शहीद दिवस के बहाने ‘भगत, गांधी, अंबेडकर और जिन्ना’ पर सुमंत भट्टाचार्य ने छेड़ी गंभीर बहस

‘एक भी दलित चिंतक ने भगत की शहादत को याद नहीं किया’, अपने इन शब्दों के साथ शहीद दिवस के बहाने संक्षिप्ततः अपनी बात रखकर वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य ने फेसबुक पर ‘भगत, गांधी, अंबेडकर और जिन्ना’ संदर्भित एक गंभीर बहस को मुखर कर दिया। भगत सिंह की शहादत को याद न करने के उल्लेख के साथ उन्होंने लिखा- ”गोडसे को तब भी माफ किया जा सकता है..क्योंकि गांधी संभवतः अपनी पारी खेल चुके थे। पर गांधी को इस बिंदु पर माफ करना भारत के साथ अन्याय होगा। भगत सिंह पर उनकी चुप्पी ने नियति का काम आसान कर दिया, ताकि नियति भारत के भावी नायक को भारत से छीन ले। यहीं आकर मैं गांधी के प्रति दुराग्रह से भर उठता हूं। पर जिन्नाह और अंबेडकर तो हिंसावादी थे..एक मुंबई में गोलबंद होकर मारपीट करते थे, दूसरे डायरेक्ट एक्शन के प्रवर्तक। इनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने चाहिए। शाम तक इंतजार के बाद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है, एक भी दलित चिंतक ने भगत की शहादत को याद नहीं किया…..क्यों..?”

पालतू बाघ, पागल युवक, जंगली जनता और जाहिल मीडिया

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Sumant Bhattacharya : कल दिल्ली जू में जो कुछ भी हुआ, साबित हुआ कि हम अपने परिवेश के प्रति अज्ञानता की हद में जी रहे हैं… चिड़ियाघर के घेरे में जन्मे बाघ को मकसूद और दीवार के ऊपर खड़े तमाम तमाशबीनों ने ऐसा करने के लिए उकसाया… मकसूद को विजय (बाघ का नाम) ने नहीं, तमाशबीनों ने मिलकर मारा… विजय के भीतर सिर्फ कौतुहल था… फुटेज देखिए….पंद्रह मिनट तक विजय की हरकतें सिर्फ उसके कौतुहल को ही दर्शा रही हैं.