पैर गंवा चुकी स्नेहिल की चैनल से बातचीत चल रही है

Vineet Kumar : स्नेहिल से मेरी बात हुई. उन्हें इस वक्त हमारी जरूरत नहीं है..लिखने से लेकर बाकी चीजों की भी. वो अब इस संबंध में कोई बात नहीं करना चाहती. उनका कहना है कि चैनल से इस संबंध में बातचीत चल रही है. हमारी प्राथमिकता स्नेहिल की जिंदगी और उसके प्रति उत्साह बनाए रखना पहले है जो कि सचमुच एक चुनौती भरा काम है..लिहाजा, हम इस मामले को तूल देकर उनके हिसाब से शायद नुकसान ही करेंगे. रही बात चैनल की तो हम किसी की आइडी, ज्वाइनिंग लेटर की कॉपी जबरदस्ती साझा करने नहीं कह सकते.

यकीन मानिए, आप सोशल मीडिया पर लिखते हुए जितना सीखते हैं, उतना आप किसी चैनल या अखबार के लिए काम करते हुए भी शायद सीख पाएं..यहां जो भी सोर्स, तथ्य औऱ बातें जुटाते हैं, सब अपनी क्रेडिबिलिटी पर, ब्रांड का असर नहीं होता..इस पूरे प्रकरण में फिर भी सोशल मीडिया ने अपना असर दिखा दिया.. मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि पब्लिक डोमेन में स्नेहिल की इच्छा के विरुद्ध वो सारी चीजें शामिल करुं. मैं किसी अखबार या चैनल के लिए स्टोरी नहीं कर रहा था कि किसी हाल में उनकी निजता, सुविधा को नजरअंदाज करते हुए सार्वजनिक कर दूं..अपनी क्रेडिबिलिटी मद्धिम होने की शर्त पर भी इसे सहेजना मेरी पहली प्राथमिकता है..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Chandan Srivastava : स्नेहल वघेला के साथ हुए हादसे के बारे में जो मित्र न जानते हों उन्हें बता दूं. स्नेहल जिया न्यूज की पत्रकार थीं. स्नेहल वाघेला के पांव दफ्तर के काम से जाते हुए ट्रेन के सफर के दौरान दुर्घटनावश कट गए. लेकिन चैनल ने कोई सुध न ली. इस बारे में सोशल मीडिया में जब चैनल की फजीहत शुरू हुई तो चैनल का मैनेजमेंट सामने आया और दो टूक कह दिया कि स्नेहल उनके यहां कभी कोई पत्रकार थी ही नहीं. यह पहली बार नहीं. जिस दिन, जिस पल से पत्रकारिता में कदम रखा है, उस दिन से यही देखता आ रहा हूं कि किसी पत्रकार के साथ दुर्घटना हुई, खबर को लेकर विवाद हुआ या रुकी सेलरी का कोई मामला हुआ, संस्थानों का फटाक से बयान आता है, अमुक पत्रकार तो हमारे संस्थान में है ही नहीं.

मुजफ्फरनगर दंगे को कवर करते हुए राजेश मारे गए, क्या किया आईबीएन7 ने? उससे तो सरकारें भली जिन्होंने 2-4 लाख की मदद कर दी उनके परिवार को. ये बुरा दौर है पत्रकारों का, हर लिहाज से बहुत बुरा. Yashwant जैसे लोग जब इसी बुराई को सामने लाने लगते हैं तो जेल भिजवा दिए जाते हैं. इसलिए दोस्तों इस बुरे और घटिया दौर में आपको ही एक दूसरे का सहारा बनना है. विचार कीजिए कि फिलहाल हम स्नेहल के लिए क्या कर सकते हैं? Surendra Grover सर या यशवंत भाई को बताईये, कुछ ऐसा तरीका कि स्नेहल को संघर्ष का मजबूत सहारा मिल सके.

पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द-एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो-विज्ञापन के काम लाए जाते हैं

Vineet Kumar : जिया न्यूज की मीडियाकर्मी स्नेहल वाघेला के बारे में जानते हैं आप? 27 साल की स्नेहल अपने चैनल जिया न्यूज जिसकी पंचलाइन है- जर्नलिज्म इन एक्शन, के लिए अपने दोनों पैर गंवा चुकी है. पिछले दिनों जिया चैनल के लिए मेहसाना (अहमदाबाद) रेलवे स्टेशन पर रिपोर्टिंग करते हुए स्नेहल फिसलकर पटरियों पर गिर पड़ी और उनके दोनों पैर इस तरह से जख्मी हुए कि आखिर में काटने पड़ गए. अब वो चल-फिर नहीं सकती.

पैर की स्थिति से आप बाकी खुद भी अंदाजा लगा सकते हैं. पिछले चार महीने से वो घर पर है और इलाज में लाखों रुपये खर्च हो गए हैं. लेकिन चैनल ने इसमे अभी तक एक रुपये की मदद नहीं की. रेलवे तो टाल-मटोल करता ही आया है. आप कुछ मत कीजिए, जिया न्यूज की वेबसाइट पर जाइए. आप देखेंगे कि स्नेहल की तरह ही एक महिला पत्रकार जमीन पर लेटकर पीटीसी कर रही है. चारों तरफ का महौला ऐसा है कि कोई आतंकवादी घटनास्थल के बीच से की जा रही रिपोर्टिंग है. ब्लैक एंड व्हाइट इस तस्वीर पर बड़ी सी स्टिगर चिपकाई गई है जिस पर लिखा है- जर्नलिज्म इन एक्शन.

कहने की जरूरत नहीं कि मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द और एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो और विज्ञापन के काम लाए जाते हैं..असल में कहीं कुछ नहीं होता, उसके लिए भी नहीं जो इसे प्रोड्यूसर करता है. मैंने पहले भी कहा था, फिर दोहरा रहा हूं- मीडिया में सबसे गई गुजरी हालत है तो उन मीडियाकर्मियों की जो इस इन्डस्ट्री के लिए खबर जैसे प्रोडक्ट तो तैयार करते हैं लेकिन उनकी जिंदगी इनमे शामिल नहीं होती..स्नेहा की स्टोरी आपने कितने चैनलों पर देखी?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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