बनारस जाने से कुछ दाग मुझ पर जाने-अनजाने लग ही गए तो कुछ बातें यहां कहना चाहूंगा : विमल कुमार

: लडाई के और भी तरीके होते हैं… असहमति का सम्मान भी करना सीखो :  मैं यहाँ अपनी बात बनारस में साहित्य अकेडमी के समारोह में काव्यपाठ को उचित ठहराने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि जिस युग में हम जी रहे हैं उसकी विडम्बनाओं को रेखांकित करने और चुनौतियों को रखने के लिए कह रहा हूँ. पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि साहित्य अकेडमी से जो पत्र आया उसमे मोदी का कहीं नाम नहीं था, जो कार्ड छापा उसमे भी नाम नहीं था, यहाँ तक कि मालवीय जी और वाजपेयी की जयंती का जिक्र तक नहीं था. टेलीफ़ोन पर भी साहित्य अकेडमी के उपसचिव ने भी ऐसी कोई जानकारी नहीं दी.