राज्यसभा टीवी पर कब्जा करने के लिए केंद्र सरकार प्लांट करा रही निगेटिव न्यूज?

वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार का मानना है कि राज्यसभा टीवी के खिलाफ निगेटिव खबरें एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. उन्होंने फेसबुक पर इस बारे में लिखा है कि केंद्र सरकार अपने लोगों को इस चैनल पर काबिज कराने के लिए चैनल को लेकर नकारात्मक खबरें छपवा रही है. विमल कुमार ने जो कुछ लिखा है, उसे पढ़िए…

राज्यसभा टीवी ने कैग के आरोपों को गलत करार दिया, अब तक 1700 करोड़ ठिकाने लगाने का था आरोप

नई दिल्ली : कैग ने राज्यसभा टेलीविजन के संचालन को लेकर कुछ सवाल खड़े किए हैं। कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि राज्यसभा टीवी चैनल के पास कोई रोडमैप नहीं है और साथ ही साथ संसद के दोनों सदनों के लिए अलग—अलग चैनल होने के औचित्य पर भी प्रश्न खड़ा किया है। राज्यसभा टीवी ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा है पिछले चार सालों में कुल खर्च केवल 146.7 करोड़ रुपए हुआ, जिसमें सैलरी, किराया, कैपिटल कॉस्ट और ऑपरेशनल एक्सपेंसेज शामिल हैं। 1700 करोड़ रुपए का आंकड़ा मात्र एक कल्पना है।

मजीठिया वेज बोर्ड पर हरिवंश अभी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं!

नीचे राज्यसभा टीवी पर मजीठिया वेज बोर्ड पर हुई बहस का लिंक दिया जा रहा है। बहस में हरिवंश (संपादक, प्रभात खबर) और सुप्रीम कोर्ट में वकील कोलिन गोंसाल्विस भी शामिल हैं। जब हरिवंश से एंकर गिरीश निकम ने पूछा कि आपके अखबार में लागू हुआ तो बोले क‌ि अभी हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतंजार कर रहे हैं। इस पर गोंसाल्विस ने कहा क‌ि एक साल पहले फैसला आ चुका है। बहस में जागरण, इंडियन एक्सप्रेस और भास्कर पर सीधे नाम लेक‌र आरोप लगाए गए हैं।

राज्यसभा टीवी में जारी है फिक्सिंग का खेल

इन दिनों टीवी न्यूज़ चैनलों में राज्यसभा टीवी की चर्चा ज़ोरो पर है। बीते दिनों राज्यसभा टीवी में पत्रकारों की भर्ती के लिए हुए मेराथन इंटरव्यू के बाद इस चर्चा ने ज़ोर पकड़ा है। राज्यसभा टीवी पिछले दरवाज़े से पत्रकारों की इंट्री करवाने के लिए पहले ही बदनाम हो चुका है। लेकिन बीते दिनों राज्यसभा टीवी के रकाबगंज रोड स्थित ऑफिस में जो कुछ हुआ उसने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि राज्यसभा टीवी में सिर्फ नेताओं और अफसरों के रिश्तेदार ही पत्रकार बन सकते हैं।ये बात किसी से छिपी नहीं है कि वर्तमान में राज्यसभा टीवी में कार्यरत लगभग सभी पत्रकारों का किसी बड़े नेता या अफसर से रिश्ता रहा है। बीते दिनों इससे जुड़ी कुछ ख़बरें सार्वजनिक होने के बाद देश भर में चर्चा का विषय बनी थी। इस लिहाज़ से राज्यसभा टीवी जनता के बीच पहले ही अपनी ख़ास पहचान बना चुका है। लेकिन बीते दिनों वाक् इन इंटरव्यू के नाम पर हुए फिक्सिंग के खेल ने राज्यसभा टीवी के डायरेक्टर और सचिवालय के अफसरों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

राज्यसभा टीवी में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत लोगों को मायूस होना पड़ा…

नौकरी पाने की ख्वाहिश थी. राज्यसभा टीवी में काम करने की सपना था. इन्टरव्यू में खुद को साबित करने की चुनौती थी. हिन्दी और अंग्रेजी के लिए कुल जमा 4 पोस्ट थी. इंटरव्यू देने पहुंचा. कॉफी की चुस्कियों के बीच कुछ पुराने दोस्तों का भरत-मिलाप हुआ और इसके साथ मीडिया का वर्ग विभेद भी मिटता दिख रहा था. किसी चैनल के इनपुट एडिटर भी प्रोड्यूसर बनने के लिए सूट पहनकर आए थे. ऐसे में सीनियर प्रोड्यूसर के प्रोड्यूसर बनने पर सवाल उठाना गलत होगा.

राज्यसभा टीवी में नौकरी की ख्वाहिश रखने वाले बहुत लोगों को मायूस होना पड़ा…

नौकरी पाने की ख्वाहिश थी. राज्यसभा टीवी में काम करने की सपना था. इन्टरव्यू में खुद को साबित करने की चुनौती थी. हिन्दी और अंग्रेजी के लिए कुल जमा 4 पोस्ट थी. इंटरव्यू देने पहुंचा. कॉफी की चुस्कियों के बीच कुछ पुराने दोस्तों का भरत-मिलाप हुआ और इसके साथ मीडिया का वर्ग विभेद भी मिटता दिख रहा था. किसी चैनल के इनपुट एडिटर भी प्रोड्यूसर बनने के लिए सूट पहनकर आए थे. ऐसे में सीनियर प्रोड्यूसर के प्रोड्यूसर बनने पर सवाल उठाना गलत होगा.