विनोद मेहता, NDTV और चुनिंदा चुप्पियां

कल भारतीय मीडिया जगत के हिसाब से दो बड़ी अहम घटनाएं हुईं। एक, विनोद मेहता की मौत और दूसरे, एनडीटीवी का एक घंटे तक अपनी स्क्रीन को ब्लैंक रखना। दोनों पर बात होनी चाहिए। एक-एक कर के इन दोनों परिघटनाओं के मायने ज़रा तलाशे जाएं। विनोद मेहता का जब देहान्‍त हुआ, तो कई के मुताबिक, जिन्होंने उनका स्मृतिशेष पढ़ा, वह इस पीढ़ी के अंतिम ‘अक्खड़, ईमानदार, अड़ियल, साफगो और निर्भीक संपादक’ थे। हमारी भारतीय संस्कृति में मौत के बाद किसी की बुराई करने या पंचनामा करने का चलन नहीं है, इसलिए ज़ाहिर तौर पर विनोद मेहता को भी महानता की श्रेणी में धकेल ही दिया जाएगा। बहरहाल, विनोद मेहता इस लेखक के लिए हमेशा उस वामपंथी(?) बौद्धिक बिरादरी का हिस्सा रहे, जो ‘चुनिंदा विस्‍मरण’ (सेलेक्टिव एमनेज़िया) का शिकार रहा है। इसके अलावा भी उनका व्यक्तित्व कोई शानदार नहीं रहा, और इसे पूरी शिद्दत से समझने की ज़रूरत है।

मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द-एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो-विज्ञापन के काम लाए जाते हैं

Vineet Kumar : जिया न्यूज की मीडियाकर्मी स्नेहल वाघेला के बारे में जानते हैं आप? 27 साल की स्नेहल अपने चैनल जिया न्यूज जिसकी पंचलाइन है- जर्नलिज्म इन एक्शन, के लिए अपने दोनों पैर गंवा चुकी है. पिछले दिनों जिया चैनल के लिए मेहसाना (अहमदाबाद) रेलवे स्टेशन पर रिपोर्टिंग करते हुए स्नेहल फिसलकर पटरियों पर गिर पड़ी और उनके दोनों पैर इस तरह से जख्मी हुए कि आखिर में काटने पड़ गए. अब वो चल-फिर नहीं सकती.