पैर गंवा चुकी स्नेहिल की चैनल से बातचीत चल रही है

Vineet Kumar : स्नेहिल से मेरी बात हुई. उन्हें इस वक्त हमारी जरूरत नहीं है..लिखने से लेकर बाकी चीजों की भी. वो अब इस संबंध में कोई बात नहीं करना चाहती. उनका कहना है कि चैनल से इस संबंध में बातचीत चल रही है. हमारी प्राथमिकता स्नेहिल की जिंदगी और उसके प्रति उत्साह बनाए रखना पहले है जो कि सचमुच एक चुनौती भरा काम है..लिहाजा, हम इस मामले को तूल देकर उनके हिसाब से शायद नुकसान ही करेंगे. रही बात चैनल की तो हम किसी की आइडी, ज्वाइनिंग लेटर की कॉपी जबरदस्ती साझा करने नहीं कह सकते.

केजरीवाल की खांसी और मोदी की चायवाले की पोलिटिकल मार्केटिंग के मायने

Vineet Kumar : मैं मान लेता हूं कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी खांसी की पॉलिटिकल मार्केटिंग की..शुरुआत में जो खांसी हुई और उसके प्रति लोगों की जो संवेदना पैदा हुई, उसे उन्होंने सिग्नेचर ट्यून में बदल दिया..ये अलग बात है कि बनावटी खांसी के लिए भी कम एफर्ट नहीं लगाने पड़ते..लेकिन एक दूसरा शख्स अपने को चाय बेचनेवाला बताता है, बचपन के संघर्ष के किस्से सुनाता है जो कि उसकी असल जिंदगी से सालों पहले गायब हो गए तो आप हायपर इमोशनल होकर देश की बागडोर उनके हाथों सौंप देते हैं.

मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द-एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो-विज्ञापन के काम लाए जाते हैं

Vineet Kumar : जिया न्यूज की मीडियाकर्मी स्नेहल वाघेला के बारे में जानते हैं आप? 27 साल की स्नेहल अपने चैनल जिया न्यूज जिसकी पंचलाइन है- जर्नलिज्म इन एक्शन, के लिए अपने दोनों पैर गंवा चुकी है. पिछले दिनों जिया चैनल के लिए मेहसाना (अहमदाबाद) रेलवे स्टेशन पर रिपोर्टिंग करते हुए स्नेहल फिसलकर पटरियों पर गिर पड़ी और उनके दोनों पैर इस तरह से जख्मी हुए कि आखिर में काटने पड़ गए. अब वो चल-फिर नहीं सकती.

19 साल पूरे होने पर आउटलुक ने शानदार विशेषांक निकाला

Vineet Kumar : रॉबिन जेफ्री की किताब मोबाईल नेशन के बाद सबसे बेहतरीन कंटेंट… आपने अभी तक आउटलुक का ये अंक नहीं खरीदा है तो खरीदकर रख लीजिए. आउटलुक पत्रिका की जिस साल शुरुआत हुई थी, उसी साल हिन्दुस्तान में मोबाईल आया था. पत्रिका ने ये बेहतरीन काम किया कि अपने 19 साल को लेकर ढोल-मंजीरा बजाने के बजाय 19 साल में बनती-बदलती हिन्दुस्तान की दुनिया पर अलग-अलग एंगिल से बेहतरीन लेख, इंटरव्यू और फीचर प्रकाशित किए हैं..इस पत्रिका को अगर किताबी शक्ल दे दी जाए तो हर लाइब्रेरी के लिए एक जरूरी किताब होगी.

रेल में खेल (2) : बैकडोर से पैसे लेकर पैन्ट्रीकार तक में ठूंसने का जो काम हो रहा है वो किस अच्छे दिन का नमूना है?

Vineet Kumar : स्लीपर की टॉयलेट में 12-14 लोग घुसे हैं… पैंट्री कार में 1500-2000 रुपए लेकर घुसाया जा रहा है…. आप कह सकते हैं कि इतनी भीड़ में क्या व्यवस्था होगी भला? लेकिन जिनकी टिकट बहुत पहले से कन्फर्म है, वो अन्दर तक नहीं जा सके और ट्रेन गुजर गयी? ये सिर्फ भीड़ है फिर इसमें भ्रष्टाचार के भी अंश घुले हैं? मोदी सरकार क्या, इससे पहले की भी सरकार नागरिक सुविधाओं में तेजी से कटौती करती आयी है. लेकिन ये मौजूदा सरकार जो नागरिक को ग्राहक मानती है, उनके बीच प्रशासन नहीं मार्केटिंग के जाल बिछाना चाहती है लेकिन ग्राहकों को चूसने के मामले में धंधेबाजों और कार्पोरेट से भी दो कदम आगे निकल जाए तो उसे आप क्या कहेंगे?

जिस रजत शर्मा ने कभी एनबीए को गैरजरूरी और टीवी टुडे नेटवर्क की जागीर बताया था, वही अब इसके प्रेसिडेंट हैं

Vineet Kumar : जिस रजत शर्मा के इंडिया टीवी ने साल 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले की कवरेज के दौरान दुनिया की मशहूर आतंकवादी मामलों की विशेषज्ञ फरहाना अली को आतंकवादी बना दिया था और जिसके कारण एनबीए ने चैनल पर एक लाख रूपये का जुर्माना लगाया..रजत शर्मा ने ऐसा किए जाने पर एनबीए को गैरजरूरी, अविश्वसनीय और टीवी टुडे की जागीर बताया, अब वही रजत शर्मा इस एनबीए के प्रेसिडेंट है..वो इस हैसियत से टेलीविजन कंटेंट को बेहतर करने के लिए प्रेस रिलीज जारी करेंगे..देश के न्यूज चैनलों को नसीहतें देंगे कि क्या प्रसारित करना राष्ट्रहित में है, क्या नहीं..

राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने अपने दाग और जी न्यूज के पाप धोने में जुटे सुधीर चौधरी

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को… जी न्यूज पर पत्रकारिता की रक्षा के बहाने हाथापाई प्रकरण को मुद्दा बनाकर राजदीप सरदेसाई को घंटे भर तक पाठ पढ़ाते सुधीर चौधरी को देख यही मुंह से निकल गया.. सोचा, फेसबुक पर लिखूंगा. लेकिन जब फेसबुक पर आया तो देखा धरती वीरों से खाली नहीं है. युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने सुधीर चौधरी की असलियत बताते हुए दे दनादन पोस्टें लिख मारी हैं. विनीत की सारी पोस्ट्स इकट्ठी कर भड़ास पर प्रकाशित कर दिया. ये लिंक http://goo.gl/7i2JRy देखें. ट्विटर पर पहुंचा तो देखा राजदीप ने सुधीर चौधरी पर सिर्फ दो लाइनें लिख कर तगड़ा पलटवार किया हुआ है. राजदीप ने रिश्वत मांगने पर जेल की हवा खाने वाला संपादक और सुपारी पत्रकार जैसे तमगों से सुधीर चौधरी को नवाजा था..

जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली में जेल जा चुके सुधीर चौधरी पत्रकारिता की नसीहत दे रहे हैं राजदीप सरदेसाई को!

(File Photo Vinit Kumar)

Vineet Kumar : जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली मामले में जेल जा चुके सुधीर चौधरी आज राज राजदीप सरदेसाई को पत्रकारिता कैसे की जाए, नसीहत दे रहे हैं. चैनल शाम से एकतरफा स्टोरी चला रहे हैं. ‪#‎shameaAbroad‬ को ट्रेंड बनाने की कोशिश में लोगों से प्रतिक्रिया मांग रहा है…. आलोक मेहता जैसे बुरी तरह साख गंवा चुके संपादक हां में हां मिला रहे हैं. मुझे राजदीप सरदेसाई के पक्ष में कुछ नहीं कहना है… बस अफसोस इस बात का है कि आप वरिष्ठ, अनुभवी मीडियाकर्मियों ने जिस तरह अपनी जुबान बंद रखी, गलत का खुलकर विरोध नहीं किया, कई बार सरोगेट ढंग से शह दिया तो ऐसे दिन देखना स्वाभाविक ही है.

जी न्यूज यानि सरकार का भोंपू!

Vineet Kumar : जिस देश में जी न्यूज़ जैसा चैनल हो, उसे सरकार की भोंपू बजाने के लिये दूरदर्शन जैसे पब्लिक ब्रॉडकास्ट चैनल की अलग से कोई ज़रूरत नहीं है..बेवजह करदाताओं के करोड़ों रुपये स्वाहा हो रहे हैं..आप चाहें तो जी न्यूज़ को प्राइवेट दूरदर्शन कह सकते हैं..

द हिंदू को हीरो और टीओआई को गटर में फेंकने का अतिउत्साह : तनु शर्मा और सायमा सहर के मामलों में कहां थे?

Vineet Kumar : TOI और द हिन्दू के बीच विज्ञापन के जरिए एक-दूसरे का मजाक उड़ाने से लेकर नीचा दिखाने की कवायदें बहुत पुरानी रही है. इन विज्ञापनों के दर्जनों वीडियो यूट्यूब पर मौजूद हैं. ऐसे में ये बहुत संभव है कि द हिन्दू अपना अगला विज्ञापन दीपिका पादुकोण के बहाने कुछ इस तरह से बनाए कि जिसमे लगे कि TOI स्त्री को कॉर्पोरेट प्रोडक्ट से ज्यादा कुछ नहीं समझता जबकि द हिन्दू सीमोन और वर्जिनिया की तलाश में भटकता फिरता है. पिछले दिनों सुहासिनी हैदर( स्ट्रैटजिक एंड डिप्लोमेटिक एफेयर एडिटर, द हिन्दू) को सुनने का मौका मिला. वो मीडिया संस्थानों में महिला पत्रकारों की स्थिति पर बात कर रही थीं.

जर्नलिस्ट ऑफ द इयर श्रीनिवासन जैन टीवी पर सिर्फ बोलते नहीं, स्क्रीन एडिटोरियल लिखते हैं

Vineet Kumar : श्रीनिवासन जैन (मैनेजिंग एडिटर, एनडीटीवी 24×7) को साल 2012 के लिए जर्नलिस्ट ऑफ द इयर का अवार्ड दिया गया. मुझे नहीं पता कि बतौर मैनेजिंग एडिटर वो चैनल के भीतर किस रूप में जाने जाते हैं और न ही उनसे मेरी कोई मुलाकात है. लेकिन एक दर्शक की हैसियत से पिछले दस सालों मैं जिस श्रीनिवासन जैन को जानता हूं, वो न तो मधु त्रेहन के साथ बड़े ही इत्मीनान से बैठे मीडियाकर्मी हैं और न ही ग्लैमरस लुक में लोकसभा स्पीकर से रामनाथ गोयनका सम्मान लेते मैनेजिंग एडिटर.