राजस्थान में हफ्ते भर में चौथे किसान ने आत्महत्या की

भूकंप के बाद तबाह हुए नेपाल में भारत ने जो सक्रियता दिखाई है, वह तारीफ के काबिल है. लेकिन अगर अपने देश में देखें तो किसान खुदकुशी का मामला किसी तबाही से कम नहीं है. हर रोज जाने कितने किसान मर रहे हैं. लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें पूरी बेशर्मी से इन मौतों को नकार रही हैं. ये सरकारें साफ-साफ किसान विरोधी दिख रही हैं. जिस देश की आबादी की बहुत बड़ी संख्या खेती पर निर्भर हो, उस देश में जब खेती तबाह हो जाए और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर रहा हो तो इससे बड़ा संकट क्या होगा.

यह राष्ट्रीय संकट है. यह आपातकाल की स्थिति है. किसानों तक तुरंत राहत पहुंचाई जानी चाहिए. कर्ज माफ किया जाना चाहिए. लेकिन सरकारी तंत्र यानि नेता अफसर मीडिया सब इस कदर चुप्पी साधे हैं जैसे कुछ हो ही न रहा हो. सारा का सारा एजेंडा अब शहर केंद्रित हो गया है. देश की बहुत बड़ी आबादी मरने के लिए छोड़ दी गई है. यूपी हो या राजस्थान, महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश. हर जगह किसान तबाह है. आत्महत्याएं लगातार जारी हैं. जयपुर से खबर है कि राजस्थान में फसल खराबे के कारण सदमें में आए किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा है. रविवार को अजमेर की ब्यावर तहसील के फतेहगढ में एक और किसान महेन्द्र सिंह ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. राजस्थान में बीते सात दिन में यह किसी किसान की आत्महत्या का चौथा मामला है.

इसी सप्ताह दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी की रैली में गजेन्द्र सिंह के अलावा और भरतपुर व अलवर में एक-एक किसान की आत्महत्या की बात सामने आ चुकी है. महेन्द्र सिंह के पास छह बीघा जमीन थी और उसकी काफी फसल खराब हो गई थी. उसे उम्मीद थी कि सरकार कम से कम 40-50 प्रतिशत तक मुआवजा देगी, लेकिन गिरदावरी रिपोर्ट में उसका खराबा सिर्फ 30 प्रतिशत बताया गया. ऐसे में उसे मुआवजा मिलने की उम्मीद ही खत्म हो गई, क्‍योंकि 33 प्रतिशत से कम खराबे वालों को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है.

उसने पटवारी से मिलकर इसका विरोध भी किया था, लेकिन कोई फायदा नहीं निकला. गांववालों के अनुसार महेन्द्र सिंह पर कर्जा भी था और खराबे के कारण वह पूरी तरह बर्बादी के हालात में पहु्च गया था. रविवार को गांव में कोई धार्मिक उत्सव था. पूरा परिवार इस उत्सव में गया था, लेकिन धर्मेन्द्र घर पर ही रह गया था. इसी दौरान उसने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

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किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

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किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

Surya Pratap Singh : बाराबंकी में सत्ता की चौखट पर आशाराम ने फ़ासी लगाई. बैंकों और सूदखोरों के तगादे से त्रस्त किसान आशाराम ने शनिवार देर रात बाराबंकी में डीएम आवास के सामने पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी. रविवार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले लोगों व एडीएम पीपी पॉल ने पुलिस को सूचना दी. आशाराम ने डीएम के नाम संबोधित दो पेज के सूइसाइड नोट में सूदखोरों के दबाव की बात लिखने के साथ ही सीएम से अपने अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह भी किया है.

किसान के सुइसाइड नोट का कुछ अंश इस प्रकार है:  “कुछ पैसे मैंने विजय यादव से लिए थे, इस पर उन्होंने मेरी जमीन का इकरारनामा करवा लिया। यह पैसा सुरेश चन्द्र मिश्रा ने विजय को दे दिया है। सुरेश चन्द्र मिश्रा अब पैसा चाहते हैं। न दे पाने पर मुझे अपनी जमीन का बैनामा करना पड़ेगा। मैं अब जीना नहीं चाहता हूं।”

डीएम का गैर जिम्मेदाराना बयानः ”किसान आशाराम शराबी था।”

प्रश्न: यदि शराबी था तो कर्जदार मान कर आत्महत्या का आधार देकर शासन से मुआवजा क्यों माँगा?

प्रदेश की सच्चाई:

1. वर्तमान ओला ब्रष्टि से उ. प्र. में ३०० से ज्यादा किसानो की मौत हो चुकी है. अभी तक रु. 7 लाख प्रति किसान को दिए जाने के वादे के विरुद्ध एक भी किसान को मुआवजा नहीं.

2. वे कहते हैं कि किसी किसान ने ओला ब्रष्टि के नुकसान से आत्महत्या नहीं की. क्या उसे शौक था ऐसा करने का.

3. 89% किसान ऐसे हैं जो साहूकार, बैंक या अन्य संस्थायों के कर्ज से दबा है. राहत के कोई उपाय नहीं किये गए. बैंक और साहूकार का कर्जा माफ़ नहीं. केवल फसली ऋण ही defer किया गया.

4. रु. 4500 करोड़ के नुकसान के सापेक्ष, किसानों को मुआवजे के नाम पर ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ वह भी आधा अधूरा.

5. 75-80% आबादी रोजी रोटी के लिए खेती पर निर्भर है, ऐसी खेती का धंधा जो इतना जोखिम भरा है, छोटे किसानों को फसल बीमा सुरक्षा क्यों नहीं. जो भी बीमा सुरक्षा है वह केवल बड़े किसानों के लिए है, जिन्होंने KKC (किसान क्रेडिट कार्ड) बनवा रखा है.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.


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खराब फसल से परेशान किसान ने डीएम ऑफिस के बाहर लगाई फांसी

बाराबंकी : दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘आप’ की रैली के दौरान किसान गजेंद्र सिंह की मौत का मामला अभी शांत भी नहीं हो पाया था कि उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है। रविवार को सुबह बाराबंकी में डीएम आवास के सामने किसान का शव लटका मिला। इसके बाद यहां ‌हड़कंप मच गया।

 

रविवार को बाराबंकी में डीएम ऑफिस के सामने पेड़ से झूलता आसाराम का शव

बताया जा रहा है कि आसाराम नाम का ये किसान 34 साल का था। जिले के ये हैदरगढ़  दतौली चंदा गांव का निवासी बताया जा रहा है। इस किसान की जमीन भी बंधक थी। सूत्रों के अनुसार इस किसान की जमीन गिरवी रखी थी और उसके ऊपर काफी कर्ज भी था। बेमौसम बारिश के कारण उसकी फसल तबाह हो चुकी थी। 

रविवार सुबह वह डीएम ऑफिस के सामने सागौन के पेड़ पर चढ़ा और उसने अपने गमछे का फंदा बनाकर उससे फांसी लगा ली। सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले एक व्यक्ति ने इस शव के बारे में पुलिस को सूचना दी। उसके बाद किसान के शव को पेड़ पर से उतरवाया गया। लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।

डीएम योगेश्वर राम ने बताया कि आसाराम ने कुछ जमीन बेच दी थी और जो बची थी वह गिरवी रखी थी। फिलहाल प्रशासनिक अधिकारी इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दे रहे हैं।

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गजेंद्र की मौत : खुदकुशी कैसे?

दिल्ली के सीएम केजरीवाल का यह कहना है- ‘‘रैली बंद न करके भूल की।’’ और आशुतोष के पहले के कथन – ‘‘अब कभी होगा, तो केजरीवाल को पेड़ पर चढ़ने को कहेंगे।’’ इन दोनों में कतई अपराध बोध नहीं झलकता, बल्कि सियासत के पुट स्पष्टतः दिखाई देते हैं। 

वास्तव में यह घटना स्टंट को हकीकत में बदलने का षड्यंत्र प्रतीत होती है। लगभग संपन्न घराने का सामाजिक कार्यकर्ता खुदकुशी करने नहीं आया होगा। समझा जाता है कि मंच पर ‘‘पगड़ी विशेषज्ञ’’ के रूप में सम्मान पाने की महत्वाकांक्षा गजेन्द्र के उस कॉल से झलकती है, जिसमें उसने रैली शुरू होने से पहले अपने भाई से कहा था – ‘‘मैं मनीषजी के बुलावे पर दिल्ली में हूं, अभी टीवी पर देखना।’’ 

मंच पर न चढ़ने पर मनोभाव स्टंट का बना होगा और पेड़ पर चढ़ गया, ताकि मेजवान नेताओं की नजर में आ सके। इस बात का अनुमान ‘आप’ का सिम्बल झाड़ू लहराते हुए देर तक पेड़ की ऊपरी डाल पर स्टंट करता रहना था। फिर भी जब मंच ने आवाहन नहीं किया तो गमछे का फंदा डाला, दोनों बांहें उसी डाल को पकड़े रहीं, पैर को नीचे की डाल पर टिका लिए थे, फिर भी नेताओं की सियासी महत्वाकांक्षा से वह नहीं हारा, नारे लगाता रहा। 

दुर्भाग्य से नीचे वाली पतली डाल नारे लगाते जोशीले गजेन्द्र के भार को न सह सकी और टूट गई। डाल टूटते ही पैरों का सहारा छूटते ही वह लटक गया और इस तरह उसके प्राण पखेरू उड़ गये। फिर यह खुदकुशी कैसे हो सकती है? उसके परिजन और मिलने वाले लोग स्पष्ट कहते हैं कि वह आत्महत्या कर ही नहीं सकता। 

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किसान सुसाइड के बहाने न्यूज चैनलों की पड़ताल और भारत में खेती-किसानी का भविष्य

Ramprakash Anant : NDTV के पत्रकार ने अभी अभी तीन बातें रखीं कि मरने वाले किसान की सत्रह बीघा फसल बर्बाद हो गई है। रैली में आने से पहले उसने जिन रिश्तेदारों से बात की उससे यही पता चलता है कि वह अपने क्षेत्र के किसानों की स्थिति की ओर इस रैली का ध्यान आकर्षित करना चाहता था। गजेन्द्र के भाई भी आजकल पर यही बात कह रहे हैं। बीजेपी के सिद्धार्थ नाथ कह रहे हैं कि वह पीड़ित किसान नहीं था. वह आप का कार्यकर्ता था।

अंजना ओम कश्यप गहन जांच पड़ताल में जुटी हैं और वे दोष सिद्ध कर तुरंत केजरीवाल को जेल भिजवाने के मूड में हैं। जो बात गजेन्द्र के भाई ने कही है वही बात राम गोपाल यादव ने आज राज्य सभा में उठाई थी कि सरकार हजारों करोड़ का प्रीमियम बीमा कंपनियों को दे रही है और वे किसानों को मुआवजा नहीं दे रहीं हैं। देश का प्रधान मंत्री हेड मास्टर की तरह बोलता है- ”देश की जीडीपी बढ़ी, बोलो ये गरीब और किसान के लिए हुआ या नहीं। मुआवजा पचास परसेंट फसल खराब की जगह से कम कर तैतीस परसेंट फसल खराब पर कर दिया, यह किसान के हक़ में हुआ या नहीं।” अब कोई इन्हें क्या बताए कि तैंतीस क्या तीन परसेंट पर कर दो, जब मुआवजा देना ही नहीं है तो क्या फ़ायदा।

ABP, IBN7, इंडिया टीवी जी न्यूज़ का पीपली लाइव चालू है। सुमित अवस्थी को देख के लगता है कि उन्हें यह भी नहीं पता है किसान क्या होता है। वे आशुतोष के बड़े भाई हैं। आम आदमी के सांसद से पूछ रहे थे कि आपकी सरकार ने तीन लाख का एलान किया है क्या इतना काफी है? मुआवजा के पंद्रह-पंद्रह रूपए के चैक किसानों तक पहुँच रहे हैं और बाउंस हो रहे हैं। किसान रोज़ आत्महत्याएं कर रहे हैं। सरकारें इस बात को स्वीकार नहीं कर रही हैं। पिछले महीने भर चैनलों पर निगाह डाल के देखिए NDTV ने लगातार रिपोर्टिंग की है वरना कोई चैनल रिपोर्टिंग तक नहीं कर रहा है।
परसों के टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सम्पादकीय लिखा है ”टायर्ड पैंटोमिम” इस सम्पादकीय में राहुल गांधी के संसद में दिए भाषण की आलोचना करते हुए किसानों हालात की खिल्ली उड़ाते हुए केंद्र सरकार के मन की बात की है। अखबार ने लिखा है- ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित मुआवजा व पारदर्शी भूमि अधिग्रहण के लिए सुदृढ़ परिवर्तन किए हैं। संक्षेप में अखबार ने लिखा है कि किसान को स्थाई रूप से गरीबी पीड़ित मान लिया है, इस गरीबी से लाखों लोगों ने अपने आप को नए मध्यवर्ग के रूप में निकाला है और अभी भी 60 % किसान अनुत्पादित कृषि जो जीडीपी में महज 13.9 % योगदान देती है में फंसे हुए है।”

यही बात NDTV पर रविश से कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र ने कही थी कि विश्व बैंक की गाइडलाइन्स हैं कि भारी संख्या में कृषि से निकाल कर लोगों को उद्योग में लगाया जाए। मनमोहन सरकार उतनी तेज़ी से काम नहीं कर रही थी। मोदी ने आते ही बहुत फुर्ती से काम शुरू किया है। आने के तुरंत बाद उन्होंने श्रम कानूनों में बदलाव कर पूंजीपतियों के लिए उपयोगी बनाया। अब उनके मंत्री खुलेआम कह रहे हैं विकास के लिए ज़मीन की ज़रूरत तो पड़ेगी ही और वह किसानों से ली जाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए आने वाले समय में मोदी ऐसे हालात पैदा कर देंगे कि साठ प्रतिशत आबादी दो वक़्त की रोटी के लिए कारखाने में काम कर के विकास करने के लिए मज़बूर होंगे।

राम प्रकाश अनंत के फेसबुक वॉल से.

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शाबास टीवी चैनलों! पूरी बहस ‘आप’ बनाम पुलिस पर फोकस रखा, वसुंधरा और मोदीजी का नाम तक न आने दिया

Sandhya Navodita : मौत के मुक़दमे की घंटों लम्बी बहस में महारानी वसुंधरा, मोदीजी और कांग्रेस का नाम तक नहीं आ पाया. यह बड़ी उपलब्धि है. साँच को आँच नहीं आई. यह साबित हुआ कि केजरीवाल और उनकी पार्टी ही मौत के लिए ज़िम्मेदार है. थोड़ी देर में यह भी साबित किया जा सकता है कि देश में अब तक जो तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है उसके ज़िम्मेदार भी केजरीवाल हैं. यह बड़ी बात है टीवी चैनलों ने किसान की बदहाली के मुद्दे पर एक शब्द भी चर्चा न होने देने में सफलता हासिल की, और पूरी बहस में आप पार्टी और पुलिस के बीच ही मामला बनाये रखा. जिसे बाद में रेफरी भाजपा ने आकर हल किया. आप के मुजरिमों के बहुत रोने गाने के बाद भाजपा का दिल पसीजा. उन्होंने कहा कि वैसे तो ज़िम्मेदार केजरीवाल एंड पार्टी ही हैं पर अगर कोई पुलिस वाला भी दोषी पाया गया, जिसकी कोई संभावना नहीं है, तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा.

पुलिस जी, आप महान साबित हुए. क्योंकि यह मौत ऎसी रही जो आपके हाथ हिलाए बिना हो गयी. न आपने लाठी चलाई, न गोली चलाई. काश ऐसे ही लोग मारें तो आप की खाकी दागदार न हो. इतने बड़े मुद्दे का हल मीडिया और भाजपा ने संसद के बाहर ही निकाल लिया. अब बस केजरीवाल का इस्तीफ़ा हो जाए तो कम से कम आगे से किसान आत्महत्या नहीं करेंगे. मीडिया जी आप संत हैं जिसके सामने एक आदमी जान देता रहा और कैमरा पकडे हुए आपका हाथ ज़रा भी काँपा. आपकी पत्रकारिता की पढ़ाई कामयाब हुई. आपको तो नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए. और गजेन्द्र जी बैठे ठाले आपको छप्पर फाड़ टी आर पी दे गए.

और, हम सब भी महान साबित हुए. हमने भी गला फाड़ा कि वहाँ खड़े लोगों ने कुछ क्यों नहीं किया! जैसे हम और आप ही बस अलग मिटटी के हैं. हम तो वैसे तमाश बीन हैं ही नहीं जो एक्सीडेंट होते देख दो मिनट नज़ारा देख निकल लेते हैं. हम मौत का वो खेल न देखते , हम तालियाँ और सीटियाँ न बजाते. हम तो सीधे पेड़ पर चढ़ते और उसे उतार लाते. साबित यह भी हुआ कि किसान आत्महत्या में तभी दम है जब वो लाइव हुई हो, उसमे सत्ता और विपक्ष को भरपूर मसाला मिले. और हाँ, मीडिया को भी. जिसमे हमें और आपको भी लाइव एहसास हो.

हम सब तो वैसे भी मौत के वीडियो को बहुत पसंद करते हैं, वह शेर ने चिड़ियाघर में जब आदमी को मारा था, जब एक आदमी ने ट्रेन पर चढ़ कर बिजली का तार पकड़ लिया और भभक के जल गया, वह जो ट्रेन से कटा और धड़ अलग हो गया, वह सब तो हम फेसबुक पर भी खूब शेयर करते हैं. साबित यह भी हुआ कि बस अब और कोई आत्महत्या नहीं होगी, गो कि इसी के साथ आज एक और गजेन्द्र जाटव ने ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली. पर वह लाइव नहीं थी, दूसरी बात उससे किसी सरकार को गिराया नहीं जा सकता , अरे भाई समझा कीजिये वह अपनी ही सरकार है.

संध्या नवोदिता के फेसबुक वॉल से.

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इसी तरह गुजरात में ‘सीएम नरेंद्र मोदी’ को खत लिखकर एक और किसान ने की थी आत्महत्या

दौसा के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या पर सभी दल अब अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगे हैं लेकिन ऐसे कई गजेन्द्र गुजरात में भी हैं. गुजरात के जामनगर जिले के कल्य़ाणपुरा तालुका के छिजवड़ गांव के अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा  ने भी ठीक गजेन्द्र की ही तरह 4 अक्टूबर 2012 को नरेन्द्र मोदी के नाम पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी. उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 

उसी अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा का परिवार आज दाने-दाने को मोहताज है. उस गरीब किसान ने अपने पत्र में गुजराती भाषा में लिखा था कि 2005 से 2012 तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। उसके परिवार में छह सदस्य हैं। वह उनका भरण-पोषण कैसे करे? उसने मोदी को लिखा था कि आप गरीब कल्याण मेले पर बहुत खर्च करते हैं लेकिन किसानों पर नहीं? ताज्जुब की बात यह है कि उस समय विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात में कुछ किसानों को एक एक लाख की राशि बांटी लेकिन अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के परिवार को उसने भी कोई मुआवजा नहीं दिया. गुजरात के किसान भी आंदोलन के मूड में हैं। अपनी इस लड़ाई को लेकर अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए हैं और अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के पत्र को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी दलील के रुप में रखा है. उनकी यह लड़ाई भरतसिंह झाला के नेतृत्व में बनी ‘क्रांति’ नाम की गैरस्वैच्छिक संस्था लड़ रही है.

झाला कहते हैं कि नर्मदा नदी को मोदी ने नर्मदे सर्वदे कहा था लेकिन अब जहां नर्मदा नदी का पानी जा रहा है, वहां की जमीन लेने का जुगाड़ किया जा रहा है. क्योंकि किसानों के लिए छोटी केनाल तो बनी नहीं, इसीलिए किसान को बड़ी केनाल से पानी लेने के लिए हर रोज एक हजार का खर्च आता है. वे कहते हैं कि मुंद्रा पोर्ट और जामनगर की कृषि आधारित जमीन तो किसानों को जबरन मार-मारकर अंबानी और अडानी बंधुओं को दे दी गई. धोलेरा जहां स्मार्ट सिटी का मोदी का सपना है, वहां के बावलयारी गांव के लोग अपनी जमीन के लिए अब भी संघर्ष कर रहे हैं. 

विधानसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मोदी ने उद्योगपतियों को टैक्स में छूट देकर 4000 करोड़ का फायदा पहुंचाया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2005 में आई बाढ़ में गुजरात के19 जिलों में 35 लाख किसानों की जमीन बंजर हो गई. उस समय पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने 189 करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन 35 लाख के सामने मात्र 2 लाख किसानों को ही मुआवजा मिला, वो भी गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर दिया गया. लेकिन वह भी एक हेक्टर पर किसी को बीज की स्थिति पर 250 रु का मुआवजा और बंजर जमीन होने पर किसी किसान को 2000रु. का मुआवजा दिया गया. 

2012 में अकाल जैसी स्थिति आई, जिसमें जून 2012 से अक्टूबर में 52 किसानों ने आत्महत्या कर ली. लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुल मिलाकर अब तक गुजरात में 6055 किसान आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन सरकार इन किसानों को दुर्घटना या बीमारी मानकर पल्ला झाड़ रही है लेकिन सरकार की यह पालिसी है कि दुर्घटना में किसान को एक लाख का मुआवजा दिया जाता है लेकिन सरकार ने अभी मात्र 2000 किसानों को ही मुआवजा दिया है, सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि तो क्या 4055 किसानों ने आत्महत्या की? गुजरात विधानसभा में बताया गया है कि 2013 से 2018 में गुजरात में 89 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. झाला का कहना है कि अभी जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जा रहा. वे कहते हैं कि 2007 में सोनिया गांधी से मिले थे लेकिन उन्होंने भी मात्र आश्वासन ही दिए. 

लेखिका उषा चांदना से संपर्क 09327012338 या ushachandna55@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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देखिये एक मोदी समर्थक इस किसान की मौत को कैसे विश्लेषित करता है…

Ajit Singh : मैं हमेशा से ये लिखता कहता आया हूँ कि ये जो किसान के नाम पे फ़र्ज़ी आत्महत्या दिखाई जा रही है और ये जो फ़र्ज़ी किसान दिखाए जा रहे हैं ये फर्जीवाड़ा बंद होना चाहिए। आज तक जितनी भी किसान आत्म ह्त्या हुई हैं उनकी वृहद् जांच होनी चाहिए। उससे पता चलेगा कि कितनी ही natural deaths को किसान द्वारा आत्म ह्त्या बता दिया जाता है। न जाने कितने लोग depression के मरीज हो के और बाकी अन्य निजी कारणों से आत्मह्त्या करते हैं। उन्हें किसान द्वारा आत्महत्या नहीं माना जा सकता। मैं हमेशा कहता हूँ की प्रत्येक किसान आत्महत्या को कायदे से study कर एक श्वेत पत्र लाया जाए जिस से समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके।

आज AAP की रैली में गजेन्द्र नामक जिस सिरफिरे ने आपिया नौटंकी और publicity stunt करते करते जान दे दी वो AAP के लिए भारी मुसीबत बन गयी है। किसानों की समस्याओं को समझे बूझे बिना सिर्फ राजनातिक stunt करने के लिए जो रैली की जाती है उसकी परिणीति ऐसे होगी किसी ने कल्पना न की होगी। राजनैतिक रैलियों में इस प्रकार के पब्लिसिटी के भूखे लोग रैली स्थल पे नाटक करते रहते हैं। ऐसा ही कोई नौटंकीबाज सिरफिरा लटक गया।

कम से कम अब इसकी वृहद् जांच ज़रूर हो जायेगी की वो कौन था? कितनी किसानी करता था? कितनी फसल बर्बाद हुई उसकी जो उसने ऐसा Live show करते हुए ख़ुदकुशी कर ली? उसका अगला पिछ्ला रिकॉर्ड भी खंगाल लो कि किसान भाई क्या करते थे और आपिया नौटंकी मण्डली में कब से शामिल थे। इस घटना ने ये पोल भी खोल दी है कि भारतीय राजनीति राष्ट्रीय समस्याओं को ले के कितनी संवेदनशील है और उनका हल खोजने के लिए कितने गंभीर प्रयास कर रही है। एक बेवक़ूफ़ नौटंकी बाज मूर्ख ने आपिया नौटंकी के चक्कर में जान दे दी।

अजित सिंह यूपी के गाजीपुर जिले के निवासी हैं और घनघोर मोदी भक्त हैं. ‘उदयन’ नाम एनजीओ का संचालन करते हैं.

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गजेन्द्र चुनाव लड़ चुका था, सैकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था, आत्महत्या की कोई वजह नहीं थी…

दिनेशराय द्विवेदी : मेरे ही प्रान्त राजस्थान के एक किसान ने आज दिल्ली में अपनी जान दे दी, तब आआपा की रैली चल रही थी। उस के पास मिले पर्चे से जिसे हर कोई सुसाइड नोट कह रहा है वह सुसाइड नोट नहीं लगता। उस में वह अपनी व्यथा कहता है, लेकिन उस नें घर वापसी का रास्ता पूछ रहा है। जो घर वापस लौटना चाहता है वह सुसाइड क्यों करेगा? जिस तरह के चित्र मीडिया में आए हैं उस से तो लगता है कि वह सिर्फ ध्यानाकर्षण का प्रयत्न कर रहा था। उस ने हाथों से पैर से भी कोशिश की कि वह बच जाए। पर शायद दांव उल्टा पड़ गया था। वह अपनीा कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। हो सकता है उसे उम्मीद रही हो कि इतनी भीड़ में उसे बचा लिया जाएगा। पर उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

यह शख्स गजेन्द्र सिंह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक विधानसभा चुनाव लड़ चुका था। सैंकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था। कोई वजह नहीं थी कि वह आत्महत्या करे। उसके पास समस्याएँ थीं। उस की फसल नष्ट हो चुकी थी। मुआवजे की बातें खूब हो रही हैं, घोषणाएँ भी हो रही हैं। कागजों पर मदद भी दिखने लगेगी। लेकिन लोगों को विश्वास नहीं कि उन्हें मदद मिलेगी, जो मिलेगी वह पर्याप्त होगी। जनता में यह अविश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता।

उसे घर से निकाल दिया गया था। कोई पारिवारिक विवाद था। हो सकता है वह जमीन से संबंधित हो या हो सकता है वह परिवार से संबंधित हो. हमारी राजनीति इस मामले में बहुत सुविधाजनक है। चन्द अदालतें खोल कर इन सब समस्याओं का रुख उधर कर देती हैं। उसे इस से कोई मतलब नहीं कि पारिवारिक विवाद अदालत से बरसों नहीं सुलझ रहे हैं। जमीन के विवाद तो पीढ़ियों तक नहीं सुलझते। कृषि भूमि विवादों के मामले में तो अदालत के चपरासी से ले कर हाकिम तक मुहँ फाड़ता हुआ दिखाई देता है।

आखिर राजनीति कब समझेगी कि इन विवादों को न्यूनतम समय में सुलझाने की जिम्मेदारी उसी की है। पर्याप्त और सक्षम अदालतें स्थापित करने का काम भी उसी के जिम्मे है। यह दीगर बात है कि अभी अधिकांश लोग यह नहीं समझते। लेकिन कब तक? कब तक नहीं समझेंगे। राजनीति को समझ जाना चाहिए कि अब वह वक्त आ गया है जब चीजें तेजी से जनता की समझ आने लगी हैं। यदि वे नहीं समझेंगे तो जनता उन्हें समझा देगी।

दिनेश राय द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

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‘आप’ की प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी गजेंद्र का पेड़ पर चढ़ना और फंदे से लटकना!

Abhai Srivastava : गजेंद्र की चिट्ठी की आख़िरी लाइन, ‘कोई मुझे बताओ, मैं घर कैसे जाऊंगा?’ जाहिर है कि ये सुसाइड नोट नहीं। मीडिया क्लिप में साफ सुनाई पड़ रहा है कि जब कुमार विश्वास भाषण दे रहा था तब आवाज़ आई, ‘लटक गया’, फिर विश्वास हाथ के इशारे जैसे कह रहा है कि ‘लटक गया है, स्क्रिप्ट के अनुसार नाटक पूरा हुआ’.  भाइयों AAP ने एक व्यक्ति की हत्या की है। ये भी ध्यान देने की बात है कि गजेंद्र के घर में 2 भतीजियों की आज शादी है, इसका मतलब उसके घर में ऐसा आर्थिक संकट नहीं जैसा प्रोजेक्ट हुआ है। भाई, ये बहुत बड़ी साज़िश है।

Deepak Sharma : केजरीवाल के ग्रह ठीक नही लग रहे. जिस दिल्ली पुलिस को महामहिम कोस रहे थे उस दिल्ली पुलिस के पास ही अब किसान आत्महत्या की जांच है. पुलिस लाइव घटना के सारे विडियो और उस वक़्त मंच पर बैठे नेताओं के द्वारा कारवाई का पूरा ब्यौरा इकठा कर रही है. कुछ पुलिसवालों पर विभागीय कारवाई के बाद पुलिस अब आप के नेताओं से पूछताछ करेगी.

Dr Praveen Tiwari : अभी किसान आत्महत्या पर बहस में आप के राघव चढ्ढा भी थे। क्यूंकि मैं अपनी वॉल को बहुत साफ सुथरा रखता हूं इसीलिए बहुत माफी के साथ कहना चाहूंगा कि अच्छा वक्ता होने के बावजूद आज वो आशूतोष, कुमार विश्वास और संजय सिंह के ‘हगे’ को समेट नहीं पाए। छी छी… धिक्कार है .. सब पर जो भी वहां मौजूद था और जो भी इस पर सियासत कर रहा है। चाहे पुलिस हो, चाहे मीडिया.. पर आप तो सबकी बाप निकली इस नंगई में.. भाईसाब कोई राजनैतिक दल के समर्थक कृपया इस बहस में मुझसे यहां मत उलझिएगा आपके पापा लोगों की औकात देख ली है थोड़ी देर पहले….

Vivek Singh : मुझे पता था कि बेशर्मी का ये काम आम आदमी पार्टी संजय सिंह से ही करवाएगी। आखिर इतनी मोटी बुद्धि और किसी की हो भी नहीं सकती है। किसान के फांसी पर लटकने के बावजूद रैली चलने के सवाल पर संजय सिंह बयान दे रहे हैं क‌ि याद करिए पटना की रैली में बम ब्लास्ट हो रहा था और नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे। मतलब क‌ि आप को दूसरी भाजपा और कांग्रेस बनने के ल‌िए ही राजनीति में आए हैं। कुछ तो शर्म करो, अब आप उन्हीं का उदाहरण दोगे।

पत्रकार अभय श्रीवास्तव, दीपक शर्मा, डा. प्रवीण तिवारी और विवेक सिंह के फेसबुक वॉल से.

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गजेन्द्र चुनाव लड़ चुका था, सैकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था, आत्महत्या की कोई वजह न थी…

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आशुतोष जैसा एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है!

Vishwa Deepak : गजेन्द्र नामक ‘किसान’ की आत्महत्या के बारे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं- ”यह अरविंद केजरीवाल की गलती है. उन्हें मंच से उतर जाना चाहिए था.उन्होंने गलती की. अगली बार मैं केजरीवाल को कहूंगा कि वो मंच से उतर पेड़ पर चढ़ें और लोगों को बचाएं.”

एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है. पत्रकार के रूप में इनका क्लेम टू फेम रहा है कांशीराम का थप्पड़. और…? अगर टीवी नहीं होता या हमारे समाज की मीडिया अंडरस्टैंडिंग ज्यादा होती तब? जैसे 1920-30-40 के बीच पैदा होने वाले अपने आप स्वाधीनता संग्राम सेनानी बन गए, वैसे ही बहत से लोग हिंदी पत्रकारता के ‘सेनानी’ हैं. कई बार घिन आती है अपने पेशे से जिसे बहुत सारे लोगों ने बहुत कुछ छोड़ कर के चुना था.

Satish Tyagi : Can not write in Hindi due to net problem but its urgent.—many years ago ashutosh was slapped by kanshiram ji. today ashutosh crossed all the limits. had he uttered such words in my presence I would have certainly slapped him. How come such an insensitive guy survived in media for so long. Chullu bhar pani men doob maro ashutosh.

विश्व दीपक और सतीश त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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Live खुदकुशी फिल्माते मीडियाकर्मी, स्टेज पर खड़ा अहंकारी मुख्यमंत्री, पुलिस से गुहार लगाते शातिर नेता, अविचल मुस्काते पुलिसवाले…

Nadim S. Akhter : फिल्म ‘पीपली लाइव’ Anusha Rizvi ने बनाई थी और आज देश की राजधानी दिल्ली में ‘पीपली लाइव’ साकार हो कर जी उठा. सब कुछ वैसा ही. वही खुदकुशी की सनसनी, गर्म तवे पर रोटी सेंकने को आतुर मीडिया-नेता-प्रशासन की हड़बड़ी और दर्शकों-तमाशाइयों का वैसा ही मेला, वही हुजूम. सब कुछ जैसे एक लिखी स्क्रिप्ट की तरह आंखों के सामने होता रहा. एक पल को तो समझ ही नहीं आया कि मनगढंत फिल्म पीपली लाइव देख रहा हूं या फिर हकीकत में ऐसा कुछ हमारे देश की राजधानी दिल्ली के दिल यानी जंतर-मंतर पर हो रहा है !!!

दिल्ली के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गणमान्य नेताओं-सज्जनों, पुलिस, मीडिया, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता के सामने एक निरीह जीवन से मायूस युवा किसान अपना गमछा बांध पेड़ से लटक जाता है, खुदकुशी कर लेता है और सब के सब तमाशबीन बने देखते रहते हैं. मीडियाकर्मी और उनके कैमरे उस वीभत्स नजारे को फिल्माने में व्यस्त रहते हैं, मुख्यमंत्री स्टेज पर खड़े होकर पुलिस से ‘बचा लो-बचा लो’ की गुहार लगाते रहते हैं, वहां मौजूद पुलिस के कुछ अफसर-जवान के चेहरों पर मुस्कान तैरती रहती है, पार्टी के कार्यकर्ता हो-हो करके चिल्लाते रहते हैं और बेचारा पेड़ पर चढ़ा किसान हताश और कातर निगाहों से उन सबको तकता रहता है. एक पल को उसने जरूर सोचा होगा कि कोई तो जल्दी से पेड़ पर चढ़ कर उसे रोकने आएगा, उसे मनाएगा, उसे डांटेगा. चलो कोई ऊपर नहीं आएगा तो नीचे से ही सही, कुछ लोग हाथ जोड़कर कहेंगे कि ऐसा मत करो, रुक जाओ….अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है…

…लेकिन कोई नहीं आया. नीचे गर्द-गुबार के बीच इंसानों के जिस्म सरीखे रोबोट टहल रहे थे, जो सिर्फ अपने पूर्वनिर्धारित काम को अंजाम देना चाहते थे. ऐसी किसी अप्रत्याशित घटना के लिए वे रोबोट तैयार नहीं थे. पेड़ पर चढ़ा किसान जल्द ही ये बात समझ गया कि नीचे इंसानों की नहीं, रोटी-बोटी नोचकर खाने वाले होमोसेपियन्स की भीड़ लहलहा रही है, जिनके सामने उसके लहु का मोल उसका अनाज उपजाने वाली मिट्टी के बराबर भी नहीं. यही सब देखता और उधेड़बुन में पड़ा वो थका-हारा-मायूस किसान आखिरकार पेड़ से लटक गया. लेकिन इस दफा उसके गमछे और उसकी धरती मां के बीच काम कर रहा गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा मजबूत साबित हुआ. इधर उसने दम तोड़ा और उधर मीडिया से लेकर नेताओं का खुला खेल चालू हो गया.

पहले बात दूध से धुली मीडिया की. मुझे नहीं पता कि जिस पेड़ पर किसान जान देने के लिए चढ़ा था, उससे मीडियाकर्मी कितने दूर थे. लेकिन अगर वह जान देने की धमकी दे रहा था तो मेरा अंदाजा है कि मीडिया के कैमरे उसे कैप्चर करने की कोशिश में नजदीक जरूर गए होंगे. ऐसे में यह सोचकर दुख और पीड़ा होती है कि इतने सारे मीडियाकर्मियों में से कोई भी इंसानियत के नाते ही सही, उसे बचाने, उसे रोकने आगे नहीं आया.

टीवी पर जो तस्वीरें देख रहा था, उनमें राममनोहर लोहिया अस्पताल के बाहर एबीपी न्यूज का कोई पराशर नामक नया-नवेला संवाददाता लोगों से बात कर रहा था कि गजेंद्र नामक उस किसान की हालत अभी कैसी है. वहां मौजूद लोगों में से शायद एक किसान का जानने वाला था. उसने रुआंसा होकर कहना शुरु किया कि साहब, वो मर गया है. इसके लिए दिल्ली की मीडिया, दिल्ली के नेता और दिल्ली की पुलिस को हम जिम्मेदार मानते हैं. कोई उसे बचाने नहीं आया…..इससे आगे वह कुछ बोल पाता लेकिन तेजतर्रार और मोटी चमड़ी का वह रिपोर्टर तुरंत वहां से अपनी गनमाइक हटा लेता है, उसे दूर कर देता है, माइक अपने थोेबड़े के अपने नथुने के सामने ले आता है और फिर ज्ञान देते लगता है…देखिए, यहां किसान को भर्ती कराया गया है, उसकी हालत नाजुक है. वह बड़ी सफाई से ये छुपाने की कोशिश करता है कि वहां मौजूद लोग नेता और पुलिस के साथ-साथ मीडिया को भी गाली दे रहे हैं. उसको लानत भेज रहे हैं. कैमरे पर सब दिख जाता है लेकिन चालाक रिपोर्टर बड़ी धूर्तता से कहानी का एंगल चेंज करता हैं. वह और उसका चैनल सिर्फ यही सवाल पूछता रहता है कि खुदकुशी के बाद भी केजरीवाल ने रैली क्यों जारी रखी. इस बात का जवाब वे नहीं देना चाहते कि मीडिया वालों में से कोई उस गरीब किसान को बचाने आगे क्यों नहीं आया??!!!

अब बात जरा राजनेताओं की. किसान की खुदकुशी के बाद करीब डेढ़ घंटे तक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की रैली चलती रही. अरविंद, मनीष, विश्वास, सबने भाषण दिया. मोदी पर जुबानी हमले हुए. और जब -गुप्तचरों- ने ये बताया कि किसान मर चुका है (ऐसा मेरा अंदाजा है) तभी केजरीवाल एंड कम्पनी उसे देखने की रस्मअदायगी करने अस्पताल पहुंचे.
लेकिन यह क्या!! कांग्रेस नेता और राहुल गांधी के हनुमान, अजय माकन तो केजरीवाल से भी पहले किसान को देखने अस्पताल पहुंच चुके हैं. कह रहे हैं कि राजनीति नहीं करनी मुझे, बहुत दुखी हूं लेकिन कर वही सब रहे हैं, जो राजनीति को शोभा देता है. कुछ ही देर में आकाधिराज राहुल गांधी भी अप्रताशित रूप से किसान को देखने अस्पताल पहुंच जाते हैं. मीडिया से बात करते हैं, बोलने को उनके पास कुछ नहीं है, लड़खड़ाते हैं और फिर संभलकर बहुत ही बचकानी बात कह जाते हैं. किसान की लाश पर राजनीति करने की कोशिश करते राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस और इसका कार्यकर्ता हरसंभव मदद करेगा मृतक की. जरूरत पड़ी तो हम लाश को पहुंचाने का भी बंदोबस्त कर देंगे.

जरा सोचिए. देश का भावी सरताज इसी बात से गदगद हुआ जा रहा है कि लाश को उसके घरवालों तक पहुंचवा देंगे. कितना महान और धार्मिक कार्य किया आपने राहुल गांधी जी. मुझे इंतजार रहेगा कि आप देश के प्रधानमंत्री कब बनते हैं !! लगता है कि इस देश की अभी और दुर्दशा होनी बाकी है !!! उधर सचिन पायलट भी कैमरे के सामने किसान की मौत पर दुख जताने लगते हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह मामले की जांच के आदेश दे देते हैं. अभी और नेताओं के बयान आने हैं, आ रहे होंगे. और सब के सब वही करेंगे. किसान की लाश पर राजनीति.

तीसरी और आखिरी बात दिल्ली पुलिस की. उसके बारे में क्या कहना. मुशी प्रेमचंद ने तो बरसों पहले लिख दिया था—नमक का दारोगा- . यानी ये जो खाकी वर्दी है, वह आपको इस संप्रभु गणराज्य में शरीर पर सितारे लगाकर बिना जवाबदेही के बहुत कुछ करने की आजादी देता है. कानून के रखवालों के सामने कानून का बलात्कार हुआ और वे मूकदर्शक बने देखते रहे. अब मंत्री जी जांच कराएंगे तो पता चलेगा कि कहां और किसने गलती की!! मतलब विभाग के कबाड़खाने की शोभा बढ़ाने एक और फाइल जाएगी. जांच चलती रहेगी, तब तक मामला ठंडा हो जाएगा. फिर कौन पूछता है कि कब-क्या हुआ??!! चलने दीजिए, ये देश ऐसे ही चलता है.

फिलहाल तो पीपली लाइव के इस असली खूनी खेल में मीडिया के दोनों हाथ में लड़डू हैं और सिर कड़ाही में. आज रात देखिएगा, कैसे-कैसे शो बनेंगे. मोदी भक्त टीवी चैनल किसान की खुदकुशी के बहाने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाएंगे कि बताइए, वहां किसान मर रहा था और ये हैं कि रैली चला रहे थे.!!! उन्हें किसी के जान की परवाह नहीं थी…वगैरह-वगैरह.

ऐसे कूढ़मगजों, हड़़ी चाटने वालों और अक्ल के दुश्मन मीडिया वालों से मेरा भी एक सवाल रहेगा. याद कीजिए लोकसभा चुनाव से पहले बिहार के गांधी मैदान में बीजेपी की एक विशाल रैली थी. तभी वहां बम धमाके होते हैं. रैली में भगदड़ मच जाती है. टीवी पर बम धमाके के दृश्य दिखाए जा रहे हैं. किसी को नहीं मालूम कि किस पल और कहां अगला धमाका हो सकता है. हजारों-लाखों लोगों की जान को खतरा है लेकिन अलग चाल-चरित्र और चेहरे का दावा करने वाली पार्टी बीजेपी और इसके नेता रैली में आए लोगों की जान की परवाह किए बिना रैली को जारी रखते हैं. अरविंद केजरीवाल की ही तरह वे भी रैली खत्म करके, भाषणबाजी पूरी करके ही दम लेते हैं. उस रैली को बीजेपी के नरेंद्र मोदी सम्बोधित करते हैं और संवेदनहीनता की हद तो ये हो जाती है कि बम धमाकों के बाद अपने भाषण में वे इन धमाकों के जिक्र भी नहीं करते !! बाद में पूछने पर बीजेपी के नेता ये कुतर्क देते हैं कि बम धमाके हों या कुछ भी हो जाए, हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे. अरे भैया, आतंकवाद के सामने मत झुकिए लेकिन अपनी रैली को सफल बनाने के लिए हजारों मासूमों की जान को बम धमाकों के हवाले तो मत कीजिए.

मुझे याद है. तब किसी मीडिया चैनल ने बीजेपी और उसके नेताओं पर ये सवाल नहीं उठाया कि बम धमाकों के बीच उन्होंने अपनी रैली क्यो जारी रखी??!! आज जो सवाल उठा रहे हैं कि किसान की जान से बढ़कर रैली थी, वो उस वक्त क्यों चुप थे??!! इसका कोई जवाब है उनके पास???

मित्तरों-दोस्तों !!! मतलब साफ है. किसान की खुदकुशी और मौत तो बस बहाना है. मीडिया हो, राजनेता हो या फिर प्रशासन. सबके अपने-अपने एजेंडे हैं, अपने-अपने स्वार्थ हैं और अपना-अपना खेमा है. सो सब के सब उसी के मुताबिक बर्ताव कर रहे हैं. और करते रहेंगे. किसानों की फिक्र किसे हैं.?? ईमानदारी से कहूं तो किसी को नहीं.

लेकिन एक बात जान लीजिएगा शासकों !!! जिस भी दिन जनता के सब्र का बांध टूटा तो वह सबको सड़क पर लाकर अपना हिसाब बराबर कर लेगी. इतिहास उठाकर देखने की जरूरत नहीं है, नजर घुमाकर देख लीजिए कि दुनिया के किन-किन देशों में सताई जनता ने क्या-क्या किया.

खबर का ये लिंक प्रधानसेवक, बीजेपी के अंधभक्तों और मीडिया के उस धड़े के लिए जो selective होकर सवाल उठाते हैं. देखिए, पढ़िए और जानिए कि जब पटना के गांधी मैदान में तत्कालीन गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी की रैली थी, वहां धमाके हुए तब बीजेपी और नरेंद्र भाई मोदी ने क्या किया. किस तरह सबकुछ ताक पर रखके उन्होंने रैली जारी रखी. http://www.theguardian.com/world/2013/oct/27/india-bomb-blasts-bjp-rally-patna

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेज-तर्रार पत्रकार हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं.


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किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता…

Panini Anand : यह नीरो की राजधानी है. एक नहीं, कई नीरो. सबके सब साक्षी हैं, देख रहे हैं, सबके घरों में पुलाव पक रहा है. सत्ता की महक में मौत कहाँ दिखती है. पर मरता हर कोई है. नीरो भी मरा था, ये भूलना नहीं चाहिए.

खून रोती आंखों वाली माँ,
बेवा, बच्चे और खेत,
सबके सब तड़पकर जान दे देंगे
फिर भी नहीं बदलेगी नीयत
इन भूखी आदमखोर नीतियों के दौर में
कैसे बचेगा कोई,
किसान
जब नियति का फैसला
बाज़ार के सेठ को गिरवी दे दिया गया हो
और चाय बेचनेवाले की सरकार
ज़हर और फंदे बेचने लगे

मौत किसे नहीं आती
कौन बचा है
पर कोई सोचता है,
कि मौत के सिवाय अब कोई रास्ता नहीं
और कोई सोचता है
वो मरेगा नहीं.
लोगों को लगातार मार रहे लोग
अपने को अमर क्यों समझते हैं
अपने मरने से पहले
दूसरों को मारना
बार-बार मारना
लगातार मारना
मरने पर मजबूर करना
किसी की उम्र नहीं बढ़ाता
न ही खेतों में सहवास से,
अच्छी होती है फसल
न गंगा नहाने से,
धुलते हैं पाप
न जीतने से,
सही साबित होता है युद्ध

हत्यारा सिर्फ हत्यारा होता है
भेष बदलने से
वो नीला सियार लग सकता है
साहूकार लग सकता है
कलाकार लग सकता है
बार-बार ऐसा सब लग सकता है
लेकिन हत्यारा, हत्यारा होता है
चाहे किसान का हो,
किसी मरीज़ का,
किसी ग़रीब का,
किसी हुनर का, पहचान का
कृति का, प्रकृति का
हत्या किसी को नहीं देती यौवन
न शांति, न अभ्युदय
मौत फिर भी आती है
मरना फिर भी होता है

खौलकर उठती मरोड़,
सूखती जीभ, बंधे गले,
और रह-रहकर चौंकते हाथों में
जो विचार
अंतिम अरदास हैं
वो चाहते हैं
कि
भाप हो जाएं
ऐसे नायक, सेवक
प्रतिनिधि
जिनके रहते आत्महत्या करे अन्नदाता
शीशे की तरह टूटकर बिखर जाएं
ऐसी आंखें
जो देखती रहीं मौत को लाइव
सूख जाएं दरख्त
कागज़ों की तरह फट जाएं राजधानी की वे सड़कें
जहाँ मरने के लिए मजबूर होकर आए एक किसान
किसान मरा करे,
देश तमाशा देखता रहे,
ऐसे लाक्षागृह की सत्ता
लहू के प्यासी नीतियां
और लड़खड़ाते गणतंत्र में
आग लगे.
मुर्दा हो चुकी कौमें
हत्यारी सरकारें
और देवालयों के ईष्ट
सबका क्षय हो.
प्रलय हो.

हा रे
हा

पाणिनि आनंद
22 अप्रैल, 2015. नई दिल्ली (एक किसान की राजधानी में आत्महत्या की साक्षी तारीख)

पाणिनी आनंद कवि, एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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किसान की खुदकुशी और बाजारू मीडिया : कब तक जनता को भ्रमित करते रहोगे टीआरपीखोर चोट्टों….

(भड़ास के संपादक यशवंत सिंह)


उदात्त दिल दिमाग से सोचिए. इस एक किसान की खुदकुशी का मामला हो या हजारों किसानों के जान देने का… सिलसिला पुराना है… महाकरप्ट कांग्रेस से लेकर महापूंजीवादी भाजपा तक के हाथ खून से रंगे हैं…. अहंकारी केजरीवाल से लेकर बकबकिया कम्युनिस्ट तक इस खेल में शामिल हैं. कारपोरेट-करप्ट मीडिया से लेकर एलीट ब्यूरोक्रेशी और विकारों से ग्रस्त जुडिशिरी तक इस सिस्टमेटिक जनविरोधी किसानविरोधी खेल में खुले या छिपे तौर पर शामिल है… ताजा मामला दिल्ली में संसद के नजदीक जंतर मंतर पर केजरीवाल के सामने हुआ इसलिए सारी बंदूकें केजरीवाल की तरफ तनवा दी गई हैं क्योंकि इससे देश भर में किसानों को मरने देते रहने के लिए फौरी तौर पर जिम्मेदार महापूंजीवादी भाजपा, महाकारपोरेट परस्त मोदी और लुटेरी भाजपा-कांग्रेस समेत अन्य जातिवादी करप्ट क्षेत्रीय राज्य सरकारों के मुखियाओं के बच निकलने का सेफ पैसेज क्रिएट हो जाता है और भावुक जनता मीडिया के क्रिएट तमाशे में उलझ कर ‘आप’ ज्यादा दोषी या दिल्ली पुलिस ज्यादा दोषी के चक्कर में फंस कर रह जाती है.

साथियों अब चीजों को तात्कालिक नजरिए से देखने का समय नहीं है. अति भावुकता से दूर होने का वक्त है. ठंढे दिमाग से सोचने और आगे बढ़ने का समय है. केजरीवाल की असलयित तो उसी समय सामने आ गई जब इसने पार्टी में सेकेंड थॉट रखने वालों को लतिया कर बाहर निकाल दिया. अब यह विशुद्ध और बेशरम राजनेता है. इसी थेथर नेतागिरी वाले अहंकार के कारण इस केजरीवाल ने अपने वालंटियर के लाइव खुदकुशी को देखने के बावजूद मंच से नीचे नहीं आया और न ही सभा को समाप्त किया. पर केजरीवाल बहुत छोटा प्यादा-मोहरा है. ज्यादा मोटी चमड़ी वाले बड़े डकैत और थेथर राजनेता तो केंद्र और दूसरे राज्यों की सरकारें चला रहे हैं. ये बड़े डकैत ही मीडिया को पोषित संरक्षित करते हैं. ये बड़े डकैत ही कारपोरेट के असली दोस्त हैं. कारपोरेट और बड़े डकैत नेताओं की जोड़ी कारपोरेट-करप्ट मीडिया के कोरस को तय करता है. आज देखिए कैसे कोरस तय हो गया. सारे चैनल एक सिरे से केजरी विरोधी गान गाने में जुटे हैं.

अरे भाई, केजरिया तो हो ही गया है चूतिया. इसने अब अपने संजय सिंह, आशुतोष, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास जैसे दर्जनों यसमैन पाल रखे हैं इसलिए अब केजरिया का तो कचूमर निकलेगा ही. केजरिया से कोई कह दे कि अबकी वह संजय सिंह को पार्टी से बाहर करे क्योंकि किसानों का संसद मार्च करने का आइडिया इसी संजय सिंह ने दिया था जिसके कारण हुई सभा में किसान ने लाइव खुदकुशी कर ली और चारों ओर से केजरी को गाली पड़ रही है. कुछ ऐसे ही तर्क देकर तो इसने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को निकाला कि इन लोगों ने लोकसभा चुनाव लड़ने को कह दिया और लड़ने के कारण पार्टी हार गई. खैर, मुद्दे पर आते हैं. केजरी को भारी बहुमत से जीत के कारण गजब का अहंकार हो गया है और ये अहंकार ही इसे ले डूबेगा, देखिएगा. शुरुआत योगेंद्र प्रशांत के निकाले जाने से हो चुकी है. ये किसान आत्महत्या कांड इसी सिलसिले की एक और कड़ी है. अगर आम आदमी पार्टी के मंच पर कोई मौलिक तरीके से सोचने वाला होता तो वह अपनी पहल पर नीम के पड़ की तरफ जाकर उस किसान को नीचे उतरवाता और उसे मंच की तरफ लाकर बिठाता. पर अब जब सब केजरी का चेहरा देखकर यसमैनी करने पर उतारू हैं तो केजरी बेचारा क्या क्या करे. वह पेड़ से दुखी किसान उतरवाए या दिल्ली सरकार चलाए या लात मार कर निकालने के लिए पार्टी के विरोधियों की गिनती में दिमाग लगाए.

तो कह रहा था कि राजनीति के बड़े डकैत जो कारपोरेट के यार होते हैं, मिलकर मीडिया का कोरस तय करते हैं क्योंकि इन डकैतों का खुले या छिपे तौर पर मीडिया में शेयर होता है या मीडिया को विज्ञापनों पैसे सत्ता से ओबलाइज कर प्रभावित करते हैं. सारे चैनल आज केजरी विरोधी कोरस गाकर किसानों के आत्महत्या जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषय को बेहद छोटा और लोकलाइज कर बैठे. आज देश में आपातकाल जैसी स्थिति है. साठ से सत्तर फीसदी आबादी जिस जमीन पर निर्भर है वह जमीन प्रकृति और सिस्टम की मार के कारण किसानों के अरमान पूरा करने में अक्षम है. इस कारण लोन निया हुआ किसान, बेटी का ब्याह तय कर चुका किसान, परिवार पालने वाला किसान खुदकुशी कर रहा है. देश में कोई इतना बड़ा सेक्टर नहीं है जिसमें इतने लोग रोजगार में लगे हों और इतने ज्यादा लोगों को पेट पल रहा हो. खेती किसानी सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण सेक्टर है भारत के लिए.

इस सबसे बड़े सेक्टर पर आन पड़ी सबसे बड़ी विपदा के बारे में न्यूज बहस डिबेट रिपोर्टिंग न दिखाकर मीडिया ने बेहद घटिया और बायस्ड किस्म की रिपोर्टिंग की है जिससे सारी बहस दिल्ली पुलिस बनाम आम आदमी पार्टी के दोषी होने या न होने तक सिमट आई है. यह शर्मनाक है. यह बेहद गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता है. टीआरपी खोर और बाजारू न्यूज चैनलों के सामने भी संकट रेवेन्यू का है. वे पीपली लाइव जैसा बरताव हर वक्त करने रहने के लिए अभिशप्त हैं क्योंकि टीआरपी और बाजार ने इन्हें विवेकहीन के साथ साथ संवेदनहीन बना रखा है. याद रखो मीडिया वालों, देश के नेता अफसर तो पहले से ही चोट्टे और जनविरोधी हैं. अब तुम भी इस गैंग के हिस्से बन चुके हो, इस कारण आम जन को बड़े मुद्दों पर सच्ची समझ देने की जगह उन्हें बरगलाने में लगे हो ताकि जनता भ्रमित रहे और तुम सब अलोकतांत्रिक खंभों का मिला-जुला गैंग लूटतंत्र का सामूहिक संचालन करता रहे. लेकिन कब तक बरगलाओगे. कब तक?  जो लक्षण देश में दिख रहे हैं, वह यह बताने के लिए काफी है कि अगर चीजें नहीं बदली तो पूरा देश गृहयुद्ध की चपेट में आ जाएगा.

पब्लिक भी अब चीजों को समझने लगी है. सोशल मीडिया पर नेताओं को जितनी गालियां मिल रही हैं, उतनी ही मीडिया को भी, देखें ये लिंक: http://goo.gl/ZJWj46

लाइव खुदकुशी फिल्माते मीडियाकर्मी, स्टेज पर खड़ा अहंकारी मुख्यमंत्री, पुलिस से गुहार लगाते शातिर नेता, अविचल मुस्काते पुलिसकर्मी http://goo.gl/PGZVbF

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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डाक्टर पति के ‘गे’ होने, 5 साल तक फिजिकल रिलेशन न बनने और टार्चर से परेशान एम्स की महिला डाक्टर ने जान दी

दिल्ली के एम्स अस्पताल के एनस्थीसिया विभाग में कार्यरत सीनियर रेजीडेंट 31 वर्षीय महिला डॉक्टर प्रिया वेदी ने हाथ की नस काटकर आत्महत्या कर ली. प्रियका का शव दिल्ली पुलिस ने रविवार की सुबह पहाडगंज के होटल प्रेसीडेंसी से बरामद किया. प्रिया का शव बेड पर पड़ा हुआ था और हाथ की नस कटी हुई थी. पुलिस को शव के पास ही एक सुसाइड नोट मिला.

सुसाइड नोट में प्रिया ने लिखा है- ”पति कमल वेदी के साथ मेरी शादी को 5 साल हो गए हैं और अब तक हमारे बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं है. शादी के 6 महीने बाद मैंने अपने पति के लेपटॉप पर एक फर्जी जीमेल अकाउंट पाया जिसमें उसके कई गे दोस्तों के मोबाइल नंबर, उनकी तस्वीरें और वीडियो थे. जब मैंने अपने पति से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि किसी ने मेरा ईमेल अकाउंट हैक कर लिया है. मैंने पति के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की, लेकिन मेरे पति ने ऎसा करने से मना कर दिया और किसी न किसी बहाने से मेरा और मेरे परिवार का उत्पीडन किया जाने लगा. एक महीने पहले ही मेरे पति ने माना कि वो गे हैं. पिछली रात मेरे पति का मुझसे झगडा हुआ. मैं परेशान होकर आत्महत्या जैसा कदम उठा रही हूं.”

पुलिस के मुताबिक प्रिया जयपुर की रहने वाली हैं और उनके पति कमल राजस्थान के सीकर का रहने वाला है. कमल भी एम्स के चर्म और त्वचा रोग विभाग में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर हैं. दोनों एम्स के सरकारी फ्लैट में रह रहे थे. प्रिया ने शनिवार की रात करीब 11:45 होटल प्रेसीडेंसी में कमरा बुक कराया पहचान पत्र के रूप में उसने अपना लाइसेंस दिया. पुलिस ने प्रिया का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और उसके पति से पूछताछ चल रही है. इस मामले की जांच एसडीएम कर रहे हैं.

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जान देने से पहले फेसबुक पर समलैंगिक पति से रिश्ते रखने वालों का नाम लिखा

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मेरी इस सुंदर-सी फेसबुक दोस्त ने कल आधी रात के बाद सुसाइड कर लिया और मैं अनजान रहा…

Yashwant Singh : मेरी इस सुंदर-सी फेसबुक दोस्त ने कल आधी रात के बाद सुसाइड कर लिया और मैं अनजान रहा… अपने फेसबुक फ्रेंड और प्रतिभाशाली युवा लिक्खाड़ नितिन ठाकुर की पोस्ट पढ़कर ठिठक गया. दुबारा-तिबारा पढ़ा. अंशु सचदेवा ने खुदकुशी कर ली. उन्होंने यह जानकारी देते हुए अंशु का फरवरी महीने का एक स्टेटस शेयर किया जिसमें अंशु सचदेवा ने लिखा है: ”वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ दे के छोड़ना अच्छा”. यह सब पढ़ के सोचा कि देखूं, कहीं अंशु सचदेवा मेरी फ्रेंड लिस्ट में तो नहीं. देखा तो ऐसा ही निकला. अंशु सचदेवा मेरी फेसबुक फ्रेंड हैं. 16 अप्रैल तक उन्होंने अपना स्टेटस अपडेट किया हुआ है. उनकी वॉल और उनकी पोस्ट्स और उनकी तस्वीरें देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि यह खूबसूरत संगीतमय लड़की अचानक सुसाइड कर लेगी.

 

और हां, मेरे जैसे लोग, जो उनके फेसबुक फ्रेंड हैं लेकिन आजतक कभी एक भी उनसे न चैट की न परिचय पूछा न हालचाल जाना और न भावनात्मक रिश्ता कायम किया, अब जब वो नहीं रहीं तो बेहद अफसोस कर रहे हैं. कि, शायद अगर वो मुश्किल में होती और मुझसे खुलकर अपनी बात कहती तो उसे उसके दुखों से उबरने उबारने का कोई तरकीब सुझा पाता, थोड़ा हंसा पाता, थोड़ा समझा पाता. पर अब पछताए क्या होता है.

अब तो बस एक ही काम करूंगा वो ये कि धीरे से अंशू को अपनी फ्रेंडलिस्ट से हटा दूंगा, अनफ्रेंड कर दूंगा. ये क्रूरता न जाने मैं क्यों करता आया हूं. जिनके जाने की खबर मिल जाती है, वो अगर फेसबुक पर मेरे मित्र हुए तो उन्हें अनफ्रेंड कर देता हूं. वो शायद भले पूछने न आएं कि भाई, ऐसा क्या कर दिया कि अनफ्रेंड कर दिया. पर मैं जवाब तैयार रखता हूं. गुरु, अब रुह बनकर ही मिलेंगे और रुहों की फेसबुकी दुनिया क्रिएट कर उसमें धड़ाधड़ फ्रेंड बनाए जाएंगे. फिलहाल मैं अंशू की तस्वीरें देख रहा हूं, वो तस्वीरें जिसे उन्होंने अपनी प्रोफाइल पिक्स बनाई हुई हैं.

ढेर सारी तस्वीरें है और सब एक से बढ़कर एक खूबसूरत. लेकिन सच यह भी है कि जो चेहरे से जाहिर है, उसे छुपाया भी जा सकता है. जो छुपा हुआ है अंदर, उसे चेहरे से जाहिर नहीं भी किया जा सकता है. फसल तबाह होने से किसानों की आत्महत्याओं और हार्ट अटैक के दुख-दर्द को तो समझा जा सकता है, लेकिन अंशू जैसों की आत्महत्या की वजह की पड़ताल कैसे की जाए. किसान अगर सत्ता सृजित ग्रामीण विडंबनाओं के कारण मर रहे हैं तो कहीं अंशू जैसे लोग कॉर्पोरट created महानगरी अवसाद की भेंट तो नहीं चढ़ जा रहे.

नीचे नितिन ठाकुर का ताजा और अंशु सचदेवा का फरवरी महीने का स्टेटस दे रहा हूं. साथ ही नितिन ठाकुर के स्टेटस पर आए कुलदीप मिश्रा के कमेंट को भी दे रहा हूं जो अंशु के क्लासमेट हुआ करते थे और उनके सुसाइड से स्तब्ध हैं.


Nitin Thakur : नीचे अंशु सचदेवा का एक पोस्ट शेयर कर रहा हूं जिसे उन्होंने फरवरी में लिखा था. दीपा के बाद अब अंशु ने भी खुदकुशी कर ली. अंशु मेरी मित्रसूची में तो नहीं थी लेकिन मेरे कई दोस्तों की दोस्त ज़रूर थी. आसपास इतनी भीड़ होने के बावजूद ना तो यहां सबकुछ कहा जा सकता और ना ही कोई समझेगा.. दीपा और अंशु ये बात शायद समझते थे इसलिए अंजाम पर नहीं पहुंचे.. मोड़ से ही लौट गए. अंशु सचदेवा के दोस्तों के मुताबिक अंशु ने कल आधी रात के बाद आत्महत्या कर ली.

Anshu Sachdeva : Wo afsaana jisay anjaam tak laana na ho mumkin…usay ik khubsurat morr de k chhorna achha.

Kuldeep Mishra : मेरी क्लासमेट थी अंशु। बेहद मिलनसार और विनम्र। 4 साल में उसे जितना जाना, यक़ीन नहीं होता कि वो लड़की अपनी जान ले सकती है। सुबह से उसका मुस्कुराता चेहरा आंखों के आगे घूम रहा है।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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अंशू सचदेवा की फेसबुक प्रोफाइल पिक्चर्स देखने के लिए नीचे दिए गए क्रमांक पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं…

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सहारा में अब उठने लगे विरोध के स्वर, कई यूनिटों में भगदड़ के हालात

सहारा में सैलरी न मिलने का असर दिखने लगा है। वाराणसी और देहरादून समेत कई यूनिटों में कर्मचारियों में भगदड़ मचने की सूचनाएं हैं। वाराणसी में थोक में लोग लंबे अवकाश पर जाने लगे हैं। तेज प्रताप सिंह, विवेक सिंह, त्रिपुरेश राय, दीपक राय, बाबू राम, राहुल सिंह, राकेश यादव, अशोक चौबे, सुद्दोधन आदि बिना बताये अवकाश पर चले गए हैं। देहरादून से निधि सिंह, सुधीर सिंह, ममता सिंह, सरिता नेगी, शक्ति सिंह लंबे समय से अवकाश पर हैं। वाराणसी में स्टाफ की कमी से संस्करण मर्ज किये जा रहे हैं।

अवकाश पर जाने से पहले इन लोगों ने सम्पादक स्नेह रंजन का घेराव किया था। मैनेजर हालात को देखते हुए फरार हैं। सम्पादक धमकी दे रहे हैं कि ‘आज’ अखबार से लोगों को बुला कर काम चला लेंगे। ये ‘आज’ अखबार से आये हैं। कर्मचारियों का कहना है कि ये शुरू से कर्मचारी विरोधी काम करते रहे हैं।

देहरादून में गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से नवाजे गए दिलीप चौबे सम्पादक हैं। इन्होंने यहां संदेश दे रखा है कि हमें मैनेजमेंट ने नहीं, छोटे साहब जेबी राय ने भेजा है। यानि मुझे हल्के में मत लेना। संस्था पर संकट है और ये अक्सर स्वयं ही लंबी छुट्टी पर नहीं रहते बल्कि चहेतों और चमचों को दिल खोल कर अवकाश देते हैं। इनकी यूनिट भी संकट के दौर से गुजर रही है। यहाँ भी विरोध होने लगा है। अगले माह से असर दिखाई देने लगेगा। वैसे सबसे ज्यादा लोगों ने यही नौकरी छोड़ी है।

प्रबंधन के हिसाब से लखनऊ सबसे शांत यूनिट है। यहाँ जी-हुजूरियों और बिना रीढ़ वालों की फौज भरी पड़ी है। कहा जा रहा है कि प्रदीप मंडल के आत्महत्या प्रकरण को मैनेज कर लेने और इस न्यूज को लखनऊ के अखबारों में छपने से रोकने की कामयाबी के बाद सहारा प्रबंधन संपादक मनोज तोमर को इनाम देने वाला है। जल्द ही इन्हें मुंबई इनाम लेने के लिए भेजा जाएगा।

एक पत्रकार द्वारा प्रेषित पत्र पर आधारित

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सहारा की जो आज स्थिति है उसमें प्रदीप मंडल का आत्महत्या करना शुरुआत भर है…

Pradeep Srivastav : सहारा इंडिया के कर्मचारियों, वर्करों, अधिकारियों की स्थिति को लेकर मेरे जैसे ढेर सारे लोग चिंतित हैं। चार माह से वेतन न मिलने कारण आर्थिक तंगी में जीवन काट रहे लखनऊ में सहारा इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी प्रदीप मंडल द्वारा आज आत्महत्या करने से मन बहुत दुखी है। सहारा में प्रदीप मंडल जैसे ढेर सारे अधिकारी ऐसे हैं जिन्हें चार-पांच माह से वेतन नहीं मिला है।

दुख और चिंता केवल प्रदीप मंडल की मौत की ही नहीं बल्कि सहारा के दस लाख स्थाई, अस्थाई कर्मचारियों, अधिकारियों के जीवन को लेकर भी है। सहारा की जो स्थिति आज है उसमें प्रदीप मंडल का आत्महत्या करना शुरुआत भर है। यदि हालात नहीं बदले तो आने वाले दिनों में इन दस लाख लोगों का क्या होगा यह सोचकर ही मन कांप जाता है। ईश्वर इन दस लाख लोगों की रक्षा करे। दुख, पीड़ा और वेदना की इस घड़ी में समाज के हर वर्ग के लोगों को सहारा कर्मियों के साथ खड़ा होना चाहिए।

लखनऊ के पत्रकार और ब्लागर प्रदीप श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर….

छह माह से सैलरी न मिलने पर सहारा के डिप्टी मैनेजर ने टॉवर से कूदकर जान दी

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यूपी में किसान आत्महत्याओं का दौर और हरामी के पिल्लों द्वारा महान लोकतंत्र का जयगान

Yashwant Singh : कौन इनकी मौत को मुद्दा बनाएगा। ये ना पूंजीपति हैं। ये ना टीआरपी हैं। ये ना शहरी हैं। ये ना संगठित हैं। हम सब अपने अपने खेल में उलझे हैं और हम सबकी निहित स्वार्थी खेलकूद से उपजे अभावों की जेल में ये आम किसान कैद हैं। इस कैद की नियति है मौत। शायद तभी इनकी मुक्ति है। सिलसिला जारी है।  मनमोहन रहा हो या मोदी, माया रही हो या मुलायम। सबने पूंजी के खिलाडियों को सर माथे बिठाया। किसानों को सबने मरने के लिए छोड़ दिया। ये मरते थे। मर रहे हैं। मरेंगे। कभी बुंदेलखंड में। कभी विदर्भ में। जहाँ कहीं ये पाये जाते हैं वहीँ मौत का फंदा तैयार पड़ा है। कब कौन कहाँ लटक रहा है, हम सब नपुंसक की भाति चुपचाप इसका इंतज़ार कर रहे हैं। महान लोकतंत्र और अदभुत राष्ट्र की जयगान करने वाले हरामी के पिल्लों पर थूकता हूँ।

ये हरामी के पिल्ले मीडिया से लेकर राजनीति, सत्ता, अफसरशाही, न्यायपालिका हर जगह भरे पड़े हैं और बहुमत में हैं। इनके लिए किसान, गांव, जमीन, आत्महत्या, गरीबी, बेरोजगारी कोई बड़ी भारी समस्या नहीं है. इनका टारगेट सिर्फ एक है. पूंजी जुटाते रहना… पूंजी के बल पर गलत को सही में कनवर्ट करते रहना… ताकतवरों को संरक्षण देते-लेते रहना…. और, कुर्सी पर बने टिके बचे रहना… कोई देश के सबसे बड़े पैसे वाला की कुर्सी बचाने के लिए लूटमार कर रहा है तो कोई देश का सबसे शक्तिशाली राजनेता बने रहने के लिए गुणा-गणित में लीन है. सबके अपने अपने निजी एजेंडे हैं लेकिन वह हिडेन है और जो कुछ सामने है उसे संविधानसम्मत का चोला ओढा़कर हमको आपको जनता को सबको बेवकूफ बनाया जा रहा है. धन्य है यह महान लोकतंत्र जो अपने किसानों, अपने अन्नदाताओं को जिंदा बने रहने का हक देने में असमर्थ है.

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Yashwant Singh : खेत में गेहूं-चना की फसल पकने को तैयार है, तमाम विपत्तियों के बावजूद, लटका-झुका ही सही। यही वो समय मौसम होता है जब गांव की याद आती है। न गर्मी न सर्दी। पूरे मौसम में अजीब मादकता होती है। हार्मोन अलग कुछ एहसास कराते हैं। भावनाएं जमीन जड़ों की तरफ खींच ले जाती है। ऐसे में कैसे भी गाँव चला आता हूँ। खेत से चना उखाड़ के कच्चा हरा-हरा खाने के बाद एक अलग पके चने की खेप भून रहे हैं। धनिया लहसुन अदरक नमक मिर्च की चटनी के साथ इसे खाने के बाद दो गिलास गुड़ दही मिक्स रस यानि शरबत पी जाने का मतलब होता है अगले 4 घंटे तक मोक्ष की अवस्था में रहना। इस अवस्था में रहते हुए कोई fb status अपडेट कर इस आनंदित मनःस्थिति के बारे में न बतियाये और शहरियों को न जलाए तो फिर अतिरिक्त मज़ा कैसे आए।

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Yashwant Singh : आज बनारस में एक मीडिया सेमिनार में शिरकत करने आया हूं। स्टेशन से लंका पहुंचा तो देखा कि यहाँ करतब जारी है। अच्छे दिनों के इंतज़ार में बेसब्र हुए लोगों के लिए तमाशा पेश है। लंका पर रविदास गेट के पास केशव पान वाले के यहां से जो-जो पान घुला के निकला और मोदियापा चिंतन मंथन के साथ आगे बढ़ा, उसका साबका जमूरे और उस्ताद से पड़ा। नवरात्र के नाम दस-दस का नोट बटोरता जमूरा अपने उस्ताद के डंडे पीटने के हर इशारे पर चकित चैतन्य हो कलाबाजी करता। बंदरिया तो जैसे हदस गयी हो, उस्ताद से आँख बचा के पीछे बैठी रही। उस्ताद कभी मोदी की तरह नजर आता तो बेचारा बन्दर जनता की तरह। हालांकि वाकई जो जनता वहां जमी थी, वो पान घुला के दांत चियारे ‘हई देखा राजा’ कह के थपोरी पीट रही थी। कहते हैं कि यही तो है बनारस। पर अब बनारस का मूड मिज़ाज़ थोडा तल्ख़ हो रहा है। औघड़पना पर दुनियादारी भारी पड़ रही है। जीवन यापन का संकट सब कुछ पर तारी है।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह द्वारा हाल के दिनों में फेसबुक पर लिखे गए विभिन्न सचित्र स्टेटस का संकलन. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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जाने-माने भोजपुरी गायक पवन सिंह की पत्नी ने खुदकुशी कर ली

Vinayak Vijeta : जाने-माने भोजपुरी गायक पवन सिंह की पत्नी ने मुंबई स्थित अपने आवास पर खुदकुशी कर ली है। हालांकि अभी तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया। पवन सिंह का विवाह पिछले दिसम्बर माह में बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में उनके बड़े भाई की साली से काफी धूमधाम से हुआ था। इस विवाह में कई राजनीतिक फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी हस्तियां सम्मिलित हुई थीं।

सूत्रों के अनुसार पवन सिंह की नवविवाहिता पत्नी पवन के व्यवहार और चाल-चलन से नाखुश थी। पवन सिंह भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के स्टार हैं। वह न सिर्फ मशहूर गायक हैं, बल्कि एक मंझे हुए अभिनेता भी हैं। उन्होंने वर्ष 2007 से अबतक दो दर्जन भोजपूरी फिल्म में बतौर अभिनेता काम किया है। उनके प्रशंसकों की लंबी-चौड़ी लिस्ट है। तीन माह पहले ही दोनों की शादी हुई थी। पत्नी की खुदकुशी की खबर से पवन सिंह समेत उनका पूरा परिवार सदमे में है। उनके प्रशंसकों में भी शोक की लहर दौड़ गई है। पवन सिंह का गाना ‘लॉलीपॉप लागे लू’ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुका है। उन्हें भजनों के लिए भी जाना जाता है। वे इस तरह के कई कार्यक्रम भी करते रहते हैं और इनमें उनके प्रशंसकों की खूब भीड़ उमड़ती है।

बिहार के पत्रकार विनायक विजेता के फेसबुक वॉल से.

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पन्ना के कलेक्टर पर केंद्रीय विद्यालय प्राचार्या ने यौन शोषण का आरोप लगा आत्महत्या की कोशिश की

(कलक्टर और प्राचार्या की फाइल फोटो. पीड़िता की पहचान छुपाने के लिए उनके चेहरे को फोटोशॉप के जरिए ब्लर कर दिया गया है.)

पन्ना : केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्या ने पन्ना जिले के प्रशासनिक मुखिया कलेक्टर आर.के. मिश्र पर दो बार जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने का गंभीर आरोप लगाया है. इससे पन्ना के साथ-साथ पूरे प्रदेश के प्रशासनिक हलके में सनसनी फ़ैल गई है. शनिवार की सुबह लगभग 9 बजे केंद्रीय विद्यालय की प्राचार्या ने मानसिक प्रताड़ना के चलते फिनायल पी कर आत्महत्या करने की कोशिश की. विद्यालय के स्टाफ ने गंभीर हालत में प्राचार्या को जिला चिकित्सालय में भरती कराया है जहां उनका इलाज चल रहा है.

इससे पहले प्राचार्या ने पत्रकारों व मीडिया के सामने खुल कर अपने ऊपर हुए अत्याचारों की व्यथा सुनाई. प्राचार्या का कहना था कि पन्ना कलेक्टर आर.के. मिश्र ने उन्हें बहाने से अपने बंगले बुला कर दो बार शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किये. साथ ही जान से मरने की धमकी भी दी. प्राचार्या का कहना था कि इस सम्बन्ध में जब उन्होंने पन्ना के एस.पी. को फ़ोन पर घटना की जानकारी देना की कोशिश की तो उन्होंने इस मामले को उनका पर्सनल मामला बताते हुए फ़ोन काट दिया और उनकी शिकायत नहीं सुनी.

इन सब बातों से मानसिक रूप से तंग आकर प्राचार्या ने आत्महत्या करने की कोशिश की. जब इस मामले में कलेक्टर पन्ना से उनका पक्ष जाना गया तो उन्होंने अपने ऊपर लगे सरे आरोपों को राजनैतिक साजिश करार दिया. उनका कहना था कि यह महिला मेंटली डिस्टर्ब है. मैंने कभी भी उसे बंगले पर नहीं बुलाया और ना ही कोई दैहिक शोषण किया. जब इस मामले में पन्ना एस.पी. से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने पत्रकारों से मिलने बात करने से परहेज किया. फिलहाल जिला चिकित्सालय पन्ना के आईसीयू वार्ड, जिसमे पीड़ित प्राचार्य भारती हैं, में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का जमावडा बना हुआ है. प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह ने कलेक्टर पन्ना को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है. अब पन्ना के नए कलेक्टर शिव नारायण चौहान बनाये गए हैं.

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काम के दबाव के कारण दबंग दुनिया अखबार के खंडवा मार्केटिंग इंचार्ज शैलेंद्र ने आत्महत्या की

दबंग दुनिया अखबार के मार्केटिंग विभाग में कार्यरत शैलेंद्र शर्मा के बारे में एक दुखद सूचना आ रही है कि उन्होंने दो दिन पहले खंडवा के एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. चर्चा है कि उन्होंने यह कदम काम के अत्यधिक दबाव के कारण उठाया. आरोप है कि दबंग दुनिया के सीईओ द्वारा उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था. वे खंडवा में दबंग दुनिया के मार्केटिंग एवं सर्क्यूलेशन इंचार्ज थे.

उनकी मौत ऑन ड्यूटी हुई. इसके बाद भी दबंग दुनिया मैनेजमेंट ने अभी तक शैलेंद्र के परिवार को आर्थिक मदद की घोषणा नहीं की है जबकि दबंग दुनिया के चेयरमैन किशोर वाधवानी की बेटी का 17 मार्च को विवाह में 50 करोड़ से ज्यादा खर्चा किया जा रहा है. किशोर वाधवानी को अपने कर्मियों के शोषण और प्रताड़ना के लिए जाना जाता है.

गुटखा किंग के नाम से कुख्यात किशोर वाधवानी अपने मीडिया विंग यानि दबंग दुनिया अखबार को भी गुटखा फैक्ट्री की तरह चलाता है. जिसको जब मन करता है, निकाल देता है या डिपार्टमेंट बदल देता है. वह संपादकीय के शख्स को गुटखा बेचने के काम में लगा देता है और कभी गुटखा बेचने वाले को खबर लिखने के लिए कह देता है. उसकी इन्हीं हरकतों के कारण अब दबंग दुनिया में अच्छे मीडियाकर्मी काम करने से कतराते हैं. चर्चा है कि किशोर वाधवानी की बिटिया के शादी के दिन शैलेंद्र के परिजन व समर्थक मुआवजे की मांग को लेकर प्रदर्शन करेंगे.

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किसान मर रहे हैं, मोदी सपने दिखाते जा रहे हैं, मीडिया के पास सत्ता की दलाली से फुर्सत नहीं

Deepak Singh :  प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बाद कौन सुध लेता हैं किसानों की? महाराष्ट्र में और केंद्र में दोनों जगह भाजपा की सरकार पर हालत जस के तस। यह हाल तब हैं जब नरेंद्र मोदी को किसानों का मसीहा बता कर प्रचार किया गया। आखिर क्यों नई सरकार जो दावा कर रही हैं की दुनिया में देश का डंका बज रहा हैं पर उस डंके की गूंज गाँव में बैठे और कर्ज के तले दबे गरीब और हताश किसान तक नहीं पहुँच पाई? क्यों यह किसान आत्महत्या करने से पहले अपनी राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं कर पाया की सरकार आगे आएगी और कुछ मदद करेगी?

क्या यह सरकार की नाकामी नहीं हैं? क्या मोदी सरकार से नहीं पूछा जाना चाहिए पूंजीपतियों पर करोड़ों रुपये फूंकने से पहले हमारे अन्नदाता किसान की सुध क्यों नहीं ली जाती? क्या यह मीडिया के लिए शर्मनाक नहीं हैं? खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जो सुबह-शाम सिर्फ एक दल विशेष के प्रचार तंत्र की तरह काम करने लगा हैं? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सेंसेक्स का ऊपर जाना ही मतलब रखता हैं, किसान आत्महत्या कर ऊपर जाए तो मीडिया के दलालों को अब क्या फर्क पड़ता हैं। अब ऐसी खबर किसी रद्दी के कोने में छप मात्र जाती हैं तो कुछ एक-दो लोग जान पाते हैं। अब किसान की मौत पर न्यूज़ चैनल पर बहस नहीं होती, अब बहस होती हैं की कौन रामजादा हैं तो कौन हरामजादा!! शर्मनाक!! बेहद शर्मनाक !!

दीपक सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सिरसा के युवा, प्रतिभाशाली और हंसमुख पत्रकार धीरज बजाज ने क्यों की आत्महत्या?

हरियाणा के सिरसा जिले के युवा पत्रकार धीरज बजाज का आत्महत्या कर लेना पत्रकारों में चर्चा का विषय है. सभी यही आपस में बात कर रहे हैं कि आखिर सुसाइड के पीछे कारण क्या रहा. कहते हैं कि धीरज बजाज ने मानसिक परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या कर लिया. धीरज के ऐसा कदम उठाने से उनके परिवार और उन्हें चाहने वाले स्तब्ध हैं. धीरज इन दिनों ‘सच कहूं’ समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ थे. साथ ही स्थानीय समाचार-पत्र ‘थर्ड वे’ के संपादक भी थे धीरज बजाज.

धीरज बजाज

बजाज ने बीते बुधवार की रात अपने एक मित्र के घर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. शव के पास रखे उनके लैपटॉप में पांच अलग-अलग सुसाइड नोट टाईप किए हुए मिले. उसमें कहीं न तो आत्महत्या के कारणों का खुलासा किया गया और न ही किसी को जिम्मेदार ठहराया गया. सुसाइड नोट में उन्होंने अपने दोस्तों, डेरा सच्चा सौदा, अपने माता-पिता व पुलिस आदि के लिए सामान्य बातें लिखी हैं.

धीरज बजाज के परिवार में उनके बुजुर्ग माता-पिता, बीमार बड़ा भाई, धीरज बजाज की पत्नी व उनका एक बेटा है. रात को 9 बजे तक धीरज जब अपने घर नहीं पहुंचे तथा बार-बार फोन करने पर भी धीरज ने फोन नहीं उठाया, तो उनके परिजनों ने उनके मित्रों से फोन कर उनके बारे में पूछताछ की. जब यह सूचना गांव गए उनके मित्र को मिली तो उन्होंने अपने पड़ोसी अजय उप्पल को फोन कर उनके घर जाकर धीरज को देखकर आने को कहा.

इस पर अजय उप्पल रात करीब 11 बजे जब वहां गए, तो दरवाजा अंदर से बंद था और बार-बार दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो अजय उप्पल छत की तरफ से नीचे गए. देखा कि छत पर लगे पंख से धीरज का शरीर फंदे पर लटका हुआ था. इस पर उन्होंने तुरंत उसे नीचे उतारा तो देखा कि धीरज की सांसे चल रही थी. इस पर उसने अपने आस पड़ोस के लोगों, धीरज के मित्रों को वहां बुलाया और डेरा सच्चा सौदा अस्पताल ले गए. वहां चिकित्सकों ने तुरंत उपचार करना शुरू कर दिया, लेकिन उपचार के दौरान ही धीरज की मौत हो गई. हंसमुख स्वभाव व सभी से प्रेम से मिलने वाले धीरज बजाज द्वारा इस प्रकार आत्महत्या करने से जिला के पत्रकारों को जहां सदमा लगा है तो वहीं शोक की लहर दौड़ गई है. सुबह सामान्य अस्पताल में पोस्टमार्टम कराने के बाद उनके शव का दोपहर को शिवपुरी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. इस दौरान वहां शहर के सभी पत्रकारों सहित राजनेता, समाजसेवी संगठनों के पदाधिकारी उपस्थित थे.

धीरज बजाज का सुसाइड करना सोशल साइट्स और अखबारों के जरिए सब तक पहुंच गई. गुणी कलमकार धीरज बजाज के रुखसत होने के बाद उनके तमाम चाहने वाले खुद को हद से ज्यादा गमगीन, अकेला एवं ठगा सा महसूस कर रहे हैं. छोटी सी उम्र में पत्रकारिता के नये आयाम छूने वाला धीरज हमारे बीच एक ऐसा रिक्त स्थान पैदा कर गया जिसकी भरपाई निकट भविष्य सम्भव नहीं है. कलम के सिपाही धीरज ने खुद को खत्म करने से पहले बेशक इंटरनेट की सोशल साइट्स से स्वयं से जुड़ी तमाम लेखन सामग्री और फोटोज आदि सब रिमूव कर दिए हों लेकिन धीरज अपने हंसमुख स्वभाव अपने उल्लेखनीय कामों के कारण हम सबके दिलों में हमेशा हमेशा जिन्दा रहेंगे.

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सेलरी न मिलने से पाकिस्तानी पत्रकार के आत्महत्या करने पर दुख जताया

The Delhi Union of Journalists (DUJ) is concerned over the reported suicide of a Pakistani journalist a few days back owing to financial problems following non-payment of his salary for four months by the Royal TV management. The DUJ also expresses support and solidarity with the Pakistan Federal Union of Journalists (PFUJ) which held countrywide protests today.

The DUJ would like to point out that this is not an isolated incident. Such incidents have also been reported in India and elsewhere. Increasing insecurity of service, contractualisation, long working hours etc are putting unprecedented pressure on journalists in India also. Despite the Supreme Court verdict, managements are refusing to implement the wage board while some are finding newer ways of circumventing them.

Press Statement

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डीआईजी गोरखपुर डा. संजीव गुप्ता और एसपी पीलीभीत सोनिया सिंह को जेल भेजा जाए : सुबोध यादव

: मृतक सिपाहियो के परिजनों को 50-50 लाख का मुआवजा मिले : इटावा। उत्तर प्रदेश पुलिस एसोषियेषन के अध्यक्ष सुबोध यादव ने आत्महत्या करने वाले दो पुलिस कर्मियों के परिजनों को 50-50 लाख रूपये मुआवजा व डीआईजी गोरखपुर डा0 संजीव गुप्ता व एसएसपी पीलीभीत सोनिया सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की मांग की है। उन्होंने इस सम्बन्ध मे मुख्यमंत्री को पत्र भी भेजा है।

इस प्रकरण के सम्बन्ध में अध्यक्ष सुबोध यादव ने बताया कि पीलीभीत में पुलिस अधीक्षक के आवास पर ड्यूटी कर रहे सिपाही दिनेश प्रजापति उम्र 27 वर्ष, 2011 बैच, ने सरकारी रायफल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली। दूसरी घटना गोरखपुर रेंज के डीआईजी के लखनऊ स्थित निजी आवास की बेगारी से आजिज होकर गोरखपुर के डीआईजी के पीआरओ सेल में तैनात सिपाही अरूण कुमार चौधरी उम्र 25 वर्ष का शव डीआईजी के लखनऊ स्थिति निजी आवास पर पंखा पर लटकता मिला। सिपाही ने इससे पूर्व अपने घर पर फोन करके अपने पिता से डीआईजी द्वारा करायी जा रही बेगारी का दुखड़ा रोया था।

अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में बताया कि शासन का कोई ऐसा आदेश नहीं है कि डीआईजी अपने निजी आवास पर भी सुरक्षा लगायें अथवा कानून के रक्षक से बेगार करायें।  ऐसे डीआईजी को मुकदमा दर्ज कर जेल भेजना चाहिये। उन्होंने कहा कि जब थाना में ऐसी घटना होती है तो प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष व पहरा पर ड्यूटी करने वाला व कार्यालय का स्टाफ दोषी माना जाता है और जेल भेजा जाता है जैसा कि तीन दिन पूर्व थाना जसवन्तनगर इटावा में प्रभारी निरीक्षक व कई को निलम्बित किया गया है।

उन्होंने कहा कि पीलीभीत में जिस सिपाही ने आत्महत्या की है उसकी शादी हो रही थी और एसपी द्वारा 30 दिन अवकाश नहीं दिया जा रहा था। जब वह अवकाश लेने गया तो एसपी ने उसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर भगा दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि डीआईजी गोरखपुर व एसपी पीलीभीत के खिलाफ मुकद्मा दर्ज कर जेल भेजा जाये और मृतक पुलिसकर्मी के परिजनों को पचास- पचास लाख रुपये का मुआवजा व एक-एक परिजन को तत्काल सेवा में लिया जाये। उन्होंने कहा कि प्रदेश में यह कोई पहली घटना नहीं है। पूर्व में भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं जिन्हें हल्के में लिया गया। अगर उसी समय गम्भीरता बरती जाती तो ये घटनाएं नहीं घटती।

प्रेस रिलीज

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डीआईजी गोरखपुर के लखनऊ स्थित घर पर कांस्टेबल सुसाइड मामले का सच क्या है…

हमने डीआईजी गोरखपुर के लखनऊ स्थित गोमतीनगर आवास पर कांस्टेबल अरुण कुमार की आत्महत्या के सम्बन्ध में अरुण कुमार के मामा बलराम चौधरी से बात की. उन्होंने हमें बताया कि वे पिछले करीब डेढ़ माह से लखनऊ में डीआईजी गोरखपुर के मकान पर रह रहे थे जिनसे वे अपने तीन मोबाइल नंबर 098076-89970, 091258-66210, तथा 073983-47607 से लगभग रोज बात करते थे. आरआई, गोरखपुर देवी दयाल ने बताया कि वे डीआईजी गोरखपुर कार्यालय से सम्बद्ध थे और दिनांक 23 नवम्बर को डाक लेकर लखनऊ गए थे. वहीँ इस बारे में डीआईजी रेंज कार्यालय ने बताया कि अक्टूबर 2014 में उनकी उस कार्यालय से सम्बद्धता समाप्त हो गयी थी.

अतः हमने प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर उनके आखिरी दो महीने में प्रत्येक दिन के निवास के सम्बन्ध में वास्तविक स्थिति की जांच कराने और इसमें गड़बड़ी पाए जाने पर सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की मांग की है. साथ ही हमने सिपाही को सीनियर ऑफिसर के आदेश पर लखनऊ में होने के कारण उन्हें पूरी तरह ड्यूटी पर मानते हुए उनके परिवार वालों को पूरा पेंशन और अन्य लाभ देने की मांग की है. हमने इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए पूरे प्रदेश में ऐसे सभी मामलों का भौतिक सत्यापन कराने और सभी अधिकारियों को ऐसा कदापि नहीं करने हेतु निर्देश देने की भी मांग की है.

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- कांस्टेबल श्री अरुण कुमार चौधरी, तैनाती डीआईजी रेंज कार्यालय, गोरखपुर की आत्महत्या विषयक 

महोदय,

कृपया दिनांक  26/11/2014 को विभिन्न समाचारपत्रों में कांस्टेबल श्री अरुण कुमार चौधरी, तैनाती डीआईजी रेंज कार्यालय, गोरखपुर की आत्महत्या विषयक छपे समाचारों का सन्दर्भ ग्रहण करें जिसमे बताया गया था कि श्री चौधरी डीआईजी रेंज कार्यालय, गोरखपुर में नियुक्त हैं लेकिन वर्तमान डीआईजी रेंज, गोरखपुर डॉ संजीव गुप्ता के 1/171, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ स्थित आवास में उन्होंने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.

समाचारपत्रों में यह भी लिखा था कि उन्हें अपनी तैनाती के स्थान गोरखपुर से अलग लखनऊ में डीआईजी गोरखपुर के आवास पर अनधिकृत रूप से रखा गया था जहां सोमवार रात्री 08.30 बजे यह घटना घटी. चूँकि हम पुलिस विभाग में अधीनस्थ अधिकारियों को आईपीएस सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत हितों में भारी मात्र में प्रयुक्त करने के खिलाफ एक लम्बे समय से कार्य कर रहे हैं, अतः आज हमने इस सम्बन्ध में अपने स्तर से मामले की पूरी पड़ताल की.

हमने इस विषय में मृत कांस्टेबल के बस्ती स्थित घर के लोगों का संपर्क ज्ञात किया तो हमें उनके पिता श्री आज्ञाराम और मामा श्री बलराम चौधरी के फोन नंबर 099364-86804 तथा 097924-24553 ज्ञात हुए. पिता श्री आज्ञाराम से बात नहीं हो पायी क्योंकि यह बताया गया कि वे बात करने की स्थिति में नहीं हैं. मामा श्री बलराम चौधरी ने हम अमिताभ तथा नूतन ठाकुर से विस्तार से वार्ता की और पूरी बात बतायी. उन्होंने बताया कि श्री अरुण कुमार अपने पिता के अकेले लड़के थे और उनकी दस साल की एक छोटी बहन है. उन्होंने यह भी बताया कि उनके भांजे डीआईजी रेंज, गोरखपुर के यहाँ तैनात थे. उन्होंने बताया कि डीआईजी साहब उनके भांजे को काफी स्नेह रखते थे और उनके भांजे भी उनकी प्रशंसा करते थे.

उन्होंने यह भी कहा कि उनके भांजे करीब एक-डेढ़ माह से लखनऊ में डीआईजी साहब के मकान पर रह रहे थे. उन्होंने बताया कि वे कागज़ पर डीआईजी साहब के ऑफिस में तैनात थे पर वास्तव में लखनऊ में डीआईजी साहब के मकान में रह रहे थे. वे कहते थे उन्हें इस घर पर कोई दिक्कत नहीं थी. उन्होंने बताया कि उनके भांजे के पास तीन मोबाइल फ़ोन नंबर 098076-89970, 091258-66210, तथा 073983-47607 थे. इन तीनों नंबर से श्री अरुण चौधरी लगभग हर दिन अपने मामा से बात करते थे. दिनांक 24/11/2014 को करीब 8.45 बजे रात उन्होंने फोन नंबर 073983-47607 से मामा से बात किया था जिसके बाद उनकी मौत हो गयी.

मामा ने बताया कि वे नहीं जानते कि उनके भांजे ने क्यों आत्महत्या कर ली क्योंकि ना तो वे डीआईजी साहब से परेशान थे और ना ही बहराइच में महिला आरक्षी पद पर तैनात अपनी पत्नी से. नूतन ठाकुर ने डीआईजी रेंज कार्यालय से बात की तो वहां फोन ड्यूटी पर आरक्षी श्री निरंजन ने कहा कि श्री अरुण की तैनाती पुलिस लाइन में थी, और उनकी डीआईजी कार्यालय में कोई तैनाती नहीं थी. उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2014 में उनकी डीआईजी रेंज कार्यालय से सम्बद्धता समाप्त हो गयी थी.

इसके विपरीत आरआई, पुलिस लाइन्स गोरखपुर श्री देवी दयाल ने मोबाइल नंबर 094544-02362 पर फोन करने पर बताया कि श्री अरुण कुमार की तैनाती पुलिस लाइन में थी लेकिन वे डीआईजी गोरखपुर कार्यालय में सम्बद्ध थे. उन्होंने यह भी कहा कि वे दिनांक 23/11/2014 को डाक ले कर लखनऊ गए थे जहां उनकी मौत हो गयी.

यहाँ कई महत्वपूर्ण प्रश्न स्वतः खड़े हो जाते हैं-

1. श्री अरुण कुमार की वास्तविक नियुक्ति/सम्बद्धता कहाँ थी?

2. श्री अरुण कुमार पिछले लगभग एक-डेढ़ माह से वास्तव में कहाँ रहे- क्या वे गोरखपुर में रहे अथवा लखनऊ में, और कितनी-कितनी अवधि तक?

3. क्या श्री अरुण कुमार की मृत्यु के बाद पुलिस लाइन्स गोरखपुर से उनकी डाक पर रवानगी दिखा दी गयी?

4. क्या इस मामले में वास्तव में श्री अरुण कुमार की कागज़ पर कहीं और तैनाती और कहीं और वास्तविक निवास की स्थिति बन रही है?

हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमारी व्यक्तिगत जानकारी में यह अकेला दृष्टान्त नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में अनेकानेक पुलिस अफसरों द्वारा ऐसा किया जा रहा है. ऐसा पुलिस कांस्टेबल और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के बारे में ख़ास कर हो रहा है. आप सहमत होंगे कि यह पूर्णतया नियमविरुद्ध है.

उपरोक्त के दृष्टिगत आपसे निम्न निवेदन है-

1. कृपया इस मामले में श्री अरुण कुमार चौधरी के आखिरी दो महीने में प्रत्येक दिन के निवास के सम्बन्ध में वास्तविक स्थिति की जांच कराने की कृपा करें और इसमें गड़बड़ी पाए जाने पर सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की कृपा करें

2. चूँकि श्री अरुण चौधरी की वरिष्ठ अफसरों के आदेशों के कारण अपनी नियुक्ति के स्थान से इतर मौत हुई, अतः उन्हें पूरी तरह ड्यूटी पर मानते हुए उनके परिवार वालों को पूरा पेंशन और अन्य मृत्य सम्बन्धी लाभ देने की कृपा करें

3. इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए पूरे प्रदेश में इस बात का भौतिक सत्यापन कराने की कृपा करें कि ऐसा और कहाँ-कहाँ हो रहा है कि कोई अधीनस्थ पुलिस अफसर कागज़ पर कहीं और तैनात है और वास्तव में अफसरों ने उन्हें कहीं और रख रखा है? ऐसे सभी मामलों को हमेशा के लिए समाप्त कराने की कार्यवाही कराने की कृपा करें

4. कृपया इस सम्बन्ध में सभी अधिकारियों को उचित निर्देश निर्गत करने की कृपा करें कि वे ऐसा कदापि नहीं करें कि कोई अधीनस्थ पुलिस अफसर कागज़ पर कहीं और तैनात है और वास्तव में अफसरों ने उन्हें कहीं और रख रखा हो.

डॉ नूतन ठाकुर
अमिताभ ठाकुर
लखनऊ

प्रतिलिपि- प्रमुख सचिव गृह, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

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चिटफंड घोटाले में फंसे पत्रकार कुणाल घोष की फोटो लेते वक्त मीडिया कर्मियों पर लाठी चार्ज

शारदा चिटफंड घोटाले में फंसे सांसद कुणाल घोष की फोटो ले रहे मीडिया पर कोलकाता पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। पुलिस ने मीडिया कर्मियों पर उस समय पर लाठी चार्ज कर दिया जब वह कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल के बाहर मीडियाकर्मियों पर लाठी चार्ज किया। दरअसल, पुलिस की ओऱ से अस्पताल में भर्ती कुणाल घोष की फोटो लेने से मना कर रही थी। सांसद कुणाल घोष ने गुरुवार को जेल में आत्महत्या का प्रयास किया था। सांसद घोष सारधा चिटफंड घोटाले के आरोपी हैं और आत्महत्या के समय वह जेल में थे।

आईसीयू से दूसरे वार्ड में शिफ्ट करने के दौरान बीमार हालत में कुणाल घोष ने मीडिया से कहा कि कहा कि सारदा चिटफंड घोटाले के मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। इस दौरान जैसे ही घोष के साथ सिपाहियों का दल आया। पुलिस ने चारों ओर से कुणाल घोष को घेर रखा था। इस दौरान मीडिया कर्मियों ने फोटो लेने और कुणाल घोष से बात करने की कोशिश की। तभी पुलिस के जवानों की ओर से मीडिया कर्मियों पर लाठी चार्ज हो गया। कोलकाता पुलिस पहले से ही दबाव की स्थति में थी और वो नहीं चाहती थी कि घोष घोटाले के बारे में मीडिया के किसी भी सवालों का जवाब दें। इसी के चलते पुलिस ने मीडिया कर्मियों को धक्का दिया, जिससे बात बिगड़ गई और धक्का मुक्की ने मारपीट का मोड़ ले लिया।

सारधा घोटाले में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार टीएमसी से निलंबित सासंद कुणाल घोष ने कहा है किघोटाले के कर्ताधर्ता खुलेआम घूम रहे हैं, उन्हें जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि कुणाल घोष ने एक दिन पहले ही जेल में काफी मात्रा में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। सारधा घोटाले में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार टीएमसी से निलंबित सासंद कुणाल घोष ने कहा है कि घोटाले के कर्ताधर्ता खुलेआम घूम रहे हैं, उन्हें जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि कुणाल घोष ने एक दिन पहले ही जेल में काफी मात्रा में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी।

कुणाल घोष ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या का प्रयास करने के पूर्व लिखे सुसाइड नोट में घोटाले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय के शामिल होने का आरोप लगाया है। यह पत्र सीबीआई प्रमुख के नाम लिखा गया था। सरधा चिटफंड घोटाले के मुख्य अभियुक्त कुणाल घोष का उक्त पत्र जेल अधिकारियों के हाथ लगा है, जो उन्होंने अलीपुर स्थित प्रेसीडेंसी जेल में आत्महत्या की कोशिश से पहले लिखा था। जेल में मिले इस पत्र की जांच की जा रही है। घोष ने शुक्रवार को 50 से ज्यादा नींद की गोलियां खाकर जान देने की कोशिश की थी। घोष की हालत अब खतरे से बाहर है। इस घटना के बाद से पश्चिम बंगाल सरकार में हड़कंप मचा हुआ है।

मुख्यमंत्री ने ममता ने जेल अधीक्षक सहित 3 अफसरों को निलंबित करने के साथ ही जेल मंत्री हैदर अजीज सफवी को भी हटा दिया। ममता ने तीन अन्य मंत्रियों को भी किनारे लगाने का निर्णय किया है। इसमें खाद्य प्रसंस्करण मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी, अल्पसंख्यक राज्यमंत्री गयासुद्दीन मोल्ला व बिना विभाग की मंत्री सावित्री मित्रा शामिल हैं। जेल सूत्रों के अनुसार पत्र बंगाली में लिखा है। इसके पूर्व भी घोष ने राज्य के कुछ ताकतवर लोगों पर आरोप लगाए थे। घोष ने इस पत्र में भी वही सब बातें लिखी हैं, जो उन्होंने कुछ दिनों पहले सीबीआई को भेजे 91 पृष्ठ के पत्र में बताई थीं। हाल ही में घोष ने कोर्ट में कहा था कि घोटाले से जिन लोगों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ उनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रमुख हैं। उन्होंने मांग की थी कि उन्हें और ममता को आमने-सामने बैठकर सवाल-जवाब किए जाएं।

घोष ने यह दावा भी किया था कि उनकी मौजूदगी में ममता और शारदा समूह के मालिक सुदीप्त सेन के बीच कलीमपोंग के डेलो हिल्स में मीटिंग हुई थी। इसके अलावा घोष ने ममता की उस पेंटिंग का भी जिक्र किया था, जो सेन और दूसरे उद्योगपतियों ने ऊंची कीमत पर खरीदा था। कई सुसाइड नोट मिलेघोष की बैरक से नींद की गोलियां और कई सुसाइड नोट मिले हैं। इसमें से एक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के नाम भी है। घोष की तबीयत कई दिनों से खराब थी और जेल के डॉक्टर ने ही उन्हें नर्व, ब्लड प्रेशर व नींद की गोली लेने की सलाह दी थी। पेशे से पत्रकार घोष शारदा ग्रुप की कंपनी बंगाल मीडिया लिमिटेड में मुख्य कार्यकारी रह चुके हैं। कुणाल के खिलाफ भादंवि की धारा 406 (विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत केस दर्ज किए गए थे । 2013 में 22 अप्रैल को एक निवेशक ने यह मामला दर्ज कराया था।

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दो परम चिटफंडियों सुब्रत राय और कुणाल घोष के दिन और मुश्किल हुए

: कुणाल घोष ने आत्महत्या की कोशिश की तो सुब्रत रॉय के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज हुआ : कोलकाता से खबर है कि तृणमूल कांग्रेस के निलंबित सांसद एवं सारदा घोटाला मामले में आरोपी कुणाल घोष ने शुक्रवार को प्रेसीडेन्सी सुधार गृह (जेल) में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. घटना के बाद जेल अधीक्षक, डॉक्टर और ड्यूटी पर मौजूद एक कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया और पूरे प्रकरण की जांच के लिए गृह सचिव बासुदेव बनर्जी के नेतृत्व में समिति गठित की गयी है. साथ ही घोष के खिलाफ आत्महत्या की कोशिश करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है. पश्चिम बंगाल के सुधारगृह सेवा मंत्री एच ए सफवी ने कहा कि घोष ने दावा किया था कि उन्होंने नींद की गोलियों खा ली है. उन्हें सरकारी एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उन्हें पिछले साल गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद से वह जेल में हैं.

एसएसकेएम के निदेशक प्रदीप मित्रा ने संवाददाताओं से कहा कि घोष को जब अस्पताल लाया गया था, उस समय वह अर्धनिद्रा में थे। मित्रा ने कहा, उन्हें सीसीयू में भर्ती कराया गया. उनके पेट की सफाई की गयी और नमूने फारेंसिक जांच के लिए भेज दिए गए हैं. घोष ने दावा किया कि उन्होंने नींद की 40 गोलियां खा ली हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा में दिए एक बयान में अधीक्षक, जेल के डॉक्टर और ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी को निलंबित किए जाने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि मामले की जांच के लिए गृह सचिव बासुदेव बनर्जी के नेतृत्व में एक समिति गठित की गयी है. उन्होंने कहा कि जांच पूरी होने तक अधीक्षक, जेल के डॉक्टर और ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी निलंबित रहेंगे.

उधर, नई दिल्ली से खबर है कि पिछले 9 महीने से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद सहारा समूह के मालिक सुब्रत रॉय की मुश्किलें हैं कि कम होने का नाम  ही नहीं ले रही हैं. एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने रॉय के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है. गौरतलब है कि जमानत हासिल करने के लिए सहारा समूह और खुद सुब्रत राय पिछले कुछ महीनों से 10000 करोड़ रुपए का इंतजाम करने में जुटे हुए हैं. इसके  चलते अपनी कुछ विदेशी प्रॉपर्टी बेचने के लिए अदालत ने उन्हें जेल परिसर में ही कॉन्फ्रेंस रूम की भी सुविधा दी थी. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अब जमाकर्ताओं को करोड़ों रुपये का भुगतान नहीं किए जाने से जुड़े मामले में सहारा समूह के खिलाफ मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज किया है.

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय को इस संबंध में सेबी से रिपोर्ट मिलने के बाद एजेंसी के मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा आपराधिक मामला दर्ज किया गया. उन्होंने कहा, सहारा समूह के खिलाफ मनी लांड्रिंग रोधी कानून के तहत एक मामला दर्ज किया गया है. जांच प्रगति पर है.  इस संबंध में सहारा समूह को भेजे गए ई-मेल का कोई जवाब नहीं आया। सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय मार्च से ही जेल में बंद हैं. निवेशकों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के पुनर्भुगतान को लेकर सहारा समूह लंबे समय से सेबी के साथ विवाद में है. सहारा समूह कहता रहा है कि उसने 93 प्रतिशत निवेशकों को सीधे भुगतान कर दिया है. प्रवर्तन निदेशालय इस बात की जांच कर रहा है कि कहीं अवैध परिसंपत्तियों का सृजन करने के लिए तो इस धन की मनी लांड्रिंग नहीं की गई. सूत्रों ने कहा कि सेबी को अभी तक मिले तथ्यों के आधार पर ईडी द्वारा शिकायत दर्ज की गई है. ईडी जांच तथ्यों के आधार पर पीएमएलए के तहत समूह की कुछ परिसंपत्तियों को कुर्क करने की कार्रवाई शुरू करेगा.

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दिवाली की पूर्व संध्या पर विदर्भ के छह किसानों ने आत्महत्या की.. कहां है नेशनल मीडिया.. किधर हैं राष्ट्रीय नेता…

विदर्भ (महाराष्ट्र) में किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है. कांग्रेस की सरकार से विदर्भ के लोग नाराज थे क्योंकि वह किसानों के राहत के लिए कुछ नहीं कर रही थी और ऋण जाल में फंसकर किसान लगातार आत्महत्याएं करते जा रहे थे. लोगों ने बड़ी उम्मीद से बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. लेकिन किसानों की समस्या जस की तस है. भाजपा और नरेंद्र मोदी को अभी बड़े-बड़े मुद्दों और बड़ी-बड़ी बातों से फुरसत नहीं है कि वे किसानों की तरफ झांकें. काटन और सोयाबनी की खेती-किसानी से जुड़े छह किसानों ने दिवाली की पूर्व संध्या पर खुदकुशी की है. कार्पोरेट मीडिया को नमो नमो करने से फुरसत नहीं है कि वह आम जन और आम किसान की खबरें दिखाए. किसी इलाके में खेती के संकट के कारण छह किसानों की आत्महत्या बड़ी खबर है और देश को हिलाने वाली है. लेकिन कोई मीडिया हाउस इन किसानों के घरों तक नहीं पहुंचा और न ही इनकी दिक्कतों पर खबरें दिखाईं. जिन घरों के मुखियाओं ने दिवाली से ठीक पहले आत्महत्या कर ली हो, उन घरों में दिवाली कैसी रही होगी, इसकी बस कल्पना की जा सकती है. विदर्भ खबर नामक एक ब्लाग पर विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने किसान आत्महत्याओं के बारे में विस्तार से लिखा है. इसे पढ़िए और सोचिए कि नेता जो बोलता है, मीडिया जो दिखाता है, क्या उतना ही देश है, क्या उतनी ही खबरें हैं, या बातें-खबरें और भी हैं जिन्हें लगातार दबाया, छुपाया, टरकाया जा रहा है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

Another ‘Black Dewali’ for Vidarbha farmers as six more farmers suicides reported on ‘Diwali Eve’

PM urged to intervene worsening  Agrarian Crisis

Nagpur : Complete cotton and soybean crop failure coupled with massive recession in cotton and soybean market price trading much below hostile minimum support prices (MSP) has added fuel in to existing despair and distress in debt-trapped Vidarbha cotton and soybean growing farmers as six more ill-fated farmers suicides reported on the eve of Diwali, four from most farm suicide affected region Yavatmal and one each from Akola and Amaravati  indentified as per reports are1.

Rajendra Chahand of village Kelzara, Dutta Chede of Umari (Pathar), Nagraj Mahadolhe of Parva, Arun Kurnule of Gangapur all Yavatmal district, Kisan Sanap of village Chincholi in Akola and Manoj Futane of Shendurjana-Ghat in Amaravati, taking toll 906 in 2014, Vidarbha Jan Andolan Samiti (VJAS) chief Kishire Tiwari said.

”Vidarbha region which is known as farm suicide capital of India since 2004 has voted BJP in recently concluded assembly election, same was trend in last parliament election of April 2014, as people have been disappointed by Congress ruled Governments at the centre and state, BJP has promised to address core issues of distress which is prevailing debt, loss making   market prices of cotton an soybean, rgent compensation for the crop failure  but healing touch from PM Modiji is not coming moreover State BJP leaders has lost is focus over the agrarian crisis of region as they are involved in ‘Power Politics’ hence now there is only hope from PM to intervene to stop this vidarbha farmers genocide” Tiwari urged.

‘High hopes and toll promises given by Indian prime minister and state leaders to more than 10 million cotton, soybean and paddy growing farmers that minimum support price will given on the basis formula that farmers investment plus 50% profit and drought affected dry land Maharashtra farmers to get complete farm loan waiver these promises has not even appeared in the manifesto of BJP but very worse 15 year experience of  Cong-NCP has no option left but recent apathy  is increasing  despair and gloom in cotton farming community  hence vidarbha farmers are no looking  towards PM to visit vidarbha and understand ground reality and resolve the farm debt, cotton soybean MSP issue urgently’ Tiwari said  

‘This year too earlier monsoon delayed by two months and now after 15 September there is dry spell and Govt. has already declared most of western vidarbh as drought prone too, hence issue raising minimum support price of cotton, soybean and paddy is critical and frem farm credit with complete loan waiver is must . Vidarbha Janandolan Samti (VJAS) has earlier too  drawn attention of  PM  toward the latest National Crime Records Bureau report that since 1995 to 2013 more than 3,00,000 farmland suicides reveal that every fifth farmer who ended his/her life in the country is dry land  cotton farmer from Maharashtra whereas  with 3,146 distressed farmers ending their lives last year, Maharashtra has topped the list of farmland suicides in the country hence this is need of the hour to adopt pro-poor farmers policies to stop innocent cotton  farmers genocide which was triggered in last regime of NDA when quantitative restrictions on import was lifted under the WTO conditions of free trade treaties, (VJAS) chief Kishore Tiwari said.

Globalization-Free trade besides Unpredictable rains with intermittent dry or wet droughts lead to crop failures and increasing cost of inputs and cultivation practices, mono-culture or dependence on a single crop only, poor awareness of agronomics, and lack of proper farm credit availability lead to an increased hold of private moneylenders are core issues Indian budget should address,said Tiwari, whose NGO has been documenting the Vidarbha crisis since 1995.

VJAS recalled promise of PM Modiji of  introducing the renowned farm scientist M S Swaminathan’s formula for fixation of MSP which provides for cost plus 50 per cent remuneration to the farmers as the basis of fixation of MSP for agricultural crops should be looked into during the process of finalization of Union Budget for 2014-15 that is only way to make agriculture far more sustainable besides ensuring no farmer was compelled to either leave this occupation or commit suicide.

As most of distressed  Small and marginal farmers who committing suicide are debt trapped hence complete loan waiver and  Fresh interest free short term crop loans whereas other farmers should be given crop loans at 2 per cent, urging for one time debt relief package should be provided for all farmers, Tiwari added.

As earlier agricultural development policies failed to remove ever-increasing stress on dying farmers allowing mass genocide of more than 3 lacs farmers mostly involved in to cash crops subjected free market  price speculations and needs protected economy on price front  with reintroduction  direct subsidies for promoting sustainable agriculture hence this appeal, Tiwari urged.

साभार :  विदर्भ खबर ब्लाग

विदर्भ जनआंदोलन समिति के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता किशोर तिवारी द्वारा दी गई सूचना पर स्थानीय मीडिया यानि महाराष्ट्र के अखबारों व कुछ अन्य जगहों पर छोटी से लेकर मझोली तक खबरें छपी हैं. वो खबरें कुछ इस तरह से है…

विदर्भ में 6 किसानों ने की खुदकुशी

नागपुर। महाराष्ट्र में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने आरोप लगाया है कि अधिकारियों की उदासीनता के कारण छह किसानों ने विदर्भ क्षेत्र में खुदकुशी कर ली। विदर्भ जनआंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने कहा कि मृतकों में चार यवतमाल जिले का, जबकि एक अकोला तथा एक अमरावती जिले का है। तिवारी ने कहा, दुख दूर होने की आस में किसानों ने लोकसभा तथा विधानसभा दोनों ही चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने वादा किया था कि वह कर्ज, कॉटन तथा सोयाबीन के बाजार मूल्य और फसल खराब होने पर मुआवजे से संबंधित मसलों को दूर करेंगे।

तिवारी ने कहा कि अधिकारियों की उदासीनता के कारण किसानों को जान देने के लिए मजबूर होना पड़ा। कार्यकर्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विदर्भ का दौरा करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष मॉनसून दो महीने देर से आया और 15 सितंबर के बाद सूखे के कारण फसलों को काफी नुकसान पहुंचा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, महाराष्ट्र में पिछले वर्ष 3,146 किसानों ने खुदकुशी कर ली थी। यह संख्या किसी भी राज्य से सर्वाधिक है।

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