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Ila Joshi : कल NDTV India पर Sushil Bahuguna की उत्तराखंड से पलायन पर रिपोर्ट देख रही थी और ये एक संयोग ही है कि पलायन की सबसे ज़्यादा मार झेलते दोनों ज़िले, पौड़ी और अल्मोड़ा, से मेरा सम्बन्ध है। एक माँ का घर और एक पिता का, कभी बचपन में छुट्टियों में गए थे अब तो वहां जाने का बहाना भी नहीं मिल पाता। मेरा एक सपना है कि अपना घर अगर कहीं बनाउंगी तो वो उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके में ही होगा, लेकिन अभी उस सपने को पूरा करने के लिए पैसे जोड़ने बाकी हैं. 

Anil Singh : फसलों को बरबाद करनेवाले सूअर आए कहां से! कल रात एनडीटीवी इंडिया पर प्राइमटाइम में उत्तराखंड से हो रहे पलायन पर सुशील बहुगुणा की शानदार रिपोर्ट देखी। इस रिपोर्ट ने बहुत से विचारणीय मुद्दे उठाए हैं। लेकिन जिस एक बात पर मुझे सबसे ज्यादा अचंभा हुआ, वो यह कि जंगली सूअर कैसे उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से लेकर उत्तर प्रदेश के सुदूर मैदानी इलाकों तक फसलों के दुश्मन बनकर फैल गए हैं। ये सूअर कभी भी वहां के परिवेश का हि्स्सा नहीं रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इन्हें बाहर से लाकर वहां छोड़ा गया है।

इसको लेकर तरह-तरह की कहानियां फैलाई गई हैं। जैसे मेरे यहां (अम्बेडकर नगर व सुल्तानपुर का सटा इलाका) दो किस्से चलते हैं। एक यह कि ये सूअर नदी की बाढ़ में बहते हुए चले जाए। दूसरा यह कि कोई व्यापारी ट्रक में भरकर इन्हें ले जा रहा था तो एक्सीडेंट में ट्रक पलटने पर ये भागकर पूरे इलाके में बिखर गए। हकीकत जो भी हो, सरकार को इन जंगली सूअरों के खात्मे का सुनियोजित अभियान चलाना चाहिए। नहीं तो हम सब यही मान लेंगे कि किसानों को उनकी फसल और खेती की ज़मीन से बेदखल करने के लिए यह सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ से रची-गई सोची-समझी साज़िश है। उसी तरह जैसे जंगल की ज़मीन से आदिवासियो को बेदखल करने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान खुद ही माओवादियों को संरक्षण दे रहा है।

पत्रकार द्वय इला जोशी और अनिल सिंह की एफबी वॉल से.

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