कलम से ही डरती हैं मज़हबी राजशाहियां… संदर्भ- पत्रकार खाशोज्जी हत्याकांड

खाशोज्जी की हत्या के खिलाफ उठी अमेरिकी आवाज से अन्य मुस्लिम राजशाहियां भी डरेगी, कलम के सिपाहियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होंगी, अमेरिका-यूरोप की तरह चीन और रूस को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। खतरा यह भी कि कच्चे तेल के दामों में आग भी लग सकती है। अमेरिकी प्रतिबंध लग गये …

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता का एक ताजा अनुभव

विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

अमर सिंह को जेड प्सल सुरक्षा : भाजपा सांसदों का ईमान खरीदने का पुरस्कार…

Vishnu Gupt : भाजपा सांसदों का ईमान खरीदने का पुरस्कार… अमर सिंह को मोदी सरकार ने दिया जेड प्सल की सुरक्षा… कैश फॉर वोट कांड में भाजपा की फजीहत कराने वाले और भाजपा के सांसदों का ईमान खरीदने वाले अमर सिंह को अभी-अभी मोदी सरकार ने जड प्सल की सुरक्षा प्रदान की है। मुसलमानो पर हुई चर्चा के दौरान भाजपा के एक सांसद अहुलवालिया का कालर पकडने का भी अमर सिंह ने दुस्साहस किया था। 

प्रणव रॉय टूटपूंजियां पत्रकार से कैसे बना एनडीटीवी मीडिया उद्योग का मालिक?

क्या सही में देश के अंदर आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है? क्या सही में देश के अंदर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट खडा हो गया है? क्या सही में नरेन्द्र मोदी सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गल्ला घोटने के रास्ते पर चल रही है? क्या सही में एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध पूरे मीडिया को निशाने पर लेने की कार्रवाई मानी जानी चाहिए? क्या कांग्रेस की मनमोहन सरकार में इलेक्टोनिक मीडिया पर प्रतिबंध नहीं लगा था? आज शोरगुल मचाने वाले तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हथकंडेबाज उस समय कहां थे जब मनमोहन सिंह सरकार ने लाइव इंडिया टीवी चैनल पर एक सप्ताह का प्रतिबंध लगाया था? एनडीटीवी के पक्ष में वैसे लोग और वैसी राजनीतिक पार्टियां क्यों और किस उद्देश्य के लिए खडी है जो खुद अभिव्यक्ति की आाजदी का गल्ला घोटती रही हैं, जिनके अंदर लोकतंत्र नाम की कोई चीज ही नहीं है, ऐसी राजनीतिक पार्टियां क्या एक प्राइवेट कंपनी के रूप में नहीं चल रही हैं?