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जीबीसी न्यूज नामक एक चैनल है. नोएडा से चलता है. इसे चलाने वालों में एक जज साहब भी हैं. नाम है केके शर्मा. बरेली के जिला जज हैं. हाल में ही इन्होंने इस्तीफा देकर इस्तीफा जल्द कुबूल करने की गुहार लगाई है ताकि ये नई पारी शुरू कर सकें. असल में जज साहब नई पारी तो पहले ही शुरू कर चुके हैं. बस, अब जानकारी चारों ओर फैलने लगी है तो उन्होंने इस्तीफा देकर चीजों को दुरुस्त करने की कोशिश की है.

जीबीसी न्यूज चैनल में जज साहब के अलावा एक दूसरे सज्जन हैं संजय गुप्ता. ये महोदय कालीन के बिजनेस में बताए जाते हैं. तीसरे शख्स हैं अकरम. ये कोई दुबई बेस्ड बिजनेसमैन बताए जाते हैं. जीबीसी न्यूज चैनल में पंगा दंगा शुरू हो चुका है. सेलरी मांगने पर गालियां मिलने लगी हैं. बड़े बड़े नेताओं से मीटिंग कराने का दबाव प्रबंधन के लोग अपने रिपोर्टरों पर बनाते हैं और रिपोर्टर उनसे अपनी बकाया सेलरी मांगते हैं.

जीबीसी चैनल के एक सीईओ हुआ करते थे, मधुकर पांडेय. बताया जाता है कि ये अंदर की भयंकर हालत देखकर पंद्रह दिन पहले ही चैनल छोड़कर चलते बने. अकरम से कुछ रिपोर्टरों की जुबानी जंग हुई है. सेलरी संकट पर जज केके शर्मा बीच-बचाव करने आए और जल्द सारी सेलरी देने का वादा किया है. फिलहाल बड़ी खबर यह है कि जज साहब लोग भी मीडिया के आकर्षण और मीडिया के धंधे से खिंचे चले आ रहे हैं.

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  • Guest - vivek

    छुटभैया चैनलों से तौबा तौबा
    हाल के कुछ सालों में देखा गया है कि कई छोटे-मोटे चैनल चिड़िया के घोसले की तरह नोएडा में खड़े हो गए हैं यह चैनल अपनी किसी निजी मकसद से खड़े किए जाते हैं और उसको पाने के बाद या नाकाम होने की सूरत में यह बंद हो जाते हैं इसी कड़ी में नोएडा के सेक्टर 63 में एक तथाकथित न्यूज़ चैनल प्रतिनिधि के नाम से शुरु हुआ कहने को तो यह न्यूज़ चैनल के नाम से चला पर इसमें न्यूज़ चैनल जैसी एक भी खासियत नहीं थी शुरू में इसने अपने यहां इंप्लॉइज को ठीक-ठाक पैसा देने के बाद लंच तक करने की व्यवस्था की और दो महीने बाद ही इस चैनल के दावों की पोल खुल गई इस चैनल के मालिक जोकि चैनल को 3 महीने में नंबर वन बनाने की बात करते थे पर करीब 1 साल होने के बाद भी यह चैनल किसी टीआरपी चार्ट तक में नहीं आ पाया और आज यह स्थिति है चैनल को छोड़े हुए 10 महीने के बाद भी अपने पूर्व कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह नहीं दे पाया इसके साथ ही चार पांच महीनों से यहां घुट रहे कर्मचारियों को भी सैलरी नहीं दी गई है ऊपर से चैनल के प्रबंधक कर्मचारियों को चैनल के पेज को जबरदस्ती अपनी फेसबुक पेज पर शेयर करने के लिए कहते हैं और ऐसा ना करने के परिणाम में 5 दिन की सैलरी काटने की धमकी भी देते हैं ऐसी स्थिति में वहां काम कर रहे कर्मचारियों की मनोस्थिति को समझ सकते हैं यह चैनल शुरू तो हो जाते हैं पर बिना किसी प्लानिंग के ना ही किसी फंड के यह चैनल बंद होने की कगार पर आ जाते हैं इससे ना सिर्फ पत्रकारों को नुकसान होता है बल्कि अपने करियर की शुरुआत में ही ऐसे चैनल में काम करने आए बच्चों का भी मनोबल गिरता है यहां ना सिर्फ कर्मचारियों का मानसिक शोषण होता है बल्कि उनके भूखे मरने तक की नौबत आ जाती है भड़ास मीडिया के माध्यम से मैं आप सभी से अपील करुंगा कि ऐसे चैनलों का सभी पर्दाफाश करें ताकि बाकी सहयोगियो का भविष्य बचाया जा सके धन्यवाद

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