बिहार के राज्यपाल के दामन पर भी छींटे?

Swami Vyalok बिहार को हो क्या गया है…? आज दोपहर एक फोन आया। राजस्थान से पत्रकार मित्र का था। उन्होंने कहा कि यार, आपकी पुलिस तो हमारे यहां बाड़मेर से एक पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को उठा ले गयी। मैं आधी नींद में था। कहा, ‘भाई, हमारे यहां शराबबंदी के बाद रामराज आ गया है। …

इसलिए कोसता हूं एनडीटीवी को

किसी ने मुझसे पूछा था कि मैं एंटरटेनमेंट चैनलों, खासकर एनडीटीवी को इतना कोसता क्यों हूं, पत्रकार (तथाकथित) होने के बावजूद मीडिया को गाली क्यों देता हूं….तो आज इस सवाल का जवाब खोजा।

विनोद मेहता, NDTV और चुनिंदा चुप्पियां

कल भारतीय मीडिया जगत के हिसाब से दो बड़ी अहम घटनाएं हुईं। एक, विनोद मेहता की मौत और दूसरे, एनडीटीवी का एक घंटे तक अपनी स्क्रीन को ब्लैंक रखना। दोनों पर बात होनी चाहिए। एक-एक कर के इन दोनों परिघटनाओं के मायने ज़रा तलाशे जाएं। विनोद मेहता का जब देहान्‍त हुआ, तो कई के मुताबिक, जिन्होंने उनका स्मृतिशेष पढ़ा, वह इस पीढ़ी के अंतिम ‘अक्खड़, ईमानदार, अड़ियल, साफगो और निर्भीक संपादक’ थे। हमारी भारतीय संस्कृति में मौत के बाद किसी की बुराई करने या पंचनामा करने का चलन नहीं है, इसलिए ज़ाहिर तौर पर विनोद मेहता को भी महानता की श्रेणी में धकेल ही दिया जाएगा। बहरहाल, विनोद मेहता इस लेखक के लिए हमेशा उस वामपंथी(?) बौद्धिक बिरादरी का हिस्सा रहे, जो ‘चुनिंदा विस्‍मरण’ (सेलेक्टिव एमनेज़िया) का शिकार रहा है। इसके अलावा भी उनका व्यक्तित्व कोई शानदार नहीं रहा, और इसे पूरी शिद्दत से समझने की ज़रूरत है।