विधवाओं के कल्याण के लिए ‘भगवान भजनाश्रम ‘ की जाँच जरूरी

धार्मिक भावनाओं की तुष्टि के सिलसिले में वृन्दावन का नाम कुछ ज्यादा ही श्रद्धा से लिया जाता है। बंगाल में तो बहुत पहले से मान्यता रही है कि स्वर्ग के दरवाजे पर दस्तक वृन्दावन में रहकर ही दी जा सकती है। वैधव्य की आपदाओं से घिरी बंगाली स्त्रियों को बाकी जीवन जीने के लिए वृन्दावन ताकत देता रहा है। यही कारण है कि वृन्दावन में बंगाली विधवाओं की उपस्थिति एक शताब्दी से लगातार बनी हुई है। विडम्बना यह है कि ये विधवाएँ सारा जीवन नारकीय यातनाओं को भोगते गुजार देती हैं। इन अनपढ़, सीधी-सच्ची और दुखी औरतों को इस बात का तनिक आभास नहीं होता कि उनकी वर्तमान हालत पुराने जन्मों के पापों का फल न होकर सुनियेाजित ढंग से धर्म के नाम पर खड़े किए गए आडंबर के कारण है। वृन्दावन में बंगाली विधवाओं की स्थिति एक बार जाल में फँसने के बाद कभी न निकलने वाली मछली की मानिंद है।