यूपी में बीजेपी की सियासी बेचैनी : अखिलेश, माया और राहुल मिल कर दे सकते हैं मात!

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार जीत का परचम फहराती जा रही है। यूपी में उसकी सफलता का ग्राफ शिखर पर है, लेकिन शिखर पर पहुंच कर भी बीजेपी एक ‘शून्य’ को लेकर बेचैन नजर आ रही है। उसे चुनावी रण में हार का अंजाना सा डर सता रहा है। इस डर के पीछे खड़ी है अखिलेश-माया और राहुल की तिकड़ी, जो फिलहाल तो अलग-अलग दलों से सियासत कर रहे हैं, मगर मोदी के विजय रथ को रोकने के लिये तीनों को हाथ मिलाने से जरा भी गुरेज नहीं है। बीजेपी का डर लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक में साफ नअर आता है। असल में 2014 के लोकसभा चुवाव मे मिली शानदार जीत का ‘टैम्पो’ बीजेपी 2019 तक बनाये रखना चाहती है।

यह तभी हो सकता है जब बीजेपी के किसी सांसद के इस्तीफे की वजह से बीजेपी को उप-चुनाव का सामना न करना पड़ जायें। बात यहां यूपी के उप-मुख्यमंत्री और फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या की हो रही है। मौर्या को अगर डिप्टी सीएम बने रहना है तो छह माह के भीतर (नियुक्ति के समय से) उन्हें विधान सभा या विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ेगा। इसके लिये सबसे पहले केशव को संासदी छोड़ना पड़ेगी। सांसदी छोड़ेगें तो जिस (फूलपुर) लोकसभा सीट का केशव प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वहा चुनाव भी होगा और चुनाव में बीजेपी को जीत नहीं हासिल हुई तो विपक्षी ऐसा माहौल बना देंगे मानों यूपी में बीजेपी शिखर से शून्य पर पहुंच गई है। बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। मोदी ने यूपी में जो चमत्कार किया था, उस पर भी सवाल खड़े होंगे? ऐसे में पूरे देश में गलत संदेश जायेगा, जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक पर पड़ सकता है।

फूलपुर लोकसभा चुनाव के पुराने नतीजे भी बीजेपी में भय पैदा कर रहे हैं। फूलपुर संसदीय सीट से तीन बार पंडित जवाहर लाल नेहरू, दो बार विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तक चुनाव जीत चुके हैं। 1952 से लेकर 2009 तक बीजेपी का यहां कभी खाता नहीं खुला। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो यहां से बीजेपी को पांयवें नबर पर ही संतोष करना पड़ा था और उसे मात्र 8.12 प्रतिशत वोट ही मिले थे। यहां तो कभी राम लहर तक का असर नहीं दिखा। हॉ, 2014 के चुनाव में जरूर चमत्कारिक रूप से मोदी लहर में यह सीट बीजेपी की झोली में आ गई थी। इसी लिये यह कयास लगाये जा रहे हैं कि बीजेपी आलाकमान केशव को सासदी से इस्तीफा दिलाने की बजाये उन्हें डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा दिलाकर दिल्ली में कहीं समायोजित कर सकती है।

वैसे, तमाम कयासों के बीच कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी की चिंता बेकार की नहीं है। असल में यहां चुनाव की नौबत आती है तो गैर भाजपाई दल यहां अपना संयुक्त प्रत्याशी उतार सकती है। फूलपुर संसदीय सीट पर चुनाव की नौबत आती है तो बसपा सुप्रीमों मायावती भी विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी बन सकती हैं। मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वह लोकसभा पहुंच कर मोदी को दलितों सहित सामाजिक समरसता के तमाम मुद्दों पर आमने-सामने खड़े होकर घेरना चाहती हैं, जिसका सीधी असर यूपी की भविष्य की सियासत पर पड़ेगा। कुछ लोग इससे इतर यह भी तर्क दे रहे है कि बीजेपी आलाकमान योगी को पूरी स्वतंत्रता से काम करने की छूट देने का विचार कर रही है। मगर इसके लिये वह पिछड़ा वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता है। पार्टी नेतृत्व का केशव पर भरोसा और पिछड़े वर्ग से होने के नाते भी उनके दिल्ली जाने की खबरों को बल मिलता दिख रहा है।

केशव प्रसाद के भविष्य को लेकर एक-दो दिन में तस्वीर साफ हो जाएगी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 29 जुलाई को तीन दिवसीय प्रवास पर लखनऊ आ रहे हैं। वह अपने प्रवास के दौरान एक तरफ सरकार और संगठन के बीच समन्वय बैठाने की कोशिश करेंगे तो दूसरी तरफ 2019 के लोकसभा चुनाव के अभियान की बुनियाद भी रखेंगे। शाह पहली बार तीन दिन के प्रवास पर आ रहे है। इसके कई संकेत हैं। तीन दिन में शाह 25 बैठकें करेंगे। बताते चलें की हाल में पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान सांसदों ने योगी के मंत्रियों की शिकायत की थी। मोदी ने इसे काफी गंभीरता से लिया थां। इसका प्रभाव भी शाह के दौरे पर दिखाई पड़ सकता है।

उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव को लेकर यही संभावना जताई जा रही है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में ही विधानसभा की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। दूसरे डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा को विधान परिषद भेजा जा सकता है। इस समय योगी, मौर्य और डॉ.शर्मा सहित परिवहन राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार स्वतंत्र देव सिंह और वक्फ व विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री मोहसीन रजा भी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं है।

योगी और मौर्य की सांसदी फिलहाल उप-राष्ट्रपति चुनाव तक तो बरकरार रहेगी ही, लेकिन 19 सितंबर से पहले दोंनो को विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता लेनी ही पड़ेगी, लेकिन विधान सभा और विधान परिषद की मौजूदा स्थिति को देखते हुए वर्तमान सदस्यों से त्याग पत्र दिलाए बिना इन सबके समायोजन की स्थिति दिखाई नहीं दे रही। भाजपा विधायक मथुरा पाल और सपा एमएलसी बनवारी यादव के निधन के चलते हालांकि विधानसभा और विधान परिषद में एक- एक स्थान रिक्त है, पर इन सीटों की स्थिति देखते हुए यहां से मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री या राज्यमंत्रियों मंे किसी को लड़ाने की संभावना दूर- दूर तक नहीं दिखती। ऐसे में संभावना यही है कि भाजपा नई सीटें खाली कारकर इन सबका समायोजन कराएगी।

अखिलेश की चुटकी
केशव के दिल्ली भेजे जाने की चर्चा के बीच सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए कहा कि अभी तो तीनों मिले नहीं, फिर क्यों घबरा गए। अखिलेश ने केशव प्रसाद मौर्य का नाम लिए बगैर कहा,सुना हैं कि आप लोग किसी को दिल्ली भेज रहे है। अभी तो समझौता नहीं हुआ है फिर क्यों घबरा गए। अगर हम तीनों (सपा, बसपा व कांग्रेस) एक हो जाएं तो आप कहां ठहरोगे, यह आप समझ सकते हो।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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बंटवारे की ओर बढ़ती सपा में बगावत

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के तेवर हल्के होने का नाम नहीं ले रहे हैं। बाप-चचा की तमाम ‘घुड़कियों’ और ‘अपनों’ के खिलाफ कार्रवाई से तिलमिलाए अखिलेश ‘जख्मी शेर’ बनते जा रहे हैं। विकास और स्वच्छता की राजनीति के कायल अखिलेश से जब उनके बुजुर्गो ने यही दोंनो ‘हथियार’ उनसे छीन लिये तो अखिलेश के पास कहने-सुनने को कुछ नहीं बचा। दागी अमनमणि को टिकट दिये जाने पर तो उन्होंने यहां कह दिया,‘मैंने सारे अधिकरी छोड़ दिये हैं।’

लेकिन इसके साथ यह कह कर कर सनसनी भी फैला दी, ‘अभी इंतजार कीजिये, तुरूप का पत्ता सामने आने दीजिये, किसका तुरूप भारी पड़ेगा, यह तो वक्त बतायेगा। जनता तय करेगी किसको सरकार में लाना है।‘ अखिलेश ने यह बात लखनऊ में विधान भवन के समाने बने लोक भवन का उद्घाटन करने के बाद मीडिया के सवालों के जबाव में तब कही जबकि उनके बगल की कुर्सी पर बैठे पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान लगातार उनका हाथ ऐसा न कहने के लिये दबाये जा रहे थे। इससे अखिलेश की नाराजगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ बात सपा प्रमुख मुलायम सिंह की नाराजगी की कि जाये तो उनका भी पारा सांतवें आसमान पर चढ़ा है। लोक भवन का जब फीता काटने की बात आई तो यहां नेताजी ने फीता काटने से इंकार कर दिया। यहां भी आजम ने किसी तरह मुलायम से फीता कटवा कर माहौल शांत किया।

अखिलेश की तमाम बयानबाजियों को अनदेखा भी कर दिया जाये तो भी सियासी पंडित अखिलेश यादव के तुरूप के पत्ते वाले बयान को हल्के में लेने को तैयार नहीं है। यह तुरूप का पता क्या हो सकता है ? इस संबंध में जो कयास लगाये जा रहे हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अखिलेश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। इसमें अधिकार छोड़ने के साथ ही पार्टी से बगावत करके नया दल बनाने के अलावा, पार्टी का चुनाव प्रचार शुरू करने से पहले कुछ शर्तों को रखना या अपने आप को प्रचार से दूर कर लेने की घोषणा कर देना,सीएम पद छोड़ देना,विधान सभा भंग कर देना, जैसे फैसले हो सकते हैं। चुनाव से पूर्व रथ यात्रा के माध्यम से जनता से संवाद स्थापित करने का कार्यक्रम अखिलेश रद्द कर ही चुके हैं और यह बताने को भी तैयार नहीं है कि क्या यह यात्रा भविष्य में निकाली जायेगी। इसी प्रकार से मेट्रो ट्रेन का शिलान्यास करने कानपुर  पहुंचे अखिलेश ने   ,‘सीएम का चेहरा तो मैं ही’ वाला बयान देकर शिवपाल खेमे में खलबली मचा दी है,जबकि शिवपाल कह रहे थे सीएम का फैसला चुनाव नतीजे आने के बाद विधायक करेंगे।   

सियासत के जानकार समाजवादी पार्टी में मचे उठापटक के बाद यह बात दावे से कहने लगे हैं कि अगर समय रहते समाजवादी पार्टी के कर्णधारों की आंखे नहीं खुली तो पार्टी का बंटावारा भले न हो लेकिन  2017 के विधान सभा चुनाव में सपा का बोरिया-बिस्तर बंधना निश्चित है। सपा के भीतर जो ‘महाभारत’ मचा हुआ है, उसमें मुलायम धृतराष्ट्र, शिवपाल‘ ‘दुर्योधन’ और सपा का युवा चेहरा अखिलेश ‘भीष्म पितामाह’ की तरह लाचार नजर आ रहे हैं। बस फर्क इतना है कि महाभारत में भीष्म पितामाह अपने बच्चों के समाने लाचार थे तो ‘सियासी महाभारत’ में पुत्र अखिलेश की ऐसी ही स्थिति अपने बाप-चचाओं के कारण हो रखी हैं। मुलायम-शिवपाल अपने ही घर के ‘चिराग’ अखिलेश यादव और उनकी सरकार को ‘बुझा’ देने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे है। अखिलेश से बिना विचार-विमर्श के एक के बाद एक अनाप-शनाप फैसले मुलायम-शिवपाल बंधु करते चले जा रहे हैंं। अपनों से ही इतने ‘जख्म’ मिलने के बाद कोई कैसे सिर उठाकर जी सकता है।

सपा में अखिलेश की जैसी धमाकेदार इंट्री हुई थी,वैसे ही उनका विरोध परवान चढ़ रहा है। अखिलेश को 2012 के विधान सभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान ‘मुलायम ब्रिगेड’ ने तब आगे किया था,जब उन्हें अच्छी तरह से यह समझ में आ गया था कि यूपी का मतदाता मुलायम राज के गुंडाराज को भूल नहीं पाया है।उसे डर सता रहा है कि अगर समाजवादी पार्टी को वोट दिया तो यूपी में फिर से गुंडाराज रिटर्न हो सकता है। 2003 से 2007 तक सत्ता में रही मुलायम सरकार की कानून व्यवस्था को लेकर काफी किरकिरी हुई थी। उस दौर में सत्तारूढ़ दल के बड़े नेताओं द्वारा गुडांे को संरक्षण दिये जाने के चलते जनता त्राहिमाम करने लगी थी। इसी लिये मतदाता फिर से मुलायम को सत्ता सौंपने के बजाये, बसपा राज के भ्रष्टाचार को भी अनदेखा करने को तैयार नजर आ रहे थे। इस बात का अहसास मुलायम टीम को हुआ तो उन्होंने अखिलेश को आगे करके हारी हुई बाजी जीतने की जुगत शुरू कर दी।

अखिलेश युवा थे। पढ़ाई लिखाई भी अच्छी की थी। उन्होंने सियासत को अपने घर के आंगन में पलते-बढ़ते देखा था। इस लिये राजनीति का क्षेत्र उनके लिये नया नहीं था। युवा अखिलेश ने बाप मुलायम का आदेश पाते ही तुरंत मोर्चा संभाल लिया,जो अखिलेश मात्र एक नेता की तरह मुलायम के अधीन प्रचार अभियान का अंग बने हुए थे,उनके लीडर बनकर  मोर्चा संभालते ही बुझे-बुझे से समाजवादी नेताओं और कार्यकर्ता में नये जोश का संचार होने लगा। अखिलेश ने तमाम मंचों से जनता को यकीन दिलाया कि अगर वह सपा को वोट देंगे तो यूपी में ‘गुंडराज रिटर्न’  नहीं होगा। गुंडे सलाखों के पीछे रहेंगे। एक तरफ वह गुंडों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ मायावती सरकार के भ्रष्टाचार को भी खुलकर उजागर कर रहे थे।

अखिलेश ने सपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिये एक तरफ रथ यात्रा निकाली तो दूसरी तरफ यह भी बताते जा रहे थे कि अगर उनको (सपा को) मौका दिया गया तो प्रदेश मे विकास की गंगा बहेगी। अखिलेश कमांडर की तरह सियासी मोर्चे पर आगे बढ़ते जा रहे थे तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से लेकर सपा के तमाम छोटे-बड़े नेता उनके पीछे हाथ बांधे खड़े प्रतीत हो रहे थे। अखिलेश की जनसभाएं अपने क्षेत्र में कराने की मांग सपा के तमाम उम्मीदवारों की तरफ से होने लगी थीं। मुलायम दूसरे पायदान पर थे, तो शिवपाल यादव सहित सपा के तमाम दिग्गज नेताओं की जनसभाएं अपने इलाके में कराने की मांग कोई नेता नहीं कर रहा था। यह कसक मुलयाम को छोड़ सपा के सभी दिग्गज नेताओं के चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी,लेकिन सत्ता की भूख में सब ने अपने मुंह पर ताला लगा रखा था। मगर सियासत के जानकारों की पारखी निगाहों को पता चल गया था कि सपा में मुलायम युग अस्तांचल की ओर हैं और अखिलेश युग शुरू होने जा रहा है। ’वृंदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना है।’ की तरह ही समाजवादी पार्टी में भी सब लोग ‘अखिलेश-अखिलेश’ कहने लगे थे।

बदलाव प्रकृति का नियम है यह बात सपा के कुछ बड़े नेताओं को स्वीकार्य नहीं हो रही थी। यह वह लोग थे जिनके कंधो पर चढ़कर अखिलेश इस मुकाम तक पहुंचे थे, तो बदले माहौल में यही लोग अखिलेश के कंधे पर बैठकर अपने हित साधने का सपना देख रहे थे। इसमें पिता मुलायम सिंह, चचा शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव, आजम खॉ जैसे तमाम नेता शामिल थे। अखिलेश के सहारे पिता मुलायम 2014 में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे तो शिवपाल यादव को लग रहा था कि भले ही चुनाव प्रचार में भतीजा अखिलेश बाजी मार रहा हो,लेकिन उनके (शिवपाल) अनुभव के आगे भतीजा अखिलेश कहीं टिक ही नहीं सकता है। मुलायम सिंह देश का पीएम बनने का ख्वाब पाले थे तो मुलायम के पश्चात शिवपाल यादव यूपी का मुख्यमंत्री बनने लायक नेताओें में अपने आप को सबसे काबिल समझ रहे थे।

एक तरफ अखिलेश प्रदेश की जनता से संवाद करके उन्हें सपा के पक्ष में करने में लगे थे तो दूसरी तरफ सपा के कई दिग्गज नेता चुनाव के बाद पैदा होने वाले हालात के मद्देनजर बेहद चालकी से पांसे फांकते हुए अपने आप को सबसे बेहतर प्रोजेक्ट करने में लगे थे। चुनावी बेला में बाहुबली डीपी यादव को समाजवादी पार्टी में लाये जाने की कोशिश इसी कड़ी का एक हिस्सा था,जिसकी अखिलेश ने ठीक वैसे ही हवा निकाल दी थी, जैसे बाद में बाहुबली मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के साथ उन्होंने किया। इससे जनता के बीच अच्छा संदेश गया था। 

कुछ महीनों के भीतर ही अखिलेश ने चुनावी बेला में पिछड़ती नजर आ रही सपा के पक्ष में माहौल बना दिया था। नतीजों ने भी इस बात की गवाही दी। मार्च 2012 के विधान सभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर मात्र 38 वर्ष की आयु में ही वे उत्तर प्रदेश के 33वें मुख्यमन्त्री बन गये। अखिलेश का मुख्यमंत्री बनाना शिवपाल यादव की सियासी मंशाओं के लिये किसी कुठाराघात से कम नहीं था,जो शिवपाल सीएम बनने का सपना देख रहे थे, उनके सामने भतीजे के नीचे ‘काम’ करने की मजबूरी आ गई।

सत्ता चीज ऐसी है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहता है। शिवपाल हों या फिर अखिलेश के अन्य चचा सब की सब भतीजे की सरकार में शामिल तो हो गये, लेकिन माथे पर शिकन साथ नजर आ रही थी। यह संकेत अखिलेश की भावी सियासत और सरकार के लिये अच्छे नहीं थे। इस बात का अहसास जल्द अखिलेश को हो भी गया जब उनकी सरकार बनने के छहः माह के भीतर ही जुलाई 2012 में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उनके कार्य की आलोचना करते हुए व्यापक सुधार का सुझाव दिया,जिससे जनता में  यह सन्देश गया कि सरकार तो उनके पिता और चाचा ही चला रहे हैं, अखिलेश नहीं। यह बात इस लिये पुख्ता भी हो रही थीं, क्योंकि अखिलेश बाप-चचाओं की ‘छाया’ से बाहर नहीं निकल पा रहे थे।

अखिलेश सरकार को दूसरा झटका तब लगा जब खनन माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोले एक आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को उन्होंने बाप-चचाओं के दबाव में आकर निलम्बित कर दिया। इस पर चारों ओर से उनकी आलोचना हुई। जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें नागपाल को बहाल करना पड़ा। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में 43 व्यक्तियों के मारे जाने व 93 के घायल होने पर कर्फ्यू लगाना पड़ा तथा सेना ने आकर स्थिति पर काबू किया। मुस्लिम व हिन्दू जाटों के बीच हुए इस भयंकर दंगे से उनकी सरकार की बेहद किरकिरी हुई। इस बीच अखिलेश ने अपने कई फैसलों पर ‘यूटर्न’ लेकर लोंगो को बातें बनाने के और मौके प्रदान कर दिये।

एक तरफ ‘अपनों’ की हठधर्मी के कारण जनता के बीच अखिलेश सरकार की किरकिरी हो रही थी,तो दूसरी तरफ पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अखिलेश की अनुभवहीनता पर चटकारे ले रहा था। अखिलेश पर दबाव साफ नजर आ रहा था,लेकिन इस दौरान जनता के बीच उनकी छवि नायक जैसी  बनी हुई थी। अखिलेश अनुभवहीनता और चचाओं की दखलंदाजी के बावजूद ईमानदारी से अपनी सरकार चला रहे थे। इसी बीच किसी तरह अखिलेश सरकार ने दो वर्ष का कार्यकाल पूरा किया और 2014 के लोकसभा चुनाव आ गये। पूरे  देश का सियासी वातावरण मोदीमय हो गया। यूपी भी इससे अछूता नहीं रहा। 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीत ली। न राहुल गांधी का क्रेज दिखा, न माया-मुलायम का जादू चला। सपा 05, कांग्रेस 02 सीट पर सिमट गई और बसपा का तो खाता ही नही खुला। राष्ट्रीय लोकदल जैसे छोटे-छोटे दलों के तमाम उम्मीदवार तो अपनी जमानत भी नहीं बचा सके।

सपा के तमाम दिग्गज और अनुभवी नेता परास्त हो गये, लेकिन इसका ठीकरा अखिलेश के सिर पर फोड़ दिया गया। यह बात हाल ही में तब और साफ हो गई जब मुलायम ने यहां तक कह दिया कि अगर उन्होंने शिवपाल की बात मानी होती तो 2014 में वह पीएम बन जाते। मुलायम के मुंह से यह बात निकलना थी और शिवपाल ने इस बात को पकड़ लिया। शिवपाल यादव को उन अमर सिंह का भी अदृश्य सहयोग मिल रहा था, जिन्हें हाल ही में अखिलेश ने अंकल मानने तक से ही इंकार कर दिया था। इसी लिये जब नेताजी ने अखिलेश से उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी की अध्यक्षी छीन कर शिवपाल को सौंपी तो अमर सिंह ने अखिलेश को चिढ़ाने के लिये शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने की खुशी में दिल्ली में एक शानदार दावत दे दी। इसके बाद जो कुछ हुआ वह तमाम अखबारों में काफी कुछ छप चुका है, जिसको दोहराया जाना शायद जरूरी नहीं है।

अखिलेश का भ्रष्टाचार की आड़ में मुलायम और शिवपाल के चहेते नेताओं की मंत्रिपद से बर्खास्ती, दोंनों नेताओं के करीबी नौकरशाहों के पर कतरना, शिवपाल का मंत्री पद से इस्तीफा। अमर सिंह को सपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया जाना, शिवपाल द्वारा प्रदेश सपा की अध्यक्षी संभालते ही अखिलेश के करीबियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना और अखिलेश के निकट के नेताओं का विधान सभा के लिये टिकट काटना। तमाम प्रकरण हैं। जिससे यह साबित किया जा सकता है कि मुलायम और शिवपाल अखिलेश के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। किसी को यह चिंता नहीं है कि इससे पार्टी का क्या हश्र होगा। अखिलेश की साफ-सुथरी छवि को बाप-चचाओं ने तार-तार कर दिया है।

लब्बोलुआब, यह है कि समाजवादी पार्टी एक बार फिर उसी ढर्रे पर चल पड़ी है, जिससे डरकर 2012 में सपा के थिंक टैंक ने अखिलेश को आगे किया गया था। अब मुख्तार अंसारी के सपा से गठबंधन की चर्चा होती है।भ्रष्टाचार में सिर से लेकर पैर तक डूबे मंत्री गायत्री प्रजापति आदि नेताओं की सीएम के न चाहने के बाद भी मंत्रिमण्डल में वापसी हो जाती है। कवियत्री मधुमिता की हत्या के जुर्म में जेल की सलाखों के पीछे उम्र कैद की सजा काट रहे अमरमणि त्रिपाठी के उस बेटे को शिवपाल सपा का प्रत्याशी घोषित कर देंते हैं जिसके ऊपर पत्नी की हत्या का आरोप लगा है। अतीक अहमद जैसे बाहुबली एक बार फिर सपा में अपने लिये जमीन तलाशने लगते हैं। कई दागी भी शिवपाल से करीबी के चलते टिकट हासिल कर लेते हैं।

हालात यहां तक पहुंच जाते हैं कि परिवार का सियासी घमासान घर में भी दीवारें खड़ी कर देता है, लेकिन इस सब से अंजान सपा प्रमुख यही दोहराते रहते हैं कि जिस सपा को उन्होंने खून-पसीने से सींचा उसे वह ऐसे खत्म नहीं होने देंगे। उन्हें यही नहीं पता कि सपा में विभीषण कौन है ? जनता किसे पसंद और किसे नापसंद करती है ? इतना ही नहीं मुलायम स्वयं के बारे में भी आकलन नहीं कर पा रहे हैं कि अब उनमें वह बात नहीं रही है जिसके बल पर वह सियासत का रूख बदल दिया करते थे। आज तो वह सिर्फ ‘इस्तेमाल’ किये जा रहे हैं और इस्तेमाल करने वाले उनके अपने ही हैं, जिनके मोह में फंस कर वह ‘धृतराष्ट्र’ जैसे हो गये हैं। जिन्हें कुछ दिखाई तो नहीं दे ही रहा है और सुनना वह (मुलायम) चाहते नहीं हैं।

पूरे परिवार का एक ही दर्द है कि कुछ वर्षो के भीतर ही उनका बेटा-भतीजा इतना सशक्त कैसे हो गया कि बाप-चचा को आंख दिखाने लगा है। इस पूरे सियासी खेल में ‘त्रिकोण’ का बहुत महत्व देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ खुले मोर्चे पर मुलायम, शिवपाल और अखिलेश नजर आ रहे हैं, वहीं तीन महिलाओं की भूमिका भी पूरे खेल में ‘द्रौपदी’ जैसी मानी जा रही है। इसमें दो परिवार की और एक ब्यूरोक्रेसी की वरिष्ठ महिला अधिकारी शामिल है। बात यहीं तक सीमित नहीं है जिस तरह से कुछ बाहुबलियों और हत्या के आरोपियों को सपा में विधान सभा का टिकट महिमामंडित किया जा रहा है,उसे देखते हुए तमाम लोग सपा में गुंडाराज रिटर्न की बात करने लगे हैं। अगर ऐसा हुआ तो अपनी छवि को बचाये रखने के लिये अखिलेश कोई बढ़ा फैसला ले सकते हैं।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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