ये केजरीवाल सरकार का नहीं, दिल्ली के लोगों का अपमान है

Sushil Upadhyay : बस्सी, केजरीवाल और चाबी भरा खिलौना… कुछ महीने पहले तक ज्यादातर लोगों को नहीं पता था कि बी.एस.बस्सी कौन है ? उनके बारे में पता न होना कोई बड़ी बात भी नहीं है, क्योंकि उनके जैसे सैंकड़ों आईपीएस अफसर इस देश में काम करते हैं। लेकिन, अब अधिकतर लोग जानते हैं कि बी.एस. बस्सी दिल्ली के पुलिस आयुक्त हैं और लोगों द्वारा चुनी गई सरकार की लगातार खिल्ली उड़ा रहे हैं। हाल के दिनों में कई बार बी.एस. बस्सी टीवी पर देखने का मौका मिला है, वे जिस प्रकार की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, उसे देखकर लगता है कि कोई अधिकारी नहीं, बल्कि नेता बोल रहा है।

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें (किस्से अखबारों के : पार्ट-चार)

(सुशील उपाध्याय)


 

मीडिया में विचार की कद्र रही है, ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है। इस धंधे में विचार कोई बुरी चीज नहीं रही। एक दौर रहा है जब पूंजीवादी मालिक अपनी दुनिया में रहते थे और अखबारों में वामपंथी रुझान के पत्रकार, संपादक अपना काम करते रहते थे। नई आर्थिक नीतियों के अमल में आने के बाद संभवतः पहली बार मालिकों का ध्यान विचार की तरफ गया। ये दक्षिणपंथ के उभार का दौर था। मालिकों और दक्षिणपंथ के बीच के गठजोड़ ने प्रारंभिक स्तर पर विचार के खिलाफ माहौल बनाना शुरु किया। इसके बाद धीरे-धीरे उन लोगों को दूर किया जाने लगा जो किसी विचार, खासतौर से प्रगतिशील विचार के साथ जुड़े थे। उन्हें सिस्टम के लिए खतरे के तौर पर चिह्नित किया जाने लगा। ढके-छिपे तौर पर पत्रकारों की पृष्ठभूमि की पड़ताल होने लगी। जो कभी जवानी के दिनों में किसी वामपंथी या प्रगतिशील छात्र संगठन से जुड़े रहे थे, उनकी पहचान होने लगी।