एक पत्रकार को जीवन में पहली बार ‘अछूत’ होने का अहसास क्यों हुआ?

प्रोफेशनल लाइफ के २८ साल में मैंने खूब भाड़ झोंकी है। करीब ढाई दशक तक मीडिया संस्थानों की शोषण की चक्की में खुद को हँसते- हँसते पिसवाया। जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर  पर एक से एक निकृष्ट मालिकों के अधीन काम करने का कटु अनुभव रहा। कुछ संस्थानों की नौकरी को मैंने खुद छोड़ दिया तो कुछ संस्थानों ने मुझे निकाल दिया। प्रोफेशनल लाइफ के पहले पंद्रह साल में मुझे नौकरी जाने का थोड़ा दुःख भी होता था। मन में टीस उठती थी कि कठोर परिश्रम और सत्यनिष्ठा एक झटके में व्यर्थ चली गई, लेकिन पिछले एक दशक से मैं इस मामले मैं बिलकुल संवेदनहीन हो गया हूँ। नौकरी जाना कोई मसला नहीं। 

प्रोफेशनल्स को कहीं न कहीं कम या ज्यादा में कुछ न कुछ काम मिल ही जाता है। कोई भी संस्थान छोड़ने के बाद सहयोगियों से मित्रवत सम्बन्ध बने ही रहते हैं, जो भावनात्मक ऊर्जा और सुरक्षा का सुखद अहसास कराते हैँ। यह भी एक प्रकार की पूँजी है, लेकिन पिछले आठ- दस महीने से मुझे खुद के अछूत होने का अहसास हो रहा है। यह अजीब दुःखद अनुभव है, लेकिन है कटु सत्य।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान के सोशल मीडिया सेल की अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए मैंने पिछले साल इसे छोड़ दिया था। मैंने प्रोफेशनल्स की तरह व्यवहार करते हुए बाकायदा एक माह का नोटिस दिया था, लेकिन सेल चलाने वाली कंपनी के लोगों ने दो कौड़ी के सड़क छाप दुकानदार की तरह मुझे व्हाट्सएप पर ही बर्खास्त कर दिया। अनुबंध तोड़ने और सीएम के नाम से डरा-धमका कर २४ घंटे काम लेने और आग्रह-दुराग्रह से अन्य कम्पनीज के लिए बिना भुगतान दिए काम लेने और आपराधिक साजिश रचने के मामले में मेरी कंपनी से कानूनी लड़ाई चल रही है। इस बीच, कंपनी के कर्ता-धर्ताओं ने सीएम सोशल मीडिया सेल के अन्य कर्मचारियों के मुझ से संपर्क रखने पर बैन लगा दिया है। उनमें इतना खौफ है कि कोई मोबाइल या व्हाट्सप्प/ मैसेंजर पर भी मुझसे बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।

उन्हें डर है कि उनका व्हाट्सप्प/ मैसेंजर हैक हो सकता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है जो कंपनी के कर्ता-धर्ता छिपाना चाहते हैं ? प्रदेश के शीर्ष अधिकारी सीएम सोशल मीडिया सेल का काम आउटसोर्स करके निश्चिन्त हैं। उनकी बला से कंपनी अपने स्टाफ का खून निचोड़ने तक शोषण करे।  मेरी शिकायत पर भी किसी शीर्ष अधिकारी ने यही टिप्पणी की है कि सरकार से कोई अनुबंध नहीं हुआ था।  दूसरे शब्दों में यदि सरकार से आपका कोई अनुबंध नहीं हुआ है तो किसी भी कंपनी को श्रम कानूनों को कुचलने का पूरा अधिकार है।

दिन-रात प्रोफेशनलिज्म का ढोल पीटने वाले कंपनी के इन कर्ता-धर्ताओं ने मुझसे उस दिन भी काम कराया जब हाई ब्लड प्रेशर से मेरी नाक से बहुत खून बहा था। साफ़ है कंपनी के कर्ता-धर्ता बौद्धिक दिखने का ढोंग भले ही करते हों, लेकिन उनकी मानसिकता निर्माण मजदूरों का ठेका लेने वाले ठेकेदार से ज्यादा  नहीं है। कंपनी के कर्ता-धर्ता नहीं चाहते कि सीएम सोशल मीडिया सेल  में चल रहे श्रम कानूनों के उल्लंघन और मानवाधिकारों के हनन की  बात सामने आये या अन्य स्टाफ भी अपने हक़ की मांग करने लगे। इसलिए उन्होंने मुझे ही ‘अछूत’ बना दिया। कमाल है २१वीं सदी में ऐसी भी कंपनी है जो कर्मचारियों को अपना दास समझती है।

विश्वदीप नाग
स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल
मोबाइल + 917649050176

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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उफ्फ… दैनिक जागरण अलीगढ़ और ईनाडु टीवी हैदराबाद में हुई इन दो मौतों पर पूरी तरह लीपापोती कर दी गई

अलीगढ दैनिक जागरण के मशीन विभाग में कार्यरत एक सदस्य की पिछले दिनों मशीन की चपेट में आकर मृत्यु हो गई. न थाने ने रिपोर्ट लिखा और न ही डीएम ने कुछ कहा. शायद सब के सब जागरण के प्रभाव में हैं. यह वर्कर 2 दिन पहले वहां तैनात किया गया था. उसका भाई वहां पहले से कार्यरत था. पंचनामा जबरन कर लाश को उठवा दिया गया. बताया जाता है कि अलीगढ़ दैनिक जागरण में शाफ्ट टूट कर सिर में लगने से मौत हुई.

यह कर्मचारी दो दिनों से ड्यूटी पर आ रहा था और उसका ट्रायल लिया जा रहा था. दैनिक जागरण प्रबंधन ने इसे रोड एक्सीडेंट दिखा दिया. पीड़ित को कहीं से कोई मदद नहीं मिली. कर्मचारी का नाम केशव प्रजापति बताया जाता है. घटना 24 सितंबर की रात ढाई बजे की है. कर्मचारी का मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को कई बार बुलाया गया लेकिन पुलिस नहीं आई. पंचनामा जागरण प्रबंधन के निर्देश के अनुसार भरा गया.

उधर, पत्रकार अमित सिंह चौहान (जी न्यूज में कार्यरत) के भाई यशपाल सिंह जो कि ईनाडु टीवी डिजिटल के हिंदी डेस्क पर कंटेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे, का 19 सितंबर 2016 को निधन हो गया.  डॉक्टर के अनुसार यशपाल सिंह का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ. यशपाल सिंह को उनके सहकर्मियों द्वारा समय से हैदराबाद के मशहूर ग्लोबल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था.  लेकिन अस्पताल की तरफ से एक लाख रुपए सिक्योरिटी के रूप में जमा करने को कहा गया तो ऐसा हो न सका क्योंकि किसी सहकर्मी के पास पैसा नहीं था. हालांकि ईलाज पर जो खर्च हो रहा था, इसके लिए पैसे लगातार जमा किए जा रहे थे. लोगों ने आनन फानन में ईनाडु दफ्तर को पूरी बात से अवगत कराया. बावजूद इसके ऑफिस से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई. यशपाल सिंह के फैमिली मेंबर से बात होने के बाद और पहुंचकर पूरे पैसे चुकाने के आश्वासन के बाद भी ऑफिस ने पैसे जमा नहीं किए. इससे इलाज के आभाव में 30 वर्षीय यशपाल सिंह का उक्त तारीख को रात दस बजे निधन हो गया.

यशपाल सिंह के बड़े भाई पत्रकार अमित फ्लाइट से जब तक हैदराबाद पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अमित सिंह ने भाई के निधन के बाद लापरवाही के कारण हत्या का केस दर्ज कराया है. इसकी स्थानीय एलबी नगर पुलिस जांच कर रही है. मामला बडे मीडिया हाउस से जुड़े होने के कारण पुलिस पर काफी दबाव है. अस्पताल प्रशासन और ईनाडु ग्रुप मामले को एक दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. इस मामले की रामोजी फिल्मसिटी में खूब चर्चा है. खबर यह भी है कि बीमारी के बाद भी यशपाल सिंह को काम से छुट्टी नही मिली थी. इसके कारण खराब तबीयत में उनने निधन से एक दिन पहले तक आफिस में काम किया था. यशपाल सिंह इसके पहले दिल्ली में एपीएन न्यूज व खबर भारती में काम कर चुके हैं. यशपाल यूपी के बहराइच जिले के रहने वाले थे. ईनाडु प्रबंधन ने मामला दबाने की लाख कोशिश की लेकिन पत्रकारों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है.

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गोरखपुर स्टेशन पर कूड़ेदान में भोजन करता वो युवक और एसी कोच में उबलता मेरा बेइमान मिडिल क्लास मन (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : गोरखपुर में आयोजित कंटेंट मानेटाइजेशन की वर्कशाप से बनारस जाने के लिए गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने से पहले एक अजीब दृश्य देखा. एक युवक डस्टबिन में दोनों हाथ डाले मूंगफली बीन-बीन कर खा रहा था. मोबाइल कैमरा आन किया और रिकार्ड करने लगा. मोबाइल कैमरा आन रखते हुए ही उसके नजदीक गए, आहिस्ते से ताकि वह जान न सके कि उसकी रिकार्डिंग हो रही है. देखा तो डस्टबिन में बाकी सारा अखाद्य कूड़ा एक तरफ कर कर के यह युवक सिर्फ मूंगफली के छिलकों के बीच बची साबूत मूंगफली को खोज रहा है और मिलते ही उसे चबा रहा है. (वीडियो देखने के लिए नीचे दिया गया पहला वीडियो लिंक क्लिक करें)

तुम्हारी इस दशा के लिए हम सब पापी हैं दोस्त, हम सब अलग-अलग चुपके-चुपके भोगेंगे, शायद यही हमारा पश्चाताप है, शायद यही हमारी नियति है.

बीच बीच में वह मूंगफली के छिलके खा रहा है. वीडियो बनाते हुए मन में तरह तरह के भावुक किस्म के भाव आ रहे थे. कैसा देश है अपना. कहां लोग भूखे जी रहे हैं और कहां सफाई अभियान चल रहा है. पहले सबका पेट तो भरो यार. भरे पेट वाला सफाई और स्वास्थ्य का महत्व खुद समझ जाता है. जब पेट खाली हो तो उसे सफाई और गंदगी में फर्क समझ नहीं आता क्योंकि उसे खाना चाहिए और खाना अगर गंदगी के बीच छिपा हो तो वह उसे खोजकर खाएगा भले ही उस संक्रमित खाने से वह बीमार पड़ जाए या मर जाए. पहला वीडियो बनाकर रुका और देखता रहा. फिर जी नहीं माना. वह लड़का लगातार खाता जा रहा था.

दुबारा वीडियो बनाना शुरू किया. अगल बगल के लोग मेरे वीडियो बनाने से थोड़े चौकन्ने हुए. इसलिए नहीं कि कोई युवक कूड़ेदान से कुछ बीन बीन कर खा रहा है. इसलिए कि कूड़े से बीन बीन कर खाते हुए को कोई ठीक ठाक दिखने वाला शख्स रिकार्ड क्यों कर रहा है. दबे कुचले गरीब खाना बीनते युवक की फिल्म बनाते मुझे देख लोग चौकन्ने हुए और एक बच्चा चला आया देखने कि आखिर अंकल डस्टबिन पर फोकस कर क्या चीज शूट कर रहे हैं या कि यह युवक डस्टबिन से क्या खा रहा है. (यह वीडियो देखने के लिए नीचे दिया गया दूसरा वीडियो लिंक क्लिक करें)

दूसरी फिल्म बनाने के बाद मैंने अपने मिडिल क्लास मन की एक न सुनी और ट्रेन खुलने से पहले की लग रही आवाज के बीच दौड़ पड़ा नजदीकी दुकान पर. वहां पैटीज नमकीन बिस्कट फ्रूटी आदि मिले जिसे फटाफट खरीदकर लाया और कूड़े में बीन कर खा रहे युवक को देने लगा. आश्चर्य ये कि उस लड़ने ने पहले तो लेने से मना करते हुए मुझे इगनोर किया. बाद में जब मैंने जिद की तो उसने हाथ में लेकर मेरे दिए खाद्य पदार्थ को कूड़े में तिरस्कार से डाल दिया और मूंगफली के छिलके बीन बीन खाने लगा. (यह वीडियो देखने के लिए नीचे दिया गया तीसरा वीडियो लिंक क्लिक करें)

अगल बगल खड़े कुछ गरीब किस्म के लोग बोलने लगे कि ये ऐसा ही है, दिया हुआ नहीं खाता है. मुझे जाने क्यों मंटो की कहानी याद आ गई ‘खोल दो’. कहीं ऐसा तो नहीं कि इस युवक को यकीन ही न हो कि उसे कोई ठीकठाक खाना खाने को दे सकता है. इसीलिए वह दिए जा रहे पदार्थ को कूड़ा मानकर कूड़ेदान में डाल देता हो. यानि उसे लगा हो कि कोई उसे कूड़ा दे रहा हो कूड़ेदान में डालने के लिए. मैं सिर से पैर तक झनझना गया. किस मुल्क में रहता हूं भगवान. दलालों चोरों हरामियों शोषकों के रूप में मौजूद हमारे देश के पूंजीपती व्यापारी नेता अफसर पत्रकार सबके सब दोनों हाथ से लूटे जा रहे हैं जिसके कारण देश की बहुत बड़ी आबादी सामाजिक और आर्थिक रूप से अपना हक पाने से बेदखल है जिस कारण वह भुखमरी की तरफ जाने को मजबूर है.

इन वीडियोज को यूट्यूब पर अपलोड तो कर दिया था अगले ही एक दो दिन बाद लेकिन इस पर लिखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. क्या लिखूं. वही दुख दरिद्रता दयनीयता दासत्व दैन्यता की कहानी. वही शोषण उत्पीड़न लूट स्वार्थ की पुरानी कहानी. वही बाजारू इकानामी के जरिए अमीरों के बीच पूंजी केंद्रीकरण की पुरानी कहानी. वही बेहद स्वार्थी और लिजलिजे दोगले मिडिल क्लास की कहानी. सच में अब बार बार लगता है कि कैसे हम सब अपनी आंखों से ये सब देखने के बाद भी बड़े आराम से अपने मजबूत सीमेंट ईंटों से बनी सुंदर दीवारों में सुख से जी पाते हैं. मैं दिल से कह रहा हूं तुम सब जो सुंदर सफल सुंगधित दिखते हो, असल में अपने अपने अंधेरे में बेहद बौने घटिया दुखी निकम्मे तिरस्कृत और श्रापित हो. हे इस देश सिस्टम के चारों स्तंभों समेत समाज के सभी गतिमान अंगों-प्रत्यंगों, झांकना अपने अंदर. तुम्हें अगर अपने मुल्क के ढेर सारे लोगों के इस हाल पर विचलन नहीं होता तो याद रखना, तुम्हें ऐसे कष्टदायी मुश्किल दिन प्रकृति द्वारा प्रदत्त किए जाएंगे कि न तुम सह सकोगे न तुम रो सकोगे. याद रखना. तीनों वीडियो लिंक नीचे दिए जा रहे हैं. हर एक को धैर्य से देखिए अंत तक.

पहला वीडियो लिंक :

https://www.youtube.com/watch?v=BJSw_fHVU34

दूसरा वीडियो लिंक :

https://www.youtube.com/watch?v=WoFd8zy57EE

तीसरा वीडियो लिंक :

https://www.youtube.com/watch?v=GgBh7vmcx9Y

मैं गोरखपुर से बनारस वाली ट्रेन के एसी डिब्बे में सवार तो हो गया लेकिन पूरे रास्ते कूड़ेदान से मूंगफली के छिलके बीनकर खाने वाले बेहद गरीब और अनाथ युवक के बारे में सोच सोच कर उबलता रहा. मन करता जा कर उतर कर देख लूं कि मेरा दिया वह खा रहा है या नहीं. आशंका यह भी हो रही थी कि कहीं उसे दिया गया खाद्य सामग्री कोई दूसरा फर्जी और उचक्का छाप गरीब न छीन ले उड़े. पर यह खयाल भी मुझे शर्म से गड़ा देता कि अरे बेटा यशवंत, तुमने कोई साल भर की खाद्य सामग्री तो उसे दे नहीं दी कि लोग लूटने लगेंगे और उसका खाद्य सामाग्री का अंत हो जाएगा और तुम्हारा प्रयास निरर्थक हो जाएगा.तुमने बस अपने तात्कालिक मिडिल क्लास भावावेग को तुष्ट करने के लिए और इसी बहाने एक खबर / एक फेसबुक पोस्ट / कुछ वीडियो बना लिए, मानेटाइज करने के लिए / वाहवाही पाने के लिए.

जाने कितने तरह के और कैसे कैसे अच्छे बुरे घृणित आध्यात्मिक भाव विचार आते रहे लेकिन यह सच है कि मैं बनारस पहुंचने तक अबनार्मल असमान्य बना रहा. कई बार यह भी लगा कि मुझे बनारस जाने की जगह कहीं भी इस ट्रेन से यूं ही उतर जाना चाहिए और बिना प्लान बिना सोच बिना मंजिल बिना विचार जीते जाना चाहिए, शायद यही मेरा पश्चाताप हो. शायद इसी से मुझे मुक्ति मिले. शायद…. !!!!!! पर ऐसा कर न सका. बस यही आखिर में उस युवक से मन ही मन मुखातिब होकर यह कहता रहा, कहता रहा, कहता रहा… कि तुम्हारी इस दशा के लिए हम सब पापी हैं दोस्त, हम सब अलग-अलग चुपके-चुपके भोगेंगे, शायद यही हमारा पश्चाताप है, शायद यही हमारी नियति है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


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