माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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‘मीडिया के सरताज’ लिस्ट में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम

फेम इंडिया और एशिया पोस्ट नाम पत्रिकाओं की तरफ से ‘मीडिया के सरताज वर्ष 2017’ के लिए किए गए सर्वे में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम आया है. फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यू मीडिया कैटगरी में एक प्रमुख सरताज के तौर पर यशवंत सिंह को चिन्हित किया गया.

इस संबंध में फेम इंडिया मैग्जीन की वेबसाइट पर एक खबर का प्रकाशन किया गया है, जो नीचे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. फिलहाल इस उपलब्धि के लिए सोशल मीडिया पर यशवंत को लोग बधाई दे रहे हैं.

मीडिया को बेबाकी से आइना दिखाते हैं यशवंत सिंह (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे 2017-मीडिया के सरताज)

Posted by fameindia On April 20, 2017

हिन्दी भाषी राज्यों में जो भी शख्स मीडिया से जुड़ा हो वह कम से कम भड़ास4मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता यशवंत सिंह को जरूर जानता होगा। बेबाक, बेलौस और बेलाग। यशवंत सिंह की ये तीन खूबियां उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। उन्हें एक ऐसे निडर पत्रकार के तौर पर जाना जाता है जो किसी युनियन या संगठन के पचड़ों में पड़े बगैर भी देश के हर मीडियाकर्मी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा है।

मूल रूप से गाजीपुर के यशवंत सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। लखनऊ में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। फिर अमर उजाला से जुड़े। अमर उजाला के लिए बनारस, कानपुर और आगरा में काम किया। इसके बाद दोबारा दैनिक जागरण से जुड़े और मेरठ, कानुपर व दिल्ली में काम किया। जागरण समूह के आई-नेक्स्ट की लॉन्चिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उन्होंने देखा कि पत्रकारिता में हर जगह कई बुराइयों ने डेरा जमा लिया है और जिस उद्देशय के लिये पत्रकारिता शुरु की थी वो कहीं है ही नहीं।

जब पत्रकारिता उबाऊ लगने लगी तो कुछ दिन दिल्ली में एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर काम किया। मन में मैली हो रही पत्रकारिता को आइना दिखाने की इच्छा दबी थी, वह नौकरी भी छोड़ दी और मई 2008 में मीडिया की खबरों का पोर्टल भड़ास4मीडिया.कॉम शुरु किया। यह अपनी तरह का पहला पोर्टल था जो हर आम मीडियाकर्मी की समस्या को तरजीह देता था व उनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता था। जल्दी ही यह काफी लोकप्रिय हो गया।

यशवंत सिंह की पहचान उनके बागी तेवरों की वजह से भी है। इसकी वजह से उन्हें कई बार उन मीडिया संस्थानों का निशाना भी बनना पड़ा जो अपने उद्देश्यों से भटके हुए थे। कई बार उनपर मुकदमे भी हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन बेहद पॉजिटिव सोच रखने वाले यशवंत सिंह ने इस मौके को भी एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और जेल में मौजूद कुव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये एक किताब -‘जानेमन जेल’ लिख डाली। उनकी यह किताब खूब बिकी और प्रशासन ने कई सुधार भी किये।

यशवंत सिंह ने भारतीय पत्रकारों के बीच अपनी पैठ बना रखी है। पत्रकार भले ही दुनिया के लिए लड़ते हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए लड़ने वाला ये अगुवा पत्रकार माने जाते हैं। कई पत्रकार युनियनों और समाजसेवी संगठनों ने इन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया है। इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवॉर्ड, ‘इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्यूमेटेशन इन सोशल साइन्सेंस’ (आईआरडीएस) अवॉर्ड आदि प्रमुख हैं।

हर मीडियाकर्मी की भलाई और जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की सोच रखने वाले यशवंत सिंह फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यु मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाये गये हैं।

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भड़ासानंद कहिन (2)- योगीजी खाने का मेनू एबीपी न्यूज देखकर तय करते हैं! (देखें वीडियो)

एबीपी न्यूज देख कर अपने खाने का मेनू तय करते हैं योगी जी… आजतक वाले योगी जी के बेडरूम में भी घुस जाते हैं ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में… मीडिया के संपादक लोग आखिर क्यों सीएम से मिलने जाते हैं लाइन लगा कर..  सुनिए भड़ासानंद कहिन… यशवंत की जुबानी… मीडिया की अल्टीमेट कहानी..

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भड़ासानंद की तरफ से ब्रेक की गई एक बड़ी खबर देखिए-सुनिए…

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अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

Yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.

अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.

ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.

इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.

हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.

सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं है :

Ravi S Srivastava फेसबुको पर वीरो की बखानता के बाद सोच ही रहा था आप ने बचा लिया साधुवाद

   Yashwant Singh मैंने फिल्म देखी भी देर में ताकि मैं लिखूं तो इससे फिल्म का बिजनेस प्रभावित न हो. आखिर अविनाश अपने साथी हैं, अपने पेशे के रहे हैं और उनकी पहली फिल्म है, बहुत संघर्षों के बाद.

   Ravi S Srivastava बात आप की सही है पर प्रोफेसन मे इमोशनल का छौंका नहीं होना चाहिये

आशीष महर्षि sahi me?

   Yashwant Singh जाइए देख ही आइए. ताकि मेरे कहे के आलोक में आप भी रिव्यू लिख सकें. आप ज्यादा तटस्थ लिखेंगे क्योंकि दोनों पक्ष आपके सामने हैं. हां, देख आना इसलिए जरूरी है ताकि साथी अविनाश की पहली फिल्म होने के नाते एक थोड़ा-सा योगदान अपन लोग की तरफ से करना बनता है.

चैतन्य घनश्याम चन्दन मैंने भी अतिउत्साह में यह फिल्म पैसे खर्च कर देख डाली, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। दरअसल जिस फिल्मकार की जैसी मानसिकता होती है, वह वैसी ही चीजें दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस फिल्मकार का इतिहास भी पलट कर देख लीजिये। कम लिखा, ज्यादा समझिये।

Prakash Govind मैं ये फ़िल्म फ़िल्म देखने को आतुर था,,, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल खोलकर सराहा था। लेकिन आपने तो एक झटके में बैंड बजा डाली। मुझे आपकी साफगोई बढ़िया लगी। बिना लाग-लपेट के सटीक समीक्षा की है। अविनाश जी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि अगली फ़िल्म सार्थक व बेहतर बना सकें।

   Yashwant Singh मजेदार ये है कि वो लोग ज्यादा ही तारीफ लिख रहे जिनने नंगई का जीवन भर विरोध किया. आज के दौर में हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और पोर्न क्लिप सबको सहज उपलब्ध है. ऐसे में सिर्फ कामुकता परोसने के लिए फिल्म बनाना और कामुकता वासना सेक्स को जस्टीफाई करने के लिए एक सरोकारी एंगल गढ़ देना पचता नहीं बंधु.

    Prakash Govind मुझे लग रहा है कि अविनाश जी ने बाजार के बोझ तले दबकर ये फ़िल्म रची, इसीलिए कहानी और रचनात्मकता को नजरअंदाज कर दिया।

   Mantu Soni अब बुद्धिजीवी की क्या बुद्धि है जनता जान चुकी है।

Dev Nath इसको कहते हैं बिना किसी लाग लपेट की समीक्षा

सुभाष सिंह सुमन तमाम रिव्यूज पढ़कर सोच रहे थे कि टिकट बुक किया जाए। अब रहने देते हैं।

Nadim S. Akhter भाई Yashwant Singh, अब तक ये फिल्म नहीं देखी है पर अब देखनी पड़ेगी. जैजै

    Yashwant Singh जरूर. मैं तो सरेआम अपील कर चुका हूं रिलीज से पहले ही कि अपने साथी अविनाश की पहली फिल्म को सब लोग देखें और उन्हें सपोर्ट करें. फिल्म सभी को देखना चाहिए क्योंकि पहली फिल्म थोड़ी भी हिट हो गई, पैसा वसूल बन गई तो निर्देशक के लिए आगे का रास्ता खुल जाता है. जरूर देखिए मित्र और लिखिएगा.

    Nadim S. Akhter आप दोनों मेरे मित्र हैं. इसलिए जरूर देखूंगा और ईमानदारी से लिखूंगा. आपका एक अलग दृष्टिकोण मिला. ये भी जरूरी था. आलोचना और समालोचना जरूरी है. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती.

Sandip Thakur कमाल कर दिया यशवंतजी…आपने। धाे डाला…पटक पटक कर। आरा आैर अनारकली….एक ताे करेला,दूजे चढ़ा नीम। अनारकली अपने आप में गजब थी आैर अनारकली यदि आरा की हो तो फिर क्या कहने..। मैंने फिल्म देखी नहीं है…लेकिन आपने जैसा लिखा है कि फिल्म में फूहड़ता का नंगा नाच है…उससे मैंने सहमत हाे सकता हूं। क्याेंकि भाेजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई व दबंगई के लिए। फिल्म सेंसर बाेर्ड ने भी ए सर्टिफिकेट दिया है ताे जाहिर है कि फिल्म में वाे सबकुछ हाेगा जाे पैंट में हलचल पैदा कर दे। .

   Yashwant Singh मेरा दावा है कि अगर आप अपने बेटे या बेटी के साथ फिल्म देखेंगे तो आपको शर्म आएगी कि क्यों देखने चला आया. बेटा या बेटी सिर्फ यौन अराजकता की शिक्षा ही पा सकेंगे. इतने घटिया फूहड़ डायलाग और इतने भोंडे गाने कि आप उफ्फ कर लेंगे.

   Sami Ahmad यशवंत जी, मैं सिनेमा के मामले में जीरो हूँ या आम तौर पर इसके बारे में अच्छी राय नहीं। मैंने इस फ़िल्म का बहुत नाम सुनकर एक भाई से पूछा था कि इस फ़िल्म में और बाई जी के नाच में क्या अंतर है? अब लग रहा कि यह तो बाई जी के बीच बाई जी है। फिर आदमी जलेबी बाई को ही क्यों देखे। किसी शादी में चला जाय। नाच और स्टेज पर ही देख ले नाथुनिये पे गोली मारे और फिर चोली के पीछे क्या है। भाई लोग भी कमाल के हैं। सबको एकदम्मे बुड़बक समझते हैं।

Madan Tiwary निष्पक्ष आलोचना है न? व्यवसायिक प्रतिद्वन्दिता तो नहीं? शेयर करना है यह समीक्षा।

   Yashwant Singh अरे पहले आप देख आइए पंडीजी. देखने से ही आप समझ पाएंगे क्या सही समीक्षा है और क्या गलत. बाकी अविनाश और मेरा कहीं कोई होड़ या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. न पहले थी. न अब है. हम लोग अच्छे मित्र हैं.

  Madan Tiwary नहीं आपकी बात पर विश्वास है। मित्र तो सब हैं, बुद्धिजीवियों वाली मित्रता भी है, प्रतिद्वन्दिता भी। हाहाहाहाहा

   Yashwant Singh आलोचना लिखना भी एक तरह की ब्रांडिंग ही होती है. इस बहाने फिल्म की चर्चा हुई. सिनेमा में तो वैसे भी निगेटिव पब्लिसिटी ब्रांडिंग कराई जाती है ताकि सिनेमा का नाम लोगों के दिमाग जुबान तक पहुंच जाए. इसलिए यह आरोप लगा सकते हैं Madan पंडी जी कि हम दोनों ने फिक्स करके यह आलोचना लिखी लिखवाई है 😀

   Madan Tiwary आरा की अनारकली यशवन्त की नजर में। वेब मीडिया के तीन मठाधीश हैं। यशवन्त आफ भड़ास, अविनाश आफ मोहल्ला लाईव, संजय तिवारी आफ विस्फोट। तीनों के बीच बुद्धिजीवी वाली मित्रता और प्रतिस्पर्धा भी रही है। यानी दोस्ती भी दुश्मनी भी। हाहाहाहाहा। लेकिन फेसबुकिया मठाधीशों वाला छिछलापन कभी नहीं रहा। खैर तीनों दोस्त है। दो के साथ जाम वाली मित्रता रही। संजय तिवारी बेचारे मजबूर है जाम नहीं छलका सकते। खैर समीक्षा पढ़े जरूर लेकिन फ़िल्म भी देखें। अविनाश के लिए, संघर्षशील एक्टिविस्ट के लिए।

  आशीष सागर Seedha likha

Aryan Kothiyal चलो अब हमारा पैसा तो बचेगा… सही समीक्षा करने के लिए धन्यवाद भईया

Ila Joshi ग़ज़ब समीक्षा उससे भी ग़ज़ब टिप्पणियां, हालांकि मेरी इस समीक्षा से भयंकर असहमतियां हैं लेकिन आपकी वॉल है सो जो चाहे लिखिए।

   Yashwant Singh आप मेरी समीक्षा और ग़ज़ब टिप्पणियों पर एक समीक्षा अपने वॉल पर लिख सकती हैं. बहस तो होनी चाहिए.

Vinay Oswal मैं तो फिल्म ही नही देखता तो टिपण्णी भी नहीं।

Siddharth Kalhans आपको धन्यवाद वरना आजकल में ही 1000-1200 की चपत लगने वाली थी। कई परिजन फिल्म दिखाने का आग्रह कर रहे थे। चेन्नई प्रवास में तो साथी उत्कर्ष सिन्हा आमादा ही हो गए थे फिल्म जाने को। अब इस बचे पैसे का कुछ सदुपयोग कर सकूंगा आपके लखनऊ आगमन पर द्रव्यपान कराने में (आपके साथियों को क्योंकि खबर है कि आपने द्रव्य से बेवफाई कर दी है)

Harsh Kumar एक ऐसी ही बकवास फिल्म पार्च्ड आई थी। जिसकी तथाकथित कम्युनिस्ट टाइप के लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

S.p. Singh Satyarthi देखने की चाह जाती रही। यशवंत जी की टिप्पणी अपनी अलग और निर्लिप्त पहचान रखती है। इतनी फूहड़ता है तो बाय बाय…

Singhasan Chauhan मैंने फिल्म देखी नहीं है मगर इसी फूहड़पन की वजह से मुझे खुद याद नहीं कब भोजपुरी फिल्म देखी थी

    Yashwant Singh इसका उल्टा होने की ज्यादा संभावना है. लोग अपना नजरिया कायम करने के लिए फिल्म देखने जाएंगे फिर लिखेंगे कि यशवंत ने सही कहा या दूसरों ने. आप जानते ही होंगे कि निगेटिव पब्लिसिटी और ब्रांडिंग सिनेमा का शगल है ताकि फिल्म जुबान दिमाग में चढ़ जाए. 😀

Deepak Pandey आपकी यह पोस्ट जितने लोग पढ़ेगे उतनी फिल्म को चपत लगेगी।

Vinay Shrikar मैंने भी बिना देखे ही यह मूवी देख ली! थैंक्यू यशवंत।

Tarun Kumar Tarun इस समीक्षा का असर यह हुआ कि मेरे १२० रुपये, तीन घंटे और पचास ग्राम खून बच गये!

डॉ. अजित मैं यही सोच रहा था सर सब वाह वाह कर रहे है क्या फिल्म का कोई कमजोर पक्ष नही है। आपकी दर्शकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

Kamal Kumar Singh एक से पहले ही अप्रैल फूल बन गया भैया, हमकों पहिले से ही पता था कि कुंठित खेल होगा।

Ramji Mishra शानदार विश्लेषण

Rajesh Yadav सटीक समीक्षा करना सबके बात नहीं रही इस बिकाऊ मीडिया में। आपने आईना दिखाया है, लेकिन बहुतों को फिर भी धुंधला ही नजर आएगा।

Sheeba Aslam Fehmi Maine Arvind Shesh aur kisi ek aur mitr ki sameeksha padhi, ta’ajub hai ki dono ne hi kuchh aisa nahi likha jisse ye pahlu ujagar hotey. Baharhaal aapke mashvire me dum hai, aainda behtar filmen bhi banaenge Avinash.

Dilnawaz Pasha कई दिन से फिल्म देखने का सोच रहा हूं. मौका मिला तो देख भी लूंगा… बिना देखे क्या कहना!

Sandeep Kumar Yadav मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ। अनारकली लेती देती है या नहीं ये उसकी मर्ज़ी है कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है कि BC रसूखदार हैं पैसे फेक रहे हैं तो वो BC के साथ सो जाए, ये उसकी मर्ज़ी है। शरीर उसका है मन उसका है मर्ज़ी उसकी है। आप ने जो ये लिखा है वो अपने दलाल को लेती देती है फिर BC से खुले आम कुछ भी करने में क्या दिक्कत है, मैं ये जानना चाहता हूँ उसके शरीर और उसके मन पर किसका हक़ है, कौन निर्णय कौन करेगा, किसको हक़ दिया गया है…. अगर आप ने फिल्म पूरी नहीं देखी तो कैसे पता की वो अंत में Bc से बदला लेती हैं और सबक सिखाती है ? जिस प्रकार आप ने लिखा है उससे ये पता चलता है कि जो नाचने गाने वाले लोग हैं उनकी अपनी स्वतंत्रता या अपनी नैतिकता कुछ नहीं होती । और जो उसका दलाल है उसने कहाँ कहाँ परोसा है फ़िल्म में अनारकली को ज़रा वो भी बताइये। खैर गीत संगीत में तो आप को फूहड़ता ही नज़र आई बाकी क्या कहें? खैर इसी कहानी में सनी लियोन होती या इमरान हाशमी होते तो शायद ये प्रतिक्रिया न होती आप की? कोई औरत क्या करेगी और किस हद तक करेगी ये BC टाइप्स वाली मानसिकता के लोग तय करते हैं? और सर कृपया अनुराग कश्यप मार्का का अर्थ ज़रा समझाइये?

    Yashwant Singh आपका अपना पक्ष है. स्वागत है. सबके विचार अलग हो सकते हैं. मैने भी लिखा है कि शरीर पर स्त्री का हक होता है, वह तय करती है. मेरा लब्बोलुआब ये है कि सरोकारी कहानी की आड़ में सिर्फ कामुकता, भोंडापन, वासना और नंगई परोसी गई है. जब आप कहते हैं कि पैंसे भी लूंगी, दूंगी भी नहीं तो ये वही नंगई है जिसमें एक पत्रकार कहता है कि रिश्वत भी लूंगा और बदनाम भी करूंगा, एक पुलिस वाला कहता है घूस भी लूंगा और चालान भी करूंगा, एक डाक्टर कहता है फीस भी लूंगा और मरीज को मार भी डालूंगा… क्या संदेश देना चाहते हैं ऐसे सीन / डायलाग से. फिल्म का अंत फिल्म की समीक्षाओं से पता है. अनुराग कश्यप मार्का समझने के लिए गैंग आफ वासेपुर देख लीजिए. दलाल कितने को दिलाता परोसता है यह कुछ दृश्य देखकर अंदाजा लग जाता है जिसमें वह खींच खांचकर हर जगह उसे ले जाता है, थाने से लेकर वीसी तक के घर में. बाकी नजरिया सबका अपना अपना. मैंने अपने जीवन में इतनी भोंडी फिल्म नहीं देखी है, इसलिए कह लिख रहा हूं. सरोकारी कहानी की चाशनी में नंगई परोसने का माडल बहुत पुराना है दोस्त. मुझे स्त्री के संघर्ष से कोई दिक्कत नहीं है. उसके संघर्ष की आड़ में क्या क्या परोसा सुनाया दिखाया गया है, उससे दिक्कत है.

Divakar Singh हम्म सही है सर. हम कल नहीं आ पाए तो एक टिकट का पैसा बर्बाद होने से बच गया. आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है.

Sandip Naik कुछ पूर्वाग्रह लग रहे हैं यशवंत। पता नही Avinash ने ये सब पढा या नहीं। खैर, अविनाश खुले दिल दिमाग़ के शख्स हैं और जिंदादिल इंसान हैं। समय आने पर सबको और सबकी जिज्ञासाओं का माकूल जवाब भी देंगे, अभी सुस्ता तो लेने दो एक लंबी पारी खेलने के बाद।

    Yashwant Singh पूर्वाग्रह होता तो फिल्म का रिलीज से पहले ही प्रचार न कर रहा होता भड़ास के जरिेए और रिलीज पर सबको देखने का आह्वान न करता. पूर्वाग्रह अगर इसे कहते हैं कि जैसा आप फील करें, उसे लिख दें तो मान लीजिए पूर्वाग्रही हूं. रही अविनाश की बात तो उन्हें प्रशंसाओं के अंबार के बीच दो चार आलोचनाओं का भी स्वागत करना ही चाहिए मित्र.

Rj Shalini Singh आप जैसे आलोचक जो स्पष्ट एक बार में कह दें कम होते हैं भाई। हम तो ऐसे लोगो को पलकों पर नहीं उनके भीतर छुपा के रखने वाले हैं। ताकि कोई नज़र न लगा पाए।

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योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से होने वाले एक बड़े फायदे के बारे में बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : योगी आदित्यनाथ के सीएम बन जाने से एक बड़ा फायदा ये है कि यूपी के सीएम को अब अपने परिवार के लोगों के लिए सांसदी, मंत्रालय, ठेका, उगाही आदि के लिए प्रयास नहीं करना होगा. मुलायम और अखिलेश के सीएम वाले कार्यकाल में इनके कुनबे के जितने लोग सांसद विधायक बने, जितने लोग मंत्री बने, जितने लोग ठेका पट्टी से जमकर लूटे, जितने लोग ट्रांसफर पोस्टिंग से ठूंस कर कमाए यानि इन लोगों ने अपने कार्यकाल में अपने और अपने कुनबे के जरिए जितना माल दूहा, इकट्ठा किया-कराया है, अगर वो सब जब्त कर मेरे पूर्वी उत्तर प्रदेश इलाके के हर घर के प्रत्येक सदस्य के बीच वितरित कर दिया जाए तो हर एक को कम से कम एक-एक लाख रुपया मिल जाएगा…

(….मुलायम सिंह जी जाने क्या मोदी के कान में फूंक चुके हैं, शपथ ग्रहण के दिन और आज अपर्णा प्रतीक खुद अपने पैरों से चलकर योगी जी से मिल आए हैं… ऐसे में धन की जब्ती तो छोड़िए, इस कुनबे के काम और आय की जांच भी होगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता…)

योगी संन्यासी हैं और दीक्षा लेने के बाद से अपने परिवार से दूर हैं. इसलिए वो पूरी तरह प्रदेश के विकास के लिए काम करने में मन लगाएंगे, ये उम्मीद करता हूं. पिछले दस वर्षों में जिस कदर अंध लूट, तुष्टीकरण, उगाही, जंगलराज का दौर चला, उससे निजात पाने में वक्त तो लगता है… बूचड़खाने हों, लेकिन लाइसेंसी हों… सड़क पर नौजवान चलें लेकिन लड़कियों की तरफ निगाह न करें… ये दो अच्छे काम कर रहे हैं योगी जी.. साइड इफेक्ट हर काम के होते हैं.. जो अफसर इंप्लीमेंटेशन में गड़बड़ करें उन्हें भी दौड़ा कर दंड दो लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों फैसले ठीक हैं… मेरी सबसे ज्यादा उत्सुकता किसानों की कर्ज माफी वाले वादे की है. अगर योगी जी ये वाला काम भी कर दें तो उत्तर प्रदेश के किसानों के मुर्झाए चेहरों पर लाली लौट आएगी… जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

यशवंत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर न लिखें, यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप मुद्दा है : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर मत लिखिए. यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप का ही मुद्दा है. जमीन पर लोग इसे बहुत जरूरी बता रहे हैं. कई लोगों की बात सुन कर और कई लोगों से बात करने के बाद लिख रहा हूं. आप आजादी, स्वतंत्रता, प्रेम आदि का राग अलापते रहिए लेकिन जमीन पर लोग शोहदों के आतंक से त्रस्त थे. मैं भी आप की ही तरह सोच रहा था कि रोमियो स्क्वाड के जरिए यूपी पुलिस बच्चों को परेशान कर रही है.

पर लोग कह रहे हैं कि परेशान वे बच्चे हो रहे हैं जो सुबह शाम लड़कियों के कालेज स्कूल और उनके निकलने के रास्ते पर तैनात रहते थे और पीछा किया करते थे. रही बात पार्कों बागों आदि में बैठने वाले जोड़ों की तो किसी भी अभियान में दस पंद्रह परसेंट जेनुइन लोग तो चपेट में आते ही हैं.. वो कहते हैं न गेहूं के साथ घुन का पिस जाना. सो, हे साथियों दोस्तों, अब थोड़ा प्रैक्टिकल होकर जमीनी हालात को समझ बूझ के लिखा करिए. सिर्फ घर से आफिस और आफिस से घर, इस दरम्यान पूरे वक्त फेसबुक पर वैचारिक लेखन से रियल्टी / अंडर करंट को नहीं पकड़ पाएंगे.

ठीक यही मामला बूचड़खाने का भी है. शहरी / रियाइशी इलाके में बहते खून, भयंकर बदबू से त्रस्त लोगों को लग रहा है कि बहुत सही हो रहा है… ध्यान रखिए, मुसलमान कतई भाजपा के वोट बैंक नहीं हैं. सपा राज में मुसलमान पूरी तरह सत्ता संरक्षण में पल बढ़ रहे थे और ढेर सारे वैध अवैध काम कर रहे थे, जिसमें छेड़खानी से लेकर अवैध बूचड़खाना संचालन तक है. अब इन पर गाज गिर रही तो हिंदू खुश हैं.

मुझे मुस्लिम हिंदू की भाषा में इसलिए बात करनी पड़ रही है क्योंकि ग्राउंड लेवल का सच यह हो चुका है और इसे सच बनाने में बड़ा रोल सपा बसपा कांग्रेस जैसी पार्टियों का है. मेरा बस इतना कहना है कि योगी के आने के बाद तुरंत हाय हाय करने की जगह तीन महीने तक का वेट करिए… देखिए, भांपिए.. घूमिए, फीडबैक लीजिए… फिर लिखिए… वरना एक बार फिर झटका खाएंगे… जितना बिना वजह भाजपा और योगी का विरोध करेंगे, उतना ही आप उन्हें मजबूत करेंगे…

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Kumar Rahman यशवंत जी, बरेली में शोहदों के डर से एक बच्ची के माता-पिता ने गांव छो़ड़ दिया है… इसकी वजह से उस नवीं कक्षा का छात्रा की पढ़ाई भी छूट गई है…. शाम छह बजे LIVE TODAY न्यूज चैनल पर बरेली से यह रिपोर्ट देखी जा सकती है…

Shivmangal Singh भाई साहब यूपी में ये समस्या कैंसर की तरह है हज़ारों बच्चियां स्कूल छोड़ रहीं हैं up में ऐसा लगने लगा था की बेटी का बाप होना अपराध है मुजफ्फरनगर के दंगों के पीछे छेड़खानी ही थी वहां लफंगों में दहशत होना जरुरी है

Deepak Thakur सटीक विश्लेषण। कुछ यही हालत पटना जैसे शहरों का भी है। पढने वाली बेटियों को काफी परेशानी हो रही है।

Kamta Prasad लगता है मैं भी कायदे से सोचने लगा हूँ तभी आपकी बातें पल्ले पड़ने लगी हैं, कल की भड़ास की रिपोर्ट भी ठीक ही थी कि कानून का दुरुपयोग भी होता है।

Vivek Singh बिलकुल सही बात। इलाहाबाद याद ही होगा किस तरह शाम को महिला छात्रावास के बाहर लल्ला चुंगी पर भीड़ लगती थी। वहां जो होता था वो यही सब था।

Anil Maheshwari Efforts to contain eve teasing (sexual harassment) are being viewed with suspicion but it intriguing that Anti Romeo Squad in UP is “moral policing” & Pink Squad in Kerala is progressive. She squads are also in Hyderabad for the same job. When Rajnath Singh, as UP Minister for Education tried to check copying in examination by making copying cognizable offence, the left/liberal forces in Delhi too opposed the move of Raj Nath Singh saying that a girl of 14 years, caught copying will also be put behind the bars. The result was under the pressure of the party leaders, having entrenched interest in copying and making copying as a source of livelihood compelled the Kalyan Singh government to withdraw the order. The result is before us. No value of UP degrees and certificates in the Job market.

Singhasan Chauhan बिलकुल सही और इसमें सज्जन लोगों को तो कोई परेशानी ही नहीं है परेशानी तो उनके लिए है जो आवारागर्दी करते हैं और रह चलती लड़कियों, औरतों के ऊपर फब्तियां कसते हैं इनका इलाज तो होना ही चाहिए| मैं किसी परती विशेष का समर्थक नहीं हूँ मगर सही काम की हमेशा तारीफ होनी चाहिए चाहे वो किसी भी परती या धर्म से हो.

Ravindra Singh Basera Dev पिछले साल दिसंबर में दिल्ली से देहरादून जा रहा था। रास्ते में बस की खिड़की से बाहर झांक रहा था तो क्या देखता हूं कि मेरठ के किसी स्कूल की छुट्टी हो रही थी। लड़कियों का स्कूल था, कतार बना कर लड़कियां घर को लौट रहीं थी। कुछ लड़कों को सड़क किनारे लड़कियों की कतार में से किसी को खोजते देखा, सोचा कि शायद किसी खास लड़की का इंतजार हो, और मैं अपने लड़कपन के दिन याद करते हुए मन ही मन मुस्कुरा दिया। लेकिन बस के जरा आगे बढने पर दृश्य बड़ा विचलित करने वाला था, लड़के बाइक लेकर एक्सेलेटर दबा, बार बार लडकियों की कतार के चक्कर काट रहे थे, लडकियों की कतार के ठीक बगल में, बीच-बीच में किनारे खड़े दोस्तों का झुंड बनाकर लड़के, छेड़ाखानी करते, हाथ खींचते और लड़कियों को झुंड में घेरने की कोशिश करते दिख रहे थे। चूंकि यह छुट्टी का समय था तो बस के थोड़ा और आगे बढने पर देखा कि, और भी कई स्कूलों की छुट्टी उसी समय हो रही थी। और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था यह देख कर कि सभी जगह वही पहले स्कूल के जैसे हालात थे। यह सब शहर के बीचों बीच चल रहा था, लोग आ जा रहे थे, सब सामान्य कामकाज की भांति चल रहा था। और लड़कों के गिरोह किसी संगठित गैंग की तरह जहां तहां लड़कियों से यूँ ही पेश आते दिखे। इसे पश्चिमी उप्र के शहरों और कस्बों की Teen Age संस्कृति के रूप में आप समझ सकते हैं। लेकिन आज जब योगी सरकार के Anti Romeo Squad के गठन का समाचार सुना तो एक-बारगी लगा कि बड़ा प्रतिगामी कदम है, प्यार पे पहरा बिठाने का Frustrated बजरंगी Lumpens का संघी Vigilante Justice वाला Agenda जैसी कि छवि, लिबरल- लेफ्टिस्ट मीडिया वाले इस कदम की आम जनता विशेषकर मध्यम वर्ग के युवाओं के मन में बना रहे हैं। मुझे फिर अचानक, मेरठ शहर का वह स्कूल से लौटती लड़कियों से Road Romeos के दुर्व्यवहार का दृश्य याद आ गया और मुझे Anti Romeo Squad का मतलब समझ में आ गया, और यह भी कि क्यों इस कदम को इतनी तत्परता से योगी सरकार ने उठाया है।

Suresh Gandhi बिलकुल सही कहा आपने विरोध सिर्फ सपाई व काग्रेसी बलात्कारी कर रहे है सच तो यह है इनके खिलाफ ही रपट दर्ज करनी चाहिए क्योंकि वोट खातिर बलात्कारियों चोर उचक्को भ्रष्टाचारियों चापलूसो व डकैतों को सपोर्ट करना इनका सगल बन गया है

Ravi Prakash Singh यशवंत जी किसी गर्ल होस्टल के बहार जब लडकिया सब्जी फल खरीदती है तो उस फल की साइज सोहदे(रोमियो) पूछते है कल से नजर नहीं आये ।

Nitin Thakur किसी को मैंने जवाब दिया था.. उसका अंश है- मैं आपसे ये कहूंगा कि मैं नहीं जानता कि आप योगी से कितने परिचित हैं और कितने नहीं। कम से कम मैं उनसे और उनके विचार से ठीक ठीक परिचित हूं। कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसे शासन में कॉलेज की लड़कियों के साथ शोहदे बद्तमीज़ी करें। शोहदे किसी के सगे नहीं होते और कोई उन्हें नहीं पालता। ये हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और जाति भी हर तरह की होती है। शासन के पास पहले से पुलिस है। पुलिस ने पहले से ही महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर दिए हैं। मेरे अपने शहर में लड़कियों के कॉलेज के बाहर बसपा और सपा दोनों सरकारों के दौरान मैंने पुलिस जीप को खड़े पाया है। दूसरे कॉलेजों के आसपास भी हमेशा इस तरह के अभियान चलते ही रहे हैं। ये अलग से जो एंटी रोमियो वाला ड्रामा है वो किस एक समुदाय विशेष के खिलाफ चलाया जा रहा है वो मैं तो जानता ही हूं और जिन्होंने योगी को सुना है उन्हें भी मालूम ही है। ये स्क्वैड दरअसल लव जिहादी खोज रही है। चूंकि चुनावी प्रचार में ये बात ज़ोर से कहकर वोट आए तो योगी ने कही भी जिसकी मैं तारीफ करता हूं… लेकिन अब यही बात शासन में बैठकर योगी बोल नहीं पाएंगे। वैसे भी घर बैठकर आपने कैसे तय कर लिया कि ये स्क्वैड अपराधी को ही धरेगा? इसमें वही पुलिसवाले काम करेंगे जो आम तौर पर किसी को भी उठाकर टॉर्चर करने के लिए बदनाम हैं। अब क्योंकि ये स्क्वैड अधेड़ उम्र के लोगों और लड़कियों के परिवार को ठीक लग रहा है तो वो असल बात मिस कर रहे हैं पर जो लोग योगी एंड टीम की बातें लगातार सुनते और समझते आ रहे हैं वो जानते हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर दरअसल क्या रोकने की कोशिश हो रही है? और रोकने की क्या.. वो खतरा तो खुद हिंदूवादियों ने चिल्ला-चिल्लाकर खड़ा किया और अब उस आभासी खतरे के खिलाफ एक स्क्वैड भी खड़ा किया है। तालियां बजाइए कि घर में तालिबान हुआ है। जो काम बजरंग दल और शिवसेना के ज़िम्मे था वो अब यूपी पुलिस से कराइए। छेड़छाड़ या किसी और तरह के अपराध की रोकथाम से भला किसको इनकार होगा मगर उसके नाम पर शुरू हुई मोरल पुलिसिंग को आप एक हद के आगे बढ़ने से रोक नहीं सकेंगें। जिस दिन वो आपके घर पहुंचेगी तो आप वैसे ही पोस्ट लिखेंगे जैसे नोटबंदी में घाटा होने पर सरकार के खिलाफ लिखने लगे थे। तब तक आप सरकार के साथ हैं क्योंकि आप नोटबंदी से पहले बहुत मसलों पर भी थे और अब ज़रा सा उबरते ही फिर किसी भी तरह से कदमताल करने लगे हैं। शुभकामनाएं।

Arun Yadav तब राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर द गाल फ्रांस का राष्ट्रपति बना था। छात्र, मजदूर और लेखकों का आंदोलन उफान पर था तथा प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यॉ-पाल सार्त्र ने इनका नेतृत्व संभाला। द गाल को सलाह दी गई कि सार्त्र को गिरफ्तार किया जाए। समझदार राष्ट्रपति द गाल ने कहा कि सार्त्र की गिरफ्तारी पूरे फ्रांस की गिरफ्तारी होगी, ऐसा नहीं होगा। सत्ता द्वारा साहित्य को दिया गया यह बहुत बड़ा सम्मान था। राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर सत्ता पर काबिज होनेवाले सत्तासीनों को द गाल से सबक लेना चाहिए और देश में दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याएँ बंद होनी चाहिए।

Bijendra K Singh दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है… लेकिन यशवंत जी ने जमीन की बात की है… सच्चाई भी है… ईव टीसिंग भी सच्चाई है… लव जिहाद भी… BBC की तो पूरी डॉक्युमेंट्री है… जै जै, अब सिटियाबाज लौंडो की खैर नहीं है, वाकई लोग योगी के इस कदम को उपयोगी बताते हुए सराह रहे हैं।

Shrikant Asthana आपसे सहमत हूं। मुद्दे से भी बहुत असहमत नहीं हूं कि शोहदे-लफंगे समस्या हैं पर सारे लड़के-लड़कियां तो लफंगे नहीं हैं! जिस तरह से इस मसले का इम्प्लीमेंटेशन हो रहा है वह बहुत खतरनाक है। भाई-बहन भी एक साथ निकलते हुए डर रहे हों तो उस स्थिति को सहज या अच्छा तो कतई नहीं माना जा सकता।

Arvind Kumar ये वो लडके है जिनके लिए मुलायम सिंह यादव जी ने कहा था कि लडके हैं गलती हो जाती है

Nagendra Singh हर बात का विरोध ठीक नही सही को सही और गलत को गलत कहने दम होनाचाहिए।

Shanu Shrivastava आप हमेशा बेबाक और सच ही क्यों लिखते हैं सर। सैलूट। वैसे लिखते रहिये। कुछ लोग ही तो हैं जो आज भी भीड़ का हिस्सा नही बने।

Shambhunath Nath सोलह आना ग्राउंड रिपोर्ट।

पंकज कुमार झा सुंदर … अब तक का सबसे बेसी समझदार पोस्ट.

Nakul Chaturvedi ये हुई न बात..

Anshuman Shukl एक दम सही लिखे हो। हद दर्जे की बदतमीजी हो रही थी और किसी का डर भी नहीं था। अब डर तो होगा।

अवधेश पाण्डेय 🙂 Sir… aapke charan kahan hain….

Shivmangal Singh साहब बच्चियों के उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो गयी थी

Michal Chandan बेहतरीन आंकलन है आपका।

Arun Khare सौ टका सही

Purushottam Asnora सोलह आने सच.

Ranjeet Chaudhary Sahi tarkaaa

Vibhuti Narain Chaturvedi सत्य वचन । # Yashwant Singh

Sneha Mishra true sir

Abhay Ashish Jain Aap ki baat mai dum hai

Awadhesh K. Yadav सही पकड़े है।

Prakash Singh Yahi sach hai …

Harsh Kumar आप तो ऐसे ना थे?

Taukir Alam Sahi bat

Vishal Ojha ये सही ठोके आप

Raghab Jha बिल्कुल सही।

Mayank Pandey Pahlee bar samajhdaari ki baat… Jai jai

प्रयाग पाण्डे सौ आना सच।

Ashok Aggarwal दमदार

Anupam Srivastava first time your bhadas on right dirction

Amit Singh सत्य वचन।

Kamlesh Kumar O Positive ज बात खरी खरी जानेमन कहीन

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यशवंत का विकास, ब्रह्मांड और अध्यात्म चिंतन

Yashwant Singh : ब्रह्मांड में ढेर सारी दुनियाएं पृथ्वी से बहुत बहुत बहुत पहले से है.. हम अभी एक तरह से नए हैं.. हम अभी इतने नए हैं कि हमने उड़ना सीखा है.. स्पीड तक नहीं पकड़ पाए हैं.. किसी दूसरे तारे पर पहुंचने में हमें बहुत वक्त लगेगा.. पर दूसरी दुनियाएं जो हमसे बहुत पहले से है, वहां संभव है ऐसे अति आधुनिक लोग हों कि अब वे टेक्नालजी व बाडी को एकाकार कर पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे हों, कास्मिक ट्रैवल पर हों…उनके लिए हमारे रेडियो संदेश इतने पिछड़े हों कि वे उसे इगनोर कर दें या पढ़ कर जवाब दें तो उस जवाब को समझने में हमें सैकड़ों साल लग जाएं….

जरूरी नहीं कि जीवन वहीं हो जहां कार्बन हो… कार्बन विहीन लेकिन सिलिकान बहुल दुनियाओं में भी जीवन है और वहां के जीवन फार्मेट, पैरामीटर, शक्ल-सूरत अलग है… दूसरी दुनियाओं को समझने के लिए जिंदा होने की अपनी परिभाषा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है. बेहद ठंढे और बेहद गर्म दुनियाओं में जीवन है… जीवन बहुत मुश्किल से मुश्किल स्थितियों में बहुत कम एनर्जी से भी कायम रह पाने में संभव है… सरवाइवल के लिए इंटेलीजेंस का होना जरूरी नहीं है… सरवाइवल बेहद मुश्किल हालात में बहुत कम एनर्जी से भी संभव है… जीवन पनपने के जो मूलभूत आधार धरती के लिए अनिवार्य हों वही अन्य दुनियाओं के लिए होना जरूरी नहीं…

धरती पर जो कुछ भी है वह दूसरी दुनियाओं से आया हुआ है.. हम मनुष्य खुद भी यहां धरती के नहीं हैं… हमारा सब कुछ स्टार डस्ट से बना है… यहां लोहा से लेकर कार्बन तक दूसरी दुनियाओं के उठापटक विस्फोट संकुचन के जरिए गिरता उड़ता गलता सुलगता फटता हुआ आया है… ऐसा संभव है कि ब्रह्मांड कि किसी दूसरी उन्नत दुनिया में कोई सुपर इंटेलीजेंट सुपर डेवलप सभ्यता हो जिसके सामने हम बच्चे ही नहीं बल्कि बिलकुल नए हैं.. वे हम पर नजर रखे हुए हों… ऐसा संभव है कि पूरे ब्रह्मांड के संचालन में कुछ बेहद समझदार और बेहद प्राचीनतम जीवन – सभ्यता का हाथ हो, जिन्हें हर तारे के बुझने, जन्मने, फटने, हर ग्रह और उपग्रह पर जीवन के पैदा होने व नष्ट होने का सही सही हिसाब पता हो… और इस कारण वे अपने को अपनी बेहतरीन तकनीक के जरिए, कास्मिक ट्रैवल के माध्यम से एक तारे से दूसरे तारे या एक ग्रह से दूसरे ग्रह या एक दुनिया से दूसरी दुनिया या एक गैलेक्सी से दूसरी गैलेक्सी या एक प्लानेट से दूसरे प्लानेट में शिफ्ट कर लेने में सक्षम हों…

जीवन की जो परिभाषा हमने गढ़ रखी है, वह काफी संकुचित और स्थानीय है. अदृश्य में भी जीवन संभव है, स्थिर में भी जीवन संभव है.. हमने इंटेलीजेंट एलियन्स को लेकर अपने मन-मुताबिक धारणाएं, तस्वीरें, कहानियां पाल रखी हैं.. वो दूसरी दुनियाओं में वहां के माहौल के हिसाब से बिलकुल अलग तरीके के जीवित हो सकते हैं जिन्हें संभव है हम जिंदा ना मानें…

डिस्कवरी साइंस चैनल पर यूनीवर्स को लेकर कई तरह के प्रोग्राम आते रहते हैं जिससे मिले ज्ञान के कुछ अंश की कड़ियों को अक्रमबद्ध रूप से जोड़ने-तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश 🙂 .. और इसी प्रक्रिया में उपजी ये चार लाइनें…

हर रोज खुद को तुम को सब को बड़े आश्चर्य से निहारता हूं
हर रोज ज़िंदगी होने, न होने के बीच के थोड़े मायने पाता हूं
हर रोज अपने अंदर-बाहर के दुनियादारी से दूर हुआ जाता हूं
हर रोज कुछ नया कुछ चमत्कार सा हो पड़ने का भ्रम पाता हूं

जैजै

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उपरोक्त तस्वीर को फेसबुक पर ”आजकल मेरी हालत ऐसी है” शीर्षक से डाला तो तरह तरह के कमेंट्स की बाढ़ आ गई. कमेंट व लाइक के लिए शुक्रिया. हंसने, मजाक मानने और मुझको मजाक समझने के लिए भी शुक्रिया. असल में यह तस्वीर देखकर मेरे दिमाग में जो बात तत्काल आई उसे आपके सामने रखना चाहता हूं.. जो इस प्रकार है….

हरे-भरे खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी-तालाब, फूल-पौधे, तारे-आसमान सब छोड़कर जब हम कहीं दूर चल पड़े तो कंकड़-पत्थर, धुआं-प्रदूषण, शोर-अशांति, भागमभाग-भीड़, एक खास किस्म के जानवरों यानि आदमियों की रेलमपेल के बीच फंस गए और उसमें जिंदा बचे रहने के लिए जो संघर्ष शुरू हुआ, उसका कोई अंत नहीं… हर दिन कुछ नष्ट होते जाने, कमजोर होते जाने, हारते जाने का भाव मन में बढ़ता गया…

हम मनुष्यों ने खूब विकास किया है, खूब तरक्की की है वाले डायलाग के उलट इस दुनिया का सबसे ज्यादा नुकसान हम मनुष्यों ने किया है.. और ऐसी स्थिति बना दी है कि सिर्फ हम मनुष्य ही नहीं, हर गैर-मनुष्य भी खुद के सरवाइवल को लेकर असुरक्षित, संघर्षरत, बीमार महसूस करने लगा है…

मैं चेतन हूं, गाड पार्टिकल हूं, आपमें हूं, आपसे इतर जो जिंदा हैं उनमें भी हूं. उनमें भी हूं जो जड़ है और स्थिर है.. सब मिलजुल कर मैं हूं, और यह मैं कोई एक नहीं पूरा ब्रह्रांड है, जिसके अनंत छोटे छोटे मैं यहां वहां जहां तहां बिखरा हुआ है… इसलिए मैं इस स्कूटर में भी हूं, बकरी में भी हूं, मिट्टी में भी हूं, पत्ती में भी हूं, आपमें भी हूं, खुद में भी हूं…
हम फंसे हुए लोग अक्सर महसूस नहीं कर पाते कि हम फंसे हुए हैं क्योंकि कई बार फंसना इतना स्थायी और जन्मना होता है कि हम फंसने को ही सहज-स्वाभाविक मान लेते हैं…
चलिए, मेरे हाल पर हंसिए… पर जरा गौर से देखिए,, कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हाल मेरा है, वही हाल तेरा है… 🙂

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पेड़ पत्ती फूल आसमान धूप हवा
तेरी कारीगरी पर फ़िदा हूं दोस्त
इनसे अलग भला मेरा वजूद कहाँ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की कुछ पुरानी एफबी पोस्ट्स का संकलन. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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यशवंत का भड़ासी चिंतन- पार्ट एक और दो : मनुष्यता से इस्तीफा देने का वक्त आ गया है…

Yashwant Singh : भड़ासी चिंतन पार्ट वन… उम्र और अनुभव के इस नाजुक व कमसिन पड़ाव पर पहुंच कर, फेसबुक को साक्षी मानते हुए, आप सभी के कपार पर अपना हाथ रखकर कसम खाते हुए… होश में रहकर पूरे जोश के साथ ऐलान करना चाहूंगा कि…..

…मनुष्य से बड़ा कमीना, धूर्त, चालबाज, मक्कार, विध्वंसक, स्वार्थी और पाखंडी दूसरी कोई मुंह-हाथ-पैर-पेट वाली प्रजाति नहीं….

…इसलिए मैं खुद को मनुष्य की जगह जानवर, चिड़िया, पंछी, कीड़ा, मकोड़ा आदि प्रजाति में से किसी एक में शामिल करने पर विचार कर रहा हूं…

…तदनुसार अपना धर्म ‘मनुष्यता’ को त्यागकर ‘जानवता’ या ‘चिड़ियाता’ या ‘किड़किड़ाता’ या ‘चहचहाता’ या ‘रेकियाता’ या ‘रेंगियाता’ में से कोई एक अपनाने पर विचार कर रहा हूं….

…और, आप लोगों से अपील करूंगा कि दुनिया के विध्वंस, मनुष्यों के शोषण, जानवरों के खात्मे, जंगल के विनाश, हाथियों के वन विहीन वास, शेरों के जंगल विहीन जीवन, मुर्गों-बकरों के लिए लगातार व सामूहिक उत्सवी कत्लेआम, पर्यावरण के जीवन विरोधी होने के लिए जिम्मेदार मनुष्यों की प्रजाति से इस्तीफा देकर खुद को कोई जानवर या पंछी या चिड़िया या पौधा मान लें, और उसी प्रजाति के हिसाब से जीवन गुजारें….

…मनुष्य के चक्कर और चंगुल में किसी भी रूप (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक, सांस्कृतिक) में फंसेंगे तो समझिए कि आपके जीवन का अपव्यय तय है….

…मनुष्य व मनुष्यता के चंगुल में फंसने वाले लोग सदा हींग खाई मुर्गी की तरह बेहद कनफ्यूज भाव से यत्र-तत्र डोलते बकते जीते रहते हैं… और उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे जी डोल बक क्यों रहे हैं…

…मनुष्यों का बनाया वैचारिक जाल जंजाल इतना तगड़ा है कि इससे शायद ही कोई मनुष्य निकल कर मनुष्य व मनुष्यता के निहित स्वार्थी चिंतन से परे उठकर ब्रह्मांड के बुनियादी भावना का एहसास कर पाता है…. क्योंकि मनुष्य ने मनुष्यों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि दो तिहाई से ज्यादा तो पापी पेट के ऐंठन से उबर नहीं पाते, इसी से उर्जा पाते और इसी में होम हो जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को न्याय दिलाने और बचाने के चक्कर में बाकी गैर-मनुष्यों का नाश कर जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को जानवर मानकर उनका भरपूर शोषण व सत्यानाश करते हैं… बाकी बचे लोग मनुष्य मनुष्य कहकर अपनी दुकान चलाते हैं और इस दुकान से होने वाली यश अर्थ पद नुमा लाभ से अपना जीवन सफलता पूर्वक संचालित करते रहते हैं…

…कुछ एक बकचोद, फकीर, नागा, पियक्कड़, गपोड़ी, ऐबी, बनुच्चर, पागल, आलसी, एकांतवासी, असामाजिक, अमानवीय टाइप लोग जीवन के असली दर्शन को बूझ भी जाते हैं तो वे किसी को बता नहीं पाते, या बताना ही नहीं चाहते क्योंकि उनके लिए कोई उनके जैसा श्रोता दर्शक पाठक ही नहीं मिल पाता…. या फिर संभवतः ये भी कि जो चरम सच को, असली मर्म को बूझ जाता है वो खुद में मगन रहता है, उसे किसी और को बताने समझाने का काम उचित नहीं लगता क्योंकि मनुष्य तो निहित स्वार्थी मनुष्यता में पागल है और बेचारे ढेर सारे गैर-मनुष्य तो इन्हीं हरामी मनुष्यों के मारे-सताए हैं…. या फिर ये भी कि जो मनुष्यों के दल दलदल से इस्तीफा देकर जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ पाया हो तो फिर वह भला निहित स्वार्थी मनुष्य को क्यों बताए, समझाए.. क्योंकि चालाक व धूर्त मनुष्य को बताने का मतलब है वह मनुष्य आपकी भी फोटो लगाकर मंदिर बनाकर पूजा शुरू कर देगा और इस तरह ढेर सारे मनुष्यों को फांसने बांधने लूटने का एक और उपक्रम शुरू कर देगा…

और ये भी कि जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ लेने वाला प्राणी आखिरी सच को किसी गैर-मनुष्य को अच्छे से कनवे कर पाएगा, बिना शब्द के ही, क्योंकि जहां सहजता और उदात्तता है, वहां सब कुछ संप्रेषणीय है.. पर मनुष्य के यहां कहां है सहजता.. वह सहजता भी मनुष्यता के इर्दगिर्द है जो बाकियों के लिए गैर-मनुष्यों के लिए, प्रकृति के लिए असहजता और असंवेदनशीलता का कारण बनता है…

जय हो…

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भड़ासी चिंतन पार्ट दो…

अपने गांव में खेत, हरियाली, धूप, नदी, शांति, अलसाए पशु-पक्षियों की मुदित चपलता, प्राकृतिक कलरवी संगीत के बीच रहते हुए हर वक्त महसूस करता हूं कि ज़िंदगी से मुझे कोई शिकायत नहीं. मैं भाग्यशाली और धनी हूं जो इन अदभुत क्षणों- अकथनीय सुखों का उपभोग कर रहा हूं. प्रकृति मुझे सचमुच अपनी खूबसूरत प्रेमिका सी लगती है जिसे महसूस करते हुए ज्यादा उदात्त और शांत हो जाता हूं… गाने लगता हूं- तुम मिले, दिल खिले, और जीने को क्या चाहिए…

मुझे लगता है कि समाज, सिस्टम, ढेर सारे चिरकुट किस्म के कथित बड़े लोगों, चालाक शासकों, चतुर चारण विद्वानों, मूर्ख चिंतकों, अज्ञानी अध्येताओं आदि इत्यादि ने मिलजुल कर हर किसी के जीवन में इतना शोर, कलह, तनाव, उत्तेजना पैदा कर दिया है कि मनुष्य नार्मल रह ही नहीं सकता. वह प्रकृति को महसूस करने लायक रह ही नहीं जाता क्योंकि वह अप्राकृतिक हो चुका होता है. वह दुखी हो चुका होता है. वह अंतहीन संघर्षों में फंस चुका होता है.

प्रकृति के संगीत को महसूस करने के लिए और इस पर खिलखिलाने के लिए अब जरूरी हो गया है कि खुद को हर लेवल पर सिर के बल खड़ा कर दें… मैं आपको समझा नहीं सकता कि मैं क्या क्या महसूस कर रहा हूं इन दिनों… और कितना अच्छा अच्छा महसूस कर रहा हूं इन दिनों… थोड़ा दुखी हो रहा हूं कि फिर शहर लौटने का वक्त आ गया है… 

भड़ास के एडिटर यशवंत के एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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किसी को वोट दे लेना, पर सपा को नहीं… वजह बता रहे भड़ास एडिटर यशवंत

Yashwant Singh : हे मीडिया के साथियों, यूपी चुनाव में सपा को जरूर हराना. वोट चाहे बसपा को देना या भाजपा को या रालोद को या किसी को न देना, लेकिन सपा को कतई मत देना. वजह? सिर्फ पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्री राममूर्ति वर्मा के कहने पर कोतवाल और सिपाहियों ने पत्रकार जगेंद्र को शाहजहांपुर में जिंदा जला दिया था. जगेंद्र ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में मंत्री राममूर्ति वर्मा का नाम लिया था. जगेंद्र ने राममूर्ति के खिलाफ कई खबरें लिखी थीं. मंत्री राममूर्ति तरह तरह से जगेंद्र को धमकाता रहता था. जगेंद्र लिख चुके थे कि मंत्री राममूर्ति उसे मार डालना चाहता है क्योंकि वह उसकी पोल खोलता रहता है.

जिसकी आशंका थी, वही हुआ. मंत्री राममूर्ति के इशारे पर सारा पुलिस प्रशासन जगेंद्र को मारने के लिए जुट गया. बाकायदा घर में घुसकर पत्रकार जगेंद्र पर पेट्रोल डालकर जलाया गया. लखनऊ में भर्ती जगेंद्र ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर से लेकर जांच मजिस्ट्रेट तक को हत्यारों के नाम बताए लेकिन अखिलेश यादव ने आजतक हत्यारे मंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्त नहीं किया. अखिलेश यादव के युवा होने, इनके स्मार्टफोन देने के वादे, इनके विकास के प्रलाप पर मत जाना. यह अपने खानदान का सबसे काइयां नेता है. परम भ्रष्ट गायत्री प्रजापति से लेकर हत्यारे राममूर्ति वर्मा को पालने वाला यह युवा नेता अगर इस बार खुद के बल पर जीत गया तो समझो इसके राज में वो-वो नंगा नाच होगा जिसकी कल्पना नहीं कर सकते.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता द्वारा बेलगाम नेताओं को शाक थिरेपी दिया जाना है. इन्हें पांच साल के लिए सत्ता से बाहर करो ताकि ये आत्मचिंतन और मनन करें. अखिलेश यादव ने पांच साल राज कर लिया. इन्हें पांच साल का ब्रेक दिया जाना चाहिए ताकि थोड़ी ज्यादा समझदारी हासिल कर सकें. अभी जो इन्होंने अपने खानदान से फिक्स मैच खेला है, उससे लॉ एंड आर्डर समेत तमाम सवाल परिदृश्य से बाहर हो गए और अखिलेश की छवि एक नए बहादुर युवा नेता की बना दी गई जो माफियाओं और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ है. लेकिन सच्चाई बिलकुल इसके उलट है. यह सारा कुछ मीडिया, मुलायम और अखिलेश द्वारा फिक्स था. अब तो आपको यकीन आ गया होगा जब मुलायम ने साफ साफ कह दिया कि वे अखिलेश और राहुल के लिए प्रचार करेंगे, शिवपाल नई पार्टी नहीं बनाएंगे, वे कभी किसी पर कोई गुस्सा न थे. सपा में आज भी हत्यारे, भ्रष्टाचारी और माफिया नेता-मंत्री अपने पूरे दमखम के साथ मौजूद हैं और साइकिल चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं. 

तो, हे यूपी के मतदाताओं, खासकर मीडिया के साथियों, मुझ भड़ासी की दिली अपील पर कान धरो, अपने वोट को किसी को भी दे डालो, बस सपा को मत देना. साथ ही सपा को वोट न देने के लिए आप लोग अपने दोस्तों, मित्रों और परिजनों को कनवींस करें. सिर्फ जगेंद्र हत्याकांड की कहानी बताओ. एक पत्रकार को घर में घुसकर जला मारने वाला मंत्री अगर अखिलेश यादव द्वारा बर्खास्त नहीं किया जा सकता तो सोचिए इनके राज में हमारा आपका और आम लोगों का क्या हाल होगा.

बाकी, दिल्ली और लखनऊ के कई बड़े दलाल पत्रकारों के लिखने बोलने पर मत जाना. ये लोग लगातार सपा और अखिलेश का चरण चुंबन करते हुए इनके पक्ष में गायन करते हुए मिल जाएंगे. ये लोग अपने-अपने चैनलों और अखबारों में अखिलेश यादव की छवि बनाते, इन्हें जीतता हुआ दिखाते मिल जाएंगे. इन पर ध्यान मत देना. इन लोगों ने बीते पांच साल में अखिलेश के रहमोकरम से अरबों रुपये कमा चुके हैं और इन्हें नमक का कर्ज तो अदा करना ही है.

99 प्रतिशत मुख्यधारा के मीडिया घराने, जिसमें अखबार और चैनल दोनों शामिल हैं, यूपी की सत्ताधारी पार्टी के रहमोकरम के तले दबे हैं. ये लोग इतना ब्लैक पैसा और नगद विज्ञापन पा चुके हैं कि इन्हें अखिलेश यादव को जीतता हुआ दिखाना मजबूरी है. ये लोग सोची समझी साजिश के तहत सपा के मुकाबले बसपा और भाजपा को कमजोर-कमतर दिखा रहे हैं. मीडिया वालों के पेड न्यूज और पेड सर्वे पर यकीन न करना. अपना दिल दिमाग लगाना. सपा को जरूर हराना. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें : Yash on FB

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भ्रष्ट पत्रकारिता पर यशवंत का लेक्चर (देखें वीडियो)

लखनऊ की चर्चित खोजी मैग्जीन ‘दृष्टांत’ के 15 बरस पूरे होने पर 14 जनवरी 2017 को आयोजित जलसे में आजकल की पत्रकारिता पर भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने एक लंबा लेक्चर दिया. यह वीडियो वहां उपस्थित एक पत्रकार ने अपने मोबाइल से बनाया.

देखें वीडियो >>

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दृष्टांत मैग्जीन के जलसे में लखनऊ पहुंचे यशवंत सेहत बनाने में जुटे (देखें वीडियो)

लखनऊ से प्रकाशित होने वाली खोजी पत्रिका ‘दृष्टांत’ के 15 बरस पूरे होने के जलसे में अनूप गुप्ता भाई ने मुझे लखनऊ बुलाकर होटल कंफर्ट इन के जिस 101 नंबर के कमरे में ठहराया, उसके ठीक बगल में जिम था. जीवन में कभी जिम नहीं गया. ज्यादा या कम कभी जरूरत महसूस हुई तो घर बाहर पार्क दुआर खेत में ही कहीं बंदर की तरह कूदफांद भाग कर, रामदेव स्टाइल में फूं फां कर एक्सरसाइज कर लिया. जेल प्रवास के दौरान कई किस्म के एक्सरसाइज एक बंदी योग गुरु ने सिखाए थे, जिसे बाहर के जीवन में अक्सर आजमा लिया करता हूं. इस तरह जिम जाने की नौबत नहीं आई.

लेकिन लखनऊ में होटल के जिस कमरे में रुकवाया गया, उसके ठीक बगल में जिम, और वह भी बिलकुल खाली देखकर मन तो मचलता है जी. एक दो दिन जिम को बाहर से घूरा, थोड़ा अंदर जाकर छुआ देखा. लेकिन तीसरे दिन तो फोन कर रिसेप्शन से किसी इंस्ट्रक्टर को जिम में भेजने के लिए स्ट्रेट फारवर्ड आदेश ही कर दिया. वहां कोई इंस्ट्रक्टर तो होता नहीं सो एक इलेक्ट्रिशिनय पिलास पेंच आदि लेकर हाथ जोड़े आ गया.

मुझे लगा या तो इसका दिमाग गड़बड़ है या मेरा, जिसके पेंच कसते हुए ठीक करने के वास्ते यह उपकरण लिए घूमता हुआ आया है. बेचारा बोला- ”साब जिम में क्यों बुलवाया मुझे”. मैंने कहा ये जो सारी मशीने हैं, इन्हें चला चला के और इन पर कैसे क्या क्या किया जाता है, कर कर के दिखाओ.

वह बेचारा कहां खुद जिम करता है लेकिन उसने आदेश पालन के वास्ते ट्राई मारा. थोड़ा मुझ देहाती का कामन सेंस भी काम आया. हम दोनों गरीब भाइयों ने मिल जुल कर सारी मशीनों को ठोंक पीट हिला डुला कर चला डाला. जब सब कुछ समझ आ गया तो बिजली वाले पिलास पेचकस धारी भइया को प्रणाम सलाम नमस्ते कर जाने को कह दिया और खुद बारी बारी से सभी मशीनों को आजमाने में जुट गया.

तभी आइडिया की बत्ती दिमाग में धड़की कि गुरु काहे नहीं खुद का एक वीडियो बनवा लिया जाए इसी जिम में, एक्सरसाइज करते हुए, ताकि सदा के लिए कहने दिखाने को ये रहे कि अपन भी हाई फाई वाई टाइप आदमी हैं जो जिम आदि करते कराते रहते हैं. वैसे मेरी एक गंदी आदत ये भी है कि जो भी कोई नया काम करूंगा, भले ही एकाध दिन के लिए, उसे डफली बजाकर गाउंगा जरूर और उसे थ्यूराइज करके उसे ऐसा पेश करूंगा जैसे कि अगर किसी ने ऐसा नहीं किया तो उसे न जाने कौन सा नुकसान हो जाएगा. इसे कहते हैं ‘सेल्फ मार्केटिंग’. हिंदी में मैं इसे ‘अप्प दीपो भव:’ कहता हूं 🙂

खैर, आइडिया को अंजाम पर पहुंचाने के लिए अपने साथ होटल के कमरे में रुके गाजीपुर वाले पत्रकार व समाजसेवी मित्र सुजीत सिंह उर्फ प्रिंस को बुलाया. उनने कैमरा थामा और मैंने जिम की मशीनें. बस तैयार हो गया ये वीडियो… देखिए और ऐसे ही आप भी मस्त रहिए, जीवन को जैसा महसूस करेंगे, जीवन वैसा ही है… उस गाने की तरह… पानी से पानी तेरा रंग कैसा… जिसमें मिला दे लगे उस जैसा…  वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

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शराब बंद किया तो शरीर भोजन के नशे की गिरफ्त में आ गया!

Yashwant Singh :  भोजन भी एक तरह का नशा होता है. शरीर मांगता रहता है. रोता रहता है खाने के लिए. खाने के तरह तरह के खुशबू खींचते रहते हैं, दिमाग में धमाचौकड़ी मचाए रहते हैं. शराब बंद हुआ तो महसूस किया कि खाने की लत लग गई है, भोजन के नशे की गिरफ्त में हूं. सुबह दोपहर शाम रात. और इसके बीच में भी चटर पटर मटर चालू. लगा कि ये तो मुझे संचालित कर रहा है. इससे भी मुक्ति जरूरी है. पूरा शरीर खाने और पचाने में फुल स्पीड से जुटा पड़ा है.

दो दिन से इस खाने पर नजर रख रहा हूं. सुबह चाय पीकर कमरे पर लौट आया. कुछ योग एक्सरसाइज कर पेट की चर्बी को एक्सीलरेट / मोबाइल किया और फिर कामकाज में उलझा तो शाम हो गई. मन को कह दिया था कि खाने की कोई जरूरत नहीं है, पर्याप्त कैलरी पेट में जमी है, उसी को पिघलाओ. फिर फील न आई. फिर भूख न लगी.

शाम खाने को निकला तो टहलते टहलते मॉल पहुंच गया. रास्ते में छह रुपये की मूंगफली तोड़ता चलता रहा. फिल्म देखते पेप्सी और पापकार्न पाया. लौटते वक्त सड़क किनारे लगे ठेले पर तीस रुपये की दो सब्जी चार रोटी और दाल के रूप में डिनर किया. अच्छा महसूस कर रहा हूं. सही लग रहा है. शरीर मध्यम मार्ग में है. मन संतुष्ट है. कल का कल देखेंगे. लेकिन आज का सबक तो यही रहा कि शरीर को अगर मन से नियंत्रित किया जाए तो वह सुनता है, कहना मानता है.

मुझे याद आ रही है Anand Swaroop Verma जी की वो बात जो उन्होंने इंटरव्यू लेते वक्त बताई थी. उन्हें साइटिका का जबरदस्त पेन हुआ करता था. डाक्टरों को दिखा दिखा के थक गए, ठीक न हुआ. वे एक रोज अंधेरे कमरे में बैठे. दिमाग को आदेश दिया कि वह रीढ की हड्डी के ठीक नीचे पेन वाली जगह जाकर निर्देश दे कि यह दर्द बंद हो. हफ्ते भर बाद उनका दर्द नियंत्रित था और फिर खत्म हो गया.

वे इसे अध्यात्म का नाम नहीं देना चाहते. शब्दों के फेर में मुझे भी नहीं पड़ना है. ये एक आंतरिक समझ है, आंतरिक संतुलन है, आंतरिक साधना है. वर्मा जी के ही मुताबिक- हमारा शरीर असीम संभावनाओं और अपार उर्जा का भंडार है. इसको साध लेने का गुण सीख लेना चाहिए, फिर जीवन में कोई तनाव-दिक्कत नहीं. #feelyash

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कल ‘बेफिकरे’ तो आज ‘कहानी-2’ देख डाली। कल नोएडा के मॉल ऑफ़ इंडिया पहली बार घूमा तो आज नोएडा के ही नए बने सिटी सेंटर वाले मॉल में पहली दफे चरण डाला। बेफिकरे दो बेफिक्र और बेखौफ युवक-युवती पर फिल्म है, जो अपने बिंदास अंदाज में जीवन को जीते / भोगते हैं जबिक कहानी-2 चाइल्ड एब्यूज पर एक शानदार पिक्चर है।

मॉल में फिल्म देखने पर खलता है केवल 280 रुपए वाला लार्ज पोपोकॉर्न पेप्सी कोम्बो खरीदना, वरना लगता है स्वर्ग कहीं है तो इन मालों में ही कैद है। सब सुखी सुंदर समृद्ध प्रसन्न डिजिटल नज़र आते हैं। सन्डे हो या मंडे, दिल्ली एनसीआर के ज्यादातर माल क्राउडेड दिखते हैं। वापसी में एक ठेले वाले के यहाँ 30 रुपये में दो सब्जी दाल और चार रोटी विथ प्याज हरी मिर्च दबा के खाया। दो अलग-अलग दुनियाओं का पैदल चक्रमण आनंद दायक रहा।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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यूपी का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश दोनों की आंखों का तारा-दुलारा हो गया है!

Yashwant Singh : दिन रात नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिख-लिख के इस शख्स को पीएम बनवा चुके सेकुलर / कामरेड / दलित / पिछड़े / मुस्लिम किस्म के भाइयों-बहनों से अनुरोध करूंगा कि कभी-कभी अपने ‘घर-परिवार’ यानि सपा-बसपा की कारस्तानी पर भी कलम चला लिया करें. उत्तर प्रदेश का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश की आंखों का तारा दुलारा हो गया है. बरेली में मंच पर भाषण दे रहे नेताजी मुलायम सिंह यादव अपनी बात सीएम अखिलेश यादव तक पहुंचाने के लिए बार बार गायत्री प्रजापति को निरखते-संबोधित करते रहे.

उफ्फफ… इस अदा पर कौन न मर जाए. दिन रात समाजवाद की दुहाई देने वाले ये बाप-बेटे असल में जंगलराज के प्रवर्तक हैं. बाप भदेस टाइप का जंगलराज चलाता था तो बेटा थोड़ा साफिस्टिकेटेड तरीके से चला रहा है. जनता के अरबों रुपये लुटा कर दिन रात अखबारों चैनलों विज्ञापन चलवा देख कर ये बाप बेटे आपस में ही यूपी को उत्तम प्रदेश घोषित करते हुए तालियां पीट कर एक दूजे की पीठ थपथपा लिया करते हैं.

जानने वाले जानते हैं कि गायत्री तो बहाना है, असल में यूपी में उगाही / करप्शन की सारी नदियां वाया गायत्री एंड अदर दरअसल यादव खानदान के समुद्र में ही विलीन होती हैं. कुछ लैपटाप बांटकर, कुछ सड़क बनाकर, कुछ घोषणाएं करके ये टीपू मान चुका है कि उससे बड़ा विकास पुरुष कोई न हुआ है न होगा. और धन्य हैं इसके पेड हरकारे जो इसकी हर अदा पर वाह वाह कहते लिखते गाते रहते हैं और बदले में भ्रष्टाचार के संगम से कुछ सीपियां चुन लाते हैं.

इन कथित समाजवादियों से तो लाख गुना अच्छी थीं जयललिता जिन्होंने गरीबों के लिए जीना, खाना, पढ़ना, इलाज कराना, इलाज कराना, शादी करना… सब कुछ लगभग फ्री कर दिया था. सच्ची समाजवादी तो जयललिता को कहना चाहिए, भले ही वो ब्राह्मण खानदान में पैदा हुईं.

जाति की राजनीति करने वालों को धर्म की राजनीति करने वालों का विरोध करने का कोई नैतिक हक नहीं है. सबसे पहले आप आज के समय का मनुष्य बनिए, तार्किक होइए, वैज्ञानिक सोच से लैस होइए, जाति-धर्म से उपर उठिए, अपने संस्कार-सोच को अपग्रेड कर माडर्न बनाइए, जो गलत हो तो उसे गलत कहने का साहस रखिए.

सेलेक्टिव होकर, चूजी होकर, एजेंडा लेकर आलोचना करते रहना असल में एक किस्म का फीसावाद ही है. उनका धर्म और झूठ आज देश को आतंकित किए है तो आपका जातिवाद और जंगलराज प्रदेश को चिरकुट किस्म का बनाए है.

फिलहाल तो आज मुलायम और अखिलेश को शेम शेम कहने का दिल कह रहा है क्योंकि भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, लुटेरों को गले लगाए बाप-बेटा जब लोकतंत्र, जनता व समाजवाद की बात करते हैं तो उत्तर प्रदेश के साथ इनका छल, झूठ और दगा खुद-ब-खुद सार्वजनिक हो जाता है व इनके प्रति भी एक नफरत का भाव पैदा हो जाता है, वैसे ही जैसे धर्म के कारोबार से अंधविश्वास /  नफरत / अज्ञान / दलाली  फैला कर जनविरोधी राज चलाने वाले सवर्ण सामंती मानसिकता के नेताओं के प्रति होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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…तो अब गिरने के बाद दारु छोड़ देंगे भड़ास वाले यशवंत!

पत्रकारिता की दुनिया में भड़ास4मीडिया के जरिये भूचाल ला देने वाले देश के चर्चित पत्रकार यशवंत सिंह बीती रात्रि बाथरूम में गिरकर घायल हो गए! ईश्वर की कृपा यह रही कि उन्हें ज्यादा गंभीर चोट नहीं आयी लेकिन इस घटना से पत्रकारिता की दुनिया में नई क्रान्ति आने की संभावनाएं जग गयी है। मैं दरअसल ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि इस घटना से यशवंत सिंह से दारु पीने की बुरी लत छूट सकती है। यदि ऐसा होता है तो यशवंत सिंह की सबसे बड़ी बुराई दूर हो जाएगी और वह पहले से ज्यादा अपनी कलम को धार दे सकेंगे!

इसमें कोई शक नहीं कि कलमकारों की आवाज़ को बुलंद करने वाले यशवंत सिंह ने पत्रकारिता में पत्रकारों की आवाज़ को बुलंद कर इतिहास रचने का काम किया है। शायद ही देश का ऐसा कोई पत्रकार होगा जो यशवंत सिंह की कलम और जज्बे का दीवाना न हो। बाथरूम में गिरकर यशवंत सिंह घायल ही हैं और उनकी भौंह के उपर काफी चोट हैं लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि खुद यशवंत सिंह अब अपनी दारूबाजी की लत से छुटकारा चाहते हैं! जैसे ही उन्होंने फेसबुक पर अपने घायल होने और दारु छोड़ने की पोस्ट डाली, सोशल मीडिया पर उन्हें कमेंट में सलाह देने का दौर शुरू हो गया। मैं खुद भी चाहता हूँ कि वो दारु छोड़ दें क्योंकि दारूबाजी उनका वो समय खराब कर देती है जिसमें वो पत्रकारों / आमजन के मुद्दों को और धार दे सकते हैं।

उम्मीद करता हूँ, यशवंत भाई जल्द ही स्वस्थ हो जायेंगे और दारूबाजी से भी मुंह मोड़ लेंगे। साथ ही आशा यह भी करता हूँ कि उनके स्वस्थ होते ही देश के बड़े मीडिया घरानों के बड़े खुलासे भी होंगे क्योंकि अब भड़ास4मीडिया पर दारुबाज यशवंत सिंह नहीं बल्कि अपने भोले-भाले पत्रकार यशवंत सिंह होंगे।

यशवंत भाई के जल्द स्वस्थ होने और दारु छोड़ देने की उम्मीद के साथ…

जियाउर्रहमान
संपादक
www.vyavasthadarpan.in
abharatrahman@gmail.com
Mob : 8923220818, 9454391714

मूल खबर :

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दुर्घटना में भड़ास संपादक यशवंत बुरी तरह घायल

(आपरेशन थिएटर से बाहर लाए जाते यशवंत)

नई दिल्ली : भड़ास4मीडिया डाट काम के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह बीती रात बुरी तरह जख्मी हो गए. उनके माथे में गहरी चोटें आई हैं. वे बाथरूम में गिर पड़े थे जिसके कारण नल की टोंटी उनके माथे में घुस गई. उन्हें दर्जनों टांके लगे हैं. चोट की स्थिति देखकर डाक्टर्स ने किसी प्लास्टिक सर्जन डाक्टर से आपरेशन कराने की सलाह दी. इसे ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक सर्जरी के विशेषज्ञ डाक्टर से संपर्क साधा गया.

विशेषज्ञ डाक्टर ने अपनी पूरी टीम के साथ करीब घंटे भर तक चले आपरेशन में दर्जनों टांके लगाए. यशवंत को करीब 9 दिन तक बेड रेस्ट की सलाह दी गई है. इस हादसे के बारे में यशवंत ने खुद फेसबुक पर जो पोस्ट किया है, वह इस प्रकार है-

Yashwant Singh : मेरा दुश्मन मैं खुद। रात ‘ज्यादा’ हो गयी थी। गिर पड़ा बाथरूम में। दोनों आईब्रो के उपर गहरे जख्म आए हैं। नॉर्मल टांका लगने की स्थिति नहीं थी। प्लास्टिक सर्जन ने ऑपरेशन थिएटर में लगभग घण्टे भर सिलाई की। अब दारू छोड़ ही देता हूं।

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यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है : यशवंत सिंह

मैंने कई कारपोरेट घरानों के बड़े लोगों से निजी तौर पर बात की. सबको छह माह पहले से पता था कि हजार और पांच सौ के नोट खत्म किए जाने हैं. मुझसे किसी एक ने संपर्क नहीं किया कि उसके यहां करोड़ दो करोड़ काला धन सड़ रहा है, उसे ह्वाइट कर दे. मैंने तमाम संभावित काले धनियों को फोन किया कि अगर कुछ हो तो बताओ, अपन लोगों के पास बहुते एकाउंट है खपाने के लिए, सबने कहा- सब सेटल हो गया.

यानि इस देश के भ्रष्टाचारियों, कारपोरेट घरानों, नेताओं, अफसरों सबने पैसे सेटल कर लिए थे. थोड़े बहुत जो बड़े लोगों के पास काला धन है तो उसे ह्वाइट करने के लिए दस परसेंट पर दो हजार के नोट होम डिलीवरी करने वाले पैदा हो गए हैं. विदेश में लाखों करोड़ रुपये पड़े काले धन को लाने में नाकाम और देश के सैकड़ा के करीब बड़े लोगों को जिनने हजारों करोड़ बैंक लोन गटक रखा है, को सुप्रीम कोर्ट में बचाने वाली मोदी सरकार अपने इस नोटबंदी की करतूत से जो लाभ हासिल करना चाहती है, उसके मुकाबले नुकसान बहुत ही ज्यादा है.

जाने कितने हजार करोड़ का वर्किंग हावर खत्म हुआ. जगह जगह काम ठप है. लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं. करीब दो दर्जन लोग जान दे चुके हैं. जाने कितने लोग मानसिक अवसाद में हैं. जिस योजना से सिर्फ मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास, बेहद गरीब आदि को ही परेशानी हो रही है तो उस योजना को आखिर किसके फायदे के लिए लाया गया है?

अपनी अंतरात्मा में झांकिए, कुछ देर के लिए कस्बों में निकलिए. शादी ब्याह श्मशान जीवन मरण उत्सव को देख आइए, सब कुछ स्थगित-सा है या अवसाद का शिकार है.. यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है. क्या जीने का अधिकार सिर्फ बडे़ लोगों को ही है? क्योंकि उनके पास तेज दिमाग और जबरदस्त लायजनिंग क्षमता है? कितने बड़े लोगों ने जान दी? कितने बड़े लोगों ने आपसे अपना धन सफेद करने के लिए संपर्क किया? उपर वालों को सब बता दिया गया था इसलिए उन्हें कोई कष्ट नहीं.

और आखिर में, अपना पक्ष हमेशा आम जनता के दुखों सुखों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए, न कि तकनीकी आंकड़े और जुमलों के आधार पर..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की फेसबुक वॉल से साभार.

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मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि पलटी भी नहीं मार सकते… जनता जमकर गरिया रही है गुरु… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : केजरीवाल का आड इवन और मोदी का करेंसी रद्द फैसला इतिहास याद करेगा. दोनों में बड़े लोगों / बड़े चोरों को कोई नुकसान नहीं था. दोनों में आम जन को मुश्किलों का सामना करना पड़ा… केजरीवाल ने तो समय रहते जनता को मूड समझ लिया और आड इवन को रद्दी की टोकरी में डाल दिया.. लेकिन मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि अब पलटी भी नहीं मार सकते…. जनता जमकर गरिया रही है गुरु… जरा फेसबुक ट्वीटर छोड़ो और बैंकों की तरफ निकलो… उनसे पूछो जिनके घरों में बेटियों की शादियां हैं अगले कुछ दिनों में… उनसे पूछो जो मजदूरी करते थे दुकानों, मकानों, कांस्ट्रक्शन कंपनियों में.. सब ठप पड़ा है… भूखों मरने की नौबत आने वाली है..

मोदिया तो गया विदेश रे…

पांच सौ और हजार की करेंसी बंद होने से बैंकों के बाहर अराजकता का आलम है. ये वीडियो आज सुबह दिल्ली के एक बैंक के आगे का है. जनता का रेला धन बदलवाने के लिए तत्पर है और बैंक के दरवाजे बंद हैं. पूरा देश सब कुछ छोड़कर सिर्फ नोट बचाने बदलने की चिंता में डूबा है. विदेशों में, प्रापर्टी में और सोने में काला धन रखने वाले असली लुटेरे मौज में हैं, उन पर कोई असर नहीं. मोदी राज में देश क्या खूब तरक्की कर रहा है 🙂

देखें वीडियो : https://youtu.be/jtQYT8xc-dY

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को ठीक से समझने के लिए इन्हें भी पढ़ना जरूरी है…

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करेंसी यूं रद्द करने से देश कैसे आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है, समझा रहे हैं भड़ास एडिटर यशवंत सिंह

Yashwant Singh : एक बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में देश आ सकता है. नोट करेंसी रद्द / बंद करने का एक साइडइफेक्ट यह भी आशंकित है. क्या आप बताएंगे या मैं समझाऊं? ध्यान रखिए, मेरी आशंका अंध मोदी विरोध टाइप कतई नहीं है. विशुद्ध आर्थिक कारणों पर आधारित है. नोट बदलने, करेंसी रद्द करने से आर्थिक मंदी की चपेट में देश क्यों आ सकता है, इसके बारे में बताने से पहले कहना चाहूंगा कि आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए. 

यूपी में चुनाव करीब है और नेताओं ने पांच साल में जो सैकड़ों करोड़ कैश इकट्ठा किया है ऐन केन प्रकारेण, वह रद्दी हो गया. ये वो पैसा था जिसे जनता तक जाना था, वोट खरीदने के लिए, एक एक वोटर को पांच पांच सौ या हजार हजार रुपये. वोटरों तक गया यह पैसा मार्केट में लगता, खरीद फरोख्त होती, राशन से लेकर फूड प्रोडेक्ट और दवा आदि जो भी इससे हासिल होता या इकट्ठा किए मूल धन में मिलाकर जो भी टीवी फ्रिज मोबाइल खरीदा जाता, वह नहीं होगा. इससे प्रोडक्शन बढ़ता, सामान बिकता तो नया सामान बाजार में भेजने के लिए प्रोडक्शन का काम होता जिससे इंप्लायमेंट मिलता और औद्योगिक ग्रोथ होती. इस हजारों करोड़ के नोट के रद्दी हो जाने से ये पैसा अब आम जन के हाथ नहीं पहुंच पाएगा. प्लीज, वोट खरीदना गलत है या सही, इस नैतिकता को अभी किनारे कर दीजिए और सिर्फ आर्थिक हिसाब से सोचिए. 

नेताओं का यह पैसा बैनर पोस्टर लाउडस्पीकर कार आदि का प्रोडक्शन करने वालों के पास जाना था. नेताओं का यह पैसा मीडिया वालों कर्मियों के पास भी जाना था, नैतिक अनैतिक रूप में. 

यानि यह पैसा मार्केट में घूमता, देश के मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास और बेहद गरीब लोगों तक जाता. औद्योगिक उत्पादन करने वालों से लेकर छोटे कारोबारियों तक जाता. अब यह पैसा कहीं नहीं जाएगा. मार्केट की मोबिलिटी बाधित होगी. खरीदारी कम होगी. लेन देन कम होगा. खपत न होने से प्रोडक्शन कम होगा. प्रोडक्शन कम होगा तो औद्योगिक इकाइयां छंटनी करेगी. छंटनी करेगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी. 

यही काला धन जो रियल इस्टेट वालों के पास था, डाक्टरों के पास था वह नए मकान भवन बनाने में लगता. मजदूर काम करते. वे पैसे को बाजार में ले जाकर खरीद करते. सीमेंट, ईंट, सरिया, बालू के कारोबारियों के पास पैसा जाता. यह सब धंधा मंदा हो जाएगा. इनके यहां काम करने वाले छंटनी के शिकार होंगे. डाक्टर उस काले धन से अस्पताल बनवाते, नर्सिंग होम बनाते, ढेर सारे नर्सिंग स्टाफ भर्ती होते, हेल्थ इंस्ट्रुमेंट खरीदे जाते. अब यह सब न होगा क्योंकि वह पैसा रद्दी हो गया. 

नेता, रियल इस्टेट वाले और डाक्टरों का उदाहरण केवल समझाने के लिए दिया है. इन्हीं काले धनों से स्कूल कालेज विश्वविद्यालय खोले जाते हैं. इन्हीं काले धनों से नए प्रोजेक्ट्स में निवेश किए जाते हैं. अब ये सब ठप हो जाएगा. ढेर सारे जो नए काम होने थे. रुक जाएगा क्योंकि जो जो काला धन रखा था, वह रद्दी हो गया. मार्केट में लंबे समय तक खरीदारी न होगी. निजी स्तर के नए प्रोजक्टस न शुरू होंगे. बिक्री कम हो जाएगी. 

समझदार के लिए इशारा काफी है. 

अंबानी जो सबसे बड़े आदमी हैं भारत के, इसलिए नहीं कि उनके पास खूब सारा कैश है. बल्कि उनके पास तो कैश जो होगा सब एकाउंटेड होगा. उनका धन एसेट में है, शेयर में है, प्रोडेक्ट में है, सर्विस में है. वह तो जनता से मुनाफा खींचते रहेंगे. उनका जो काला धन होगा वह स्विटरलैंड से लेकर दुनिया के ढेर सारे ब्लैक मनी फ्रेंडली देशों में होगा. उस पर कोई असर न पड़ेगा. पड़ेगा हमारे आप जैसे छोटे बड़े जिलों के रहने वाले आम लोगों को जिनको इस पैसे से रोजगारा पाना था, या प्रोडक्ट खरीदना था, या घूमना था. सब कुछ ठप हो जाएगा धीरे धीरे. नई मुद्रा के आने और उसे आम जन तक पहुंचने में जो लंबा वक्त लगेगा, उस दौरान आए बाजार के ठहराव से पूरी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है. 

मंदी का एक नियम है कि जब यह आती है तो जल्दी जाती नहीं, अपना चक्र पूरा करने के बाद ही टलती है. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

हां, लेकिन जो असली काले धन वाले हैं, जिनका जमीन, सोना और विदेशों में काला धन गड़ा है, उन्हें कोई फरक नहीं पड़ने वाला. क्योंकि वह धन न तो भारत के मार्केट में, भारत की इकोनामी में चलायमान था और न चलायमान होना था. वह अर्थव्यस्था से बाहर का धन था, जिसे सरकार ले आती तो भारतीय अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मोबिलिटी आती. उसके उलट जो भारत की इकानामी में इस्तेमाल होने के लिए रखा काला धन, वह रद्दी हो गया जिससे बाजार का रुख मंदी की ओर जा सकता है. 

अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. 

यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है. नया धन नया नोट नया करेंसी जो आएगा, वह आम जन तक न पहुंचेगा. वह सरकार, अफसर, कर्मचारी, कारोबारी आदि के एक दस परसेंट वाले छोटे समूह के बीच लंबे समय तक दौड़ेगा. बहुत देर बाद वह नीचे आम जन, सबसे गरीब आदमी के पास पहुंचेगा. तब तक लोग सौ रुपये के नोट से लेकर एक रुपये के सिक्के तक में किसी तरह जीवन यापन करेंगे और बाजार को मोदी सरकार के भरोसे छोड़कर घर बैठे रहेंगे. देखिएगा, जनता से बहिष्कृति बाजार (भले ही मजबूरी अभाव में बहिष्कार को मजबूर किया गया हो) कितने दिन हंसी खुशी नार्मल रह सकता है. टें बोलना ही पड़ेग. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

मेरा लिखा इसके पहले वाला पार्ट भी पढ़िए ताकि पिक्चर क्लीयर रहे :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त फेसबुक पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashwini Kumar Srivastava बेहतरीन और सरल भाषा में किया गया विश्लेषण

Manudev Bhardwaj नायाब आकलन

Dinesh Choudhary गज़ब!!

Sunil Kumar बाज़ार की हालात अभी से ही खराब होने लगी हैं

Robin Singh यही तो देखना है.. फैसला तो अच्छा है.. मैं समर्थन में भी हूँ पर क्रियान्वन कितने अच्छे से होता है आपूर्ति कितने अच्छे से होती है और साइड इफेक्ट्स जैसे रिसेसन जो पैदा होगा व्यापर में उससे निपटने की कितनी तयारी है अब यही देखना है.. अगर इसमें सफल रहते हैं तो सरकार को 100 में से 200 मार्क्स.. कोई गधा ही कैश का बिस्तर बना के सोता रहा होगा.. बेवकूफाना फैसला राजस्व की छति .. आम आदमी के लिए मुसीबत अलग.. जिनके घर शादी है उनको रोने आंसू नहीं आ रहा..

Vivek Dutt Mathuria सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं। एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की। उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है। चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है। पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं। वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं। हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है। -हरिशंकर परसाई
डॉ. अजित तार्किक विश्लेषण आपसे असहमति की कोई वजह ही नही बचती।

Kamal Kumar Singh बेहतरीन।

पवन उपाध्याय राजस्व सचिव ने दी जानकारी… बिना हिसाब का पैसा जमा करने पर टैक्स के साथ देनी होगी 200% की पैनाल्टी। बैंको द्वारा ढाई लाख से ऊपर जमा की गई रकम की जानकारी सरकार को देनी होगी। ढाई लाख से ज्यादा जमा पर सरकार की नज़र (अगर पैसा कानूनन वैद्य है तो आपको कोई दिक्कत नहीं होगी)।

Sumit Vaish सब कुछ एक साथ नहीं सुधारा जा सकता। आपने जो शंका व्यक्त की है नए नोटों के आम आदमी तक न पहुँच पाने की और 100, 50 के नोट पर काम चलाते रहने की केवल उसी पॉइंट में दम है। जो अगर झूठ साबित हुआ तो अच्छा होगा। बाकी जो स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सटी नेता जी लोग खोल रहे हैं उनकी उत्तमता तो जग जाहिर है।

Vinay Pandey उम्दा सर

Manmohan Sharma Your assessment is correct but blind supporters of modi are delibraterly misleading people.

Shivam Srivastava चुनाव बहुत से लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में रोज़गार देता है और काला धन का प्रयोग इसमें होता है । लेकिन यह धन आया कहा से ? निश्चित रूप से गरीबों का ही पैसा है । जनता का पैसा है । एनआरएचएम के पैसे का बन्दर बाँट हो गया , इलाज़ के अभाव में अनेकों लोग मर गए । मनरेगा का पैसा है , मिड डे मील का पैसा है , खनन का पैसा है । 05 साल में कुछ दिन चांदनी होती है फ़िर अँधेरी रात । इस अँधेरे को हटाने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया कदम सराहनीय है । आतंकवाद , नक्सलवाद, अपहरण , रंगदारी आदि में कमी संभावित है ।

Yashwant Singh सराहनीय तब होता जब यह विदेशों में बसे कालेधन से होता. देश के काला धन को अचानक खत्म कर देना देश के बाजार को बर्बाद करेगा और देश का बाजार देश की इकानामी को बर्बाद करेगा और देश की इकानामी मंदी के कारण सब कुछ को नष्ट करेगा.

Shivam Srivastava कुछ दिनों तक के लिए कह सकते है कि बाज़ार में मंदी रहेगी । लेकिन तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं है । महीने दो महीने में स्थिति सामान्य हो जायेगी । सामानांतर अर्थव्यवस्था किसी भी देश के लिए अच्छी नही होती है । करपावंचन पर कुछ दिनों के लिए विराम लगेगा । देश में विकास की उम्मीद की जा सकती है ।

Arun Srivastava भाजपा नेता प्रवचन दे रहे थे कि इससे कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं रुकेंगी। लोग पत्थर फेंकने वालों को नकली नोट देते थे।

Yashwant L Choudhary सर ये पूरा पोस्ट ही कटाक्ष है | इसमें आपने राजनेताओं और डाक्टारो, इसकी और उसकी खूब धोयी है | इसका कंटेंट देखने में कुछ है और पढने के बाद विचार करने पर कुछ और है | ये आज तक का सर्वकालीन भयानकम पोस्ट है | इसको में सेव कर लेता हु

Ghanshyam Dubey मोदी जी अर्थ और राजनीति दोनो के महान खिलाड़ी हैं । अब तो PM भी हैं । उन तक , उनके खेल को 2014 मे कांग्रेस नहीं समझ पाई और सिमट कर 44 तक आ गयी , तो देश का गरीब – आम जन क्या समझेगा । गरीब आदमी की सारी तकनीक मामूली जीवन को गुजारने मे बिता देता है , उसके लिए यह सब अचरज जैसा, दुःस्वप्न जैसा है । …

Manish Kumar भाई बहुत ही साफ़ सुथरी भाषा और बड़ी ही समझदारी भरा ये पोस्ट लेकिन बहुत देर जो चुकी है जिसको फायदा पहुंचना था पहुँच गया। गरीब को मुसीबत दे गया।

Rajnish Tara Musibat gareeb ko nahi jamakhoro ko de gaya

Manish Kumar हाहाहा रजनीश तारा बहुत से धंधेबाजों को कमाने का मौका दे गए। किसी का एक रुपया नहीं रुकने वाला सब बदल जायेगा। सिर्फ मुसीबत उस गरीब की होती है जो पैसों के आभाव में शिक्षा नहीं पा पाया और अब मजदूरी करके महनत करके अपने बच्चों का लालन पालन कर रहा है। रजनीश तारा अमीर से भी पूँछों और गरीबों से भी। नोट बदलने में ना यशवंत भाई को परेशानी है ना मुझे और ना शायद आपको। परेशानी जिसे है वो आपके आस पास वाले ही हैं।

Anita Gautam आपकी बात सही है पर यह संवैधानिक तरीका नहीं है।

Raghvendra Singh Government has indirectly bailed out the PSU banks with black money as their NPA have risen to double digit. PSU banks needed capital infusion of about 110 b$ otherwise technically they are bankrupt.

DrRakesh Pathak तार्किक आकलन बधाई

Acharya Chandrashekhar Shaastri चुनाव में जनता को पहुंचाने के नाम पर कुछ दलाल नेता से रूपये ऐंठ लेते हैं कि वोट खरीदने हैं। लेकिन उस रकम का 10 प्रतिशत भी ऍम वोटर के पास नहीं जाता। हैं दारु का चक्कर वे लगातार चलाते हैं और मतदाता को पूरा उलझाते भी हैं

Rajnish Tara Yashwant bhaiya pahli baat to ye ki kala dhan rakhna hi gunah hai… barso tak kala dhan daba kar use election me gareebo ko baat kar unke vote kharidna bhi gunah hai… unke kharide hue votes ke adhar par ek giri hui aur ghatia sarkar banana bhi gunah hai….is faisle se mujhe to koi dar nahi… gine chune 5 ya 10 note mere paas honge jo main exchange kar lunga lekin jinke bed ke neeche chatte biche hai 500 aur 1000 ke wo chinta karenge…. ya to tax do ya is sardi me unhe jala ke haath seko….haa 2 4 din ki dikkat to hogi par faisla durgaami hai…. baaki adani ambani to door ki baat hai kisi chote mote builder pe bhi chapa maro to 5 7 crore to mil hi jate hai adani ambani pe to kuch jyada hi joga…. bhai mujhe aaj mera 500 ka note na toot pane ki takleef to jarur hui but mai modi ko salute karta hu

Raghavendra Narayan 2008 की आर्थिक मंदी से भारत को यही बचाया था सिर्फ बैंकिंग आधारित अर्थव्यस्था खतरनाक होती।

Sharad Mishra भाई शाब आप तो नोबल prize के उपयुक्त economic analyst है जो ये बताने का असफल प्रायश कर रहे हैं की काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था क्यूँ ज़रूरी हैं ।। वाह वाह । समश्या ये है की जिन्हें इस तरह की अर्थव्यवस्था मे अपने हित देखने की आदत हो जाती है वो ऐसे ही कुतरक देके लोगों को बरगनाले का प्रायश करते रहते है और किसी भी चीज़ का आर्थिक आकलन अवैध धंधों से कमाए धन के आधार पर तो क़तई नहीं किया जाता। ऐसी काले धन आधारित अर्थव्यवस्था से जितनी जल्दी आज़ादी मिलें उतना अच्छा हैं उससे वस्तुओं के मूल्य भी वास्तविक रहते हैं और ग़ुब्बारे तो फ़ुटना ही हैं और अत्यधिक बाज़ारीकरण पर भी संयम मेन रहेगा इसमें बराई क्या है महाशय।

Rajnish Tara Mujhe umeed hai ki iske baad bahut sa kala dhan sirf isliye bahar niklega ki kahi raddi naa ho jaye aur usse fayda hi hoga …. black ko white karne ke liye sarkari khajane me mota tax bhi jayega aur wohi paisa market me circulate bhi hoga…fir kaha bachi mahangai…. ya to jalao ya fir badlao

Mitra Ranjan और चूँकि आपको भी मालूम है कि ईश्वर कहीं नहीं है…इसलिए आपका कहा तो सच और सिर्फ सच ही निकलेगा

शांति भूषण कुमार यार कभी तुम क्रोनी कैपिटल पर मोदी को गरियाते थे और केजरीवाल की तारीफ करते थे…..यशवन्त सिंह जरा बताना तो कि वैचारिक रूप से दोगला किसे कहते हैं?

Bhagwat Shukla Bhai ji apke hisab se black money ko samanantr rup se flow hone dena chahia…. modi ne jo kia wo nhi hona chahia……waaah salute apko

Ripudaman Kaushik आदरणीय यशवंत जी, एक नज़र इधर भी, जितना मेरी समझ में आया उतना लिखा है 170000000000000 के करेंसी नोट इस समय भारत में व्यवहार में हैं जो की नकली हैं और पाकिस्तान या अन्य देश विरोधी माफियाओं द्वारा मार्किट में झोंक दिया गए हैं, जो लोग इस बात को ले कर प्रश्न उठा रहे हैं की, धन बेशक काला हो लेकिन वह भारत की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मार्किट को रोटेट करता है, इस तरह से करेंसी नोट को बंद कर देना बचकाना कदम है जो की भारत को भयंकर आर्थिक मंदी की तरफ धकेल देगा…..उफ़्फ़  … सोशल नेटवर्क्स पर इस अकथित virtual मंदी को प्रोडक्शन, इंप्लायमेंट, औद्योगिक ग्रोथ, औद्योगिक उत्पादन, छोटे कारोबारी, मार्केट की मोबिलिटी, बेरोजगारी बढ़ेगी, औद्योगिक इकाइयां में छंटनी, नए प्रोजेक्ट्स में निवेश बंद, बाजार के ठहराव… आदि-आदि अनेकानेक कारण दे कर समझाया जा रहा है.. लेकिन ये कोई विचार नहीं कर रहा की 170000000000000  ये केवल एक अनुमान मात्र है, इस आधार पर की हाल के कुछ वर्षों में ज़ब्त की गयी नक़ली मुद्रा में हर 10 लाख़ नोट में 250 जाली होते हैं, और जो करेंसी चुनाव जैसे ख़ास मौके के लिए टनों की मात्रा में गोदामों में रखी है वह इस अनुमान से भी कई गुना हो सकती है,  अब प्रश्न ये है की 17 लाख करोड़ रूपये की मुद्रा बाज़ार से बाहर कैसे निकलेगी या निष्क्रिय कैसे होगी। १. कल रात से जब से प्रधानमंत्री ने घोषणा की है, तब से कोई भी आदमी 500 का एक नोट लेने को तैयार नहीं है, अधिक मात्रा तो भूल ही जाओ, मतलब एक भी नया जाली नोट, अब अगले 50 दिनों में चलन में नहीं आने वाला। २. यदि आप के पास है, और आप बैंक चले जाते हैं, तो कैशियर जब्त कर लेगा (हालांकि इस बारे में मुझे कोई सुचना नहीं है की भुगतान होगा या नहीं). ३. अब जिसे पता है की उसके पास जाली नोट का स्टॉक हैं और bulk stock है, मात्र उसका पैसा ही मिट्टी होगा।  ४. जाली नोट की सबसे अधिक चोट बांग्लादेश और नेपाल में बैठे सटोरियों पर पड़ेगी, जो चुनाव जैसे ख़ास मौकों पर या ड्रग्स के लेनदेन में 300-400 की face value पर 1000 का नोट सीमापार के गोदाम से भारत भिजवाते थे.  दरअसल सरकार का मुख्य निशाना असली करेंसी वाला काला-धन नहीं है, बल्कि ये जाली करेंसी वाला नकली धन है. —– इसे दूसरे नज़रिये से देखते हैं की अगले 50 दिन में यदि 17 लाख करोड़ रूपये की कोढ़ रूपी जाली मुद्रा का बाज़ार से जाना, और लगभग 90% काला धन जो की घरों, तिज़ोरियों में कब से बंद था उसका एकदम से बाज़ार में किसी भी माध्यम से परावर्तित हो कर व्यवहार में आना. ये एक बहुत बड़ी घटना है.  17 लाख करोड़ + अचल मुद्रा (काला धन) का आगमन = भारत की अर्थव्यवस्था में इतनी ही value की अपरोक्ष इन्वेस्टमेंट का होना है नैतिक या अनैतिक रूप में. अब मेरे जैसे छोटे लोगों की भी सुन लो : हमारे यहाँ धन को लक्ष्मी रूप में पूजा जाता है, तो असली वाला नोट हिन्दुस्थान में कोई जलाएगा तो कतई नहीं, येन-केन प्रकारेण अगले 50 दिनों में बाहर आएगा ही और बदल दिया जाएगा।

Arif Beg Aarifi 17 lakh karod ki total currency purey india me hai.jisme se 14 lakh karod k 500 wa1000 k note hai………aap k dwara diya gaya aankda durust nahi hai,aap total mudra ko fake mudra samjh baithe hai

राज किशोर उपाध्याय मोदी काले धन को दूर रखने के लिए वाक़ई संकल्पशील हैं तो पार्टी के धन/खर्च का ब्योरा आरटीआइ के तहत देश को देने के मामले में उन्हें स्वेच्छा से आगे नहीं आना चाहिए था?

Sanjay Kumar Singh In economy depression is caused due to lack of demand or excessive supply but this decision ofgovernment will make morecirculation of money in economy. Then how we can say that in future economy of India will suffer depression.

Anurag Khandelwal  अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. केवल आप के लिए जनाब. १) पहले जब मुद्रा को बदला गया तब सरकार के पास मुद्रा के विनिमय पर नजर रखने के साधन नही थे….. २) डिजिटल विनिमय नहीं होता था….. ३) प्लास्टिक करेंसी नही थी….. ४) मोबाइल पे वॉलेट नहीं थे….. ५) नगद क्रय विक्रय पर निश्चित सीमा तय नही थी….और शायद आपको ऐसा लगता है की यह सारे बड़े प्रोजेक्ट, कॉलेज, चुनाव, अस्पताल आदि केवल और केवल काले धन से ही संभव है और इसीलिए सरकार को इस समानांतर अर्थव्यवस्था बरक़रार रखना चाहिये….हद्द है भाई…. कसम से बाबू आप जैसे लोग स्वर्ग में भी मीन मेख निकाल सकते हो….. गुड ब्रो….कीप इट अप…. साहब जी, ये जो इतनी सारी छोटी मछलियां गिना रहे हो ना आप ये सब मिलकर कई बड़ी बड़ी मछलीयों के आकार से भी ज्यादा बड़ी हो जाएगी….. रही बात मंदी की तो आपके हिसाब से काला धन ही यदि अर्थव्यवस्था को ऑपरेट करता है तो स्वागत है ऐसी मंदी का जिसमे न्यूनतम काले धन के लिए भी कोई स्थान नहीं हो…. रही बात विदेश में जमा काले धन की तो भविष्य के गर्भ में क्या है यह कोई नहीं बता सकता….सरकार की अपनी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ है….बैंकिंग कानून है हर देश के….और सभी को साध कर चलना पड़ता है…..सरकार की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं है इस विषय पर…. हाँ यह सही बात है की गोल्ड और रियल एस्टेट के अब तक के काले धन पर कोई फर्क नहीं गिरेगा किन्तु इस क़ानूनी करेंसी निरस्ती के बाद कहीं भी काले धन का निवेश मुश्किल होगा और बड़े transaction सरकार की निगरानी में आ जायेंगे…. आप बिल्लोरी कांच लेकर नकारात्मकता खोजना छोडिये भाई सा….थोड़े भोत दुःख आये भी तो मिलजुल कर बाँट लेंगे…. देश को बढ़ाना जो है…..

Roy Tapan Bharati आपके विश्लेषण और तर्क से.सहमत हूं।

Geeta Yadvendu कुछ भी हो मोदी भक्त तो मोदी आरती ही गाएँगे

Prashant Tulsani लेखक लेख लिखते समय , काफी कंफ्यूज जान पड़ते है ,  एक तरफ वो चुनावों में प्रयोग होने वाले काले धन की बात करते हैं , तो दूसरी ओर उसी काले धन को बाजार की मंदी से जोड़ कर देखते है , आशय स्पष्ट नहीं होता , क्या वो मान कर बैठे है के अब भारत में जो है सिर्फ वेसा ही चलेगा ? या वो चाहते है कि थोड़ा मंद ही सही किन्तु बाजार को सफ़ेद धन पर चलना चाहिए? हर छोटा व्यापारी ( मेरा परिवार भी ) इस बात को जनता है की अगले ५० दिन कुछ मुश्किल में गुज़र होने वाले है , और उसके बाद बाजार धीमे ही उठेगा , लेकिन ये भी जानते है कि ऐसा होने से मकान से लेकर भवन निर्माण तक जो प्रीमियम राशि काले धन के रूप में देनी पड़ती थी उस पर लगाम कस सकेगी,  दूसरे चरण में भी लेखक काले धन को ही विकास कार्यों से जोड़ते हुए नज़र आते हैं ,  साथ ही लेख के आरम्भ में लिखते है की “आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए”  और अंत आते आते स्वयं ही लिखते है “यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है.”  और फिर अंत में अपने लेख को काल्पनिक सिद्ध कर लिखते है “ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले” कुल मिलकर इस लेख को देखे तो , तथ्यों, आकँडो , एवं तर्क से दूर एक काल्पनिक लेख ,

Deepak Shweta Singh Kya praksh dala hai Bhaiya…. Ekdam sysska led bulb type

Sudhir Pradhan कुछ तार्किक विश्लेषण

Mayank Pandey अभी तक काली अर्थव्यवस्था में ही तो जीते आये हैं। अब नये वाले को भी देख लिया जाय।

Adv Shivani Kulshrestha bilkul sahmat hu sir…apne sahi likha hai ekdam…ye apne dil se likha hai. koi banwatipan nahi hai..fact or akarne agar sahi hote to deah itna gaddhe me na jata…

Rishi Munjal Vo noor ban ke jamaane mein fail jaayega – Tum aaftaab mein keedey talaash karte rehna ..

Prakash Govind यशवंत भाई बहुत जबर्दस्त और सटीक लिखा है …. पठनीय पोस्ट

Himanshu Priyadarshi Yashwant Singh bhai munhe bahut shiddat se mahsoos hota hai ki aapko abhi economy padhne ke bahut zarroorat hao

Prakash Govind तो आप ही पढ़ा दीजिये न. वैसे आप पहले ही पढ़ा चुके हैं —

Shubh Narayan Pathak सरलीकृत विश्लेषण!

Abhishek Singh Rajput भड़ास मीडिया पर लिखते-लिखते लगता है पुरे भसिया गये हैं…,खुद तो अपनी जवानी में कुछ नही कर पाये, एक बूढ़ा आदमी कुछ अच्छा कर रहा है, उसको तो करने दो भईया… काहे दर्द उखड़ रहा है इतना?

Sudesh Tamrakar वाह रे अर्थशास्त्री! अर्थशास्त्र के ज्ञाता धन्य है आपका ज्ञान! जो कालाबाजारियों और भ्रष्ट नेताओं के द्वारा कमाये गए धन से भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का ख्वाब देखते और दिखाते हो आप वाकई धन्य हैं । आपको वो करोड़ों जाली नोट भी नहीं दिखते जो भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहे थे आतंकवादियों के हांथों की बंदूकें अलगाववादियों के हांथो की मशाल बन रहे थे जो बच्चों के स्कूलों में आग लगा रहे थे। बात करते हैं कि थोड़ी देर को मोदी विरोध या समर्थन किनारे रख दीजिए। ठीक है आप देशहित की बात तो करिये । बात करते हैं ….। मोदी का ये कदम उनके खुद के लिए सरकार के लिए एक आत्मघाती कदम है लेकिन भ्रस्टाचारियों और कालाबाजारियों के लिए फांसी का फंदा। माना कि अभी भी बहुत से बच जाएंगे जिसके लिए एक और सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी वह है चुन चुन के रेड्स देखते जाइये अभी 2 साल से ज्यादा बाकी है। सलाह देने के लिए मोदी जी ने मोबाइल एप का तोहफा जो दिया है । सो उस पर आप भी सलाह दे सकते हैं । वैसे भी पप्पू तो खुद ही समझदार है आपकी बात मीडिया तक पहुंचा ही देगा।

Gaurav Bisht aap jis money ki baat kr re h wo black money h …beshak wo rotate hota pr ..un logo ki akal thikane ni lgti jo frod krte h …gandhi ji ne kha h …paap mitao… ab se 2 baar pkka sochenge ese log

Rajesh Gupta क्या स्तर है इन बुद्धिजीवियों का कहते तो हैं हम पूंजीपति के लूट के विरोधमें हैं लेकिन असली बात ये लोग विदेशी देशद्रोही के भाड़े के टट्टू हैं

Mohan Chopra कमजोर सोच वालों के लिए जोरदार लेख।

Nand Kishor Jha यसवंत जी, आप के बात में दम है। लेकिन अर्थव्यवस्था में भी स्वच्छता भी जरुरी है।काले धन की सामानांतर व्यवस्था देश के पालिसी इम्प्लीमेंटेशन में बाधक है। अभी यदि सरकार को इससे कुछ लाख करोड़ रुपये मिलते हैं तो जनकल्याण पर ही खर्च होगा। यदि सरकार सख्त रहे तो भ्रस्टाचार पर भी कंट्रोल होगा। नकली नोट पर भी काबू होगा, जिससे आतंकवादी गतिविविधियों पर भी लगाम लग सकता है।

Vishwakarma Harimohan मानता हूँ कि इस बदलाव से अर्थव्यवस्था फिलहाल स्लो होगी और ये बात मोदी से लेकर जेटली और विपक्ष सभी कह रहे हैं। लेकिन आपके सवालों के जवाब आपके सवालों में ही हैं। अंबानी टाइप लोग कितना भी पैसा विदेश में रखे हों लेकिन जब देश की इकॉनमी ठप्प होगी तो न तो उनके पास रिलायंस बीमे की किश्तें पहुंचेगी न टीवी बिकेंगे और न मकान। कहने का आशय कुछ समय के लिए मार्केट या टर्न ओवर उनका भी थमेगा, तब। आप भी जानते हैं कि अम्बानी हो चाहे कोई और सब कर्जे के संजाल में हैं किसी पर देशी कर्ज है किसी पर विदेशी जब कर्ज है तो ब्याज भी जाएगा। अब ब्याज जाएगा और आवक न होगी क्योंकि मार्केट में टर्नओवर घूमने में समय लगना है तो संतुलन बिगडना है। कोई भी उद्योग तभी फलता है जब टर्न ओवर चालू हो। अब दिवाला निकला कि नही। माल्या या सुब्रतो राय को शौक नहीं था दिवालिया होने का किन्तु गलत नीतियों के कारण आवक को लुटाते रहे और लागत लगती रही सो अपनी जान बचाने दिवालिया हुए। इसलिए हे भडासानंद महाराज खुद को संभालिए।

Balwant Singh आपका कहा झूठ ही होगा श्री मान

Umrendra Singh Pahli baar asahmat hu aapke visleshan se

श्री विदेह इन्फ्लेशन के बारे में भी कुछ सुना है यशवंत जी….और इस पर मोदी के फैसले का क्या असर होगा यह भी बताईये

Nidhi Panday 100 % correct..i like ur articke nd view iagre with this..

Navin Kr Roy यह एक व्यंग्यात्मक लेख है जो साफ़-साफ़ झलक रहा है।पर यदि इसे लेखक का विश्लेषण भी मान लिया जाए तो यह कहने में कोई हिचक नही है कि,इनका विश्लेषण अधूरा है।काले धन के नष्ट होने से भी अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।मैं बहुत विस्तार में नही जाऊँगा।पर कम से कम हजारों करोड़ नकली नोट जो भारतीय बाजारों में फैलकर दीमक की तरह हमारी अर्थव्यवस्था को चाट रहे थे,उस पर तो रोक लगी।क्या यह कम है ? और सम्पूर्ण रूप से शायद ना हो पर, निश्चित रूप से सरकार के इस निर्णय से छुपे काले धन पर चोट पहुंचेगी।

पंडित राकेश कुमार त्रिपाठी कुल मिला कर मूलभूत आवश्यकता रोटी कपडा और मकान पर फोकस रहेगा और किसान की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होने की सम्भावना बढ़ती है …. अतिरिक्त और गलत मार्ग का धन विलासिता को बढ़ावा देता है । आतंक की रीढ़ तोड़ने से कुछ समय देश में शांति की संभावनाएं भी प्रवल होती है

Shahnawaz Qadri आप की बात को नकारा नहीं जा सकता

Drashish Tiwari भाई साहब बड़ा बेहूदा कुतर्क दिया है आपने।आपका कुतर्क कुछ ऐसा है जैसे बीमारी ठीक करने को इंजेक्शन लगाना जरुरी तो है।पर डर इस बात का है की कही इंजेक्शन से स्किन में छेद न हो जाये।या सुई अंदर टूट न जाये इसलिए इंजेक्शन न लगाया जाये। Nonsense post

Rajesh Kumar Singh थेथरलॅाजी…

Irfan Khan देश का आर्थिक शोधन समय समय पर ज़रूरी है। कड़वी दवाई का साइड इफ़ेक्ट तो होता ही है।

Pankaj Chaturvedi अब देखिये जनधन खातों का खेल, सुदूर गांव में खातों में दो लाख के आस पास जमा होगा फिर निकाला जायेगा, कई करोड खाते हें गणित लगा लें . ढाई लाख से ज्यादा कि राशि पर पूछताछ होगी सो उससे कम जमा होगा , दिक्कत हमारे नजरिये का हे, विजय बहुगुणा जब इधर होते हें तो राहत के अरबो रुपये का घोटाला करने वाला खलनायक और इधर आ गए तो देव-तुल्य. , जिस काँग्रे पर आरोप हे काले धन का उसके दर्जनों बड़े नेते इस तरफ आ गए यानि सफ़ेद वाले हो गए, शूट द मेसेंजर वाली थ्योरी हे, काले धन के मूल पर नहीं सोचना शाखाओं पर पानी छिडकना, जमीं जायदाद के सर्किल रेट घटा दें , रियल एस्टेट बाज़ार जमीं पर होगा और काला धन असल में सड़कों पर कूड़े में मिलेगा

Sunita Soni Use less thought… You don’t understand economics

Abdul Samid this step of modi ji is very good bt I think it is not for black money holders bcz they may have money in formats other than cash

Alamgir Khan Perfect analysis

Preeti Dubey आज़ यकीन हुआ तर्क सुतर्क और कुतर्क…..काले धन की इतनी उपयोगिता?//वाह साहेब धन्य आपकी सोच धन्य आपकी लेखनी। लिखना अच्छी बात है।लेकिन जो हम बोल रहे है वो केवल भिन्न विचार के कारण बोल रहे है या ये भी ध्यान रख रहे है के इसका सामान्यजन की मानसिकता पे क्या असर पड़ेगा?आप चोरी को बढ़ावा दे रहे है। गज़ब है ।

Satbeer Singh main to sochta tha ki Kejriwal hi akela tha but i m wrong

Sarwjeet Singh काश आप जेसी बुद्धि और सोच वालों के लिए भी एक सर्जिकल स्ट्राइक होता

Rajendra K. Gautam इस फैसले से साफ हो गया है कि अपनी नाकामी को ढँकने और जनता का ध्यान भटकाने के लिये किया गया है। विदेश से काला धन ला नहीं पाये और देश में काला धन खोजने की मुहिम छेड़ कर यह संकेत दिये हैं कि देश की जनता टेक्स चोर है। जनता अपना टेक्स भी दे रही है और परेशानी भी उठा रही है। उसको न तो सुरक्षा मिल रही है और न ही टेक्स से राहत। इससे सिर्फ और सिर्फ जनता ही कष्ट भोगेगी। मजे मरेंगे सिर्फ और सिर्फ टेक्स चोर।

Vivek Dutt Mathuria अब जन धन योजना खाते करेंगे जुगाड का काम….

Madhukar Singh पैसे की तरलता (liquidity) केवल काला धन बर्बाद होने से ही नहीं प्रभावित हो रही है बल्कि आम लोगों की शुद्ध कमाई को नोट बदलने के नाम पर बैंकों में अनिश्चित समय तक रखने से भी प्रभावित होगी। इस तरह नगद आरक्षण अनुपात (cash reserve ratio – CRR) अघोषित रूप से बढ़ गया। अर्थशास्त्र का सारा व्यवहारिक सिद्धांत दरकिनार हो चुका है। ऐसे दौर में मांग कम पूर्ति ज्यादा होने के बावजूद सोने चांदी और अन्य चीजों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भी संशय का विषय बन गई है। ऐसे ढेरों अनुत्तरित पहेलियां इस बर्बर पूंजीवादी और बाजारवादी समय की पहचान हैं। अन्य विषयों पर ध्यान आकर्षण कराना खतरनाक है इसलिए मेरी तरफ से इतना ही।

Arvind Gupta मोदी जपान उड गये देशवासी को busy कर के मोदी मोदी नमो नमो नमो

Manju Kumari Badlab prakriti ka niyam hai ye hamlog jante hai,Baba Bhimrab ambedker ka bhi to kahna tha ki agar samajh aur duniya ko bhrast mukta rakhna ho to Har Das saal me note ko basal do,to ye subha kam modijee ne hi kar dala
Ratnesh Gupta Jaisi jiski soch. Ek baat aur isko yadi positive le to logo ki niyat me bhi to badlav ayega aur employee bhi salary ko hi apni dharohar samjhenge  Jo hai thode samay ki pareshani but jindgi bhar ki aasani

Arvind Pathik Beshaq mandi aayegi par mahgayi ghategi to kray shakti bhi badhegi.

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कालेधन पर मोदी के सर्जिकल स्ट्राइक का सच सुनिए भड़ास के एडिटर यशवंत से

Yashwant Singh : नेताओं और अफसरों का जो विदेशों में काला धन जमा है, वह सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा काला धन है, उसे सबसे पहले निकालना चाहिए, उसे रखने वालों का नाम खोलना चाहिए, यह मेरा मत है. उसके बाद सेकेंड फेज में ये करेंसी बदलने वाला काम करना चाहिए.

अब जो सेकेंड लेवल वाला काम पहले लेवल का मान कर किया गया और इसको कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक बोला जा रहा है तो मन करता है कहूं कि हम भारतवासी सच में इमोशनल जीव हैं, रेशनल तो बिलकुल नहीं हैं.

सब जानते हैं कि सबसे बड़े लोगों का काला धन विदेशों में रखा जाता है, उस पर इस नोट रद्द करने, नोट बदलने का कोई असर नहीं पड़ेगा.

सब जानते हैं कि काले धन का सबसे ज्यादा निवेश देश में प्रापर्टी और गोल्ड में किया गया है, उस पर इस नोट रद्द करने, नोट बदलने का कोई असर नहीं पड़ेगा.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो वोट खरीदने के लिए सैकड़ों करोड़ कैश जुटा रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो सिस्टम जनित करप्शन से पैसा बटोरकर घर में रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो व्यापार कारोबार कर लाभ बनाए पैसे को बटोरकर घर में रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां आएंगी जो कंपनियां चलाकर उससे हुए मुनाफे का एक हिस्सा इकट्ठा कर घर में छिपाए थे.

फिर भी, कहना चाहूंगा कि जो माहौल है, उसमें अपन फकीरों की तो मौज है. कैश घर में सजाकर खुद को ईमानदार बताने कहने वाले अफसरों व्यापारियों नेताओं पत्रकारों पुलिस वालों क्लर्कों कंपनी मालिकों आदि को तो सांप सूंघ गया है. वो अब तलाश रहे हैं खलिहर किस्म के एकाउंट जिसमें दस बीस परसेंट पर नोट जमा कराकर ह्वाइट किया जाए.

जो हुआ है, ठीक हुआ है, लेकिन इसके पहले बहुत कुछ होना चाहिए था, जिसे करने से ना जाने क्यों ये सरकार बच रही है. यहां तक कि जो बैंक के हजारों करोड़ के लोन गटक गए हैं और लौटाने को तैयार नहीं हैं, उन तक को सुप्रीम कोर्ट में बचाने में लगी है मोदी सरकार. जिनके धन विदेशों में जमा है, उनको राडार पर लेकर पकड़ने और उन धन को वापस लाने से कांग्रेसी सरकारों की तरह बच रही है ये भाजपा सरकार.

कहीं ऐसा तो नहीं कि बड़े कारपोरेट्स, बड़े चोरों पर हाथ न डाल पाने की मजबूरी ही छोटे चोरों पर एक्शन करा रही है? इसमें डबल गेम है. तारीफ की तारीफ हो गई और काला धन खत्म करने के लिए जोरदार एक्शन टाइप का फील वोटरों में दे दिया गया..

देश एक अजीब दौर में जी रहा है जहां ठोस और प्रमुख काम करने की जगह बस काम करते हुए दिखने दिखाने की जल्दी पड़ी है.

फिर भी, हम तो इसलिए खुश हैं कि हमारे आसपास के मिडिल क्लास कैश धारी लोग परेशान हुए पड़े हैं…

कहते हैं न, पड़ोसियों की जले जान, अपनी बढ़े शान.

जियो मोदी जी..

आपके कारण कुछ तो इधर भी एकाउंट में आएगा.

कोई है दस बीस परसेंट देकर वापस लेने वाला…

अपने परिवार, गांव और फकीर टाइप कई दोस्तों के एकाउंट मुंह बाए लाख दो लाख देखने को बेकरार हैं.

बड़े कालाधनियों पर सर्जिकल स्ट्राइक न होने से वादे वाला पंद्रह लाख तो एकाउंट में नहीं आया, हां अब इन छोटे चोरों पर कार्रवाई से बने हालात में दस बीस परसेंट पर ब्लैक ह्वाइट कार्यक्रम चलाकर कम से कम पंद्रह हजार तो आ ही जाएगा अपन गरीब देशवासियों के एकाउंट में.

जय हो

🙂

चाहूंगा कि आप फाइनल राय बनाने से पहले इन्हें भी पढ़ें :

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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अभिषेक मानव जैसे मीडिया के प्रोफेशनल बेगर्स से आपका भी पाला पड़ा है क्या!

Yashwant Singh : एक रोज एक फोन आता है. खुद को अभिषेक मानव नामक पत्रकार बता रहा एक शख्स पहले तो मेरी और फिर भड़ास4मीडिया डॉट कॉम की तारीफों के पुल बांधता है. मैं सर सर कहते हुए उन्हें सुनता रहा और थैंक्यू थैंक्यू बोल उनकी हौसलाअफजाई करता रहा. तारीफ सुनना भला किसे अच्छा नहीं लगता. आखिर में वे बोले कि बड़ा मुश्किल में हूं. अभी के अभी चार हजार रुपये चाहिए, आपको अगले बीस दिन बाद जरूर से जरूर लौटा दूंगा. मैंने पूछा इतनी अर्जेंसी क्यों है और आपकी लोकेशन क्या है. वे बोले- दूध वाला खड़ा है, कई महीने से उधार है, बिना लिए जाने को तैयार नहीं है. कोई रास्ता नजर नहीं आया तो आपको फोन किया. उन्होंने अपनी लोकेशन के लिए लक्ष्मीनगर दिल्ली का नाम लिया.

मैंने अपने उसी इलाके के एक मित्र को फोन किया और उनसे अपने नाम पर उधार अभिषेक मानव जी को दिलवा दिया. मैं उस वक्त दिल्ली से बाहर था. ऐसे फोन आते रहने मेरे लिए रुटीन है क्योंकि मीडिया के बहुत-से साथी छंटनी, बेरोजगारी अन्यान्य मुश्किलों की वजह से पैसे के लिए कई बार परेशान हो जाते हैं. जिन भी परेशान हाल मीडिया के साथी का फोन आता है तो भरसक कोशिश करता हूं कि मदद कर दूं या करा दूं, यह जानते हुए की मेरी खुद की औकात उधार बांटने या समाजसेवा करने की नहीं है लेकिन स्वभाव ऐसा है कि अगर पास में मुद्रा है तो उसे किसी भी भांति खर्चने में संकोच नहीं करता.

अभिषेक मानव जी ने बीस दिन बाद कोई फोन नहीं किया लेकिन जिन मित्र से दिलवाया था, उनके फोन आने लगे. डेढ़ महीने बाद दिल्ली पहुंचा तो उन मित्र को खुद से पैसे दे दिए और अभिषेक मानव जी को फोन लगाया तो पिछली बार की तरह फिर वे नया डेट दिए. मई की बात है और अब अक्टूबर लास्ट की तरफ हम लोग हैं. आखिर बार कुछ दिन पहले कई बार फोन किया तो उनने फोन नहीं उठाया. मैं समझ गया. मेरे चार हजार रुपये गए. उन्हें मैसेज किया तो उनका जवाब कुछ इस अंदाज में आने लगा कि जैसे रुपये उन्होंने नहीं, उनसे मैंने उधार लिए हों.

अभिषेक मानव खुद को शाह टाइम्स दिल्ली में कार्यरत बताते हैं. वे दिल्ली में जहां रहते हैं वहां का पता भी नहीं देते और न ही फोन करने पर फोन उठाते हैं. एक बार वह भड़ास के कार्यक्रम में मिल गए थे और खुद ही अपना परिचय बताया तो मैंने उनसे उधार वाले पैसे लौटाने के लिए बिलकुल नहीं कहा बल्कि उन्हें गले लगाया था. लेकिन अब वह फिर से पुनर्मूषकोभव: वाली स्थिति में आ गए हैं. वो अगर यही साफ साफ कह दें कि भइया लौटा न पाउंगा, भूल जाइए तो मैं भूल जाता. पर वे झूठ पर झूठ बोले जाते हैं ताकि अगला बंदा खुद झुंझला कर फोन करना बंद कर देगा और खुद ही मान लेगा कि पैसे डूब गए.

चलो आज मैंने यह पोस्ट लिखकर मान लिया कि मेरे पैसे डूब गए. मेरे तो पैसे वैसे ही यहां वहां जहां तहां डूबते रहते हैं. एक ये चार हजार और सही. 

यह पोस्ट सिर्फ इसलिए नहीं लिख रहा कि मेरे चार हजार डूब गए. इसलिए भी लिख रहा कि ऐसे अभिषेक मानवों के कारण मीडिया के जेनुइन मदद चाहने वाले साथियों को भी मदद देने से पहले कई सवाल मन में पैदा हो जाते हैं. मैं तो यही सोच कर खुश हूं कि अभिषेक मानव जी चार हजार न लौटाएंगे तो कम से कम आगे से मुझसे तो नहीं मांगेंगे. क्योंकि अगर वे चार हजार लौटा देते तो उनकी मांगने की क्रेडिट मेरे दिमाग में चालीस हजार रुपये तक बढ़ जाती और अगली बार वे जब मांगते तो यह सोचकर उन्हें तुरंत देता कि इनका लौटाने का रिकार्ड अच्छा है. चिंता सिर्फ इतनी भर है कि कुछ लोग माहौल ऐसा कर देते हैं जिससे जेनुइन लोग एक तो मदद मांगने में हिचकते हैं कि कहीं उन्हें ऐसा वैसा न समझ लिया जाए और मांगते भी हैं तो देने वाला सोचता है कि पता नहीं यह जेनुइन है या प्रोफेशनल बेगर है.

जी हां. मीडिया में बहुत-से प्रोफेशनल बेगर साथी हैं. वे सिर्फ मांगना जानते हैं, लौटाना नहीं. यहां तक कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक भी होने लगती है तो वे अपने मन से नहीं लौटाते, छोटी छोटी रकम देकर उधार भरपाई करना नहीं चाहते. वे दूसरे से यानि उधार देने वाले से उम्मीद करते हैं कि वह अपना पैसा डूब जाने की तसल्ली कर ले और न फोन करे न पैसे वापिस मांगें. वे नित नए नए क्लाइंट ढूंढते हैं जो पैसे दे सकने का सामर्थ्य रखते हों. अभिषेक मानवों जैसों से आपका भी पाला पड़ा हो तो आप लोग जरूर अपना अनुभव शेयर करिए, शायद इस भड़ास निकालने से ही मन को संतोष मिल जाए. 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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यादव कुल में लातम-जूतम : कहीं आईपीएस अमिताभ ठाकुर और पत्रकार यशवंत सिंह के श्रापों-आहों का असर तो नहीं!

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में भयंकर ड्रामा चरम पर है. सारे चेहरे बेनकाम हो रहे हैं, मुलायम सिंह यादव से लेकर रामगोपाल यादव तक और शिवपाल यादव से लेकर अखिलेश यादव तक. हर कोई स्वार्थ, लिप्सा और सत्ता की चाहत में किसी भी लेवल पर गिरने को तैयार है. जनता हक्की बक्की देख रही है. उधर, कुछ लोगों का कहना है कि आईपीएस अमिताभ ठाकुर व भड़ास फेम पत्रकार यशवंत सिंह जैसे बहादुर, ईमानदार और सरोकारी लोगों के साथ सपा की इस सरकार के राज में जो जो बुरा बर्ताव किया गया, उसकी आहों व बददुवाओं का असर है कि अखिलेश यादव राज बवंडर में है और यादव कुल के किसी भी व्यक्ति का जीवन शांत नहीं रह गया है.

इस यादव कुल की आपसी लातम-जूतम को देखकर दुनिया आनंदित हो रही है और इनकी लगातार सामने आती खलनायकी भ्रष्टाचारी वाली छवि से नाराज लोग इन्हें चुनावों में सबक सिखाने को आतुर हैं. कट्टर यादवों को छोड़ दें तो इस समय सारे लोग इस सपा सरकार के जंगलराज और इनकी आपसी जूतम-पैजार से परेशान है. प्रदेश में सारा काम ठप पड़ा हुआ है. अफसर भी मजे लेकर तमाशा देख रहे हैं.

रामगोपाल यादव सीबीआई और बीजेपी के चंगुल में हैं जिसके कारण उन्हें शिवपाल ने पार्टी से निकाल दिया वहीं मुलायम सिंह दलालों अपराधियों आदि को अपना बहुत करीबी बताकर अपने बेटे अखिलेश का विरोध कर रहे हैं. वहीं अखिलेश मुगल शासक के राजाओं की तरह सत्ता मिल जाने के बाद किसी भी तरह अपना कद और पद बड़े से बड़ा बनाना चाहते हैं ताकि यादव कुल में सीएम पद के लिए कोई दूसरा प्रतिस्पर्धी न पैदा हो सके. इस प्रकार यह खानदान आपस में ही चरम मारकाट में लिप्त होकर एक दूसरे को एक्सपोज कर रहा है. उत्तर प्रदेश में जंगलराज का जो लंबा दौर चला है उसमें बहुत से ईमानदार, निर्दोष और साहसी लोगों को शासन सत्ता का उत्पीड़न झेलना पड़ा.

मीडिया मालिकों और संपादकों के सांठगांठ के दबाव में यूपी सरकार ने भड़ास4मीडिया के एडिटर को 68 दिनों के लिए जेल भेज दिया था और तरह तरह के फर्जी मुकदमें लाद दिए थे ताकि कभी जमानत न हो पाए. इसी तरह निर्भीक आईपीएस अमिताभ ठाकुर को पग पग पर परेशान किया गया और जितना प्रताड़ित किया जा सकता था, उन्हें किया गया. अमिताभ और यशवंत दोनों ने फेसबुक पर अपने अपने अंदाज में लिखा है कि उनकी बददुवाओं और आहों का असर पड़ा है जिसके कारण प्रकृति निरंकुश और अन्यायी यादव कुल के साथ अपने तरीके से न्याय कर रही है. आइए पढ़ते हैं अमिताभ और यशवंत ने एफबी पर क्या क्या लिखा है :

Amitabh Thakur : इनकी दुर्दशा में कुछ मेरी भी आहें जरूर शामिल रही होंगी जो मैंने अकेली रातों में उनके अन्याय के साए में निकालीं. चलो, कम से कम अब मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ कार्यवाही तो हो रही है. xxx अब जब मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने श्री प्रजापति को दुबारा बर्खास्त करते हुए कड़ा कदम उठाया है तो हम उम्मीद करेंगे कि वे मेरी पत्नी द्वारा जून 2015 में श्री प्रजापति के खिलाफ थाना गोमतीनगर में दर्ज कराये गए एफआईआर में उन्हें गिरफ्तार कराते हुए हमें न्याय देंगे. xxx My silent tears on all the torture I faced through misuse of their authority seem to get some solace today. xxx Thank God, now justice is being done against minister Gayatri Prajapati. Now when CM Sri Akhilesh Yadav has taking strong action against Mr Prajapati by sacking him again, we hope the CM will also take police action against Mr Prajapati by arresting him in the FIR registered by my wife Nutan in Gomtinagar police station in June 2015 for trying to frame us in false cases, which is pending since then.

Yashwant Singh : प्रकृति का न्याय है भाई। एक फ़क़ीर का श्राप था इन रामगोपाल जी पर। और, यादव खानदान पर भी। इन्हें नष्ट होना है। जिन जिन पर श्राप होंगे, वो नष्ट होंगे। भ्रष्टाचारियों और आततायियों को रोने के लिए कंधे न मिलेंगे। खुद को बिना अपराध 68 दिन जेल में रखने के चलते दिए गए श्राप का असर होना ही था। यादव खानदान के गलत कामों और जंगलराज से पीड़ितों की आह भी तो लगेगी इनको, इसलिए ये नष्ट होंगे। कुछ श्राप जल्द लगते हैं, कुछ आहों का असर सदियों में दिखता है। इसके उलट वाइस वर्सा कुछ आहों का असर तत्काल दिखता है और कुछ श्राप का सदियों में।

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जानिए, भड़ास के एडिटर यशवंत क्यों करते हैं रावण को नमन!

Yashwant Singh : रावण की आज पुण्यतिथि है. इस मौके पर मैं रावण को सादर नमन करता हूं. रावण को मैं असली योद्धा मानता हूं. आपने झुकने या टूटने की जगह अंतिम दम तक लड़ाई लड़ना पसंद किया और लड़ते हुए प्राण त्यागने को अपना गौरव समझा. कायरों की इस दुनिया में जिनकी थोड़ी-थोड़ी, छोटी-छोटी बातों से फट जाती है, उन्हें रावण से सबक लेना चाहिए कि हर हालत में, चाहें भले ही हार सुनिश्चित हो, मौत तय हो, आपको अपने साहस के साथ डटे रहना चाहिए…

रावण ने अपने परिजन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी… रावण को हराने के लिए दुश्मन पार्टी ने रावण के खानदान में फूट डलवाने की रणनीति अपनाई और एक भाई को गद्दार बनने को प्रेरित किया, जिसमें सफलता भी पाई… इन्हीं कारणों से रावण की हार हुई… दुश्मन पार्टी के लेखकों-कवियों ने रावण को महान खलनायक बनाने की पूरी कोशिश की और इसमें सफलता पाई… जबकि वे अपने पक्ष की बुराइयों पर रोशनी डालते कम देखे गए.

रावण ने अपनी बहिन की नाक काटे जाने पर दूसरी पार्टी की औरत का अपहरण कर डाला जिसे दुश्मन पार्टी छलपूर्वक उठाया गया कदम बताया लेकिन दुश्मन पार्टी ने जब छलपूर्वक रावण के एक भाई का ब्रेनवाश कर उसे अपनी पार्टी में मिला लिया तो इसे सत्यकर्म साबित करने में जुट गए… कुल मिलाकर राम, रावण, रामायण पर नए सिरे से सोचने विचारने की जरूरत है और रावण को फूंकने की जगह उनसे बहुत कुछ सीख लेना वक्त का तकाजा है…

इसीलिए मैं खुद के बारे में बस इतना कहता हूं….

थोड़ा रावण, थोड़ा राम।
दोनों को भरपूर प्रणाम।।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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आइए, थोड़ा शरणार्थी हो लें… आइए, थोड़ा शरणार्थीपना जी लें..

Yashwant Singh : शरणार्थी ही तो हैं हम सब. पर मालिक मानकर बैठे हैं. मालिक मानकर अपना सब कुछ पक्का करने में जुटे हैं. पक्की दीवार. पक्का बैंकबैलेंस. पक्का बेटा. पक्की पत्नी. पक्के रिश्ते. सब कुछ पक्का कर रहे हैं. मिट्टी को पका रहे हैं और पक्का कर रहे हैं भविष्य. सब कुछ पक्का करके हम खुद को भी पक्का मान रहे हैं. पर हुआ कहां पक्का. सब कच्चा है. रेत है. भरभरा कर गिर जाता है एक दिन. सब कुछ मिल जाता है, समा जाता है एक दिन. जिसका अंश था, उसी में. फूलों में, पत्तियों में, हवाओं में, पानी में, आसमान में, धरती में… पंच रचित यह अधम शरीरा.

जन्म-जन्मांतर से होता आ रहा है. पर प्राण पड़ते ही हम कुलबुलाने जो लगते हैं, खड़े जो होने लगते हैं, उसके बाद खुद को मालिक मानने की मनःस्थिति में पहुंच जाते हैं एक दिन. पर शरणार्थी तो शरणार्थी ही होता है. वो चाहे अपने को कितना भी मालिक मान ले. तात्कालिक किस्म की व्यवस्था होती है शरणार्थी जीवन में. कुछ भी टिकाउ नहीं होता. इससे उबरकर हर कुछ पक्का बनाने को आमादा रहते हैं. और जब पक्का बन जाता है तो थोड़ा ज्यादा पक्का करने की फिराक में पड़ जाते हैं.. अंततः हम विलुप्त हो जाते हैं.. पहले हम विलुप्त होते हैं… फिर हमारा पक्का बनाया हुआ सब कुछ, एक-एक कर विलुप्त होता जाता है..

ज्यादा सजग, संवेदनशील और सुंदर होता है शरणार्थी जीवन. लेकिन पक्के की रेलमपेल है सो जाने अनजाने हम सब पक्का बनाओ अभियान में लगे पड़े हैं… चलो, थोड़ा-सा शरणार्थी हो लें.. थोड़ा जंगलों-पहाड़ों-खेतों के करीब जाकर उन्हीं के बीच रहें, शरणार्थी-सा. लकड़ी बटोरें. जलाने के लिए. लकड़ी बटोरें, रात गुजारने के लिए. लकड़ी तलाशें खुद को संबल देने के लिए.. पानी तलाशें, पीने के लिए, जीने के लिए… कुछ पत्तियां और कुछ अन्न बीन लें, पकाने के लिए… कुछ मिट्टी निकाल लें, चूल्हा बनाने के लिए… कुछ नमक मांग लें, स्वाद पाने के लिेए.. और, ढेर सारी नींद व निश्चिंतता पा लें, अगले दिन गुनगुनाते हुए जगने, चलने, थकने के लिए… आइए, थोड़ा शरणार्थी हो लें… आइए, थोड़ा शरणार्थीपना जी लें..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Anil Sakargaye दिल का सोना रूप की चांदी… जवानी का निखार… वक़्त का कज़ाक आकर सब उठा ले जाएगा

S.a. Asthana क्या बात है? भडासी बाबा … आज तो कुछ ज्यादा ही दार्शनिक लग रहे है ?

Chandan Srivastava वृद्धावस्था ऐसे ही शरणार्थी जीवन के लिए मानी जाती है. अभी जीवन के और भी रहस्यों को समझा जाय. अभी लड़ने-भिड़ने का वक़्त है भईया.

Pradeep Kumar जय हो जय हो बाबा की

Sangita Puri गजब …

Arvind Srivastava yashwant bhai is par ek sher KUL UMRA FAIDE K LIYE KHARCH HO GAYI…AKHIR ME JAB HISAB KIYA KUCHH NAHIBACHA

Ravi S Srivastava jai ho

Bhanu Pratap Singh Chauhan sadhuvad. aap ka lekh dil ko choo gaya. aap ne bhi dil se likha lagta hai

Saurabh Suman Bahut Sahi kaha hai !

Deepak Shukla WAH

Shekhar Chopra WAH RELAY REALASTIC

राकेश कुमार सिंह Keval rah jayege pyare terey bol ik din bik jayega mati ke mole.

Sunil Kumar आइए, थोड़ा शरणार्थी हो लें… आइए, थोड़ा शरणार्थीपना जी लें..

Vishnu Sharan Rastogi बढ़िया है भाई ..

Santosh Kumar Singh ab samajh me aa gaya hai aap himalay ki taraf jane wale hain

Vishwakarma Harimohan ram nam hi saty hai….

Sunil Mishra yashwantanand ji sahi mashvira hai ….

Neh Indwar सारे प्राणार्थी शारणार्थी ही हैं। रास्‍ते के पत्‍थरों को उठा उठा कर जमा करवाने का चलन कब छुटने वाला है। यह प्रक्रिया सांसों की डोर से बंधी प्रतीत होती है।

Alok Tripathi Ant me sab yahin cchut jana hai….

प्रवेश कुमारी Ham ho gaye sharanarthi

Ajit Ujjainkar वाह!

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रवीश के इस प्राइम टाइम को देखने के बाद यशवंत ने क्या लिखा FB पर, आप भी पढ़ें

यशवंत

Yashwant Singh : न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया आपको मानसिक रोगी बना सकते हैं। कल बहुत दिन बाद न्यूज़ चैनल खोला तो अपनी पसंद के अनुरूप ndtv प्राइम टाइम रविश कुमार को देखा। मनोरोग सप्ताह मनाए जाने के दौरान ndtv ने प्राइम टाइम में इसी सब्जेक्ट को चुना। इसी कार्यक्रम में रविश ने बताया कि ताजा शोध के मुताबिक दुनिया भर में न्यूज़ चैनल्स लोगों को मनोरोगी बना रहे हैं।

यही हाल सोशल मीडिया का है। कल का ndtv prime time show आपने मिस किया है तो उसका वीडियो ढूंढ कर ज़रूर देखें। न ढूंढ पाएं तो इस लिंक https://goo.gl/JHyjk3 पर क्लिक करें. इस उन्मादी दौर और दौड़ में अगर आप खुद का धैर्य खोता देख रहे हैं तो कुछ दिन टीवी मोबाइल को अलविदा कह मेरे पास आ जाएं। दोनों भाई गले मिल रोएंगे-गाएंगे।

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अतिवादियों से बच के रहें। खासकर राजनीतिक। जो लोग दिन भर सिर्फ मोदी या केजरी या राहुल या संघ या कम्युनिस्ट या पाकिस्तान या चीन या हिन्दू या मुसलमान विरोधी पोस्ट लिखते रहते हैं, ये भी मनोरोगी हैं। इनसे दूर रहें। इन्हें unfriend करें। ये आपको जबरन मनोरोगी बना रहे हैं।

आपके न चाहते हुए भी आप इनके मनोरोग के वर्तुल में खींचे जा रहे हैं। ये जो उगलते हैं, लगातार, धारा प्रवाह, एक ही सुर में, न चाहते हुए भी आप इन्हें सुनते पढ़ते हैं और चुपचाप इनकी वैचारिक विकृति को कन्सीव करते जाते हैं। ऐसा लगतार होने से आप तटस्थ नहीं रख पाते खुद को और कुछ न कुछ लिख बोल देते हैं।

इस तरह आप अनजाने में ही मनोरोगियों के एक अंतहीन युद्ध / विकार के शिकार लोगों के गैंग के सदस्य बन जाते हैं। बहुत मुश्किल है सहज मनुष्य बने रहना। बड़ा आसान है मनोरोगी बन जाना। ये दौर ऐसा है दोस्तों। आओ, प्रेम करें, हंसें, गाएं। एक पल का जीवन है, यूँ न गवाएं।

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मेरे प्यारे मित्र और आकाशवाड़ी के जाने माने एनाउंसर Ashok Anurag जी द्वारा सृजित इन 2 लाइनों पर गौर फरमाएं और पसंद आए तो कमेंट बॉक्स में वाह करें…

अजनबी शहर में जाने कौन था पहचान वाला,
जिस तरफ़ से गुज़रा, पत्थर बेशुमार चले।

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और आखिर में एक चुटकुला…

संता शराब पीते पीते रोने लगा…..

बंता : क्या हुआ… रो क्यूं रहे हो?

संता : यार जिस लड़की को भूलने के लिए पी रहा था, उसका नाम याद नहीं आ रहा.

उपरोक्त चारों स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vinod Sirohi मई 2014 से टीवी नहीं देखा है और न्यूज़ पेपर भी 2 महीने से पढ़ने शुरू किए हैं क्यूंकि उसकी आवश्यकता नौकरी के हिसाब से हो गयी है| दोनों ही दुनिया में उन्माद भर रहे हैं| मनोरोगी तो बना चुके हैं| इस प्रकार दिखाते हैं कि किसी देश के एक व्यक्ति का ब्यान मानो उस पूरे देश का बयान है और सोच है| किसी जाति या धर्म के एक व्यक्ति का कथन पूरे धर्म की सोच हो| आज जावेद मियांदाद का कुछ बयान प्रमुखता से छपा है| आप छाप भी रहे हो और आलोचना भी कर रहे हो| इससे अच्छा है छापिए ही मत| बेहूदी बातों पर क्यों ध्यान देते हो| न गलत बोलो न गलत पर ध्यान दो| अब तो मुख्यतः उकसाना, उलझाना, बहलाना, गरमाना काम है। समझाना, बतलाना, सुनाना बंद है| कोई चिंतन या मनन नहीं| राहत की बात है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा समाचारों से दूर हो रहा है| काम में बिजी लोगों को फालतू लफड़ों की फुर्सत नहीं है। अभी यहां लोग फुर्सत में हैं|

Anil Dwivedi : भाई Yashwant Singh को अभी पढ़ा , उनके विचारो से सहमति रखते हुए आप सबसे गुज़ारिश है कि कट्टरता के मनोरोग से बचें! ये मनोरोग आपको उन्मादी, आक्रामक, असहिष्णु, जिद्दी और आत्ममुग्ध बना देगा। इसलिए तुरंत ही अतिवादी कांग्रेसी, भाजपाई, आपिये, समाजवादी, हिंदूवादी, राष्ट्रवादी, मुस्लिमवादी से मुक्ति पाइये , तुरंत रिमूव करे ऐसे लोगो को , आइये प्यार बाँटें और मनोरोग से मुक्ति पाएं.

Madan Tiwary : दारु की व्यवस्था कीजिये, आ जाते है. वैसे तो अब बिहार ही छोड़ने का मूड कर रहा है. मर रहा है स्टेट. पहले भी कुछ नहीं था. अब तो सब कुछ ख़त्म हो गया. रात में आप नेचरुल प्लेस पर जा नहीं सकते. पहाड़, नदी किनारे टहल नहीं सकते. सड़क किनारे सन्नाटे में बैठ नहीं सकते।

Ghanshyam Dubey : मैंने भी कल उसी अड्डे पर देखा। पागलपन और उन्मादी माहौल मे सकरातमक बातों की ओर ध्यान खींचा जा सकता है। NDTV यह करता रहा है।

आशीष सागर : मैंने पिछले दो साल से न्यूज़ चैनल देखना बंद कर रखा है और सोशल मीडिया में सिर्फ फेसबुक ही

Deepak Tamrakar : सही कहा सर. जल्द तैयारी करते हैं दिल्ली की तरफ.

Yogesh Garg : इन मनोरोगियों पर एक कैम्पेन चलाया जाए

Journalist Atul : बिल्कुल भैया…और कल मैं भी ऐसे ही दो तीन मनोरोगियों का शिकार हो गया था और सुबह 2:50 तक एक अतार्किक औचित्यहीन युद्ध करता रहा..

Yashwant Singh : पिछले कुछ हफ्ते से सोशल मीडिया का हाल बहुत बुरा हो चला है। कम से कम समय इस पर रहें। अगल बगल घूमें, मस्त रहें।

Journalist Atul : जैसा आपका आदेश.

Prashant Mishra : कई दिन बाद इस “लीहो लीहो” के दौर में सही लिखे हैं.. सही बात है जी… मनोरोगी… खतरनाक टैम चल रहा जी…

Vijay Prakash Ray : मनोरोगी का इलाज है सर लेकिन नमोरोगी का नहीं।

Siddharth Pandya गुर्बत और जहालत की जब शादी होती है….तो उनका बच्चा पैदा होता है जिसे कहते है जज्बातियत…दोनो देशो मे यह लोग बडी तादाद मे पाये जाते हैं. बाकी आपकी बात सोला आने सच है.

DrMandhata Singh यशवंतजी यह उन लोगों पर लागू होता है जो पहले से ही रोगी होते हैं। आपको कोई एडिक्ट बना सकता है। जिनके जीवन में संघर्ष नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई लक्ष्य नहीं ऐसे बैठे ठाले खुद को नाकारा बना रहे लोग तो किसी भी बात के शिकार हो सकते हैं। हां इन दशा में कोमल मन वाले बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी हमारी आपकी है।

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यूपी का शिशु सीएम हर एग्जाम में फेल… जानिए, जनता क्यों नहीं करेगी इन्हें रिपीट…

Yashwant Singh : अखिलेश यादव जैसा बेचारा और धूर्त मुख्यमंत्री खोजे नहीं मिलेगा… बेचारा इसलिए कि खुद कोई फैसला नहीं ले सकते… धूर्त इसलिए कि चोरों और भ्रष्टाचारियों का नेता बन शासन चला रहे लेकिन खुद के बोल ऐसे होते हैं जैसे उनके जैसा इन्नोसेंट कोई दूसरा नेता नहीं. यह धूर्तता ही तो है कि जो आप हो, उसे छुपा कर एक नई लेकिन झूठी छवि निर्मित करने की कोशिश कर रहे हो जिससे जनता भ्रमित होकर बहकावे में आकर वोट दे जाए… सबको पता है कि अगली बार भी सीएम बने तो यही सब चोर उचक्के लुटेरे मंत्री बनेंगे और यही सब काकस घेरे रहेगा… ऐसे में सिवाय एप्प लांच करने और खुद की मार्केटिंग-ब्रांडिंग करने के, दूसरा कोई काम नहीं होगा… हां, जंगलराज इससे भी भयानक रूप में बदस्तूर जारी रहेगा… सारी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए एंड्रायड स्मार्ट फोन देने का जो नारा अखिलेश ने दिया है, वह एक तरह से वोट पाने के लिए रिश्वत देने जैसा है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल किया जाना चाहिए. आप पांच साल के जंगलराज को एक स्मार्टफोन देकर नहीं ढंक सकते.

अपने भ्रष्टतम और दागी मंत्री गायत्री प्रजापति को बस कुछ दिन के लिए हटा पाया…फिर से उस चोर को अपनी टीम में ले लिया.. काहे भाई… चलो छोड़ो.. अब ये बताओ कि अपने लिए तो छह सात सौ करोड़ का नया सीएम आफिस बना लिए हो… हमारे गाजीपुर जिले के लोगों के लिए ठीकठाक सड़क भी मयस्सर नहीं कराए… देखिए, क्या हाल है गाजीपुर की सड़कों का.. कहने को ये बौद्ध परिपथ की सड़क है लेकिन यहां रोजना एक्सीडेंट में दर्जनों लोग घायल होते हैं… शुक्रिया भाई Braj Bhushan Dubey जी जिन्होंने इन खराब सड़कों के मुद्दे को जोर शोर से उठाया और इस पर अभियान चला रहे हैं… दुबे जी लगातार गाजीपुर जिले की मूलभूत समस्याओं को लेकर सक्रिय रहते हैं और शासन-सत्ताधारियों की नींद हराम किए रहते हैं…

दुबे जी के ताजा अभियान के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : यूपी के जंगलराज में बौध परिपथ पर रोज गिरता है खून…. गाजीपुर में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शुरू किया ‘आपरेशन एनएच’

इसी गाजीपुर से महान पत्रकार अच्युतानंद मिश्रा के भतीजे विजय मिश्रा भी मंत्री हैं… ओम प्रकाश सिंह मंत्री हैं… ऐसे लाल बत्ती वालों की संख्या चार से ज्यादा बताई जाती है है.. लेकिन ये सब के सब आंख के अंधे हो चुके हैं… इन्हें कुछ दिखाई नहीं देता… ये सभी अपने आकाओं के नक्शेकदम पर चलते हुए सारी की सारी कोशिश ज्यादा से ज्यादा उगाही के लिए करते रहते हैं…

अखिलेश यादव से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन यह आदमी चूं चूं का मुरब्बा बन चुका है.. न छवि साफ सुथरी रही और न ही कोई विकास कार्य किया… जैसा जंगलराज कायम है, उसे ही चलते देने का नाम अखिलेश यादव है. सोचिए, किसी करप्ट अफसर के यहां कोई छापा डलवा पाया अखिलेश यादव? कोई चोर अफसर कभी अरेस्ट हुआ? इसलिए क्योंकि सारे चोर और करप्ट तो अखिलेश यादव के राज में इनके खानदानियों से संरक्षण पाए हुए हैं… सो, लूटकांड का जो महान दौर यूपी में रचा गया है, उसके सिरमौर अखिलेश बाबू ही कहे जाएंगे… लाख ये किंतु परंतु लेकिन इफ बट आदि लगाएं… लेकिन जनता बस एक बात जानती है कि अखिलेश राज में जन जन का जीवन ज्यादा दूभर हो गया है और चोरों लुटेरों भ्रष्टाचारियों की जय जयकार मची हुई पड़ी है…

शासन सत्ता में उपर से नीचे तक चोर ही चोर भरे हुए हैं… ढेर सारे पैसे देकर अच्छी पोस्टिंग पाओ और जमकर कमाओ… इस पूरे लूट प्रदेश में अजीब किस्म के दानव राज की दुर्गंध फैली हुई है जिसमें किसके साथ क्या कब कहां घटित हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता… पत्रकार दिनदाहड़े जला फूंक दिए जाते हैं, हत्यारे मंत्री बने रहते हैं… जो सच बोलने की कोशिश करेगा, वह मारा जाएगा या जेल जाएगा… जो झूठ चापलूसी भ्रष्टाचार के साथ खड़ा होकर यसमैन बना रहेगा, उसकी तरक्की दिन दूनी रात चौगुनी होती जाएगी. नौकरशाही का आलम ये है कि प्रदेश में सारे कामधाम ठप है. किसी को किसी से कोई डर भय नहीं. कोई उत्तरदायित्व-जवाबदेही नहीं. बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स ठप पड़ चुके हैं. बस केवल ब्रांडिंग और मार्केटिंग का खेल जारी है. चेहरा चमकाने की कोशिशों में सब व्यस्त हैं. अब तो पता ही नहीं चलता कि यूपी में कोई मुख्य सचिव भी है… कोई डीजीपी भी है… तो क्या अखिलेश ऐसे ही यसमैन चाहते हैं ताकि न कोई काम हो और न उन पर उंगली उठे? यानि नो वर्क, नो क्वेश्चनमार्क… किंकर्तव्यविमूढ़ता की हद है…

इस यादव खानदान को मुगालता हो चुका है कि वे चाहें जो करें, सत्ता में तो उन्हें आना ही है… देखते हैं यूपी की जनता क्या तय करती है… लेकिन फिलहाल तो अपन का यही कहना है कि भई, अखिलेश के चेहरे मोहरे पर मत जाओ… यह रीढ़विहीन युवा न कोई कड़ा फैसला ले सकता है और न ही दागियों-भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक्शन कर सकता है. यह शिशु सीएम सिर्फ अच्छी अच्छी बकलोली कर सकता है जिस पर उसके चमचे वाह वाह भर कर कह लिख बोल सकते हैं… ऐसा कोई भी नहीं जो अखिलेश यादव को बता सके कि वह एक ऐतिहासिक मौका खो चुके हैं… वह चाहते तो उत्तर प्रदेश को भ्रष्टाचारियों से मुक्त कर खुद को जबरदस्त लोकप्रिय नेता बना सकते थे लेकिन अखिलेश की हालत यूं हो गई है कि न खुदा मिला न बिसाले सनम.

भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

यूपी में जंगलराज की दर्जनों कहानियां पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : अखिलेश राज कुछ और नहीं, बस एक भयंकर जंगला राज का उन्नत नाम…

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पहली विदेश यात्रा (3) : एआई वन में बतियाने-गपियाने और तुलसी-रजनीगंधा चबाने के दौर ने वेनेजुएला पर बड़ा ज्ञान दे दिया!

ये तस्वीर एआई-वन की है. बहुत लंबी इस अंतरराष्ट्रीय उड़ान के दौरान जहाज में समय काटने के लिए खाने-पीने-सोने के बाद भी भारी समय बचता. ऐसे में दिमाग को तसल्लीबख्श खुराक देकर दुरुस्त रखने के लिए और समय से परे हो जाने के लिए सबसे सही काम हुआ करता राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बात करना, बहस सुनना, हर किसी के पेश किए गए विचार को समझना. इस बहस-विमर्श बतियाने गपियाने समझने-समझाने हंसने हंसाने के दौर में पता ही नहीं चलता कब घंटों बीत गए.

इस पूरे बौद्धिक सत्र का बड़ी शिद्दत से संचालन / संयोजन करते कराते थे राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ Gurdeep Singh Sappal जी. वो जब भी मीडिया डेलीगेशन टीम के सदस्यों वाले जहाज के कूपे में आते तो हर एक से हलो हॉय के बाद जहां कहीं दो-चार लोगों में विचार-विमर्श होता दिखता तो उसमें शामिल हो जाते. उनको सुनकर लगता कि इस शख्स के विचार कितने सुस्पष्ट, उदात्त और जनपक्षधर हैं.

आने-जाने के दौरान कम से कम आधा दर्जन बार गंभीर बातचीत कई मुद्दों पर हुई. राज्यसभा टीवी के भाई Shyam Sunder पूरी बातचीत बहस में अपने निजी नजरिए को पूरी गंभीरता और विस्तार के साथ रखते और हम लोगों की जिन बातों से राजी न होते उस पर अपनी असहमति दर्ज कराते हुए ढेर सारे तर्क, तथ्य,  सैद्धांतिक समझ और व्यावहरिक अनुभवों को पेश करते. सब कुछ को सुन कर सप्पल साब एक नतीजापरक / कानक्लुडिंग नजरिया पेश करते जिसमें वे कोशिश करते सबके सवालों और संदेहों का  उत्तर समाहित हो. वेनेजुएला के साथ अमेरिकी गुंडई हो या भारत में राजनीतिक आंदोलनों का अंजाम, बताने-समझाने के लिए सप्पल साब के पास तर्क और तथ्य का भंडार होता, और, सबसे अलग किस्म का एक नया पर्सपेक्टिव भी.

इसी तरह ट्रिब्यून के संदीप दीक्षित जी समेत कई अन्य पत्रकार साथी इन बहसों में शिरकत कर देश, काल, समय समेत अनेक अनोखें प्ररकणों / मामलों पर अदभुत जानकारियां देते. ऐसे ही विमर्श बतकही के एक मौके पर जब पीटीआई के फोटोग्राफर शैलेंद्र भोजक जी विचार विमर्श में तल्लीन हम लोगों की चुपके से तस्वीर बनाने में मशगूल थे तो हम लोग उनके मुख-कैमरा मुद्रा देख तुरंत पोज देने वाली स्टाइल में व्यवस्थित हो डटे… कुछ इस अंदाज में- ” लो भाई खींचो, जितना मन हो उतना खींचो!” 🙂

मैं निजी तौर पर वेनेजुएला को समझना चाह रहा था जिसके बारे में इंटरनेट पर नकारात्मक खबरों की बाढ़ है. एक क्रांतिकारी रहे देश में आंतरिक हालात कितने बिगड़ चुके हैं, इंटरनेट पर फैली पसरी ढेर सारी खबरें यही बताती रहीं. वेनेजुएला को लेकर अमेरिका और अमेरिकन मीडिया का जो रुख है, उसके पीछे बड़ा खेल तेल का है. वेनेजुएला ने अपने समाजवादी / कम्युनिस्ट स्वभाव के कारण हमेशा साम्राज्यवादी अमेरिका को दुत्कारा और कम्युनिस्ट चीन से याराना रखा. तेल निकालने समेत ढेर सारा कार्य व्यापार वेनेजुएला ने चीन को सौंप रखा है. इसका नतीजा ये हुआ कि बौखलाए अमेरिका ने वेनेजुएला पर कई बहानों से तरह-तरह की पाबंदी लगा दी.

वेनेजुएला ने अपनी आय का ज्यादातर हिस्सा देश के सोशल सेक्टर पर खर्च किया. हेल्थ, एजुकेशन, हाउस या यूं कहिए रोटी कपड़ा मकान सब फ्री में सभी को दे रखा है. यही वजह है कि वहां साक्षरता सौ प्रतिशत है. हर एक के पास कंप्यूटर है. सबके रहने के लिए घर है. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों, अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा फैलाई गई नकारात्मक खबरों से टूरिस्टों का आना बंद हो जाने, तेल का दाम लगातार गिरने और आम जन को राज्य पर पूरी तरह डिपेंडेंट कर देने जैसे कई कारणों से धीरे धीरे अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई. तेल के गिरे दामों ने आग में घी का काम किया जिससे वेनेजुएला की लोकल मुद्रा बोलिवर का पतन भयंकर रूप से हुआ. हालत यह है कि अमेरिका का एक डालर अब एक हजार बोलिवर के बराबर है.

अमेरिकन मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों के लगातार नकारात्मक कवरेज के कारण आय के दूसरे सबसे बड़े साधन टूरिज्म का वेनेजुएला से खत्मा हो गया. शासन-सत्ता से ही सब कुछ मिलते जाने के कारण पनपे संतुष्टि भाव ने जनता को समानांतर कार्य व्यापार खेती उद्यम विकसित न करने दिया. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने यहां की जनता को दुनिया की हलचलों से जोड़ा और सबके मन में आकांक्षाओं-उम्मीदों-लालसओं-रंगीनियों-सपनों के पर लगा दिए. अमेरिका और सीआईए ने तीन काम बहुत मजबूती से किया. अर्थव्यवस्था कमजोर किया, विपक्ष को मैनेज किया और दुष्प्रचार किया. कमजोर होती अर्थव्यवस्था से जूझ रह वेनेजुएला में एक ऐसा अमेरिका संरक्षित विपक्ष तैयार हुआ, पनपा जो जनता को भड़काते हुए सारी दुर्गति के लिए वहां के समाजवादी / कम्युनिस्ट शासन को जिम्मेदार ठहराने लगा. अमेरिकी प्रतिबंधों से पीड़ित और गिरती अर्थव्यवस्था से कई किस्म के अभाव झेलती जनता ने यथास्थितिवाद के खिलाफ बदलाव के विपक्षी नारे पर भरोसा करना शुरू कर दिया है.

आने वाले दिनों में अगर वेनेजुएला में अमेरिका संरक्षित डमी सरकार सत्ता में आ जाए और तेल के सारे कारखाने खदान आदि चीन से लेकर अमेरिका के हवाले कर दिया जाए तो कोई बड़ी घटना मत मानिएगा. तब अमेरिका प्रतिबंध हटा लेगा और दुनिया भर के टूरिस्टों को वेनेजुएला जाने के लिए प्रोत्साहित करेगा जिससे वहां फौरी तौर पर चमक दमक तो दिखाई देने लगेगा लेकिन दीर्घकालीन रूप से होगा यह कि जनता की सारी जिम्मेदारियां जो अभी राज्य के कंधे पर है, धीरे धीरे बाजार के हवाले हो जाएगी और एक ऐसा वक्त आएगा, भारत की तरह, वहां कारपोरेट का राज होगा, नौजवान लोग दस बीस हजार की अस्थाई नौकरियां इन्हीं कारपोरेट में करेंगे और हेल्थ-एजुकेशन जैसे बेहद महंगे काम के लिए खेत-मकान बेचेंगे या खुद को गिरवी रख कंगाल हो जाएंगे.

मेरे खयाल से वेनेजुएला और भारत की शासन व्यवस्था दोनों ही दो अतियों पर हैं. अगर इनके बीच का कोई रास्ता निकाला जा सके, जिसमें एक तो मूल में समाजवादी राज्य व्यवस्था हो जो स्वास्थ्य शिक्षा मकान तकनीकी जैसे जरूरी काम को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए हर नागरिक को इसे मुहैया कराए और इन क्षेत्र से निजी कंपनियों / कारपोरेट्स को खदेड़ दे, साथ ही इसके समानांतर छोटे छोटे उद्यम व्यापार खेती आदि को प्रमोट कर ग्रासरूट लेवल पर लाभप्रद मार्केट रिलेटेड माडल डेवलप कराए तो एक शानदार शासन सिस्टम बनाया खड़ा किया जा सकता है.

एक बहुत शानदार बात तो मैं बताना भूल ही गया. वेनेजुएला में महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं है. वहां की महिलाएं वैसे ही रहती पहनती हैं जैसे मर्द. हम जैसे लोग जो सामंती कुंठित किस्म के उत्तर भारतीय परिवेश से आते हैं, वेनेजुएला की महिलाओं को देखकर लगभग चौंक पड़ते हैं कि क्या कोई देश ऐसा भी है जहां महिलाएं इतनी आजादी रखती हों और पुरुषों के मन में एक परसेंट भी महिलाओं के दोयम होने टाइप का भाव न हो. वेनेजुएला की राज्य व्यवस्था ने वहां के लोगों को अदभुत किस्म की चीजें दी हैं जो हम लोग अपने कारपोरेट्स-पूंजीवादियों के शासन पद्धित में कभी नहीं हासिल कर पाते.

असल में कारपोरेट्स-पूंजीवाद बस वहीं तक सुधार कार्यक्रम चलवाता है जहां तक उसके धंधे के बेरोकटोक चलने में दिक्कत होती है. उसका कनसर्न समाज और जनता से नहीं रहता. उसका लक्ष्य पूंजी होता है, अधिक से अधिकतम पूंजी इकट्ठे करते रहना. इस चक्कर में वह जनता को बाजार के हवाले किए रहता है और बाजार बड़ी क्रूरता से जनता को चूसते हुए उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से विकलांग बनाता रहता है.

वेनेजुएला गए बगैर आप असली समाजवादी / कम्युनिस्ट शासन को नहीं समझ सकते. अच्छी शासन व्यवस्थाओं की दिक्कत यह है कि वह लगातार साम्राज्यवाद और पूंजीवाद को चैलेंज करते रहते हैं और यह साम्राज्यवाद / पूंजीवाद / कारपोरेट्स की मजबूरी है कि वह लगातार अपने पूरे तंत्र के जरिए झूठ को सच में तब्दील कर जन मानस को भड़काते रहते हैं ताकि उन्हें मुनाफा पीटने के लिए ज्यादा से ज्यादा और नए से नया बाजार मिलता रहे. वेनेजुएला को बाजार और यहां की जनता को कीड़े-मकोड़े में तब्दील करने के लिए अमेरिका समेत सारे यूरोपीय यूनियन वाले देश जी जान से लगे हैं. इसी के तहत यूरोपीय मीडिया लगातार ऐसी खबरें छापता बताता रहता है जिससे वेनेजुएला और वहां के शासन की एक खौफनाक तस्वीर सामने आती है.

हां, ये सच है कि वेनेजुएला की राजधानी कराकस समेत कई शहरों में अभावों के कारण अराजक घटनाएं होने लगी हैं, संगठित अपराधी गिरोह सर उठाने लगे हैं और किसी का भी लुट जाना, पिट जाना आम बात हो गई है. पर यह भी सच है कि ऐसी हालत पैदा करने के लिए बहुत हद तक अमेरिकी पाबंदी जिम्मेदार है जिसने वेनेजुएला की नाकेबंदी कर रखी है. कुछ हद तक वेनेजुएला की शासन पद्धित भी जिम्मेदार है जिसने लोगों को परजीवी बना दिया है, वे हर चीज के लिए सरकार पर निर्भर हो गए हैं जिसके कारण वे ब्रेड के लिए लंबी लंबी लाइन लगाने के लिए तो तैयार रहते हैं पर खुद कुछ कर के पैदा करने से बचना चाहते हैं. समाजवादी / कम्युनिस्ट व्यवस्था में कैसे लोगों को खुद काम कर अर्जित करने के लिए मोटीवेट किया जाए, इसके लिए चीन का माडल देखा समझा जा सकता है. वेनेजुएला यह नहीं कर पाया जिसके कारण वहां की जनता के लिए शासन बोझ हो गया है और शासन के लिए जनता बोझ की तरह दिख रही है. आवश्यक सामान-चीजों की ब्लैक मार्केटिंग हद से बढ़ गई है. जीवन के लिए जरूरी चीजें बाजार से गायब हो गई हैं.

वेनेजुएला अब जिस तरफ चल पड़ा है उसमें अब वहां कम्युनिस्ट / समाजवादी शासन ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है और दुखद यह है कि कोई देश वेनेजुएला की मदद करने के लिए तैयार नहीं है. अकेला चीन वेनेजुएला का बोझ अपने सिर नहीं उठा सकता. वैसे भी चीन ने दूसरे देशों में समाजवादी राज कायम रखने के लिए हथियार से लेकर पैसा देने वाली सोवियत संघ की नीति को शुरू से ही नहीं अपनाया है. तो कह सकते हैं कि वेनेजुएला को लेकर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन की नीति कामयाब होने की ओर है. चमत्कारी नेता ह्यूगो शावेज का न होना भी बड़ा संकट है जो अपने जोश और विजन से पूरे वेनेजुएला को जवान बनाए रहते थे और कुछ भी कर गुजरने के लिए प्रेरित करना का जज्बा लिए रहते थे.

आने जाने के दौरान जहाज पर सप्पल साहब के नेतृत्व में हुई बहसों और मौके पर जाकर वहां के स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद वेनेजुएला को लेकर एक ठीकठाक समझ अपन के दिमाग में डेवलप हुई. मैं खुद भी कम्युनिस्ट शासन से संबंधित बहुत सारी बातों से सहमत नहीं लेकिन वेनेजुएला जाकर बिलकुल सामने से देखा कि कैसे एक राज्य अपनी जनता की हर जिम्मेदारी खुद उठाता है और मनुष्य को पूरी तरह से आजाद छोड़ देता है. लेकिन हम मनुष्यों के दिमाग बड़े अजीब होते हैं. जो हमें मिल जाता है, वह मूल्यहीन हो जाता है और जो न मिला होता है, वह अमूल्य दिखता है. मानव मन के इस कांट्रास्ट को समझेंगे तभी जान पाएंगे कि क्यों कम्युनिस्ट शासन वाले देशों की जनता लालसाओं-इच्छाओं की जुगुप्सा से भरपूर उत्तेजित होकर यदा-कदा पूंजीवादी मॉडल के खुले बाजार वाली शासन पद्धति की ओर उन्मुख देशों के मनुष्यों जैसा बनना चाहती है और क्यों पूंजीवादी देशों की भरपूर आजाद कही जाने वाली जनता कम्युनिस्ट / समाजवादी शासन पद्धति वाले देशों की माफिक सोशल सेक्टर (हेल्थ, एजुकेशन, मकान आदि) की जिम्मेदारी अपने सरकारों के कंधे पर डालने के लिए आंदोलित होती है.

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सप्पल सोशल मीडिया की तरफ इशारा करके कहते हैं कि इसने एक अजीब दौर शुरू कर दिया है जिसमें दिमागी रूप से बौने किस्म के लोग एकजुट होकर अपनी झूठी और सतही राय को समूह में सच की तरह पेश कर वायरल करते हैं और खुद के जैसे झूठे-सतही नेता को सबसे सच्चा नेता बताते हैं. यही कारण है कि दुनिया भर में झूठे-मक्कार और आक्रामक किस्म के विचार विहीन नेताओं की फौज पैदा हो रही है जो सत्ता में आने पर अंतत: जनता के खिलाफ और कारपोरेट्स के पक्ष में काम करते हैं. ऐसे ही नेता अगर धरती को किसी नए किस्म के युद्ध में झोंक दें और पूरी धरती से जीवन तबाह करने की ओर अग्रसर हो जाएं तो कोई बड़ी परिघटना न होगी.

सप्पल साब आगे बताते हैं- अमेरिका में एक नेता आक्रामक तरीके से यह कहते हुए चुनाव लड़ रहा है कि अमेरिका की खोई ताकत वह वापस करेगा, अमेरिका बहुत बर्बाद देश हो गया है, यह महाशक्ति जैसा नहीं रहा… सोचिए जरा, सबसे ताकतवर देश अमेरिका को यह नेता जीतकर किस तरह ताकतवर देश साबित करेगा? दूसरे देशों पर बेवजह हमला करके? दूसरे देशों पर कब्जा करके? दूसरे देशों को बात बात में सबक सिखा के? और, जब यह सब वह करेगा तो उसके इस कृत्य से दुनिया किस तरफ जाएगी? लेकिन मजेदार बात है कि अमेरिका के लोग इस बड़बोले नेता पर यकीन कर रहे हैं और उसे हीरो मानकर उसे जिताने में लगे हैं. यह फेनोमिना पूरी दुनिया में दिखेगा आपको. भारत हो या अमेरिका या वेनेजुएला… हर जगह सोशल मीडिया ने बिलकुल नए किस्म के नेतृत्व गढ़े हैं जो जन हित के लिहाज से खतरनाक हैं. आज के दौर में सच और झूठ में फर्क करना बेहद मुश्किल हो गया है. झूठ को सच की तरह पेश किया जाता है और सच पर सौ सवाल उठाकर उसे झूठा साबित कर दिया जाता है. ऐसे में किसी को जानना समझना हो तो दूसरों की राय पर जाने की बजाय खुद की खुली आखों और खुद के खुले दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जमीनी स्तर पर उतरना पड़ेगा, मौके पर जाना पड़ेगा, तब जाकर एक सही नजरिया कायम कर सकेंगे हम लोग. लेकिन आज के फटाफट वाले दौर में इतनी जहमत कौन उठाना चाहेगा. वेनेजुएला भी आने वाले दिनों में ऐसे ही एक सतही किस्म के नेतृत्व के हवाले हो सकता है जिसकी परिणति शासन सत्ता से जनपक्षधरता का खात्मा होगा. इसमें अमेरिका तो लगा ही हुआ है, सोशल मीडिया के जरिए वेनेजुएला की जनता भी एकजुट होकर बदलाव के संबंध में दिखाए जा रहे सपने को जरूरी मानने लगी है.

खैर, अब बात करते हैं दूसरी तस्वीर की.

ये दूसरी तस्वीर ईटीवी बिहार के एडिटर Kumar Prabodh के साथ वेनेजुएला के होटल में स्थित भारतीय मीडिया सेंटर की है. प्रबोध भाई से मेरा याराना सबसे ज्यादा रहा क्योंकि हम दोनों बिहार यूपी की माटी के खांटी देसज स्वभाव वाले पत्रकार थे, सो, अक्सर आंखों ही आंखों में कूट भाषा में बहुत कुछ कह बतिया लिया करते थे. रजनीगंधा-तुलसी का याराना कितना तगड़ा होता है, इसे वही समझ सकता है जो इसका शौकीन हो. ज्यादातर सिगरेट वाले थे लेकिन प्रबोध भाई और शैलेंद्र भोजक भाई ने रजनीगंधा-तुलसी की कमी पूरी यात्रा के दौरान न अखरने दी. आखिर जहाज में चढ़ने का क्या फायदा जब हम जैसे यूपी बिहार के भइये पत्रकार खैनी गुटखा ही न खा पाएं, वो भी 21 घंटे की अंतरराष्ट्रीय उड़ान में. 🙂

जितना मजे से वक्त बहसियाने-गपियाने से कटा, उतने ही प्यार से प्रसन्न रखा रजनीगंधा-तुलसी के चबाने ने. जब मुंह बंद करने का मन होता तो कुमार प्रबोध भाई या शैलेद्र भोजक जी को इशारा करता और हां हां ना ना करते करते तुलसी रजनीगंधा दोनों में से कोई न कोई उपलब्ध करा ही देता. मेरी तरह कुमार प्रबोध और शैलेंद्र भोजक भी उपराष्ट्रपति के साथ और एआई वन में पहली बार उड़ रहे थे. लौटानी को तो स्थिति ये हुई कि तुलसी कुमार प्रबोध के पास बची रह गई और रजनीगंधा का स्टाक सिफ शैलेंद्र भोजक के पास. तब एक दूसरे से अनजान इन दोनों के बीच संवाद / पुल / लेन-देन का काम करते हुए बंदरोचित न्याय मैं करने में जुटा रहता. इनसे तुलसी लेकर उनको देता और उनसे रजनीगंधा लेकर इनको थमाता. इस प्रक्रिया के दौरान बीच में डंडी मार कर थोड़ा-थोड़ा खुद के मुंह में फेंकता रहता. इस तरह दोनों को ये मलाल न होता कि कोई घुसपैठिया उनके निजी स्टाक को लगातार शेयर करते हुए अवांछित रूप से कम कर रहा है. 🙂

कह सकता हूं कि जहाज पर गपियाने-बतियाने और बीच बीच में तुलसी-रजनीगंधा चबाने ने कम से कम वेनेजुएल के बारे में बड़ा ज्ञान दे दिया. कई साथी सिगरेट पीते थे सो बीच बीच में निकल जाते और धुआं फूंक मार कर बहस में नई उर्जा से शामिल हो जाते. 

शुक्रिया शैलेंद्र भोजक भाई, इतनी प्यारी तस्वीर खींचने और फिर मेल पर भेजने के लिए. आपकी तस्वीरों ने बहुत सारी बहसों बातों यादों को ताजा कर दिया, और देखिए न, लिखते लिखते कितना कुछ लिख गया. फिर से प्यार और आभार. 

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com या ह्वाट्सअप नंबर +91 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.


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कहां हो बीईए वाले एनके सिंह? देखो न, तुम्हारे न्यूज चैनल गंध फैलाए हैं!

कहां हो एनके सिंह… बीईए यानि ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के नेता… सकारात्मक सोच रखने वाले पत्रकार… कहां हो गुरु… देखो न तुम्हारे महान न्यूज चैनल किस ‘रचनात्मक’ खेल में बिजी हैं… क्या गंध फैलाए हैं.. हम कहेंगे लिखेंगे तो कहोगे कि आठ साल से झेल रहे हो भड़ास को… नकारात्मक भड़ास को झेल रहे हो… भाई, अपने चिरकुट चैनल वालों को समझा लो कि वो देश में नकारात्मक माहौल न फैलाएं… ये साले तुम्हारे चैनल वाले असल में रीयल प्रेस्टीट्यूट्स हैं… उन्हें न देश की चिंता और न समाज की… उन्हें तो टीआरपी चाहिए… उन्हें तो बिजनेस देखना है… और, गुरु, बुरा न मानना तुम इन रीयल प्रेस्टीट्यूट्स के नेता हो… पूछना पड़ेगा कि तुम्हें कितना देते हैं ये सब ताकि उनका प्रवक्ता बन उनकी रक्षा के लिए हर जगह हर समय नए नए तर्क खोजते रहो…

मैं नहीं कहना चाहता था तुमसे कुछ… लेकिन तुम्हारे चरम पतन ने मुंह खोलने पर मजबूर कर दिया है… सच में, तुम कारपोरेट और बाजारू मीडिया के असल प्रवक्ता हो… यही कारण है कि तुम्हारे अलावा कोई कारपोरेट और बाजारू मीडिया का संपादक सामने नहीं आता क्योंकि उसके पास बोलने, सफाई देने के लिए कुछ होता नहीं… वह तुम्हीं को सबकी तरफ से आगे कर देता है और तुम हो कि उनकी रक्षा में अपने सारे करियर, अपने सारे सरोकार और अपनी सारी सोच को दांव पर लगा देते हो… हम जब इस पर कुछ सवाल उठाते हो तो कहते हो कि हम लोग बड़े उद्दंड हैं… हम लोग बड़े नकारात्मक हैं… हम लोग विध्वसंक हैं… देख लो, विध्वंस कौन फैला रहा है… तुम्हारे चैनल वाले या हम लोग…

हम लोग तो तुम्हारे बेहया वेश्या चैनल वालों की कालर पकड़ कर बस औकात में रहने के लिए कह रहे हैं… और तुम हो कि हम लोगों की ऐसी बातों कामों से घबरा कर हमें ही सुधारने की बात करने लगते हो…. पहले अपने दल्ले और बिकाऊ न्यूज चैनल वालों को समझाओ, उनको पत्रकारिता सिखाओ, उनके मीडिया संस्थानों व स्कूलों में काम करने वाले, पढ़ने वाले बच्चों को पत्रकारिता का ककहरा सिखाओ, फिर आना बताना पढ़ाना हम लोगों को असल पत्रकारिता और सकारात्मक पत्रकारिता का पाठ… एनके सिंह जी, एक प्रेस रिलीज तो जारी कर दो, एक एडवाइजरी तो जारी कर दो चैनलों के लिए… कि युद्ध के पहले वे लोग युद्ध न कराएं…. फर्जी खबरों और घटिया ब्रेकिंग न्यूज से देशवासियों को न बहकाएं….

एनके सिंह जी… जब कहिएगा, आमने सामने आपसे बहस के लिए तैयार हूं… अगर आपको कारपोरेट और करप्ट मुख्य धारा की मीडिया का प्रवक्ता साबित कर दिया तो आप पत्रकारिता से संन्यास ले लेना और आप अगर हमें नकारात्मक सोच रखने वाला पत्रकार साबित कर दें मैं भड़ास बंद कर दूंगा… लेकिन यह बहस उसी कांस्टीट्यूशन क्लब में होगी जिसमें आपने अपने न्यूज चैनल वालों का बचाव कर उन पर सवाल उठाने वालों को नकारात्मक सोच रखने वाला करार दिया था.. उस बहस में देश भर के लोगों को बुलाया जाएगा… एनके सिंह साहब…. अब दौर लिहाज करने का नहीं रह गया है… देश और समाज के हालात ऐसे हैं कि सच को सच कहने के लिए अगर कुछ लोगों से रिश्ते खराब भी करने को मजबूर होना पड़े तो हम खुशी खुशी यह काम कर लेंगे… उम्मीद है आपका जवाब आएगा…

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ये लिंक एनके सिंह को पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिए कि उनके प्यारे दुलारे बेचारे न्यूज चैनल आजकल कौन-सा गेम खेल खिला रहे हैं….

https://www.bhadas4media.com/tv/10782-yuddh-se-pahle-yuddh

https://www.bhadas4media.com/tv/10779-hamid-meer

https://www.bhadas4media.com/web-cinema/10778-the-quint-ki-jhoothi-khabar

https://www.bhadas4media.com/tv/10777-milind-ki-khabar

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ये लिंक है एनके सिंह को लेकर जिन्होंने मीडिया पर सवाल उठाने वालों को नकारात्मकता से भरा बताया था…

https://www.bhadas4media.com/article-comment/10725-bhadas-aayojan

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आभार

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया ( संपर्क : +91 9999330099  Yashwant@bhadas4media.com )


फेसबुक पर डाले गए उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vivek Dutt Mathuria : भाई यही मैं भी सोच रहा था…. आखिर गीता सुनाई दी… जिसकी इस वक्त सख्त जरूरत है….. चैनल वाले बौराए हुए हैं….. हम कॉस्टीट्यूशन क्लब में यह बात समझ लिए कि एनके सिंह कॉरपोरेट मीडिया के पैरोकार हैं…. यही नहीं, एनके सिंह मीडिया में कालेधन के भी पैरोकार हैं।

Ashok Anurag : देश हित में रिश्तें जाये भांड़ में, इन गधो ने युद्ध और उसकी विभीषिका का दंश नहीं झेला है, छावनी में पला बढ़ा हूँ इसलिए जानता हूँ, तो महान चैनल के महान कर्ता धर्ता युद्ध टलती रहे तो बेहतर है..

Saurabh Rajput : बहुत अच्छा धो डाला, मीडिया के किसी भी सही (सही करते नहीं) या गलत कामों का पक्ष रखने के लिए आगे आते हैं, वो भी बहुत ही अतार्किक और तथ्यों से पर रहते हैं

Pawan Lalchand : दम है बॉस…दम! सकारात्मक पत्रकारिता की चदरिया के भीतर के नकारात्मक गंध को सड़ांध को चिंदी चिंदी उधेड़ कर रख दिया है आपने….तभी तो अपन कहते हैं गुरु आदमी हैं Yashwant Singh जय हो भड़ासानंद.

Dinesh Singh Rawat : Dear Yashwant Singh Live life as nature has made you, and if you will try to change then you will be nobody. Well done and carry on.

Hero Dubey : आपकी दाद देनी पड़ेगी सर ! इन चैनलों ने तो देश का बेड़ा ही गर्क कर दिया। पाकिस्तान की मीडिया कम से कम अपने देश को तो अच्छा दिखाती है। वहीं भारतीय मीडिया के कई चैनल उड़ी हमले को ही फर्जी बताने में लगे हुए हैं।

Mamta Yadav : उनकी एक परेशानी यह भी है कि हम लोग चोर को चोर क्यों कहते हैं?उस पीढ़ी के बोये बीज आज असल पत्रकारों की राह के सबसे बड़े कान्टे हैं करें चैनल्स वाले और भुगते सब वेब मीडिया तो खैर है ही खराब लेकिन हम सच लिखते हैं इसलिये खराब है तो यही सही सच बोलना लिखना अगर गाली देना है तो हम बहुत बड़े गालीबाज हैं। फर्जी खबर चली 20 आतंकियो के मारने की वो किसके इशारे पर? क्यों नहीं कोई सीमा तय की जा रही इनकी?

Pankaj Kumar : भड़ास बाबा सबसे पहले इन चैनलवालों को बॉर्डर पर सबसे आगे रखना चाहिए । दुश्मन की गोली जब चले तो इनके पीछे लगे और मरे नहीं सिर्फ घायल हो। तब पता चलेगा कि स्टुडिओ और बोर्डर में कितना फर्क है।  ये जो रोजाना शाम को चैनल पर भारत-पाकिस्तान की पंचायती करते है और देशवासियो के भावनाओं के साथ खेल रहे है।  अब तो रही सही कसर हमारे प्रिंट मीडिया वाले साथी पूरा कर दे रहे है। क्या झुठ बोलने का ठेका खोल रखा है। न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पेपर खबर की जगह सास बहू और फ़िल्मी मेलोड्रामा ज्यादा दिखता है।  जय हो।।

Divakar Singh : ज़ोरदार लिखा यशवंत भैया। वैसे एक बात है। क्विंट वालों ने यदि झूठी खबर फैलायी है तो क्या उनको इसके लिए जेल में डालने में सरकार को देर लगेगी? यदि उनकी पत्रकारिता झूठी है तो ये सबसे बड़ा केस बनेगा देश द्रोह का। कन्हैया कुमार से कहीं ज्यादा संगीन मामला। पर सरकार ने क्विंट पर कोई एक्शन नहीं लिया। वैसे आज नहीं तो कल शायद क्विंट को अपनी खबर वापस लेनी ही पड़ेगी। सच हो या झूठ, दोनों ही स्थितियों में ये खबर अपने आप में राष्ट्र सुरक्षा के लिए घातक है।

Arun Srivastava : आज पहली बार मेरे पेट में हो रही मरोड़ अपने साथियों के विचार पढ़कर समाप्त हुई। मैं जबसे भड़ास के कार्यक्रम से वापस आया हूं तबसे एनके सिंह की कही बातें परेशान कर रहीं थीं। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा था कि ” क्या चाहते हैं एनके सिंह ” भड़ास को पोस्ट करूं या नहीं। लिख तो लिया था 11 की रात में बस अपनी भड़ास नहीं निकाल पा रहा था। यशवंत भाई ने और अन्य साथियों ने मुझे संबल प्रदान किया, सबके प्रति आभार।

Ashok Das : और आपने उन्हीं एन.के सिंह से सरोकारी पत्रकारिता वाला अवार्ड दिलवा दिया भईया। 🙁 खैर यह पोस्ट लिखकर अच्छा किया आपने। मुझे भी उसी दिन से खटक रहा था। उन्होंने कहा कि हमारी हैसियत घर चलाने की नहीं है, वही सेठ हमें तनखा देते हैं। नहीं एन.के सिंह जी हमारी हैसियत घर चलाने की है। बिना दलाली किए, बिना किसा गलत करने वाले की डफली बजाए। भड़ास ने यह कर दिखाया है और प्रेरणा लेकर हमलोग भी कर रहे हैं।

Vishwanath Chaturvedi : एनके सिंह न के अलावा इन दलालों के पास कोई है भी नही जो इनका कवच-कुण्डल बनकर सामने खड़ा पायें।ये दलाल है ओर इनका रच्छा कवच बन गये है सिंह साहेब

Anshuman Tripathi : भाई, टाइम्स नाऊ की फौज बलूचिस्तान तक, आजतक की फौज़ गिलगित तक पहुंच चुकी है, वही इंडिया टीवी इस्लामाबाद और एबीपी लाहौर तक बता रहे है लोग, आपके पास कोई अपडेट है क्या?

Ashok Mishra : टीवी चैनल वाकई बहुत गैरजिम्मेदार हो चुके हैं जनता को इन्हें देखना बंद करना चाहिए। यशवंतजी बहुत बधाई कम से कम आपने एनके् सिंह को ललकारा।

Pankaj Mishra : कुछ दिन बाद लडाई बार्डर पर नही होगी दिल्ली नोएडा के फिल्म सिटी से तोपे और गोले चलेगे… फेकू के कसीदे पढेगे

Ghanshyam Dubey : ये लोग पुराने घाघ हैं और घुटे हुए निर्लज्ज । यह हितोपदेश इन्हें छू भर जाये तो ये भांड चैनेल सड़ांध कम फैलाएंगे । आमीन।

Sunayan Chaturvedi : यशवंत भाई धन पशुओं के भोपुओं की जिस अंदाज़ में धुलाई की है उस अंदाज़ को सलाम.

Anil Jain : आपने जमीर जगाने का प्रयास किया है लेकिन मैं दावे से कहता हूं कि नहीं जागेगा। सोया हुआ जमीर तो जाग सकता है जो जमीर मर चुका हो वह कैसे जागेगा? बहरहाल आपकी कोशिश को सलाम।

Arun Khare : किनसे कह रहे हो यशवंत भाई। “अंधों के आगे रोना अपना दीदा खोना” वाली कहावत होगी यह तो।

Vikash Rishi : उस दिन बुरा तो बहुतो को लगा था मगर शायद कोई माहौल का स्वाद नहीं बिगाड़ना चाहता था।

Anand Gkp : इसको कहते हैं यशवंतजी स्टाइल। बहुत बेहतर। फाड़ कर रख दिया।

Jawahar Goel : मीडिया के अंदर की बहस का समुंदर मंथन चलता रहना चाहिये । तभी तो देव और दानव, अमरीत और विष अलग साबित होगा।

Kumar Narendra Singh : N. K. Singh to dekhane se hi dalal lagata jai aur jab munh chuniya ke bolta hai to tarawa ka lahar kapar par chadh jata hai

Shyam Singh Rawat : यशवंत जी, आपकी इस पोस्ट ने अपने नाम–भड़ास4मीडिया को सार्थक कर दिया। एकदम बेलौस। हार्दिक बधाई।

Anil Singh : हां, एनके जैसे दोयम चेहरे वाले लोगों को इस तरह ही सम्मानित किया जाना चाहिए

Sharad Bajpai : Jai ho THAKUR JI KI, AAJ SACH ME JUTA MARA HAI…

Vinay G. David : अब तक छप्पन उड़ा दिया भड़ास ने, और कौन का न लागी

Santosh Singh : char botal bodka —drama tera roj ka

अहमद मतलूब : भइस के आगु बीन बजावे भईंस रहे पगुराई।

Affan Nomani अच्छा है भाई …..आईना दिखाते रहिए

Virendra Rai बराबर है बास

Pankaj Chaturvedi धो डाला यार

Kamal Kumar Singh सही नाप दिए

Nevil Clarke Very well written, congrats!!

A.P. Soni Akash : जय हो भड़ास बाबा

Vandana Mittal : बेबाक

Rajeev Ranjan Tiwari : जबरदस्त धुलाई.

Rajnikant Shukla : लगे रहो भाई बिन्दास…

Mahendra Singh : अब यही बचे थे सर

Ravindra Sharma : Good very good

आशीष सागर : सुन्दर और तीखा उत्तर

Dhyanendra Singh Chauhan : Jiyo dada jiyo ..

Vinay Dwivedi : श्री Nawal Kishore Singh जी, एक प्रेस रिलीज तो जारी कर दो, एक एडवाइजरी तो जारी कर दो चैनलों के लिए… कि युद्ध के पहले वे लोग युद्ध न कराएं…. फर्जी खबरों और घटिया ब्रेकिंग न्यूज से देशवासियों को न बहकाएं….

Prateek Chaudhary : इतना कटु सत्य बोला है आपने की इसको पचा नही पाएंगे एन के सिंह

संजय राय : देख लीजिए एन के सिंह जिनके साथ मेरी प्रोफाइल फोटो लगी का क्या बैंड बजाया यसवंत ने….. मैं सहमत हूँ….. फालतू का युद्ध करा रहे अपनी नाकामी दिखाने जो मोदी क्यों की कश्मीर शांत नहीं हुआ, राहुल की खाट सभा जोरो पे है, मुलायम का युद्ध शांत ही हो गया ये कारन भी हो सकते हैं

Hemant Jaiman : हौसले को प्रणाम करता हूँ। आज के दौर में जब कुछ न्यूज़ चैनलों, मीडिया संस्थानों ने चाटुकारिता की सारी हदें पार कर दी हैं। मीडिया इनके लिए देशवासियो की भावनाओं से खेलने का हथियार बन गया है। लेकिन इसके एकदम विपरीत बेबाक, बिंदास, कटु सत्य के साथ वास्तविकता का अहसास इस पोस्ट के माध्यम से करा दिया। जिस तरह से आलाकमान, मिडिया निगरानी कमेटी, बीईए (ब्रॉडकास्टर्स एडिटर्स एसोसिएशन) के नेता फर्जी खबरों, फर्जी न्यूज़ चैनलो पर पाबन्दी नहीं लगाकर देश की जनता के अरमानों और देशप्रेम की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे है। वही केंद्र सरकार के सूचना व् प्रसारण मंत्रालय के केबिनेट मंत्री वैंकया नायडू एवं मोदी सरकार के सबसे यश्यश्वी, तेजस्वी वर्तमान राज्य मंत्री कर्नल R S राठौड़ साहब के संपूर्ण देश में अवैध रूप से प्रसारित हो रहे “फर्जी न्यूज़ चैनलो” के खिलाफ आदेशो को ठेंगा दिखा कर जिला स्तरीय प्रशासन अपनी आँखे बंद करके बैठा है। आदेशो की खानापूर्ती की जा रही है। एक खास बात और है दिल्ली से आलाकमान 8 जुलाई 2016 को सख्त आदेश जारी करता है। लेकिन इन महत्वपूर्ण आदेशो की जिला स्तर पर खानापूर्ति कर दी जाती है। सब कुछ भ्रष्ट हो गया है। जो कहते है करते नहीं। देशवासियों को रिझाने के लिये आश्वासन, कागजी आदेश, और फर्जी कार्यवाही कर, फर्जियो के पक्ष में विधायक, नेता, अपने रुतबे का इस्तेमाल कर अनैतिक, अवैध न्यूज़ चैनलो, अवैधानिक, गैरकानूनी लोगोँ, संस्थाओं, को संरक्षण दे रहे है। ऐसे में लाजमी है भड़ास की भाषा में बात करने की।

Neeraj : मैने तो इनको जितनी जगहो पर सुना या देखा सिर्फ सरकार की ओर से फसल बीमा का प्रचार करते हुए पाया. आपके भी कार्यक्रम के दौरान वही अपनी ढपली अपना राग शुरू किये. पर यशवंत भाई आपका कार्यक्रम था नही तो वही हम फसल बीमा पर चर्चा ज़रूर किया होता उनसे….

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पहली विदेश यात्रा (2) : जब तक जहाज का दरवाजा बंद न हो जाए, बताना मत….

पार्ट वन से आगे…. भारत के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने जब मेल कर मुझे सूचित किया कि वेनेजुएला में होने वाले गुट निरपेक्ष सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे भारतीय उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी के साथ जाने वाले भारतीय मीडिया डेलीगेशन के लिए भड़ास4मीडिया डॉट कॉम की तरफ से एक पत्रकार को भेजा जाना है, इसके लिए भड़ास किसे नामित कर रहा है, उनका डिटेल वगैरह चाहिए, तो मैंने तत्काल रिप्लाई में अपना मोबाइल नंबर दे दिया और लिखा कि फोन करिए, बात करते हैं. थोड़ी ही देर में फोन आ भी गया.

वापसी के दौरान वीपीआई (वाइस प्रेसीडेंट आफ इंडिया) ने जब प्रेस कांफ्रेंस और सवाल-जवाब का सत्र खत्म किया तो इस यात्रा की याद के बतौर ग्रुप फोटो की परंपरा के तहत तस्वीरें खिंचवाई गईं. मीडिया डेलीगेट्स की संख्या बीस के करीब थी तो एक बार में सभी का ग्रुप फोटो संभव नहीं हो पा रहा था. ऐसे में दो किश्तों में क्लिक क्लिक हुआ. सबसे उपर वाली तस्वीर में इस संस्मरण के लेखक यशवंत सिंह भी दिख रहे हैं, वीपीआई के ठीक पीछे ह्वाइट शर्ट में. तस्वीरों को डिटेल में देखने के लिए आप तस्वीरों के उपर कर्सर मारें. वापसी के समय जहाज में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान वीपीआई ने क्या कहा, सवाल क्या पूछे गए, इस वीडियो लिंक पर क्लिक कर देख सुन सकते हैं : Youtube.com/FAJQIV5HoR8 वेनेजुएला से लौटते वक्त जहाज में पीसी


उनको मैंने कहा कि भइया, फिलहाल तो मेरा ही नाम लिख लो क्योंकि दो साल से पासपोर्ट बना रक्खा है, एक भी मुहर ठप्पा नहीं पड़ा है उस पर, कहीं वो सारे कागज कोरे ही न रह जाएं, इसलिए मैं खुद ही भड़ास4मीडिया की तरफ से जाने लायक सबसे उपयुक्त व्यक्ति हूं और खुद को इसके लिए अधिकृत करता हूं.

उन्हें यह भी बताया कि मैं कभी विदेश नहीं गया हूं और किशोर उम्र में जो तीन सपने देखे थे, उसमें तीसरा और आखिरी सपना यही था कि विदेश गए बगैर न मरूं. वो यह समझते हुए थोड़ा हंसे कि ये बंदा मजाक कर रहा है, फिर बोले- एक मेल भेज रहे हैं जिसमें जो जो जानकारी मांगी जा रही है आपके बारे में, उसे भरकर, अटैच करके भेज दीजिए. मैंने फौरन कहा- ‘यस सर, जय हिंद’.

इसके बाद मेल पर जानकारी लेने-देने, डाक्यूमेंट्स भर कर भेजने और वीजा के लिए दूतावास जाने आदि के लिए जो क्रम चला उसे थोड़े अतिरिक्त प्रेशर की तरह मैं झेलता रहा क्योंकि उन्हीं दिनों भड़ास के आठवें बर्थडे पर कांस्टीट्यूशन क्लब में होने वाले कार्यक्रम की तैयारियों और लोगों को निमंत्रित करने का काम जोरों पर जारी था. बताया गया कि वीजा जर्मनी का भी लेना है क्योंकि फ्लाइट तकनीकी कारणों से जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में आते-जाते लैंड करेगी, हो सकता है रुकना भी पड़े, इसलिए जर्मनी के वीजा की फार्मेल्टीज के लिए फलां टाइम पर जर्मनी दूतावास सभी लोग पहुंचिए.

दिल्ली में जर्मनी दूतवास पहुंचा तो इस टूर पर जा रहे दूसरे कई पत्रकार साथी भी मिले. वेनेजुएला के वीजा के लिए बस एक पन्ने का फार्म भर कर मिनिस्ट्री में जमा कर देना था, फिजिकल उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन जर्मनी का वीजा पाने के लिए जर्मन दूतावास में फिजिकल प्रजेंस के साथ साथ आंख, हाथ के दोनों पंजों और अंगूठों को कंप्यूटर के जरिए स्कैन कराना था, जिसे बायोमीट्रिक्स या बायोमैट्रिक्स कहा जाता है. यूरोपियन यूनियन के देशों में जाने के लिए वीजा की शर्तें काफी कठिन होती हैं. चूंकि हम लोग डिप्लोमेटिक विजिट पर जा रहे थे, इसलिए उन सब कठिन सवाल का सामना करने से बच गए जिससे आम तौर पर आम पर्यटकों को सामना करना होता है. हाथ के दोनों पंजों, अंगूठों और आंखों की स्कैनिंग के बाद हम लोगों को जर्मन दूतावास से छुट्टी मिल गई, हम लोगों के पासपोर्ट वहीं जमा हो गए. बाद में उसे विदेश मंत्रालय के लोगों ने इकट्ठा कर वेनेजुएला के वीजा के लिए वहां के दूतावास को दे दिया होगा.

भड़ास स्थापना दिवस का कार्यक्रम 11 सितंबर को बेहद सफलतापूर्वक बीत गया तो 12 सितंबर से वेनेजुएला जाने की तैयारियों में लग गया. हम लोगों को बंदोबस्त मीटिंग के लिए उड़ान भरने की पूर्व संध्या यानि 14 सितंबर की शाम पांच बजे दिल्ली के शास्त्री भवन में स्थित मिनिस्ट्री आफ एक्सटर्नल अफेयर्स के आफिस बुलाया गया. बंदोबस्त मीटिंग में सभी लोगों को वीजा, पासपोर्ट, सेक्युरिटी टैग, टिकट्स आदि दिए जाते हैं और विदेश मंत्रालय के वे अधिकारी जो मीडिया के दल को लीड करते हैं, वे यात्रा के बारे में ब्रीफ करते हैं. बंदोबस्त मीटिंग को लेकर जो मेल आई थी, उसमें जहां जहां रुकना था, वहां के तापमान और ड्रेस कोड का भी जिक्र था. यानि मौसम के हिसाब से कपड़े रखें और कुछ कपड़े आफिसियल भी रखें, यानि कोट सूट टाई आदि. टाई तो अपने कभी लगा न पाए. सूट शादी वाला रखा था. जाते वक्त जर्मनी के बर्लिन में रुकने और वहां तापमान कम होने की सूचना को देखते हुए एक जैकेट भी ले जाना उचित समझा. करने को ढेर सारे काम थे. 

भड़ास की खबरों मेल्स आदि से जूझते हुए मुझे बस इतना मौका मिला कि मैं अपने नहीं हो सके कई सारे काम दोस्तों में बांट दू. सो जिम्मेदारी दे दी दो मित्रों को. अपने बीएसएफ वाले भाई जनार्दन यादव को फोन किया कि मुझे एक चमड़े का काला जूता दस नंबर का, एक अमेरिकन टूरिस्टर ट्राली बैग, एक जैकेट अपने कैंटीन से खरीद कर रख लें और 15 सितंबर की दोपहर एक बजे से दो बजे के बीच पालम एयरफोर्स स्टेशन के गेट पर मिल कर मेरे हवाले कर दें. जनार्दन जी डन बोल खरीदारी में लग गए. कमल को फोन किया कि भाई साठ सत्तर हजार रुपये को अमेरिकन डालर में कनवर्ट कराने की व्यवस्था कराओ क्योंकि विदेश मंत्रालय के अफसरों ने बताया है कि हमें रहने और खाने के बिल खुद पे करने होंगे, सिर्फ आना जाना फ्री रहेगा, इसलिए डालर यहीं से ले जाना होगा.

मैंने शादी वाला सूट रख लिया. अन्य कपड़े डाल लिए. लैपटाप ले जाऊं या न ले जाऊं, इसको लेकर सोचता रहा. हालांकि विदेश मंत्रालय के लोगों ने साथ ले जाए जा रहे सामान की लिस्ट और लैपटाप कैमरे आदि के डिटेल मंगा लिए थे ताकि उसके विवरण संबंधित देशों और सुरक्षा एजेंसियों को एडवांस में दे सकें. फिर भी ये सोचता रहा कि लैपटाप की क्या जरूरत, वहां कोई भड़ास तो अपडेट करना नहीं है. जो थोड़ा बहुत काम होगा वह स्मार्टफोन से हो ही जाएगा. लेकिन मैं लैपटाप ले गया. लैपटाप रखने के लिए एक नया केबिन बैग भी जनार्दन जी से खरीदवाया. ये अलग बात है कि लैपटाप जी केबिन बैग में सोते गए और सोते ही लौटे, विदेश की हवा तक न लगी. यानि बैग से बाहर तक नहीं निकाला. भड़ास के मेल चेक करने और कुछ अन्य आनलाइन कामधाम वेनेजुएला के गुट निरपेक्ष सम्मेलन स्थल पर बने मीडिया सेंटर में लगे ढेर सारे कंप्यूटरों में से एक पर कब्जा जमाकर निपटाया. बाकी काम मोबाइल से होटल आदि जगहों के वाई फाई से कनेक्ट करके निपटाया.

मेरी यह पहली विदेश यात्रा थी, इसलिए कई विदेश पलट विशेषज्ञ मित्रों से फोन कर पूछा था कि क्या क्या तैयारी करनी चाहिए, क्या क्या ध्यान रखना चाहिए. खासकर कुछ उन पत्रकार मित्रों को भी फोन किया जो पीएम या राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के साथ विदेश जा चुके हैं. मैंने सबसे लास्ट में कहा कि भाई अभी किसी को बताना नहीं कि मैं उप राष्ट्रपति के साथ जा रहा हूं, जब 15 सितंबर की शाम पांच बजे जहाज का दरवाजा बंद हो जाए तब बताइएगा ताकि कोई मेरा शुभचिंतक टंगड़ी न मार पाए. सुनने वाले साथी लोग हंसने लगे कि कुछ भी सोचते बोलते रहते हो, लेकिन उन लोगों ने यह माना कि मामला संवेदनशील है और यह जानकारी पता चलते ही कि यशवंत उप राष्ट्रपति के साथ जाने वाले हैं, कई मीडिया हाउस और कई कई शत्रु किस्म के मित्र सक्रिय हो जाएंगे, इसलिए उन लोगों ने चुप्पी साधे रखी. लेकिन अपन की आदत है कि दूसरे लोग डेडलाइन का उल्लंघन करें न करें, अपन खुद ही पेट में भरी गैस बाहर निकालने के लिए समय से पहले ही अकुला व्याकुल होकर बक देते हैं. सो फेसबुक पर पंद्रह सितंबर की सुबह ‘ब्रेकिंग न्यूज’ लिख दिया. जनता ने पसंद किया. देखें स्क्रीनशॉट….

पंद्रह सितंबर की दोपहर जनार्दन भाई मय साजो सामान मिले. ट्राली बैग कुछ ज्यादा ही बड़ा खरीद लिया था जिसमें मैं खुद और मेरा सारा सामान पैक हो जाता तो भी नहीं भरने वाला था. सो, अपना ही बैग ले जाने का इरादा किया जो भले ही छोटा था लेकिन सारा सामान उसमें आ जा रहा था. जनार्दन भाई को अपना डेबिट कार्ड देकर एटीएम पिन नंबर बता दिया और बोल दिया कि जितना पैसा लगा है, इससे निकाल लीजिएगा, और अगर मैं विदेश में ही रह गया या उपर से बिलकुल उपर चला गया तो ये कार्ड और एटीएम पिन नंबर मेरे घरवालों को दे दीजिएगा.

यादव जी ठठाकर हंसे और कहे कि शुभ शुभ बोलिए, आप भी पक्के वाले पत्रकार हैं, नकारात्मक एंगल भी हमेशा सूंघते सोचते रहते हैं.

कमल भाई मनी एक्सचेंजर ले आए जो पचास हजार रुपये लेकर छह सात सौ डालर के करीब दे गया. इसमें से खर्चा केवल चार-पांच सौ डालर के बीच ही हुआ. तब भी मेरे जैसे गरीब पोर्टल वाले के लिए यह रकम काफी थी, क्योंकि जब खर्चा का हिसाब रुपय्या में लगाता तो पता चलता कि काफी खर्च हो गया, लेकिन जब डालर में खर्च जोड़ता तो लगता कि अभी तो कुछ खर्च ही नहीं हुआ है. कमल ने पालम एयरफोर्स स्टेशन गेट पर टैग वगैरह फिल करते वक्त मेरी तस्वीर कब ले ली, पता नहीं नहीं चला. बाद में उनने उस तस्वीर को कुछ यूं पोस्ट किया फेसबुक पर…

पालम एयरफोर्स स्टेशन पर एक अलग काउंटर बना दिया गया था, हम सभी मीडिया डेलीगेट्स के लिए. हर विभाग के लोग क्रम से बैठे मिले, सिक्योरिटी से लेकर एयर इंडिया तक वाले. सबने फटाफट मुहर ठप्पा ठोंककर एयर इंडिया वन की तरफ बढ़ा दिया. हम सभी पत्रकार जब सारी औपचारिकता कंप्लीट करके एयरपोर्ट के फाइनल गेट के साथ बने हॉल में पहुंचे तो वहां एक एक कर इंट्री कर रहे लोगों का एक सेक्युरिटी वाला वीडियो बनाता मिला.

मैं वीवीआईपी सिक्योरिटी के बारे में सोच रहा था. जाने कितने लेयर्स पर ये लोग तैयारी करते होंगे ताकि कहीं कुछ भी छूट न जाए. यानि हम जो जो जा रहे थे, उन सभी के चेहरे मोहरे का हाई रिजोल्यूशन वाला वीडियो तैयार हो चुका था. वीपीआई (वाइस प्रेसीडेंट आफ इंडिया) के आने के दो घंटे पहले ही हम लोगों को जहाज पर चढ़ने के लिए कह दिया गया. मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैं किशोर उम्र में देखे गए अपने तीसरे सपने को साकार करने पहली बार विदेश जा रहा हूं, वह भी उप राष्ट्रपति के मीडिया दल का सदस्य बनकर, वह भी देश-दुनिया के सबसे ताकतवर और एलीट जहाज एआई वन (एयर इंडिया वन) में सवार होकर….

….जारी….

यशवंत से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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वर्ष 2008 में यशवंत जब एक हजार सदस्यों वाले सबसे बड़े हिंदी कम्युनिटी ब्लाग भड़ास का संचालन करते थे तो किसी जहाज पर बैठने उड़ने का पहली बार एक मौका मिला था. इस यात्रा के ठीक पहले और ठीक बाद उनने जो लिखा, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं…

कल है मेरी पहली जहाज यात्रा

पहली जहाज यात्रा के अनुभव

जहाज दारू दिग्गज विमर्श

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‘नाम’ में भाग लेने के लिए उप रा‍ष्‍ट्रपति के साथ यशवंत वेनेज़ुएला वाया जर्मनी रवाना

वेनेज़ुएला में होने वाले 17वें गुट निपरेक्ष सम्‍मेलन (नाम) में भाग लेने के लिए उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी की अगुवाई में पत्रकारों का दल आज दिल्ली से शाम को रवाना हो गया. इस दल में भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशंवत सिंह भी शामिल हैं. यह दल नौ घंटे की उड़ान के बाद जर्मनी के बर्लिन पहुंचेगा, जहां से फिर सम्‍मेलन में भाग लेने के लिए अगले दिन वेनेज़ुएला के लिए रवाना हो जाएगा. अब तक इस सम्‍मलेन में देश के प्रधानमंत्री शामिल होते थे, लेकिन चौधरी चरण सिंह के बाद नरेंद्र मोदी दूसरे पीएम हैं, जो इस सम्‍मेलन में नहीं जा रहे हैं.

गुट निरपेक्ष सम्‍मेलन में उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी भारत का प्रतिनिधित्‍व करेंगे. उनके साथ अधिकारियों के साथ विभिन्‍न मीडिया संस्‍थानों से जुड़े 21 पत्रकारों का दल भी वेनेज़ुएला जा रहा है. इसमें भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह भी शामिल हैं. इस सम्‍मेलन में 120 विकासशील देश प्रतिनिधित्‍व करेंगे. सम्‍मेलन का समापन 18 सितंबर को होगा. गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को एक मंच पर लाने वाले वैश्विक नेताओं में पंडित नेहरू भी एक थे. इसलिए संस्थापक होने के नाते भारत के लिए ‘नाम’ सम्मेलन की अहमियत ज्यादा है.

वायु सेना के पालम हवाई अड्डे पर खड़े यशवंत

उपराष्‍ट्रपति के नेतृत्‍व में भारतीय दल पालम एयरपोर्ट से भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से गुरुवार की शाम साढ़े चार बजे रवाना हुआ. यह विमान आठ घंटे की उड़ान के बाद जर्मनी के बर्लिन में वहां के समयानुसार नौ बजे उतरेगा. पूरी टीम गुरुवार की रात बर्लिन में ही विश्राम करेगी. शुक्रवार 16 सितंबर को यह टीम साढ़े बारह बजे वेनेज़ुएला के लिए रवाना हो जाएगी. 18 सितंबर को यह दल वेनेज़ुएला से रवाना होकर 19 की रात में दिल्‍ली वापस आ जाएगा.

इस यात्रा के संदर्भ में भड़ास4मीडिया के एडिटर ने फेसबुक पर यह स्टेटस पोस्ट किया है : ”जीवन की पहली विदेश यात्रा. उपराष्ट्रपति संग. दिल्ली से बर्लिन. फिर बर्लिन से वेनेजुएला. आपके लिए क्या लाना है बता दीजिए. फिलहाल तो पांच दिन के लिए ‘हे प्यारे देशवासियों’, तुम्हें नमस्ते.”

विशेष विमान में यशवंत

बर्लिन पहुंचने के बाद यशवंत सिंह ने एफबी पर यह स्टेटस अपडेट किया…

Yashwant Singh : बाय इंडिया। अब 9 घंटे आसमान में। रात साढ़े नौ पर बर्लिन एयरपोर्ट। रात में ही घूमने का प्लान है। कल सुबह वेनेज़ुएला के लिए उड़ान। गुट निरपेक्ष आंदोलन (NAM) के शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी कर रहे हैं। कवरेज के लिए कई मीडिया हाउसेज की तरफ से 21 मीडिया कर्मी जा रहे। हम सभी पालम एयरफ़ोर्स स्टेशन पर एयर इंडिया के स्पेशल विमान में बैठ चुके हैं और टेकऑफ के लिए उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

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