विनोद मेहता पत्रकारों को पगार देने के नाम पर बेहद कंजूस थे लेकिन ‘एडिटर’ कुत्तों पर खूब खर्च करते थे

(स्व. विनोद मेहता जी)


Sumant Bhattacharya : विनोद मेहता की रुखसती का मतलब… मैं शायद उन चंद किस्मत वाले पत्रकारों में हूं, जिनका साक्षात्कार विनोद मेहता साहब ने लिया और पत्रकारिता के अपने स्कूल में दाखिला लिया। मैं हिंदी आउटलुक में था और हिंदी आउटलुक को नीलाभ मिश्र साहब देख रहे हैं। वो भी मेरे बेहद पसंदीदा और मेरी नजर में पत्रकारिता के बेहद सम्मानित, काबिल नाम हैं।

‘एडिटर’ नाम के कुत्‍ते के कारण विनोद मेहता से कई संपादक चिढ़ते थे

Ashish Maharishi : विनोद मेहता नहीं रहे। उनसे पहली और अंतिम मुलाकात कुछ साल पहले साउथ दिल्‍ली के Nirula’s में हुई थी। दोपहर का वक्‍त था। पेट की भूख शांत करने के लिए रेस्‍टोरेंट में जैसे घुसा तो सामने विनोद जी बड़ी शांति से बैठकर कुछ खा रहे थे। मैं उन्‍हें देखता रहा। उनका लिखा अक्‍सर मुझे अंदर तक झंकझोर देता था। खासतौर से आउटलुक में उनका कॉलम। जिसमें में वे साधारण शब्‍दों में बड़ी बातें कह दिया करते थे।

विनोद मेहता कहीं आलोक मेहता के भाई तो नहीं हैं?

Sushant Jha : विनोद मेहता से सिर्फ एक बार मिला, वो भी संयोग से। सन् 2004 में IIMC में एडमिशन लेना था, प्रवेश परीक्षा का फार्म खरीद लिया था। एक सज्जन थे जो 1000 रुपये प्रति घंटा विद चाय एंड समोदा कोचिंग करवाते थे। किसी भी कीमत पर IIMC में घुस जाने की जिद ने मुझे नोएडा सेक्टर 30(शायद) के एक सोसाइटी में पहुंचा दिया। सुबह के सात-साढे सात बजे होंगे। हमारी कोचिंग चल ही रही थी, कि कॉलबेल बजा।

संपादक की संस्था थोड़ी और हिल गई… (पढ़िए, विनोद मेहता के निधन पर किसने क्या कहा)

Om Thanvi :  विनोद मेहता के निधन के साथ निरंतर कमजोर होती संपादक की संस्था थोड़ी और हिल गई। डेबनेयर से लेकर आउटलुक तक मैंने उनकी विफलता और सफलता के कई मुकाम देखे। आउटलुक उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। पंद्रह दिन के अंतराल में निकलने वाले इंडिया टुडे को आउटलुक ने न सिर्फ सफल चुनौती दी, उसे भी हफ्तेवार शाया होने को विवश किया। बेबाकी मेहताजी के स्वभाव में थी और उनकी संपादकी में भी; खुशी है कि आउटलुक उसे बराबर निभा रहा है। मुझे निजी तौर भी एक दफा उनका अप्रत्याशित समर्थन मिला। जब एडिटर्स गिल्ड में महासचिव पद से मैंने एमजे अकबर के आचरण के खिलाफ इस्तीफा दे दिया तो उन्होंने मुझे जूझने को प्रेरित किया था; गिल्ड के इतिहास में पहली दफा आपतकालीन बैठक बुलाई गई, जिसमें अकबर ने माफी मांगी और इस्तीफा वापस हुआ। मेहताजी के साथ उनका अनूठा तेवर चला गया; लोकतांत्रिक, बेबाक और जीवट वाला तेवर पहले से दुर्लभ था, उनके जाने से जमीन कुछ और पोली हो गई। विदा, बंधु, विदा!

वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता का निधन

AAA VINOD MEHTA

नई दिल्ली। आउटलुक के संस्थापक संपादकीय प्रमुख और संपादकीय अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता, 73, का रविवार सुबह निधन हो गया। वे काफी समय से बीमार चल रहे थे। मेहता का जन्म रावलपिंडी में हुआ था। पत्रकारिता में उन्होंने काफी लंबे समय तक अपना योगदान दिया। उनकी मौत से मीडिया जगत को धक्का लगा है। मेहता ने आउटलुक को नई पहचान दिलाई।