उमेश चतुर्वेदी, विनीता यादव, अशोक वेंकटरमानी और उमेश कुमावत की नई पारी

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी अब आकाशवाणी के साथ जुड़ गए हैं. प्रसार भारती ने उमेश को आकाशवाणी का सलाहकार बनाया है. बलिया के रहने वाले उमेश लंबे समय तक प्रिंट, टीवी, रेडियो और इंटरनेट मीडिया आदि माध्यमों के साथ काम करते रहे हैं.

एबीपी न्यूज चैनल की चर्चित चेहरा विनीता यादव ने संस्थान को अलविदा कह दिया है. वह न्यूज नेशन चैनल में एडिटर (इनवेस्टीगेशन) बनी हैं. एबीपी न्यूज में विनीता दशक भर से थीं और उन्होंने ढेर सारी चर्चित स्टोरीज कीं. एबीपी न्यूज में विनीता स्पेशल करेस्पोंडेंट थीं. 16 साल से मीडिया में सक्रिय विनीता शानदार काम के लिए कई बार सम्मानित की जा चुकी हैं. वे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की निदेशक भी रह चुकी हैं.

एक अन्य जानकारी एबीपी न्‍यूज से ही है. एबीपी न्यूज नेटवर्क के पूर्व सीईओ अशोक वेंकटरमानी ने क्रोम डाटा एनालिटिक्स एंड मीडिया नामक कंपनी के साथ बतौर निदेशक अपनी नई पारी शुरू की है. यह कंपनी क्रोम डीएम ब्रॉडकास्‍ट, डिस्‍ट्रीब्‍यूशन, ऑडिट्स और प्राइमरी मीडिया रिसर्च क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रही है.

उमेश कुमावत फिर से एबीपी न्यूज वापस आ गए हैं. वे दो महीने पहले एबीपी न्यूज से टीवी9 मराठी में मैनेजिंग एडिटर पद पर गए थे. टीवी9 की खराब हालत देख उन्होंने इस्तीफा देकर घर वापसी करना बेहतर समझा. अबकी वे एबीपी न्यूज की जगह एबीपी माझा से जुड़े हैं और उन्हें सीनियर एडिटर का पद मिला है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जनसत्ता में ‘दुनिया मेरे आगे’ स्तंभ शुरू होने की कहानी बता रहे पत्रकार उमेश चतुर्वेदी

Umesh Chaturvedi : नवभारत टाइम्स में जब मेरे गुरू डॉक्टर रघुवंश मणि पाठक के गुरू और हिंदी के प्रकांड विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र संपादक थे, तब संपादकीय पृष्ठ पर एक स्तंभ सिर्फ रविवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन प्रकाशित होता था -निर्बंध..तब अच्युतानंद मिश्र वहां कार्यकारी संपादक थे..चूंकि मैं हिंदी में एमए करके पत्रकारिता करने आया था, लिहाजा उन दिनों हिंदी की प्रकीर्ण विधाओं मसलन डायरी, गद्यगीत, ललित निबंध आदि से मेरा कुछ ज्यादा ही लगाव था। निर्बंध कुछ-कुछ ललित निबंध जैसा ही स्तंभ था..उन दिनों अपनी भी कच्ची-पक्की लेखनी से लिखे आलेख निर्बंध में छपे।

बाद में जब अच्युतानंद मिश्र जी जनसत्ता के संपादक बने तो उन्होंने अखबार को रिलांच करने की योजना बनाई। कोशिश भी की, क्यों नाकाम हुई, ये तो वही बताएंगे। लेकिन उन दिनों तक उनका स्नेह मुझे और भाई अजित राय को खूब मिलना शुरू हो गया था। उस स्नेह हासिल करने में तब के प्रतापी अखबार जनसत्ता में नौकरी पाने की लालचभरी उम्मीद भी छुपी हुई थी। उन्हीं दिनों मैंने अपनी सीमा जानने के बावजूद एक सुझाव दिया था..जनसत्ता में भी निर्बंध जैसा स्तंभ छपना चाहिए। मैं तब बहुत छोटा और बच्चा ही था। इसलिए इसका श्रेय तो मैं नहीं ले सकता। लेकिन इतना जरूर है कि तब शायद ऐसा कुछ अच्युता जी के दिमाग में भी चल रहा था। इसलिए संपादकीय पेज का जब नया लेआउट उन्होंने तैयार किया तो उसमें निर्बंध जैसा भी स्तंभ जरूर रहा। जिसे लोग ‘दुनिया मेरे आगे’ नाम से जानते हैं।

तब से लेकर यह स्तंभ लगातार ना सिर्फ चल रहा है, बल्कि काफी लोकप्रिय भी है। इस स्तंभ में पहला आलेख अच्युताजी ने ही लिखा था- संपादक की भाषा-। हाल में जनसत्ता के मौजूदा संपादक मुकेश भारद्वाज जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने दुनिया मेरे आगे की लोकप्रियता बने रहने की जानकारी दी। इस स्तंभ में पहले भी काफी छपा हूं..लेकिन भारद्वाज जी की जानकारी के बाद मैं लोभ संवरण नहीं कर पाया और एक आलेख भेज दिया। वही आज के जनसत्ता में साया आलेख आपके सामने है। आभार मुकेश जी…

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

काश कि बीबीसी अच्युता जी की इस किताब को भी देख लेता

भारतीय जनसंचार संस्थान में हमारे सहपाठी रहे टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस पर किताब लिखी है. ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ़ हिंदू इंडिया’….उसके आधार पर गीता प्रेस को बीबीसी ने उग्र हिंदुत्व का पैरोकार संस्थान बताया है… बीबीसी की रिपोर्ट में गीता प्रेस को गांधी का विरोधी भी बताया गया है… हालांकि हाल के दिनों में वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र के संपादन में गीता प्रेस के व्यवस्थापक-संपादक रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार के पत्रों का संग्रह निकला है-पत्रों में समय-संस्कृति… उसमें शामिल पत्र कुछ और ही कहानी कहते हैं…

हनुमान प्रसाद पोद्दार को गांधी ने ही सुझाव दिया था कि विज्ञापन ना लेना… कल्याण में कभी विज्ञापन नहीं लिया गया… कल्याण के ईश्वर अंक के लिए गांधी ने भी लिखा… प्रेमचंद प्रगतिशील थे… फिर भी उन्होंने कल्याण के लिए कई लेख लिखे… लेकिन बीबीसी का ध्यान इस पर नहीं है… आखिर सिर्फ उग्र हिंदुत्व के पक्ष को ही क्यों उभारा जा रहा है… काश कि बीबीसी अच्युता जी की इस किताब को भी देख लेता…ऐसी रिपोर्ट बीबीसी की साख के अनुरूप नहीं है.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें:

एक छापाख़ाना, और हिंदू इंडिया बनाने की मुहिम

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा और रामबहादुर राय को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती

Shambhunath Shukla : जिन तीन पत्रकारों को पद्म पुरस्कार मिला है उनका योगदान साहित्य व शिक्षा क्षेत्र में बताया गया है। मगर तीनों में से किसी ने भी जवानी से बुढ़ापे तक कोई चार लाइन की कविता तक नहीं लिखी। यहां तक कि नारे भी नहीं। ये तीन पत्रकार हैं स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा (दोनों को पद्म भूषण) और रामबहादुर राय को पद्म श्री। पत्रकारों को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

Umesh Chaturvedi : जयप्रकाश आंदोलन के अगुआ… शुचिता की पत्रकारिता के पैरोकार… ईमानदार कलम… जयप्रकाश नारायण के शिष्य… गांधी विचार के प्रबल अनुयायी…. चंद्रशेखर, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्रियों के नजदीकी होने के बावजूद राजनीति के आंगन में सहज निर्विकार शख्सियत… यथावत पाक्षिक के संपादक… रामबहादुर राय के लिए कई और विशेषण हो सकते हैं. उन्हें पद्मश्री मिलने पर हार्दिक बधाई. यह बात और है कि वे इससे भी कहीं ज्यादा के हकदार हैं.

पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिंदी का ये कौन बड़ा अखबार है जो पहले कांग्रेस का चाटुकार था, आज भाजपा का चाटुकार है

Umesh Chaturvedi : हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक बदलाव का दौर चल रहा है..यह बदलाव अंदर से है या सिर्फ दिखावे का..इसे तय पाठक ही करेंगे..हिंदी का एक बड़ा अखबार है..16 मई 2014 से पहले तक पूरे दस साल तक उसके बीजेपी बीट रिपोर्टर का एक ही काम होता था..बीजेपी की आलोचना करना..बीजेपी से जुड़ी रूटीन खबरें नहीं करना..

यह ऐसी सच्चाई है, जो अखबार के हालिया अतीत के पन्नों में दर्ज है..तब वहां के लेखों में चाहें वह लेख संपादक ने लिखे हों या किसी और ने..सिर्फ कांग्रेस की प्रशंसा ही होती थी..तब कुछ सुधीजनों को वह पत्र कांग्रेस का मुखपत्र जैसा लगता था..लेकिन 16 मई 2014 के बाद हालात बदल गए हैं..अब उस अखबार में मोदी जी का गुणगान हो रहा है..बीजेपी की सकारात्मक खबरें छप रही हैं..सवाल यह है कि पत्र का 16 मई के पहले का रूख सही था या अब का स्टैंड जेनुइन है..आप विचार करें.

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: