क्या आरएसएस के किसी आदमी ने ब्रिटिश हुकूमत से लड़ाई नहीं लड़ी?

Urmilesh Urmil : ‘आप’ वाले बीच-बीच में तमाम तरह के ग़लत फैसले और मूर्खताएं भी करते रहते हैं पर धीरे-धीरे उनमें कुछ राजनीतिक-प्रौढ़ता भी आ रही है। दिल्ली विधानसभा की गैलरी में में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले अनेक महान् योद्धाओं और नेताओं के कुल 70 चित्र लगे हैं। उनमें एक चित्र महान् योद्धा टीपू सुल्तान का भी है।

इसे लगाने के विरुद्ध जब भाजपाई नेताओं ने आपत्ति जताई तो पार्टी प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने भाजपा विधायकों-नेताओं से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘ विधानसभा गैलरी में ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले योद्धाओं के चित्र लगते हैं। जनसंघ-आरएसएस-भाजपा जैसे संगठनों के ऐसे तत्कालीन कुछ योद्धाओं के नाम भेजिए, हम उनके चित्र भी लगवायेंगे!’ यह प्रस्ताव दिए कई दिन हो गए पर भाजपा वाले अभी तक ऐसे लोगों के नाम की सूची लेकर नहीं आ सके!

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की एफबी वॉल से.

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संघी वर्तमान को भी तोड़-मरोड़ देते हैं! (संदर्भ : गौरी लंकेश को ईसाई बताना और दफनाए जाने का जिक्र करना )

Rajiv Nayan Bahuguna : इतिहास तो छोड़िए, जिस निर्लज्जता और मूर्खता के साथ संघी वर्तमान को भी तोड़ मरोड़ देते हैं, वह हतप्रभ कर देता है। विदित हो कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में गंगा को गंगे, गीता को गीते, नेता को नेते और पत्रिका को पत्रिके कहा-लिखा जाता है। तदनुसार गौरी लंकेश की पत्रिका का नाम है- लंकेश पत्रिके। इसे मरोड़ कर वह बेशर्म कह रहे हैं कि उसका नाम गौरी लंकेश पेट्रिक है। वह ईसाई थी और उसे दफनाया गया। बता दूं कि दक्षिण के कई हिन्दू समुदायों में दाह की बजाय भू-समाधि दी जाती है। मसलन आद्य शंकराचार्य के माता पिता की भू-समाधि का प्रकरण अधिसंख्य जानते हैं।

गौरी के पिता पी लंकेश का नाम मैं अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में कौतुक से सुनता था, उसके ‘लंकेश’ सरनेम के कारण। गांघी के बाद वह अकेला लोक प्रिय पत्रिका का मालिक था, जो बगैर विज्ञापन के पॉपुलर मैगज़ीन निकालता था। उसकी पत्रिका लाखों में बिकती थी, और दिल्ली तक उसकी धमक सुनाई पड़ती थी। जाहिल, अपढ़, बेशर्म, इतिहास विमुख संघियों का 1977 में लाल कृष्ण आडवाणी ने बड़े मीडिया हाउसों में धसान किया, जब आडवाणी सूचना मंत्री बना। फलस्वरूप जिन्हें पढ़ना भी नहीं आता था, वह लिखने लगे। कालांतर में इन्होंने पत्रकारिता में जम कर अंधाधुंध की।

हमारे समय मे व्यावसायिक पत्रकारिता के कठिन मान दन्ड थे। एमए और अधूरी पीएचडी करने के बाद मुझे नवभारत टाइम्स की नौकरी करनी थी। उसके सम्पादक मेरे पिता के निकट मित्र राजेन्द्र माथुर थे। उन्होंने बगैर परीक्षा के मुझ रखने से मना कर दिया, और प्रस्ताव रखा कि वह मुझे किसी यूनिवर्सिटी में हिंदी का लेक्चरर बना देंगे। लेकिन मुझे ओनली पत्रकार बनना था। सो मुझे कहा गया कि 15 दिन बाद नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण के लिए परीक्षा होगी। तैयार रहूं। परीक्षा में हिंदी, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अंग्रेज़ी आदि का कठिन पर्चा होता था। अन्य में तो मैं होशियार था, पर मुझे अंग्रेज़ी तब इतनी ही आती थी, जितनी आज सोनिया गांधी को हिंदी आती है। मैं डर कर, माथुर को बगैर बताए परीक्षा के वक़्त गांव भाग गया, और दो माह बाद लौटा। मुझसे पूछताछ हुई, डांट पड़ी। छह माह बाद फिर पटना संस्करण के लिए एग्जाम हुए। इस बार माथुर की नज़र बचा कर एक सीनियर कुमाउनी जर्नलिस्ट दीवान सिंह मेहता ने मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर पास कराया। बाद में मैंने अपनी अंग्रेज़ी सुधरी। ऐ, मूर्ख, आ मुझसे ट्यूशन पढ़ भाषा, हिस्ट्री, पोयम और जोग्राफी का।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

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