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नैतिकता के चोले में रंगे सियार (पार्ट-एक) : नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार स्वयं कितने अनैतिक हैं इसका खुलासा ‘दृष्टान्त’ की पड़ताल में नजर आया। मीडिया के क्षेत्र से जुड़े मठाधीश अपने जूनियर पत्रकारों को तो इमानदारी से पत्रकारिता करने की सीख देते हैं, लेकिन वे स्वयं कितने बेईमान हैं, इसकी बानगी कुछ चुनिन्दा पत्रकारों के पन्ने खुलते ही नजर आ जाती है। खबरिया चैनल से लेकर अखबारों और मैगजीन से जुड़े पत्रकारों ने सरकार की चरण वन्दना कर जमकर अनैतिक लाभ उठाया। जानकर हैरत होगी कि कोई करोड़ों की लागत से आलीशान कार्यालय और बेशकीमती कारों का मालिक है तो किसी के पास अथाह जमीन-जायदाद। कोई फार्म हाउस का मालिक बना बैठा है तो किसी के पास कई-कई मकान हैं।

ये सारा कुछ पत्रकार की हैसियत से कमाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे पत्रकारों को मीडिया घराने के मालिकान कितना वेतन देते हैं जिससे उनके पास चन्द वर्षों में ही करोड़ों की सम्पत्ति इकट्ठा हो जाती है? आय से अधिक सम्पत्ति मामले में दूसरों की बखिया उधेड़ने वाले ऐसे पत्रकारों पर न तो ईडी की नजर जाती है और न ही आयकर विभाग वाले ही उनकी बेतहाशा आय का स्रोत जानने की कोशिश करते हैं।

किसी दौर में पत्रकार शब्द सुनते ही अमूमन लोगों के जेहन में पैंट, कुर्ता, कंधे पर टंगा झोला और पैरों में चपप्ल पहले शख्स की छवि उभर आती थी। जिस गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबू विष्णु राव पराडकर का नाम सुनकर पत्रकारिता गौरवांवित हो उठती थी, उन्हीं पत्रकारों की अगली पीढियों की छवि बदल गई है। अब पत्रकार शब्द सुनते ही लोगों के मन में भौकाली, दलाल, फरेबी, धंधेबाज जैसे शब्द गूंजने लगते हैं। अब ना वह इज्जत बची ना ही इज्जतदार पत्रकार बचे, धंधेबाज मीडिया संस्थान और व्यापारी पत्रकारों के बीच कुछेक जो पत्रकारिता को बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं, खुद उनके ही बचने पर अब संदेह के बादल अक्सर उमड़ते-घुमड़ते नजर आते हैं।

कई दिग्गज पत्रकार देने वाले राजधानी लखनऊ में ही अब पत्रकार की खाल में छिपे धंधेबाजों को पहचाना बहुत मुश्किल नहीं लगता। मीडिया में आए नए छोरों को नैतिकता और ईमानदारी की चासनी में लपेटकर पत्रकारिता का पाठ पढ़ाने-समझाने वाले वरिष्ठ यानी पुरनिया पत्रकार खुद कितने अनैतिक एवं बेईमान हैं, इसका खुलासा दृष्टांत की खोजी पड़ताल में दिखी। पत्रकारों के नए पौध को सीख देने वाले मठाधीश कितने बेईमान हैं, इसकी बानगी तब दिखने लगती है, जब कुछ चुनिंदा पत्रकारों के क्रियाकलापों के पन्ने खुलने शुरू होते हैं। हर पन्ना मठाधीशों के स्याह पत्रकारिता और उनके अनैतिक कर्मों को चीख-चीख कर बताता है। खबरिया चैनल से लेकर अखबारों-मैगजीनों, चौपतिया अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने पत्रकारिता की कीमत पर जमकर माल बनाया। सरकार की चरण वन्दना कर जमकर अनैतिक लाभ उठाया।

जानकर हैरत होगी कि कोई करोड़ों की लागत से बने आलीशान मकान-कार्यालय का मालिक है तो कोई बेशकीमती कारों और अथाह जमीन-जायदाद का। कोई फार्म हाउस का मालिक बना बैठा है तो किसी के पास कईएक मकान हैं। ये सारा कुछ पत्रकार की हैसियत से कमाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे पत्रकारों को मीडिया घराने के मालिकान कितना वेतन देते हैं, जिससे उनके पास चन्द वर्षों में ही करोड़ों की सम्पत्ति इकट्ठा हो जाती है, आय से अधिक सम्पत्ति मामले में दूसरों की बखिया उधेड़ने वाले ऐसे पत्रकारों पर न तो ईडी की नजर जाती है और न ही आयकर विभाग वालों की। ना ही कोई संस्था नैतिकता के नाम पर अनैतिकता के घोड़े दौड़ा रहे इन कथित पत्रकारों के बेतहाशा आय का स्रोत जानने की कोशिश करती है।

पूर्ववर्ती सरकारों ने मीडिया को पालतू बनाने के उद्देश्य से एक योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बिना किसी नियम के पत्रकारों को रियायती दरों पर मकान और जमीनें दिए जाने की घोषणा कर दी। जमीनों पर निर्माण के लिए रियायती दरों पर लोन सुविधा की भी व्यवस्था की गयी थी। योजना की घोषणा होते ही ऐसे कई तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार सुविधा का लाभ लेने के लिए ऐसे टूट पडे़, मानो भिखारियों की भीड़ मन्दिरों के आस-पास मुफ्त में भोजन पाने के लिए टूट पड़ी हो। पूर्व मुख्यमंत्री की ‘दया दान’ का लाभ लेने के लिए वरिष्ठों की भीड़ में कई ऐसे चेहरे भी शामिल थे जो अपने जूनियर को पत्रकार और पत्रकारिता की गरिमा से समझौता न करने की सलाह देते रहते थे। कहने में कतई गुरेज नहीं कि पूंछ उठते ही हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ गयी।

उस वक्त तथाकथित वरिष्ठों में एक भी चेहरा ऐसा नहीं निकला जिसने पत्रकारों के स्वाभिमान को बचाने की गरज से विरोध की पहल की हो। हर कोई अपने-अपने स्तर से अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के तरीके खोजता नजर आया। ये अलग बात है कि जिन्हें ‘दया दान’ का लाभ नहीं मिल सका वे तत्कालीन मुख्यमंत्री को पानी पी-पीकर कोसते रहे, जिन्हें भिक्षावृत्ति मिल गयी उनके चेहरों पर एक कुटिल मुस्कान साफ देखी जा सकती थी। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के फेंके गए टुकड़ों का असर यह हुआ कि लगभग एक दशक बाद भी मीडिया के क्षेत्र से जुडे़ वरिष्ठ कहलाए जाने वाले तथाकथित पत्रकार (जिन्होंने लाभ लिया) समाजवादी पार्टी के लिए स्वामिभक्त बने हुए हैं। मौजूदा समय में भी जब-जब मुलायम सिंह यादव की प्रेस कांफ्रेंस होती है ‘दान की बछिया’ की पूंछ पकड़ने वाले कथित पत्रकार पार्टी और सरकार के खिलाफ उनसे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करते। यदि कोई दूसरा पत्रकार ऐसा करता भी है तो वरिष्ठों के नाम पर कलंक बने पत्रकारों का एक गुट ऐसे पत्रकारों के बोलने पर ही रोक लगा देता है।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी अपने पिता के पदचिन्हों का पूरी तरह से पालन किया। जिस वक्त न्यायपालिका ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली करवाने का आदेश जारी किया, उस वक्त अखिलेश यादव ने न सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले बचाने के लिए नया एक्ट बनाकर कोर्ट को चुनोती देने की कोशिश की बल्कि पत्रकारों को भी आश्वस्त कर दिया गया कि उनसे उनके सरकारी आवास नहीं छीने जायेंगे। इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने भी पत्रकारों को अपना पालतू बनाने के उद्देश्य से कई पत्रकारों के कटोरे में दक्षिणा स्वरूप रियायती दरों पर मकान-जमीनें दिए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे पत्रकार घोषणा होते ही खुशी से दुम हिलाने लगे।

यह दीगर बात है कि वायदा पूरा करने से पहले ही अखिलेश सरकार सत्ता से बाहर हो गयी। गौरतलब है कि (अगस्त 2016) जन्माष्टमी वाले दिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राजधानी लखनऊ के चुनिन्दा पत्रकारों को भोज पर बुलाया था, लेकिन जोड़-जुगाड़ लगाकर पत्रकारों की संख्या 600 का भी आंकड़ा पार कर गयी थी, इसके बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री ने किसी पत्रकार को निराश नहीं किया गया। सभी को सुविधा का लाभ दिए जाने की बात कही गयी।

वर्तमान योगी आदित्यनाथ की सरकार में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। हालांकि शुरुआती दौर में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि जिन पत्रकारों ने योग्यता न होने के बावजूद सरकारी भवनों पर कब्जा जमा रखा है, उनसे मकान खाली करवा लिए जायेंगे लेकिन हाल ही में योगी सरकार की तरफ से आश्वासन मिला है कि पत्रकारों से सरकारी आवास खाली नहीं करवाए जायेंगे। इतना ही नहीं योगी सरकार भी कुछ पत्रकारों को लेकर एक बार फिर से पुरानी सरकार की परम्परा दोहरा रही है। योगी सरकार ने भी हाल ही में राजधानी लखनऊ के हजारों पत्रकारों में से लगभग चार दर्जन पत्रकारों को सरकार का पालतू बनाने के लिए चारा फेंका है। इस बात के संकेत 13 जुलाई 2017 को ही मिल गए थे जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भोज में चुनिन्दा पत्रकारों को न्यौता दिया। हालांकि योगी सरकार के इस सौतेलेपन को लेकर सैकड़ों पत्रकारों के बीच निराशा के साथ ही विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं, लेकिन पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर कोई नहीं लेना चाहता। हर किसी को अखबार की आड़ में अपना धंधा चलाने के लिए सरकारी विज्ञापन की उम्मीद रहती है लिहाजा योगी सरकार में भी पाबन्दी के बावजूद चार पन्नों का अखबार चलाने वाले सरकार के विरोध की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

वैसे तो मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अनैतिक रूप से लाभ पाने वाले सरकार के स्वामीभक्त पत्रकारों की सूची काफी लम्बी है, लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने बड़े मीडिया संस्थान के नाम पर कई-कई बार लाभ लिया। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्होंने रियायती दरों पर एक से अधिक जमीन-मकान तो लिया ही साथ ही राजधानी लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों में बेशकीमती जमीनें भी कौड़ियों के भाव बटोर लीं। वरिष्ठ पत्रकारों की शक्ल में ऐसे कथित लुटेरों का साथ तत्कालीन सरकार ने भी दिया। कुछ पत्रकारों ने तो पूर्व सरकार के कुछ मंत्रियों का सहारा लेकर किसानों की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के भाव खरीदने में स्थानीय प्रशासन से लेकर गुण्डों तक की मदद ली। आय से अधिक सम्पत्ति जुटाने वाले ऐसे ही पत्रकारों की फेहरिस्त में खबरिया चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

कमाल खान ने तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार के कार्यकाल में रियायती दरों पर विराज खण्ड, गोमती नगर और विकल्प खण्ड, गोमती नगर में (भवन संख्या 1/97 विराज खण्ड और 1/315 विकल्प खण्ड) दो भूखण्ड हथियाये जबकि तत्कालीन सरकार ने राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त एक पत्रकार को मात्र एक ही भूखण्ड आवंटित किए जाने की व्यवस्था की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह व्यवस्था इसलिए की थी कि ताकि सरकारी आवासों में रह रहे पत्रकार सरकारी आवास खाली करके रियायती दरों पर मिले प्लाट में मकान बनवाकर अध्यासित हो जाएं और लाइन में लगे जरूरतमंद सरकारी कर्मचारियों को सरकारी मकान आवंटित किये जा सकें, लेकिन समाजवादी टुकड़ों का स्वाद लेने वाले पत्रकार दगाबाज निकले। सरकार से रियायती दरों पर तो भूखण्ड लिए ही साथ ही सरकारी भवनों का लोभ भी नहीं छोड़ा। ऐसे पत्रकारों में से कमाल खान भी एक हैं। कमाल खान रियायती दरों पर दो-दो प्लाट का लाभ लेने के बाद भी बटलर पैलेस के सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं।

नियमानुसार देखा जाए तो सरकारी टुकड़ों पर भी खबरिया चैनलों में काम करने वाले कमाल खान जैसे पत्रकारों का हक नहीं है। इस बात का खुलासा विगत वर्ष प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में हो चुका है। प्रकरण कुछ इस तरह से है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दूरदर्शन में काम करने वाले पत्रकारों को लेकर एक पत्र लिखा गया था। उस पत्र को प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित विभाग को उचित कार्रवाई के लिये भेजा गया। केन्द्रीय सरकार के प्रसार भारती से एक पत्र फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा को प्राप्त हुआ। उस पत्र से स्पष्ट हो गया था कि दूरदर्शन में काम करने वाले पत्रकारों को द वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के अनुसार पत्रकार नहीं माना गया इसलिये उनके वेतन आदि के बारे में विचार नहीं किया जा सकता।

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 में स्पष्ट लिखा गया है कि न्यूज पेपर का मतलब मुद्रित समाचार पत्र। न्यूज पेपर एम्पलाई का अर्थ वर्किंग जर्नलिस्ट। वर्किंग जर्नलिस्ट का अर्थ, जो न्यूज पेपर में कार्यरत हो। उसमें संपादक, न्यूज एडीटर, सब एडीटर, फीचर राईटर, रिर्पोटर, कार्टूनिस्ट, न्यूज फोटोग्राफर और प्रूफ रीडर शामिल हैं। एक्ट में यह भी स्पष्ट है कि मैनेजमेंट अथवा एडमिनिस्ट्रेशन जैसे कार्य करने वाले वर्किंग जर्नलिस्ट की श्रेणी में नहीं आते। अब आइए इस बात का खुलासा भी हो जाए कि आखिरकार कमाल खान समेत उन तमाम खबरिया चैनलों के कथित पत्रकारों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी सुविधाएं कैसे ले लीं?

...जारी...

लखनऊ से प्रकाशित चर्चित खोजी पत्रिका 'दृष्टांत' में यह स्टोरी मैग्जीन के प्रधान संपादक अनूप गुप्ता के नाम से छपी है. वहीं से साभार लेकर इसे भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

इसके आगे की कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें...

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