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बाबा राम रहीम के बहाने न्यूज चैनलों ने एक बार फिर साबित कर दिया उन पर किसी का बस नहीं चलता। बाबा राम रहीम एक शक्तिशाली और धनबली संत हैं। उनके लाखों अनुयायी हो सकते हैं। मगर इसका मतलब यह नहीं कि किसी संत के सात खून देश का कानून माफ कर सकता है। सनातन धर्म के एक प्रमुख शंकराचार्य को तमिलनाडू पुलिस ने हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। उनके भी करोड़ों समर्थक थे। लेकिन किसी की भी धींगामुश्ती कानून के सामने नहीं चल पायी। आशाराम हो या रामपाल, हर मामले में यही हुआ।

बाबा राम रहीम पर चल रहे मामले पर जब अदालत का फैसला आना था तब तक यानि फैसले से पूर्व तक टीवी चैनलों ने बाबा का इतना महिमा मंडन किया कि वहां बाबा राम रहीम के अलावा कोई दूसरी खबर ही नहीं थी। ऐसा नहीं कि देश में खबरों का अकाल पड़ गया हो, मगर बकौल टीवी न्यूज चैनल ऐसी खबरों को चलाने से कोई फायदा नहीं जो टीआरपी न देती हो।

इस दौरान टीवी चैनलों ने बहुत गैर जिम्मेदाराना तरीके से काम किया।  राम रहीम को लेकर विशेष पैकेज चलाए गये, विशेष शो बनाये गये। सिरसा से लेकर चंडीगढ़ और पंचकुला तक ओबी वैनें भेज दी गयीं। हद तो उस वक्त हो गयी जब बाबा अपने डेरे से अदालत के लिए निकले तो टीवी चैनलों के रिपोर्टरों ने उनके वाहन के काफिले का इस तरह से फॉलो किया, मानों किसी ऐसी खबर को दिखाने पर तुले हो जिसके बारे में आज तक किसी को न पता हो। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन को इस बात की खबर तो जरूर होगी कि देश के तीन राज्य भीषण बाढ़ की चपेट में हैं, करोड़ो लोग बेघर हैं और हजारों पालतू जानवर बाढ़ में बह गये। चैनलों के बहादुर रिपोटर्स पंचकुला और चंडीगढ़ जाना पसंद करते है उन्हें बिहार, असम और उत्तर प्रदेश की बाढ़ दिखाई नहीं देती।

बाबा राम रहीम के मामले में टीवी चैनलों को संयम से काम लेना था। जिस तरह आशाराम बापू और रामपाल के मामले में लिया था। मीडिया ने बाबा राम रहीम के समर्थकों को बल प्रदान किया। हरियाणा सरकार को खलनायक बना दिया। पुलिस को बेबस बताया और इस तरह का आचरण किया माना हरियाणा सरकार ने बाबा के समर्थकों के सामने घुटने टेक दिये हों। न्यूज चैनलों की गरिमा इस प्रकरण के बाद और कम हुई है। देश को ऐसा महसूस हुआ मानों बाबा ने सभी न्यूज चैनलों को अपने पक्ष में खड़ा कर रखा हो। देखा जाये तो ये एक तरह से अदालत पर दबाव बनाने की तरकीब भी थी।

लेकिन मामला अचानक तब पलटा जब अदालत ने बाबा को दोषी करार दे कर हिरासत में ले लिया। बाबा के जो समर्थक सुबह से टीवी चैनलों के हीरो बने थे, वे अचानक विलेन बन गये। केवल इसलिये कि उन्होंने मीडिया के रिपोर्टरों और ओबी वैन पर भी हमला किया। दोपहर तक जो भीड़ बाबा की शक्ति थी, वो शाम को गुंडों में तब्दील हो गयी। क्या यही है मीडिया की निष्पक्षता? इसे दोगलापन नहीं कहेंगे? अभी बाबा के मार्केटिंग टीम वाले कुछ बुलेटिन्स को स्पॉन्सर भर कर दें.. फिर देखियेगा, कैसे यही गुंडे मासूम और पुलिस से प्रताड़ित भक्तों में बदल जायेंगे।

देश में लंबे वक्त से इस मुद्दे पर बहस चल रही हैं कि न्यूज चैनलों के कंटेंट के मानक तय होने चाहिए। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की आजादी के चलते देश में अभी ऐसी कोई तंत्र नहीं है, जो न्यूज चैनलों के कंटेंट पर निगाह रख सके। इस दिशा में जब लोगों ने आवाज उठाई तो इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) ने एक स्व नियमन संस्था ब्रॉडकास्ट कंटेंट कंप्लेन्टस काउंसिल (बीसीसीसी) बना ली। मगर आज तक इस संस्था ने किसी भी न्यूज चैनल से यह नहीं पूछा कि आप क्या दिखा रहे है और क्यों दिखा रहे है और कौन इसे देखना चाहता है।

अतुल सिंघल
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