अब बिना मजीठिया वेतनमान के नहीं छप पाएंगे अखबार

सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री की फोटो नहीं तो प्रधानमंत्री की फोटो क्‍यों—-जरा विचार कीजिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के लिए अखबार मालिकों को कोई विशेषाधिकार मिला है क्‍या—- अखबार मालिक लगातार मजीठिया वेतनमान न देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर उसकी अवमानना कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को गिरा रहे हैं।- और हर ओर चुप्‍पी है—सन्‍नाटा है—-सिर्फ कर्मचारियों के जीवन में न ज्‍वार है न भाटा है।

अब समय आ गया है, सिर्फ हम बोलेंगे और जागरण सुनेगा !

(फेसबुक पर यह कथन कविता के फार्म में है लेकिन इसकी पठनीयता यहां पाठकीय दृष्टि से इस रूप में ज्यादा अभीष्ट लगी। इसलिए सीधे सीधे प्रस्तुत है)

दैनिक जागरण ने वेतन नहीं बढ़ाया- हम कुछ नहीं बोले। दैनिक जागरण ने फोर्स लीव पर भेजा-  हम कुछ नहीं बोले। दैनिक जागरण ने प्रताडि़त किया- हम कुछ नहीं बोले। दैनिक जागरण ने तबादला कर दिया- हम कुछ नहीं बोले। दैनिक जागरण ने हमला करा दिया- हम कुछ नहीं बोले। दैनिक जागरण ने मजीठिया वेतनमान नहीं दिया- हम कुछ नहीं बोले। सादे कागज पर हस्‍ताक्षर करा लिया- हम कुछ नहीं बोले।