मुम्बई के मंच पर विष्णु खरे की बोलती बंद

Bodhi Sattva : निराला जी की सरस्वती वंदना का मजाक बनाया खरे जी ने…. कौन कहता है कि कविवर विष्णु खरे जी को नियंत्रित और संयमित या दबा कर बैठाया नहीं जा सकता। 27 फरवरी 2015 को मुंबई विश्वविद्यालय में आयोजित मंगलेश डबराल जी के काव्यपाठ के एक आयोजन में विष्णु खरे को अपनी बोलती बंद रख कर मंच पर काफ़ी समय निर्गुण-निर्विकार संत की तरह मौन बैठना पड़ा। या यूँ कहें कि दबंगई भूल कर दबे रहना पड़ा…. कार्यक्रम के दौरान कवि विष्णु खरे ने अपनी चिरपरिचित दबंग या असंत मुद्रा का विकट प्रदर्शन किया.. अपना रौद्र रूप भी दिखाया। लेकिन संचालन कर रहे गीतकार-कवि देवमणि पाण्डेय जी ने ज़रा भी भाव न खाते हुए उनसे मंच पर अध्यक्षीय गरिमा के साथ और नियंत्रित और संयमित तरीके से यानी का़यदे से बैठने को कहा।

‘आप’ दिल्ली से अपना एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अविलम्ब शुरू करे : विष्णु खरे

एक भारतीय की हैसियत से 1952 से अपने सारे आम और विधान-सभा चुनाव देखता-सुनता आया हूँ, पत्रकार के रूप में उन पर लिखा भी है, जब से मतदाता हुआ हूँ, यथासंभव वोट भी डाला है, दिल्ली में 42 वर्ष रहा हूँ, लेकिन वहाँ  से आज जो नतीज़े आए हैं वह विश्व के राजनीतिक इतिहास में अद्वितीय हैं और गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में तो दर्ज़ किए ही जाने चाहिए. एक ऐसी एकदम नई पार्टी, अपनी पिछले वर्ष की राजनीतिक गलतियों के कारण जिसने देशव्यापी क्रोध, मोहभंग और कुंठा को जन्म दिया था और लगता था कि वह कहीं अकालकवलित न हो जाए, अपने जन्मस्थान में एक अकल्पनीय चमत्कार की तरह लौट आई है. पिछले एक वर्ष में ‘आप’ ने वह सब देख लिया और दिखा दिया है जिसके लिए अन्य वरिष्ठ पार्टियों को कई दशक लग गए.भारतीय परम्परा में मृत्यु या उसके मुख से छूट जाने की कई कथाएँ हैं लेकिन ‘आप’ ने ग्रीक मिथक के फ़ीनिक्स पक्षी की तरह जैसे अग्नि से पुनर्जन्म प्राप्त किया है.