हम दोनों बेहद अकेले हैं, जीने का कोई मकसद नज़र नहीं आता, ऐसे में हम पति-पत्नी अपनी मर्जी से जान दे रहे हैं!

( File Photo Sanjay Sinha )

Sanjay Sinha : आप घर से निकलिए। लोगों से मिलिए। लोगों से बातें कीजिए। यहां फेसबुक पर आइए। अपने दिल की बात कहिए। जो दिल में आए वो कीिजए। यूं ही किसी को गले लगा लीजिए। किसी के घर यूं ही पहुंच जाइए कि आज आपकी चाय पीनी है। किसी को घर बुला लाइए कि चलो आज चाय पीते हैं, साथ बैठ कर। किसी से मुहब्बत कर बैठिए। किसी को मुहब्बत के लिए उकसाइए। कुछ भी कीजिए। लेकिन खुद को यूं तन्हा मत छोड़िए। खुद को यूं गुमसुम मत रखिए। खुद में ऊब मत पैदा होने दीजिए। कुछ न सूझे तो किसी अनजान नंबर पर फोन करके यूं ही बातें करने लगिए, लेकिन करिए जरूर।

मैं यही सब उनसे कहता जिनकी चिट्ठी मुझे कल अपने दफ्तर में पढ़ने को मिली। चालीस साल के इस दंपति से काश मैं पहले मिला होता! मेरा दफ्तर नोएडा फिल्म सिटी में है। ये रोहित और रश्मि वट्टल नामक दंपति का घर मेरे दफ्तर से ज्यादा दूर नहीं रहा होगा। वो दोनों भी तो नोएडा में ही रहते थे। मुझे अफसोस है कि मैं उनसे पहले क्यों नहीं मिला?

मुझ जैसे पत्रकार के लिए कल का दिन बहुत अफसोस भरा था।

कल एक रिपोर्रटर मेरे कान में फुसफुसाया कि सर नोएडा में रहने वाले एक दंपति ने अकेलेपन से ऊब कर आत्महत्या कर ली तो मैं चौंक गया।

अकेलेपन से ऊब कर? भला तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?

रिपोर्टर ने बताया कि सर उन्होंने एक चिट्ठी छोड़ी है, जिसे मैंने पढ़ा है और कैमरे में शूट भी कर लाया हूं।

मैंने कहा कि मुझे चिट्ठी दिखाओ।

पूरी चिट्ठी हाथ से लिखी हुई थी। अंग्रेजी में थी।

चिट्ठी मैं पढ़ता जा रहा था और मेरा दिल सुन्न होता जा रहा था।

मैं नहीं चाहता कि सुबह-सुबह आपके लिए इस तरह की पोस्ट लिखूं। लेकिन क्या करूं, मरघट में बैठा इंसान सोहर भी तो नहीं गा सकता।

कल मैं सारी रात मरघट में ही बैठा रहा। हजारों-लाखों लोगों की भीड़ में घिरा रहा, लेकिन इस भीड़ में कोई किसी के साथ नहीं था। सबके सब अकेले थे। एकदम तन्हा। पति-पत्नी एक बिस्तर पर थे, लेकिन तन्हा थे। बच्चे घर में थे, लेकिन तन्हा थे। हर घर के बगल में एक घर था, लेकिन दोनों अगल-बगल होकर भी एक दूसरे से कोसों दूर थे। मुझे लाख लोगों की इस भीड़ में कोई किसी का नज़र नहीं आया।

ऐसा लग रहा था, सबमें होड़ लगी थी अपने अकेलेपन को जीने की।

जीने की?

हां-हां जीने की। वैसे ही जैसे नोएडा के रोहित और रश्मि जी रहे थे।

सबको तो यही लगता था कि ये दोनों जी रहे थे। दोनों के पास अपना घर था, गाड़ी थी, बैंक में पैसे थे, दोनों एक ही बिस्तर पर सोते भी थे, दोनों अपने पड़ोसियाें की नज़र में आदर्श दंपति भी थे। मतलब वो सब इस दंपति की ज़िंदगी में था, जो होना चाहिए। पर नहीं था अगर कुछ तो उनकी ज़िंदगी में कुछ नया नहीं था। कुछ अलग नहीं था। कुछ ऐसा नहीं था जो उन्हें जीने को उकसाता। इन्हें लगने लगा था कि ऐसे ही रोज सुबह जागना, काम पर जाना और काम से घर लौट आना ही अगर ज़िंदगी है तो इस ज़िंदगी का क्या करें?

मैं ये सब पढ़ रहा था, और खुद में डूबता जा रहा था। सचमुच जिसकी जिंदगी इतनी अकेली और उदास हो वो क्या करे?

इससे तो अच्छा होता कि उनकी ज़िंदगी में कुछ कमी होती। उनके पास काश अपना घर नहीं होता, किसी एक के पास नौकरी नहीं होती। पैसे की कमी होती। कुछ तो ऐसा होता कि उन्हें लगता कि उन्हें ये पाना है, और इसी चाहत में वो जीते। लेकिन नहीं, उनकी ज़िंदगी में सबकुछ का होना ही उनके लिए शाप बनता चला गया, और वो अपनी ही ज़िंदगी से ऊबते चले गए। और एकदिन इसी ऊब में उन्होंने इस पत्र को लिखा और अपनी जान दे दी।

पत्र इस तरह है-

“मैं रोहित अपनी पत्नी रश्मि के साथ आत्महत्या कर रहा हूं। ज़िंदगी जीने की जगह आत्महत्या करने का ये फैसला एकदम अचानक में लिया गया है, और हमें लगता है कि हमारे पास इस तरह मर जाने के सिवा कोई और दूसरा रास्ता नहीं बचा। कभी-कभी जिंदगी बहुत तेजी से करवट बदलती है और ऐसे में आपके पास खुद को खत्म कर लेने के सिवा और कोई विकल्प नहीं बचता।

बहुत मुश्किल होता है ऐसा फैसला करना। पर क्या करें? हम दोनों ज़िंदगी से ऊब गए हैं। हम दोनों बेहद अकेले हैं। हमें अब ज़िंदगी जीने का कोई मकसद नज़र नहीं आता। ऐसे में हम दोनों पति-पत्नी अपनी मर्जी से अपनी जान दे रहे हैं। मरने के बाद हम चाहते हैं कि हमारे शरीर को दान मान लिया जाए। हमारी मौत की जिम्मेदारी किसी और पर नहीं, क्योंकि हम पूरी तरह होश में ये फैसला ले रहे हैं।

हमारा कोई दोस्त नहीं। हमारी ज़िंदगी में ऐसा कोई नहीं जिसका दिल हमारे लिए धड़कता हो। ऐसे में हमने तय किया है कि हम अपनी जान खुद देकर खुद को आज़ाद कर लेंगे। आपको नहीं पता तन्हाई का दर्द कितना सालता है। हम अब और इस दर्द से गुजरने को तैयार नहीं।

रोहित और रश्मि”

मैं जानता हूं कि पत्र पढ़ कर आप भी सन्न रह गए होंगे।

रोहित और रश्मि जा चुके है। वो खबर बन चुके है। लेकिन आप अपने आसपास के रोहित और रश्मि को पहचानिए। उन्हें खबर बनने से रोकिए। उन्हें जीने के लिए उकसाइए। कहिए कि कुछ भी करें, लेकिन ये न करें। और कुछ न सूझे तो अपने भीतर के उसी प्यार को फिर जगाएं जिसे पंद्रह साल पहले रोहित ने रश्मि के लिए और रश्मि ने रोहित के लिए जगाया होगा।

उन्हें समझाइए कि ज़िंदगी अनमोल है। इसे यूं जाया कर देना तो कतई बुद्धिमानी नहीं।

हो सकता है रोहित और रश्मि को लगता हो कि उनकी मौत के बाद इस संसार में कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं। काश उन्हें किसी ने बताया होता कि कहीं दूर बैठा कोई संजय सिन्हा उनके लिए जीवन भर आंसू बहाता रहेगा! काश वो उसे पहले मिले होते! पहले मिले होते तो संजय ने उन्हें उकसाया होता कि कुछ भी करिए पर खुद को अकेला मत छोड़िए।

अकेलापन सजा है। सबसे बड़ी सजा। और इस सजा से कोई किसी को आजाद कर सकता है तो वो खुद आप हैं।

एक बार फिर दुहरा रहा हूं। घर से बाहर निकलिए। लोगों से मिलिए। जिसे मर्जी हो गले लगा लीजिए। जो दिल में आए वो कीजिए।

पर वो मत कीजिएगा, जिसे रोहित और रश्मि ने किया।

टीवी टुडे ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

खालिक भाई, आप यूं खुदकुशी करने वाले तो नहीं थे

Vivek Bajpai : अभी-अभी इटावा से एक हमारे मित्र ने एक दुखद समाचार सुनाया है, उसने बताया है कि इटावा से एबीपी न्यूज संवाददाता मो. खालिक ने पारिवारिक कलह से तंग आकर आत्महत्या कर ली हैं, अगर ये सच है (मेरा दिल अभी भी मनाने को तैयार नहीं हैं) तो खालिक की मौत से इटावा ने एक निर्भीक पत्रकार खो दिया हैं. मुझे पता है कि खालिक भाई आप जहां गए है वहां से कभी कोई नहीं वापस आता है, हमेशा दूसरों से सख्त सवाल पूछने वाले मो. खालिक आज मैं तुमसे आखिरी सवाल पूछ रहा हूं, क्यों किया ऐसा जघन्य अपराध. क्योंकि तुम ऐसे तो नहीं थे.  Mohd Khaliq BHAI REST IN PEACE.

Anant Paliwal : अब कब दिखेगी यह सफेद टोपी…..खालिक भाई, जिंदगी को छोड़कर आप ऐसे चले जाएंगे, इसका तो सोचा भी नहीं था। आज आप हम सबको छोड़कर चले गए तो यह ख्याल आ रहा है कि अब जब थे तो हम लोगों ने क्यों नही आपकी परेशानियों को समझा और आपको संकट से उबारने के लिए जुटे। feeling sad.

पत्रकार विवेक बाजपेई और अनंत पालीवाल ने उपरोक्त दोनों प्रतिक्रियाएं मोहम्मद खालिक के फेसबुक वॉल पर पोस्ट की हैं.

मूल खबर..

इटावा में एबीपी न्यूज के संवाददाता ने ट्रेन से कटकर दी जान

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इटावा में एबीपी न्यूज के संवाददाता ने ट्रेन से कटकर दी जान

इटावा से खबर है कि एबीपी न्यूज के संवाददाता मोहम्मद खालिक ने रविवार को नीलांचल एक्सप्रेस के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली. तलाशी लिए जाने पर उनकी जेब से एक सुसाइड नोट भी मिला है जिसको लेकर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. बताया जाता है कि मोहम्मद खालिक करियर और परिवार को लेकर तनाव में चल रहे थे. 44 वर्षीय मोहम्मद खालिक इटावा के मोहल्ला साबितगंज कोतवाली सदर निवासी थे. वे एबीपी न्यूज के संवाददाता थे. वे रविवार को इटावा रेलवे स्टेशन पर अपराह्न करीब साढ़े तीन बजे पहुंचे. वहां कई लोगों से बातचीत करने के बाद वह प्लेटफार्म एक से पश्चिमी की ओर चले गए.

करीब 15-20 मिनट पश्चात अप ट्रैक पर नीलांचल एक्सप्रेस तेज गति से गुजरी तब शोर-शराबा हुआ. मौके पर मोहम्मद खालिक का शव पड़ा था. उन्होंने कूदकर जान दे दी थी. जानकारी मिलते ही प्रभारी एसओ जीआरपी सुशील चंद्र शर्मा मौके पर पहुंचे. इस दौरान काफी संख्या में पत्रकार मौके पर आ गए. तलाशी पर मोहम्मद खालिक की जेब से एक पत्र मिला. जीआरपी ने शव का पंचनामा भरवाया. खालिक के पिता मुहम्मद तारिक ने बताया कि उनका पुत्र अपनी ससुराल पक्ष को लेकर काफी परेशान रहता था.  वहीं कुछ लोगों का कहना है कि करियर संबंधी चिंताएं भी उन्हें परेशान किए हुए थीं.

इसे भी पढ़ें….

खालिक भाई, आप यूं खुदकुशी करने वाले तो नहीं थे

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: