अस्सी हजार रुपये में बिक गई यशवंत की अल्टो कार, अब हुए पूरी तरह पैदल

Yashwant Singh : अस्सी हजार रुपये में बिक गई मेरी दस साल पुरानी अल्टो कार. आजादी थोड़ी सी और बढ़ गई. घुमक्कड़ी में अब आएगा ज्यादा आनंद. दिल्ली का भड़ास आफिस बंद करना और अब कार बेचना… दोनों काम खुद ब खुद हो गए… लेकिन ये दोनों काम और इन दोनों के कम हो जाने के बाद खुद को ज्यादा मुक्त व उदात्त महसूस कर रहा हूं. अगर कार रखने की जगह न हो, एकल परिवार में कोई दूसरा कार चलाने वाला न हो और आफिस वाफिस जाने का कोई झंझट न हो तो कार असल में हाथी की माफिक हो जाया करती है. उस पर भी दिल्ली में केजरीलाल ने आड इवन करके बे-कार जीने के रास्ते जबरन चला दिया था. केजरी भाई साहब के उस प्रयोग से मुझे बड़ा फायदा ये हुआ कि लगातार बस मेट्रो आदि की यात्राएं करने से कार के प्रति मोह आस्था यथास्थितिवाद खत्म हो गया.

कार बेचने के पीछे तात्कालिक कारण भी बता दूं. जहां रहता हूं वहां घर के भीतर कार पार्किंग की सुविधा नहीं है. घर के सामने पार्क के करीब कार खड़ी कर देता हूं. देहाती किस्म के एक चोर महोदय एक रात आए और पेचकस डाल के कार का गेट खोलने वाला छेद और कार स्टार्ट करने वाला छेद दोनों भयंकर रूप से थूर दिए. म्यूजिक सिस्टम व कार से मोबाइल चार्ज करने वाला चार्जर ले गए. कार भी वो ले जाने की कोशिश किए होंगे लेकिन बैट्री डिस्चार्ज मोड में थी इसलिए जो मिला वही ले गए.

ये चौर्य कांड काफी पहले ही हो चुका था. मुझे पता तब चला जब महीने भर से खड़ी कार को एक रोज स्टार्ट कर कहीं जाने की सोचा तो देखा कि इसमें तो कांड हुआ पड़ा है. तब दिमाग में कौंधा कि उपर वाले का आदेश है कि बेटा इसे बेच दे वरना ये जाने वाली है. सो, फौरन फोटो वोटो खींच के olx पर डाला और olx की महिमा देखिए कि फोन काल्स की लाइन लग गई.

अंतत: आगरा के एक भाई साहब नब्बे हजार से बारगेन करते हुए अस्सी पर ले आए और मैंने भी देकर छुट्टी पाई. तो इस प्रकार मैं कार से बे-कार हो गया हूं. हां, ढेर सारे लोग मुझसे पूछे कि अब कौन सी नई बड़ी वाली कार लेंगे. मैंने कहा भइया मैं थोड़ा डाउनग्रेड, डाउनमार्केट, परम देहाती और थेथर बेहया टाइप प्राणी हूं जो अपने गोबर कीचड़ मि्ट्टी पैदल में ही सुकून पाता है इसलिए नो कार. हां, स्कूटी जरूर लेने की सोच रहा हूं ताकि घर वाले द्रुतगामी हो जाएं. मुझे अब किसी वाहन की जरूरत नहीं. मैं तो खुद ही यह देह रूपी वाहन धारण कर इधर उधर हिलता डुलता इस ब्रह्मांड प्रकृति की विशिष्टता विचित्रता अलौकिकता देखकर आनंदित विस्मित चकित होते हुए धन्य-धन्य कहता महसूसता फिरकी माफिक फिरक रहा हूं. जैजै 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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