पश्चिम बंगाल चुनाव : लेफ्ट फ्रंट वापस सत्ता में आ जाए तो हैरत नहीं

बंगाल में लेफ्ट फ्रंट का नारा है- तृणमूल हटाओ, बंगाल बचाओ… मोदी हटाओ, देश बचाओ….

पश्चिम बंगाल में तकरीबन 34 साल तक सत्ता पर काबिज रहनेवाली लेफ्ट फ्रंट इसी नारे के सहारे फिर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। इस नारे में बड़ा सवाल भी है। सवाल ये कि तृणमूल सरकार के दौर में लेफ्ट फ्रंट ने ऐसा क्या चमत्कार किया कि वो वापसी की आस लगा बैठी है? क्या, महज कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनावी गठबंधन लेफ्ट को खोया राज वापिस दिला सकती है? या फिर लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बेदखल करने के लिए मोटे तौर पर जिम्मेदार नंदीग्राम और सिंगूर में हालात बदल गए हैं, जहां पांचवें और छठे दौर में मतदान होने हैं।

सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।