क्या एक कुशल पत्रकार के हिस्से में आत्महत्या और अवसाद ही है?

योगेश मिश्रा, छत्तीसगढ़

भड़ास को नियमित तौर पर पढ़ने की आदत से अभी कुछ देर पहले ही जब भड़ास का पन्ना खोला, तो पत्रकारिता जगत में अपनी छाप छोड़ने वाले सौमित सिंह की ख़ुदकुशी की ख़बर ने सुन्न कर दिया. सौमित की मौत पर कुछ जाननेवालों का अनुभव भी पढ़ा. एक पत्रकार के द्वारा दुनिया को अवसाद से तंग आकर अलविदा कहने का यह कोई पहला मामला भी नहीं है, बल्कि भारत जैसे देश में, जिसमे अभी हालिया एक सर्वे में पता चला कि पत्रकारिता को दुनिया में सबसे खराब पेशा माना जाता है, वहां पत्रकारों पर हमला करना, उन्हें मारना, जलील करना, आम बात हो चुकी है. जगह का स्तर भले ही अलग अलग हो, पर देहात से लेकर दिल्ली तक पत्रकारों को नीचा दिखाने, उन्हें अपमानित करने, चापलूसी नहीं करने पर अवॉयड करने की घटना आम है. तंंगी तो कुशल और स्वाभिमानी पत्रकारों के साथ चलने वाली सतत प्रक्रिया हो गई है.

सौमित खुदकुशी के बहाने मीडिया संस्थानों की हालत देख लीजिए

बेहद टैलेंटेड जर्नालिस्ट सौमित सिंह ने पायोनियर, डीएनए, मुंबई मिरर और हेडलाइंस टुडे जैसे तमाम बड़े कहे जानेवाले संस्थानों में बेहद सीनियर पदों पर काम करने के बावजूद भीषण बेरोजगारी का दंश झेला और 44 साल की उम्र में दो छोटी बच्चियों के भविष्य का ध्यान रखे बगैर अपनी जान दे दी। इसका मतलब है कि बड़े संस्थान और बड़े पद का अनुभव भी पत्रकारों को सुरक्षा भाव देने में असमर्थ है। आगे पता नहीं उसके परिवार का जीवनयापन कैसे होगा। पत्रकार संस्थाएं इसमें कोई भूमिका निभा भी सकती हैं या नहीं?