दुनिया में फिर से शीतयुद्ध शुरू… अबकी जाने क्या होगा अंजाम…

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते जब यह घोषणा की कि वे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर जाॅन बोल्टन को लाएंगे और माइक पोंपियो को विदेश मंत्री बनाएंगे, तभी मैंने लिखा था कि इन दोनों अतिवादियों के कारण अब नए शीतयुद्ध के चल पड़ने की पूरी संभावना है। इस कथन के चरितार्थ होने में एक सप्ताह भी नहीं लगा। अब ट्रंप ने 60 रुसी राजनयिकों को निकाल बाहर करने की घोषणा कर दी है।

अमेरिका अब सिएटल में चल रहे रुसी वाणिज्य दूतावास को बंद कर देगा और वाशिंगटन व न्यूयार्क में कार्यरत राजनयिकों को यह कहकर निकाल रहा है कि वे जासूस हैं। अमेरिका के नक्शे-कदम पर चलते हुए 21 राष्ट्रों ने अब तक लगभग सवा सौ से ज्यादा रुसी राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकालने की घोषणा कर दी है। इन देशों में जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क, इटली जैसे यूरोपीय संघ के देश तो हैं ही, कनाडा और उक्रेन जैसे राष्ट्र भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में इस तरह की यह पहली घटना है। किसी एक राष्ट्र का इतने राष्ट्रों ने एक साथ बहिष्कार कभी नहीं किया।

यह कूटनीतिक बहिष्कार इसलिए हो रहा है कि 4 मार्च को ब्रिटेन में रुस के पुराने जासूस कर्नल स्क्रिपाल और उसकी बेटी यूलिया की हत्या की कोशिश हुई। वे दोनों अभी अस्पताल में अचेत पड़े हुए हैं। इस हत्या के प्रयत्न के लिए ब्रिटेन ने रुस पर आरोप लगाया है। रुस ने अपने इस पुराने जासूस की हत्या इस संदेह के कारण करनी चाही होगी कि यह व्यक्ति आजकल ब्रिटेन के लिए रुस के विरुद्ध फिर जासूसी करने लगा था। इस दोहरे जासूस को रुस में 2005 में 13 साल की सजा हुई थी लेकिन 2010 में इसे माफ कर दिया गया था। तब से यह ब्रिटेन के शहर सेलिसबरी में रह रहा था। रुस ने ब्रिटिश आरोप का खंडन किया है और कहा है कि अभी तो इस मामले की जांच भी पूरी नहीं हुई है और रुस को बदनाम करना शुरु कर दिया गया है।

यह सबको पता है कि ब्रिटेन की यूरोपीय राष्ट्रों के साथ आजकल काफी खटपट चल रही है और ट्रंप और इन राष्ट्रों के बीच भी खटास पैदा हो गई है लेकिन मजा देखिए कि रुस के विरुद्ध ये सब देश एक हो गए हैं। जहां तक रुसी कूटनीतिज्ञों के जासूस होने का सवाल है, दुनिया का कौनसा देश ऐसा है, जिसके दूतावास में जासूस नहीं होते ? किसी एक दोहरे जासूस की हत्या कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि दर्जनों देश मिलकर किसी देश के विरुद्ध कूटनीतिक-युद्ध ही छेड़ दें। रुस के विरुद्ध ट्रंप का अभियान तो इसलिए छिड़ा हो सकता है कि वे अपने आप को पूतिन की काली छाया में से निकालना चाहते हों और रुस के विरुद्ध सीरिया, एराक, ईरान, उ. कोरिया और दक्षिण एशिया में भी अपनी नई टीम को लेकर आक्रामक होना चाहते हों। घर में चौपट हो रही उनकी छवि के यह मुद्रा शायद कुछ टेका लगा दे।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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केजरीवाल ने माफी मांगने का जो रास्ता ढूंढा है, मेरी राय में वह सर्वश्रेष्ठ है : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले विक्रमसिंह मजीठिया और अब नितिन गडकरी से माफी मांगकर भारत की राजनीति में एक नई धारा प्रवाहित की है। यह असंभव नहीं कि वे केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और अन्य लोगों से भी माफी मांग लें। अरविंद पर मानहानि के लगभग 20 मुकदमे चल रहे हैं। अरविंद ने मजीठिया पर आरोप लगाया था कि वे पंजाब की पिछली सरकार में मंत्री रहते हुए भी ड्रग माफिया के सरगना हैं।

गडकरी का नाम उन्होंने देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची में रख दिया था। इसी प्रकार अरुण जेटली पर भी उन्होंने संगीन आरोप लगा दिए थे। इस तरह के आरोप चुनावी माहौल में नेता लोग एक-दूसरे पर लगाते रहते हैं लेकिन जनता पर उनका ज्यादा असर नहीं होता। चुनावों के खत्म होते ही लोग नेताओं की इस कीचड़-उछाल राजनीति को भूल जाते हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल पर चल रहे करोड़ों रु. के मानहानि मुकदमों ने उन्हें तंग कर रखा है।

उन्हें रोज़ घंटों अपने वकीलों के साथ मगजपच्ची करनी पड़ती है, अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और सजा की तलवार भी सिर पर लटकी रहती है। ऐसे में मुख्यमंत्री के दायित्व का निर्वाह करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा निराधार आरोपों के कारण उन नेताओं की छवि भी खराब होने की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति से उबरने का जो रास्ता केजरीवाल ने ढूंढा है, वह मेरी राय में सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा रास्ता यदि सिर्फ डर के मारे अपनाया गया एक पैंतरा भर है तो यह निश्चित जानिए कि अरविंद की इज्जत पैंदे में बैठ जाएंगी।

यह पैंतरा इस धारणा पर मुहर लगाएगा कि केजरीवाल से ज्यादा झूठा कोई राजनेता देश में नहीं है लेकिन यदि यह सच्चा हृदय-परिवर्तन है और माफी मांगने का फैसला यदि हार्दिक प्रायश्चित के तौर पर किया गया है तो यह सचमुच स्वागत योग्य है। यदि ऐसा है तो भविष्य में हम किसी के  भी विरुद्ध कोई निराधार आरोप अरविंद केजरीवाल के मुंह से नहीं सुनेंगे। केजरीवाल के इस कदम का विरोध उनकी आप पार्टी की पंजाब शाखा में जमकर हुआ है लेकिन वह अब ठंडा पड़ रहा है। इस फैसले की आध्यात्मिक गहराई को शायद पंजाब के ‘आप’ विधायक अब समझ रहे हैं। यह फैसला देश के सभी राजनेताओं के लिए प्रेरणा और अनुकरण का स्त्रोत बनेगा।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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हज यात्रा किसी दूसरे की मदद से करना इस्लाम के खिलाफ है

हज-यात्रा में दी जानेवाली सरकारी सहायता को खत्म करने का विरोध कुछ मुस्लिम नेता और संगठन जरुर करेंगे और यह प्रचार भी करेंगे कि आरएसएस के प्रधानमंत्री से इसके अलावा क्या उम्मीद की जा सकती है लेकिन ऐसा करना बिल्कुल गलत होगा। यह सहायता खत्म की जाए, ऐसा फैसला 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने किया था। यह फैसला दो जजों ने दिया था, जिसमें से एक हिंदू था और दूसरा मुसलमान!

दोनों जजों ने कुरान शरीफ, इस्लामी ग्रंथों और रिवाजों का गहरा अध्ययन किया और वे इस नतीजे पर पहुंचे कि हज-यात्रा किसी और की मदद से करना इस्लाम के खिलाफ है। मुख्य जज आफताब आलम ने कुरान के तीसरे अध्याय के 97 मंत्र को उदधृत करते हुए सरकार से हज-यात्रा की सब्सिडी खत्म करने के लिए कहा। उस समय कांग्रेस की सरकार थी और उसे दस साल का समय दिया गया था। अब भाजपा सरकार ने इसे खत्म करने का फैसला किया है तो देश के मुसलमानों का इसका स्वागत करना चाहिए।

इस फैसले का सुझाव अफजल अमानुल्लाह कमेटी ने सारी जांच के बाद अक्तूबर 2017 में दिया था। हज-सहायता पर खर्च होनेवाले लगभग 700 करोड़ रु. अब मुस्लिम बच्चों की शिक्षा पर खर्च होंगे, ऐसा आश्वासन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने दिया है। यदि सरकार अपनी कथनी को करनी में बदल सके तो देश के मुसलमानों की अगली पीढ़ियों की किस्मत चमक उठेगी।

नकवी ने बयान में यही बताया है कि सरकारी सहायता के ज्यादातर का फायदा हाजियों को मिलने की बजाय हवाई कंपनियों और दलालों को मिलता था। अब लोग पानी के जहाज से भी हज-यात्रा पर जा सकेंगे। पहले यह जल-यात्रा सिर्फ 1600 रुपए में हो जाती थी। अब भी यह काफी सस्ती होगी। महिलाओं को अब अकेले हज-यात्रा की सुविधा सरकार ने दे दी है। जो लोग हवाई जहाज से जाना चाहें और पांच सितारा-यात्रा करना चाहें, जरुर करें। कई प्रांतीय सरकारों ने हिंदुओं की तीर्थ-यात्रा का जो जिम्मा लिया है, उस पर पुनर्विचार की जरुरत है। कानून तो कानून है। वह सबके लिए समान होना चाहिए। तीर्थ-यात्राएं अपने दम पर ही की जानी चाहिए।

लेखक वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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दिल्ली की केजरीवाल सरकार के इस अदभुत प्रयोग की हो रही है वाह-वाह

दूसरी सरकारें भी दिल्ली सरकार से प्रेरणा लें… दिल्ली सरकार के एक लोक-कल्याणकारी काम पर उप-राज्यपाल ने मोहर लगा दी, यह अच्छा किया। वे यदि इसमें अड़ंगा लगाए रखते तो उनकी बदनामी तो होती ही, केंद्र की भाजपा सरकार भी बुरी बनती। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने यह इतनी अच्छी योजना शुरु की हैं कि वे अन्य नेताओं की तरह कोरे भाषणबाज नहीं, बल्कि सच्चे जनसेवक सिद्ध हो रहे हैं।

उन्होंने दिल्ली राज्य में ऐसी व्यवस्था लागू कर दी है कि दिल्ली के नागरिकों को 40 प्रकार की जनसेवाओं के लिए अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, अफसरों की खुशामद नहीं करनी पड़ेगी और रिश्वत भी नहीं देनी पड़ेगी। इन जन-सेवाओं को सरकारी कर्मचारी लोगों के घर पहुंचकर देंगे जैसे सुबह हॉकर घरों पर खुद जाकर अखबार फेंक आता है या दूधवाला आकर थैलियां पकड़ा जाता है।

ये सेवाएं कई प्रकार की हैं। जैसे अनुसूचितों के प्रमाण-पत्र, मोटर कारों के पंजीकरण प्रमाण पत्र, कार-चालन लाइसेंस, विकलांगों और वृद्धों की पेंशन, मकानों के मिल्कियत दस्तावेज आदि। सरकार अपने कर्मचारियों के अलावा ये काम ठेके पर भी उठाएगी ताकि लोगों को जल्दी से जल्दी राहत मिले। दिल्ली सरकार का यह अदभुत प्रयोग है। यदि देश के हर गांव की पंचायत और हर शहर की नगरपालिका और नगर निगम इस पद्धति का अनुकरण करने लगे तो देश के करोड़ों नागरिकों को बड़ी राहत मिलेगी। वे अभी नेताओं को कोसते हैं, फिर वे उन्हें दिल से दुआ देंगे।

दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने कुछ दिन पहले दुर्घटनाग्रस्त नागरिकों के मुफ्त इलाज की व्यवस्था भी की थी। उसने दिल्ली के मोहल्ले-मोहल्ले में स्वास्थ्य केंद्र भी खोले हैं। ऐसी पार्टी को चुनावों में हराना आसान नहीं है। इस बात को उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने अच्छी तरह समझ लिया और उन्होंने केजरीवाल सरकार के साथ सहयोग किया। उनके इस सुझाव पर भी केजरीवाल ने अमल करने का वादा किया है कि तरह-तरह की सरकारी सेवाएं वे डिजिटल माध्यम से उपलब्ध करवाएंगे।

उप-राज्यपाल का यह सुझाव भी मुख्यमंत्री ने मान लिया है कि वे जगह-जगह ‘इंटरनेट कक्ष’ भी खुलवाएंगे ताकि आम लोगों को सरकारी सेवाओं का फायदा उठाने में ज्यादा सहूलियत हो जाए। यदि केजरीवाल सरकार और दिल्ली के उप-राज्यपाल इसी रचनात्मक शैली में काम करते रहे तो दिल्ली सरकार देश की प्रादेशिक सरकारों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाएगी।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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यह कोई मान नहीं सकता कि केजरीवाल ने पैसे खाकर दो गुप्ताओं को राज्यसभा टिकट दिए होंगे…

लेकिन ये टिकट क्यों दिए गए, यह बताने में आम आदमी पार्टी असमर्थ है… केजरीवाल भूल सुधार करें….

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह तो कोई मान ही नहीं सकता कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पैसे खाकर दो गुप्ताओं को राज्यसभा के टिकिट दे दिए होंगे लेकिन ये टिकिट उन्हें क्यों दिए गए, यह बताने में आम आदमी पार्टी असमर्थ है। उन दोनों में एक चार्टर्ड एकाउंटेट है और दूसरा शिक्षा और चिकित्सा के धंधे में है, जो आज देश में लूट-पाट के सबसे बड़े धंधे हैं। जो चार्टर्ड एकाउंटेंट है, वह अभी कुछ दिन पहले तक कांग्रेस में था और केजरीवाल का घनघोर विरोधी था।

उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि अरविंद ने सम्मोहित होकर उसे राज्यसभा में भेजने का निर्णय कर लिया ? इन दोनों के चयन ने केजरीवाल और ‘आप’ की छवि को चौपट कर दिया है। ऐसा नहीं है कि अयोग्य धनपशुओं को अन्य दलों ने पहले राज्यसभा में नहीं भेजा है लेकिन उन दलों और नेताओं की छवि क्या अरविंद केजरीवाल-जैसी थी ? भ्रष्टाचार-विरोध ही अरविंद और ‘आप’ की पहचान है और उसकी पहचान पर अब सवाल उठने लगे हैं।

इस नामजदगी से ‘आप’ पार्टी में कितनी नाराजगी है, यह कार्यकर्ताओं ने बता दिया है। तीसरा उम्मीदवार संजय सिंह अपना पर्चा भरने  शेर की तरह गया और दो गुप्ता- लोग बिल्कुल गुप्त- से ही हो गए। यदि ‘आप’ पार्टी तुरंत नहीं संभली तो दिल्ली में उसका लौटना भी मुश्किल हो सकता है। उसने इधर इतने अच्छे काम किए हैं कि 2019 में उसकी राष्ट्रीय भूमिका भी बन सकती है बशर्ते कि वह तुरंत भूल सुधार करे।

कैसे करें? इन दोनों गुप्ताओं को पहले जीतने दे और फिर दोनों ही इस्तीफा दे दें। उसके बाद ‘आप’ पार्टी में ही कई तेजस्वी और मुखर नेता हैं, उन्हें नामजद किया जाए और अपनी इज्जत बचाई जाए। राज्यसभा की नामजदगी में सभी दलों के नेता इतनी धांधली करते हैं कि मेरी राय में यह अधिकार नेताओं से छीनकर उनके संसदीय दलों या कार्यसमितियों को दे दिया जाना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा की जानेवाली 10 नामजदगियों का अधिकार भी राज्यसभा के सभी सदस्यों के पास चला जाना चाहिए ताकि राज्यसभा में सचमुच योग्य लोग जा सकें।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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‘पद्मावती’ फिल्म देख आए वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक, पढ़िए वो क्या कह रहे हैं…

फिल्म पद्मावती को लेकर आजकल जैसा बवाल मच रहा है, अफवाहों का बाजार जैसे गर्म हुआ है, वैसा पहले किसी भी फिल्म के बारे में सुनने में नहीं आया। बवाल मचने का कारण भी है। पद्मावती या पद्मिनी सिर्फ राजस्थान ही नहीं, सारे भारत में महान वीरांगना के तौर पर जानी जाती है। मध्ययुग के प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी महान कृति ‘पद्मावत’ में चितौड़ की इस महारानी का ऐसा सुंदर चरित्र-चित्रण किया है कि वे भारतीय नारी का आदर्श बन गई हैं। यदि ऐसी पूजनीय देवी का कोई फिल्म या कविता या कहानी अपमान करे तो उसका विरोध क्यों नहीं होना चाहिए और डटकर होना चाहिए लेकिन यह जरुरी है कि विरोध करने के पहले उस कला-कृति को देखा जाए, पढ़ा जाए, उसका विश्लेषण किया जाए। मुझे पता नहीं कि जो संगठन इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उनके नेताओं ने यह फिल्म देखी है कि नहीं? मैंने यह सवाल पिछले हफ्ते अपने एक लेख में उठाया था। मुझे राज-परिवारों से संबंधित मेरे कुछ मित्रों ने प्रेरित किया कि मैं खुद भी इस फिल्म को देखूं और अपनी राय दूं।

मैंने यह फिल्म देखी। फिल्म ज्यों ही शुरु हुई, मैं सावधान होकर बैठ गया, क्योंकि यह फिल्म मैं अपने मनोरंजन भर के लिए नहीं देख रहा था। मुझे इसमें यह देखना था कि इसमें कोई संवाद, कोई दृश्य, कोई गाना ऐसा तो नहीं है, जो भारत के इतिहास पर धब्बा लगाता हो, अलाउद्दीन- जैसे दुष्ट शासक को ऊंचा उठाता हो और पद्मावती जैसी विलक्षण महारानी को नीचा दिखाता हो ? मुझे यह भी देखना था कि महाराजा रतनसिंह-जैसे बहादुर लेकिन भोले और उदार व्यक्तित्व का चित्रण इस फिल्म में कैसा हुआ है ? मेरी चिंता यह भी थी कि फिल्म को रसीला बनाने के लिए कहीं इसमें ऐसे दृश्य तो नहीं जोड़ दिए गए हैं, जो भारतीय मर्यादाओं का उल्लंघन करते हों?

मुझे लगता है कि बिना देखे ही इस फिल्म पर जितनी टीका-टिप्पणी हुई है, उसका फायदा फिल्म-निर्माता ने जरुर उठाया होगा। उसने ऐसे संवाद, ऐसे दृश्य और ऐसे संदर्भों को उड़ा दिया होगा, जिन पर कोई एतराज हो सकता था। फिल्म के कथा लेखक, इतिहासकार और निर्माता सर्वज्ञ नहीं होते हैं। वे गलतियां करते हैं और कई बार उनके कारनामे आम दर्शकों को गहरी चोंट भी पहुंचाते हैं। लेकिन इस फिल्म को वे सब फायदे पहले से ही मिल गए, जो सेंसर बोर्ड या जनता के सामने जाने पर मिलते हैं। इस फिल्म को सबसे बड़ा फायदा यह मिला है कि इसका जबर्दस्त प्रचार हो गया है। यदि इसके प्रचार पर करोड़ों रु. भी खर्च किए जाते तो इसका नाम हर जुबान तक पहुंचाना मुश्किल था। इस फिल्म को अब भारत के अहिंदीभाषी प्रांतों में भी जमकर देखा जाएगा और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ जाएगी।

इस फिल्म का सबसे बड़ा खलनायक सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी है। यह जो खिलजी शब्द है, इसका सही पश्तो और फारसी उच्चारण गिलजई है। अफगानिस्तान में एक ‘जहांसोज अलाउद्दीन’ भी हुआ था। याने सारे संसार को भस्मीभूत करने वाला। अलाउद्दीन के इस भस्मासुर रुप को इस फिल्म में नई युद्ध-तकनीक दिखाकर बताया गया है। अलाउद्दीन ने तोप जैसे एक ऐसे यंत्र से चितौड़ के किले पर ऐसा हमला किया कि उसके अग्निबाणों से भारतीय सेना का बचना मुश्किल हो गया। इस फिल्म में अलाउद्दीन एक धूर्त्त, अहंकारी, कपटी, दुश्चरित्र और रक्तपिपासु इंसान की तरह चित्रित है। वह अपने चाचा सम्राट जलालुद्दीन की हत्या करता है, अपनी चचेरी बहन से जबर्दस्ती शादी करता है, वह समलैंगिक है, वह उस राघव चेतन की भी हत्या कर देता है, जो उसे पद्मावती के अलौकिक सौंदर्य की कथा कहकर चित्तौड़ पर हमले के लिए प्रेरित करता है। वह हर कीमत पर पद्मावती को अपनी रानी बनाना चाहता है। अलाउद्दीन ने धोखे से महाराज रतनसिंह को दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया लेकिन बहादुर पद्मावती कैसे नहले पर दहला लगाती है, खुद दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को चकमा देती है, उसे बेवकूफ सिद्ध करती है और रतनसिंह को छुड़ा लाती है। अलाउद्दीन और रतनसिंह की मुठभेड़ों में मजहब कहीं बीच में नहीं आता। वह मामला शुद्ध देशी और विदेशी का दिखाई पड़ता है।

जहां तक पद्मावती का प्रश्न है, श्रीलंका की राजकुमारी और परम सुंदरी युवती को रतनसिंह एक शिकार के दौरान देखते हैं और उसके प्रेम-पाश में बंध जाते हैं। फिल्म के शुरु से अंत तक पद्मावती की वेशभूषा और अलंकरण तो अद्वितीय हैं। वे चित्तौड़ की इस महारानी के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। रतनसिंह और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग को चोरी-चोरी देखनेवाले गुरु राघव चेतन को देश-निकाला दिया जाता है। पद्मावती उसे सजा-ए-मौत देने की बजाय देश-निकाला सुझाती है। ऐसी उदार पद्मावती का यहां वह दुर्गा रुप भी देखने को मिलता है, जब उसे अलाउद्दीन खिलजी की इच्छा बताई जाती है।

पूरी फिल्म में कहीं भी ऐसी बात नहीं है, जिससे दूर-दूर तक यह अंदेशा हो कि पद्मावती का अलाउद्दीन के प्रति जरा-सा भी आकर्षण रहा हो। बल्कि पद्मावती और रतनसिंह के संवाद सुनकर सीना फूल उठता है कि वाह ! क्या बात है ? एक विदेशी हमलावर से भिड़कर अपनी जान न्यौछावर करनेवाले ये राजपूत भारत की शान हैं। इस फिल्म में पद्मावती अद्वितीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ही नहीं है, बल्कि साहस और चातुर्य की मिसाल है। वह कैसे अपने 800 सैनिकों को अपनी दासी का रुप देकर दिल्ली ले गई और उसने किस तरकीब से अपने पति को जेल से छुड़ाया, यह दृश्य भी बहुत मार्मिक और प्रभावशाली है। दूसरे युद्ध में वीर रतनसिंह कैसे धोखे से मारे गये, कैसे उन्होंने अलाउद्दीन के छक्के छुड़ाए और कैसे पद्मावती ने हजारों राजपूत महिलाओं के साथ जोहर किया, यह भी बहुत रोमांचक समापन है। जहां तक घूमर नृत्य का सवाल है, उसके बारे में भी तरह-तरह की आपत्तियां की गई थीं। लेकिन वह नृत्य किसी महल का बिल्कुल निजी और अंदरुनी मामला है। वह किसी शहंशाह की खुशामद में नहीं किया गया है। उस नृत्य के समय महाराज रतनसिंह के अलावा कोई भी पुरुष वहां हाजिर नहीं था। वह नृत्य बहुत संयत और मर्यादित है। उसमें कहीं भी उद्दंडता या अश्लीलता का लेश-मात्र भी नहीं है।

यह फिल्म मैंने इसलिए भी देखी कि हमारे एक पत्रकार मित्र की पत्नी ने, जो मेरी पत्नी की सहपाठिनी रही हैं, मुझे मुंबई से एक संदेश भेजा और कहा कि आपको शायद पता नहीं कि मैं प्रतिष्ठित राजपूत परिवार की बेटी हूं और इस फिल्म में मैंने एक छोटा-सा रोल भी किया है। यह फिल्म राजपूतों के गौरव और शौर्य की प्रतीक है। इस फिल्म को बाजार में उतारने के पहले राजपूत संगठनों के नेताओं को भी जरुर दिखाई जानी चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे सभी नेता इतने विचित्र और डरपोक क्यों है ? फिल्म को देखे बिना वे ऐसे फतवे जारी क्यों कर रहे हैं ? वे इतने डर गए हैं कि सेंसर बोर्ड को भी परहेज का उपदेश दे रहे हैं। अदालत ने फिल्म पर रोक लगाने से मना कर दिया। उसे भी इस फिल्म को देखना चाहिए था। यदि इसमें कोई गंभीर आपत्तिजनक बात हो तो सेंसर बोर्ड और अदालत दोनों को उचित कार्रवाई क्यों नहीं करनी चाहिए लेकिन अफवाहों के दम पर देश और सरकार चलाना तो लोकतंत्र का मजाक है।

पहले पद्मावती को देखें, फिर बोलें…

फिल्म पद्मावती का प्रदर्शन अब एक दिसंबर से शुरू नहीं होगा, यह अच्छी खबर है। अब फिल्म-निर्माता और फिल्म-विरोधियों को इस फिल्म पर ठंडे दिमाग से सोचने का समय मिल जाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि फिल्म को देखकर उन्हें काफी संतोष होगा। यदि उसमें सुधार के कुछ सुझाव वे देंगे तो फिल्म प्रमाणीकरण पर्षद (सेंसर बोर्ड) उन पर विचार करेगा और वे सुझाव उसे ठीक लगेंगे तो वह फिल्म-निर्माता को वैसे निर्देश देगा, जिसे यदि वह नहीं मानेगा तो फिल्म सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं जा सकेगी। इसी आशय की बात राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कही है। यदि सेंसर बोर्ड की सहमति के बावजूद कुछ लोगों को फिल्म आपत्तिजनक लगे तो उन्हें अधिकार है कि वे उसका विरोध करें लेकिन वह विरोध अमर्यादित न हो और हिंसक न हो। वह राजपूत समाज की अप्रतिष्ठा और मजाक का कारण न बने, यह जरुरी है।

मैंने यह फिल्म काफी गौर से देखी है। मुझे इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगा। हां, एकाध जगह उसे बेहतर बनाने का सुझाव मैंने दिया है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी का खलनायकत्व जमकर उभरा है और महाराजा रतनसिंह की सज्जनता और वीरता भी काफी प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुई है। और पद्मावती के क्या कहने ? उसे अप्रतिम सौंदर्य की प्रतिमूर्ति तो बनाया ही गया है, साथ-साथ उसके शौर्य और रणनीति-कौशल को इतना तेजस्वी और अनुकरणीय रुप दिया गया है कि देश की प्रत्येक महिला उस पर गर्व कर सकती है।

झूठी अफवाहों के आधार पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, जैसे अलाउद्दीन और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग, दोनों का एक-दूसरे के सपनों में आना, घूमर नृत्य की अश्लीलता आदि का लेश-मात्र संकेत भी इस फिल्म में नहीं है। सेंसर बोर्ड और नेताओं को भी घबराने की जरुरत नहीं है। उन्हें बहानेबाजी और चुप्पी का सहारा लेने की बजाय अपनी राय इस फिल्म पर खुलकर दे देनी चाहिए। जब मेरे-जैसा मामूली हैसियत का आदमी इस फिल्म के बारे में खुलकर बोल रहा है तो वे खुद इस फिल्म को देखने का आग्रह क्यों नहीं करते ? मैंने जैसे यह फिल्म देखी, वैसे ही कुछ चुने हुए लोग इस फिल्म को देखें, तो वह न तो किसी कानून का उल्लंघन है और न ही किसी मर्यादा का। इस तरह फिल्म दिखाने और सिनेमा घरों में उसे दिखाने में बहुत फर्क है। यह दिखाना पैसा कमाने के लिए नहीं, सत्य और शुभ की स्थापना के लिए है।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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केजरीवाल के इस काम ने वरिष्ठ पत्रकार डा. वेद प्रताप वैदिक का दिल खुश कर दिया

दिल्ली की केजरीवाल सरकार के एक विज्ञापन और एक खबर ने मेरा दिल खुश कर दिया। विज्ञापन यह है कि दिल्ली के किसी भी निवासी को यदि एमआरआई, सीटी स्केन और एक्स रे जैसे दर्जनों टेस्ट करवाने हों तो वह सरकारी अस्पतालों और पोलीक्लिनिकों में जाए। यदि एक माह में उसका टेस्ट हो जाए तो ठीक वरना वह अपना टेस्ट निजी अस्पतालों में भी करवा सकता है। वह मुफ्त होगा, जैसा कि सरकारी अस्पतालों में होता है।

आप जानते ही हैं कि देश के सरकारी अस्पतालों की हालत क्या है? वहां अफसरों और नेताओं के इलाज पर तो जरुरत से ज्यादा ध्यान दिया जाता है लेकिन आम आदमियों को भेड़-बकरी समझकर गलियारों में पटक दिया जाता है। यही हाल टेस्टों का है। पहली बात तो यह कि टेस्टों की लाइन इतनी लंबी होती है कि महिनों इंतजार करना पड़ता है और कभी-कभी इंतजार की इस अवधि के दौरान मरीज दूसरे संसार में चला जाता है।

दूसरी बात यह कि टेस्ट हमेशा ठीक ही हों, यह भी जरुरी नहीं। जो मरीज इन अस्पतालों में जाते हैं, वे कौन होते हैं? वे, जिनकी जेब खाली होती है, ग्रामीण, गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पशिक्षित लोग! सारी चिकित्सा अंग्रेजी भाषा में होती है, जादू-टोने की तरह। दिल्ली सरकार को सबसे पहले तो इन सरकारी अस्पतालों को सुधारना चाहिए और उसने अब ये जो असाधारण सुविधा की घोषणा की है, उसे ठीक से लागू करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है। इसमें भ्रष्टाचार की काफी गुंजाइश है।

अरविंद और मनीष, दोनों ही मेरे प्रिय साथी हैं। मैं दोनों से कहता हूं कि वे दिल्ली प्रशासन के सभी कर्मचारियों और विधायकों के लिए यह अनिवार्य क्यों नहीं कर देते कि उनका और उनके परिजनों का इलाज सरकारी अस्पतालों में ही हो। इन अस्पतालों का स्तर रातों-रात सुधर जाएगा। यदि केजरीवाल सरकार की उक्त योजना सफल हो गई तो ‘आप’ पार्टी का दिल्ली से बाहर फैलना बहुत आसान हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे इलाज की यह सुविधा मोदी की नोटबंदी और स्किल इंडिया की तरह फेल न हो जाए। वह सिर्फ विज्ञापन और भाषण का विषय बनकर न रह जाए।

दिल्ली सरकार को हर माह आंकड़े जारी करके बताना चाहिए कि उसकी इस नई योजना से कितने लोगों को लाभ मिल रहा है। इस बीच मप्र सरकार ने गरीबों के लिए पांच रु. में और दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूल के बच्चों को नौ रुपए में भोजन देने की जो घोषणा की है, वह भी सराहनीय कदम है। मुझे विश्वास है कि केंद्र की सरकार इन दोनों सरकारों से कुछ प्रेरणा लेगी।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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