राज्यसभा टीवी ने कैग के आरोपों को गलत करार दिया, अब तक 1700 करोड़ ठिकाने लगाने का था आरोप

नई दिल्ली : कैग ने राज्यसभा टेलीविजन के संचालन को लेकर कुछ सवाल खड़े किए हैं। कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि राज्यसभा टीवी चैनल के पास कोई रोडमैप नहीं है और साथ ही साथ संसद के दोनों सदनों के लिए अलग—अलग चैनल होने के औचित्य पर भी प्रश्न खड़ा किया है। राज्यसभा टीवी ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा है पिछले चार सालों में कुल खर्च केवल 146.7 करोड़ रुपए हुआ, जिसमें सैलरी, किराया, कैपिटल कॉस्ट और ऑपरेशनल एक्सपेंसेज शामिल हैं। 1700 करोड़ रुपए का आंकड़ा मात्र एक कल्पना है।

कैग ने अपने रिपोर्ट में यह भी बताया है कि चैनल शुरु होने से पहले ही एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स और एक्जीक्यूटिव एडिटर्स ने यात्रा पर 60 लाख रुपये खर्च कर दिए थे। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2011 में चैनल शुरु होने से लेकर अब तक 1700 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। राज्यसभा टीवी चैनल ने कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में तय मानदण्डों का पालन नहीं किया। चैनल के पास अपने दर्शकों की संख्या को लेकर कोई पुख्ता रिकार्ड नहीं है। 

राज्यसभा टीवी ने कहा है कि राज्यसभा टीवी के खिलाफ कोई भी रिपोर्ट कैग ने पेश नहीं की है। डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑडिट ने वार्षिक ऑडिट के दौरान कुछ ड्राफ्ट ऑब्जर्वेशंस तैयार किए थे, जिसमें राज्यसभा टीवी भी शामिल था। तथ्यात्मक अशुद्धियों और झूठी रिपोर्ट के साथ पेश किए इस ड्राफ्ट ऑब्जर्वेशंस को नष्ट कर दिया गया है। इसके बावजूद राज्यसभा टीवी ने  इन ऑब्जर्वेशंस को लेकर संतोषजनक ढंग से उत्तर दिया। राज्यसभा टीवी ने आगे कहा कि वित्त मंत्रालय ने कभी भी उससे नाराजगी के संदर्भ में कोई सूचना नहीं दी। इसके अलावा उसके बजट को भी कठिन परिस्थितियों के तहत कम नहीं किया गया।

कैग के रिपोर्ट में कहा गया है कि टीवी चैनल प्रबंधन टीम,राज्यसभा सचिवालय और सरकार के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा और बहुत से महत्वपूर्ण निर्णयों में अपनी मनमर्जी चलाता रहा है। 

इससे पहले वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने राज्यसभा सचिवालय और राज्यसभा टेलीविजन में अनियमितताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। भूषण ने अपने द्वारा दायर याचिका में राज्यसभा सचिवालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक पर कुछ लोगों की गलत तरीके से नियुक्ति करने का आरोप लगाया था साथ ही उन्होंने राज्यसभा टेलीविजन के सीईओ की नियुक्ति पर भी सवाल खड़ा किया था। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की खण्डपीठ ने भूषण को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने को कहा था।

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें 

An inspection report by the CAG has raised several questions over the functioning of Rajya Sabha TV, even as advocate Prashant Bhushan moved the Supreme Court over irregularities in the appointment of senior people in the Rajya Sabha secretariat including its channel. 

The court of chief justice H L Dattu asked Bhushan to approach the Delhi high court, adding that in case it refuses to entertain his plea, he could approach the apex court again. Bhushan alleged large-scale irregularities in the appointment of senior officers of the rank of joint secretary and above in the Rajya Sabha secretariat including the CEO of RSTV. 

The CAG inspection report says the channel doesn’t have a roadmap, while questioning the very relevance of a separate channel for the Upper House of Parliament. 

The channel has spent over Rs 1,700 crore since it was started in 2011. The channel came into being in 2011, but became fully functional only in May 2012. The audit has said that until February 2012, even before the channel became fully functional, the executive directors and executive editors had spent Rs 60 lakh on travel. 

Since it started operations RSTV has had no revenue, and has carried out recruitments that do not adhere to laid down norms, the inspection report says. Among other things, RSTV also does not track its viewership, it found. 

It has also raised questions about the way RSTV has made senior-level appointments and fixed their salary structures, which are not in conformity with that of Rajya Sabha secretariat or government. The inspection report has also pointed that RSTV management has taken several ad hoc decisions. 

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मजीठिया वेज बोर्ड पर हरिवंश अभी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं!

नीचे राज्यसभा टीवी पर मजीठिया वेज बोर्ड पर हुई बहस का लिंक दिया जा रहा है। बहस में हरिवंश (संपादक, प्रभात खबर) और सुप्रीम कोर्ट में वकील कोलिन गोंसाल्विस भी शामिल हैं। जब हरिवंश से एंकर गिरीश निकम ने पूछा कि आपके अखबार में लागू हुआ तो बोले क‌ि अभी हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतंजार कर रहे हैं। इस पर गोंसाल्विस ने कहा क‌ि एक साल पहले फैसला आ चुका है। बहस में जागरण, इंडियन एक्सप्रेस और भास्कर पर सीधे नाम लेक‌र आरोप लगाए गए हैं।

पूरी बहस देखने सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

http://rstv.nic.in/rstv/video_upload/PlayYoutubeVideo.aspx?v=os_1zhZDg5I&feature=youtube_gdata

पूरा मामला क्या है, जानने के लिए इसे पढ़ें…

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर राज्यसभा टीवी पर बहस : हरिवंश संपादक हैं या मालिक ?

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राज्यसभा टीवी में जारी है फिक्सिंग का खेल

इन दिनों टीवी न्यूज़ चैनलों में राज्यसभा टीवी की चर्चा ज़ोरो पर है। बीते दिनों राज्यसभा टीवी में पत्रकारों की भर्ती के लिए हुए मेराथन इंटरव्यू के बाद इस चर्चा ने ज़ोर पकड़ा है। राज्यसभा टीवी पिछले दरवाज़े से पत्रकारों की इंट्री करवाने के लिए पहले ही बदनाम हो चुका है। लेकिन बीते दिनों राज्यसभा टीवी के रकाबगंज रोड स्थित ऑफिस में जो कुछ हुआ उसने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि राज्यसभा टीवी में सिर्फ नेताओं और अफसरों के रिश्तेदार ही पत्रकार बन सकते हैं।ये बात किसी से छिपी नहीं है कि वर्तमान में राज्यसभा टीवी में कार्यरत लगभग सभी पत्रकारों का किसी बड़े नेता या अफसर से रिश्ता रहा है। बीते दिनों इससे जुड़ी कुछ ख़बरें सार्वजनिक होने के बाद देश भर में चर्चा का विषय बनी थी। इस लिहाज़ से राज्यसभा टीवी जनता के बीच पहले ही अपनी ख़ास पहचान बना चुका है। लेकिन बीते दिनों वाक् इन इंटरव्यू के नाम पर हुए फिक्सिंग के खेल ने राज्यसभा टीवी के डायरेक्टर और सचिवालय के अफसरों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

दरअसल पूरा मामला ये है कि राज्यसभा टीवी ने बीते दिनों एंकर, प्रोड्यूसर, सीनियर एंकर और सीनियर प्रोड्यूसर जैसे वरिष्ठ पदों के लिए वाक् इन इंटरव्यू आयोजित किया था। इस वाक् इन इंटरव्यू में सैकड़ों की संख्या में पत्रकार शामिल होने आये थे। जिनमें बड़ी संख्या में दिल्ली के बाहर के पत्रकार और महिला पत्रकार भी शामिल हुए। हालाकि मीडिया जगत में पहले ही ये खबर फ़ैल गयी थी कि वहां सबकुछ पहले से फिक्स हो रखा है। इसलिए कईं वरिष्ठ पत्रकारों ने खुद को इस इंटरव्यू से दूर रखा। बावजूद इसके कड़ाके की सर्दी में खुले में ठिठुरते सैकड़ों पत्रकार रात नौ बजे तक इंटरव्यू के लिए अपनी बारी आने का इंतज़ार करते रहे। लेकिन कुछ ख़ास लोगों का इंटरव्यू लेने के बाद इंतज़ार करते बाकी के महिला और पुरुष पत्रकारों को रजिस्ट्रेशन हो जाने के बावजूद ये कहकर लौट दिया गया कि दूसरे चरण में आपका इंटरव्यू लिया जाएगा। और दूसरे चरण की सूचना एक दो दिन में वेबसाइट पर दाल दी जाएगी।

इस पूरी प्रक्रिया में कुछ दिलचस्प बातें खुलकर सामने आई।

1. सबसे दिलचस्प बात ये थी कि विज्ञापन में स्पष्ट लिखा होने के बावजूद उम्मीदवारों से किसी तरह के कोई दस्तावेज, अनुभव प्रमाणपत्रों की फोटोप्रति जमा नहीं कराए गए।

2. जिस उम्मीदवार ने जितने साल का अनुभव बताया उसे मान लिया गया। ऐसे में कईं इंटर्न और ट्रेनी लेवल के पत्रकार प्रोड्यूसर और सीनियर प्रोड्यूसर तक के इंटरव्यू में शामिल हो गए।

3. सिर्फ एक सादे कागज़ पर उम्मीदवारों से बायोडाटा लिखवा लिया गया।

4. इंटरव्यू की प्रक्रिया में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं थी। महज़ दो घंटे में इंटरव्यू पैनल ने साठ उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया था। एक दिन में 200 से ज़्यादा उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेकर इस पैनल ने एक नया रिकॉर्ड बनाया था।

5. हैरानी वाली बात ये थी कि कुल जमा 18-20 पदों के लिए चार पांच दिन तक लगभग एक हज़ार उम्मीदवारों के इंटरव्यू लिए गए। जबकि सरकारी नियम के मुताबिक़ एक पद के विरुद्ध केवल तीन लोगों के इंटरव्यू होने चाहिए।  

6. इंटरव्यू में शामिल पत्रकारों के मुताबिक़ उनसे बेतुके सवाल पूछे जा रहे थे।ऐसे सवालों का प्रोड्यूसर के काम से कोई लेना-देना नहीं था। इंटरव्यू पैनल में सदस्यों की संख्या भी निश्चत नहीं थी। कभी सात तो कभी महज़ दो सदस्य ही इंटरव्यू लेते देखे गए।ज़्यादातर उम्मीदवारों से उनका नाम और परिचय पूछकर उन्हें जाने के लिए कह दिया गया। जिसके बाद इंटरव्यू में देश भर से शामिल होने आए पत्रकार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

इस घटना के बाद मीडिया जगत में राज्यसभा टीवी के सरकारी बाबुओं को लेकर तमाम तरह की चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में है। पत्रकार ये सवाल कर रहे हैं कि

1. पूरी प्रक्रिया को इतनी जल्दबाज़ी में क्यों अंजाम दिया गया?
2. आवेदन मंगवाकर किसी निष्पक्ष संस्था के द्वारा उनकी स्क्रूटनी क्यों नहीं की गयी?
3. निर्धारित योग्यता ना रखने वाले लोगों के इंटरव्यू क्यों लिए गए?
4. बिना दस्तावेज़ों की जांच किये ही उम्मीदवारों के इंटरव्यू क्यों लिए गए?
5. राज्यसभा टीवी ने चयन के लिए वस्तुनिष्ठ चयन परीक्षा का आयोजन क्यों नहीं करवाया?

सरकारी नियमों के मुताबिक़ 90 फीसदी अंक ओएमआर प्रणाली की चयन परीक्षा और 10 फीसदी अंकों के इंटरव्यू को चयन का आधार बनाकर एक निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के आधार पर चयन किया जाना चाहिए था। लेकिन इस चयन में तमाम नियमों को किनारे कर दिया जाना कईं तरह के संदेहों को जन्म दे रहा है। जिसके बाद पत्रकार आरटीआई के ज़रिये पूरी जानकारी पाने के लीये आवेदन कर रहे हैं। साथ ही इस बारे में भी जानकारी माँगी जा रही है कि राज्यसभा टीवी में कार्यरत कितने पत्रकार नेताओं और अफसरों के रिश्तेदार है या उनसे प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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राज्यसभा टीवी में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत लोगों को मायूस होना पड़ा…

नौकरी पाने की ख्वाहिश थी. राज्यसभा टीवी में काम करने की सपना था. इन्टरव्यू में खुद को साबित करने की चुनौती थी. हिन्दी और अंग्रेजी के लिए कुल जमा 4 पोस्ट थी. इंटरव्यू देने पहुंचा. कॉफी की चुस्कियों के बीच कुछ पुराने दोस्तों का भरत-मिलाप हुआ और इसके साथ मीडिया का वर्ग विभेद भी मिटता दिख रहा था. किसी चैनल के इनपुट एडिटर भी प्रोड्यूसर बनने के लिए सूट पहनकर आए थे. ऐसे में सीनियर प्रोड्यूसर के प्रोड्यूसर बनने पर सवाल उठाना गलत होगा.

कुल मिलाकर बात ये थी कि सबको मौका मिला था और सब एक बार किस्मत को आजमाना चाह रहे थे. कुछ ऐसे भी थे जो सीनियर प्रोड्यूसर और प्रोड्यूसर दोनों के वाक इन में शामिल हुए थे. शायद इस उम्मीद में कि कुछ भला हो जाए. वॉक इन की ये पूरी कवायद सवालों के घेरे में है. प्रोड्यूसर और सीनियर प्रोड्यूसर जैसी पोस्ट पर सिर्फ साक्षात्कार से नौकरी दिए जाने का ड्रामा किया गया. सवाल ये है कि क्यों इस चयन प्रक्रिया में कॉपी लिखवाने की जहमत नहीं उठाई गई. क्या राज्यसभा टीवी का पैनल सिर्फ साक्षात्कार के आधार पर ही कॉपी लिखने की क्षमता का भी पता कर सकता था.

दूसरा सवाल ये है कि जब पचास या साठ लोगों के ही इन्टरव्यू का इंतजाम था, तो क्यों लोगों को बुलाया, और जब बुला लिया गया तो उनका इन्टरव्यू क्यों नहीं लिया गया. हैरत की बात ये भी रही कि इन्टरव्यू देने आए मीडिया कर्मियों ने भी इस बात को लेकर कोई एतराज नहीं जताया. मीडिया कर्मियों के कवच में छिपा मजदूर शायद ये करने का साहस नहीं कर पाया होगा. वाक इन के नियत जगह के ठीक सामने डॉ. भीवराव आंबेडकर का प्रेरणा स्थल था. संविधान निर्माता का प्रेरणा स्थल. मीडिया के बेरोजगारों को देखकर कई भावनाएं आ जा रही थी. संविधान के जरिए सिस्टम बनाने वाले डॉ.भीवराव आंबेडकर की प्रेरणा भी काम नहीं आई.

वाक इन के दौरान अगर कुछ नहीं था, तो बस सिस्टम नहीं था. ये बात खुद सिद्ध हो गई कि सरकारी टीवी भी सरकारी होता है और सरकारी काम भी सरकारी काम की तरह होता रहेगा. शाम करीब पांच बजे लोगों की पहले टूट रही उम्मीदों को आखिरी झटका मिलता है. दिन भर से इंतजार कर रहे लोगों को बताया जाता है कि बाकी सभी लोगों को अब रुकने की जरुरत नहीं है. फार्म जमा करिए और निकल जाइये. कहा गया कि आने वाले वक्त में उनके आवेदन पर विचार होगा. बहुत नाइंसाफी हुई… राज्यसभा में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत सारे लोगों को मायूस होना पड़ा…. क्या आप भी उनमें से एक थे….

सुमीत ठाकुर
sumeetashok@gmail.com

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राज्यसभा टीवी में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत लोगों को मायूस होना पड़ा…

नौकरी पाने की ख्वाहिश थी. राज्यसभा टीवी में काम करने की सपना था. इन्टरव्यू में खुद को साबित करने की चुनौती थी. हिन्दी और अंग्रेजी के लिए कुल जमा 4 पोस्ट थी. इंटरव्यू देने पहुंचा. कॉफी की चुस्कियों के बीच कुछ पुराने दोस्तों का भरत-मिलाप हुआ और इसके साथ मीडिया का वर्ग विभेद भी मिटता दिख रहा था. किसी चैनल के इनपुट एडिटर भी प्रोड्यूसर बनने के लिए सूट पहनकर आए थे. ऐसे में सीनियर प्रोड्यूसर के प्रोड्यूसर बनने पर सवाल उठाना गलत होगा.

कुल मिलाकर बात ये थी कि सबको मौका मिला था और सब एक बार किस्मत को आजमाना चाह रहे थे. कुछ ऐसे भी थे जो सीनियर प्रोड्यूसर और प्रोड्यूसर दोनों के वाक इन में शामिल हुए थे. शायद इस उम्मीद में कि कुछ भला हो जाए. वॉक इन की ये पूरी कवायद सवालों के घेरे में है. प्रोड्यूसर और सीनियर प्रोड्यूसर जैसी पोस्ट पर सिर्फ साक्षात्कार से नौकरी दिए जाने का ड्रामा किया गया. सवाल ये है कि क्यों इस चयन प्रक्रिया में कॉपी लिखवाने की जहमत नहीं उठाई गई. क्या राज्यसभा टीवी का पैनल सिर्फ साक्षात्कार के आधार पर ही कॉपी लिखने की क्षमता का भी पता कर सकता था.

दूसरा सवाल ये है कि जब पचास या साठ लोगों के ही इन्टरव्यू का इंतजाम था, तो क्यों लोगों को बुलाया, और जब बुला लिया गया तो उनका इन्टरव्यू क्यों नहीं लिया गया. हैरत की बात ये भी रही कि इन्टरव्यू देने आए मीडिया कर्मियों ने भी इस बात को लेकर कोई एतराज नहीं जताया. मीडिया कर्मियों के कवच में छिपा मजदूर शायद ये करने का साहस नहीं कर पाया होगा. वाक इन के नियत जगह के ठीक सामने डॉ. भीवराव आंबेडकर का प्रेरणा स्थल था. संविधान निर्माता का प्रेरणा स्थल. मीडिया के बेरोजगारों को देखकर कई भावनाएं आ जा रही थी. संविधान के जरिए सिस्टम बनाने वाले डॉ.भीवराव आंबेडकर की प्रेरणा भी काम नहीं आई.

वाक इन के दौरान अगर कुछ नहीं था, तो बस सिस्टम नहीं था. ये बात खुद सिद्ध हो गई कि सरकारी टीवी भी सरकारी होता है और सरकारी काम भी सरकारी काम की तरह होता रहेगा. शाम करीब पांच बजे लोगों की पहले टूट रही उम्मीदों को आखिरी झटका मिलता है. दिन भर से इंतजार कर रहे लोगों को बताया जाता है कि बाकी सभी लोगों को अब रुकने की जरुरत नहीं है. फार्म जमा करिए और निकल जाइये. कहा गया कि आने वाले वक्त में उनके आवेदन पर विचार होगा. बहुत नाइंसाफी हुई… राज्यसभा में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत सारे लोगों को मायूस होना पड़ा…. क्या आप भी उनमें से एक थे….

सुमीत ठाकुर
sumeetashok@gmail.com

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