इस भ्रष्ट व्यवस्था में बच्चों की तथाकथित उच्च शिक्षा पर लाखों रुपये न फूंकें!

सामान्य शिक्षा दिलाइए और खर्चीली उच्च शिक्षा पर व्यय होने वाले धन को बच्चों के नाम फिक्स डिपॉजिट कर दीजिए… अभी कुछ दिन पहले एक बड़े अखबार में सर्वे आया था। अमेरिका के युवाओं की बाबत। सर्वे इस बात पर था कि अमेरिका में शैक्षिक ऋण और इस ऋण से हुई पढ़ाई के बाद रोजगार की क्या हालत है। अमेरिका जैसे अतिशय सम्पन्न देश में सर्वे में शामिल युवाओं में से एक चौथाई का मानना था कि वे इस ऋण के जंजाल से बाहर आने के लिए अपनी किडनी तक बेचने को तैयार हैं क्योंकि निरन्तर रोजगार का भरोसा अब नहीं रहा। इस सर्वे को पढ़ने के बाद तत्काल मुझे बहुत पहले खुशवंत सिंह साहब का लिखा एक लेख याद आया जिसमें उन्होंने लिखा था यूरोप और अमेरिका में कई बार पढ़ाई इतनी मंहगी हो जाती है कि कालांतर में सामान्य विद्यार्थी उतना भी नहीं कमा पाते जितना उनकी पढ़ाई पर खर्च हुआ।