहा है उतना ही साहित्यिक भी. जैसा की आपको विदित होगा ही की हिंदी साहित्य के निर्माण में यहाँ के रचनाकारों की कितनी बड़ी तादात है. सबसे मशहूर कुछ दो लोगों का ज़िक्र करना चाहूँगा. एक भारतेंदु हरीश चन्द्र दूसरे प्रेमचंद. दोनों ही चंद अब भुलाये जा चुके हैं यहाँ. चौखम्बा स्थित भारतेंदु भवन तो फिर भी ठीक है पर लमही स्थित प्रेमचन्द निवास के क्या कहने. जाकर देखने योग्य भी नहीं है.