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श्रीगंगानगर। धर्म के नाम पर पाखंड होता ही आया है, अब तो मीडिया द्वारा सच के नाम भी पाखंड किया जाने लगा। सच के नाम पर झूठ बोलने, दिखाने का पाखंड। पाखंड चाहे धर्म के नाम पर बाबाओं द्वारा किया गया हो या मीडिया द्वारा सच के नाम पर, पाखंड तो पाखंड है। पाखंड की चकाचौंध से इंसान पूरा अंधा तो नहीं होता लेकिन उसकी हालत अंधे जैसी ही हो जाती है।  धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड का जब पर्दाफाश होता तब जन जन की आस्था, श्रद्धा और भावना आहत होती हैं।  जब मीडिया सच के नाम पर कोरा झूठ, आधा झूठ पेश करता है तो विश्वास टूटता है। यह मीडिया का आम जन से विश्वासघात है। विश्वासघात भी किसने किया, उस मीडिया ने जिसे लोकतन्त्र का  चौथा स्तम्भ कहा जाता है। हालांकि संविधान मेँ इसका कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका के मद्देनजर मीडिया को यह दर्जा दे दिया गया, चाहे वह उचन्ती ही सही। कल सोमवार को सुनारिया जेल से लगभग दो किमी दूर इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया ने सच के नाम पर झूठ का जो लाइव पाखंड रचा, उसकी मिसाल शायद ही कोई और हो।

न्यूज चैनलों के बड़े बड़े कीमती से कीमती कैमरे जूम के बावजूद जेल की दीवार तक तो दिखा नहीं पा रहे थे, उन चैनलों के पत्रकार जेल के अंदर लगी सीबीआई कोर्ट का आँखों देखा हाल बता  रहे थे।  ये सब वरिष्ठ सुना और बता भी यूं रहे थे जैसे वे खुद वहीं बैठे हों। कभी यूं भी लगा जैसे उनके पास  द्वापर के संजय की तरह दूर तक देखने की दिव्य दृष्टि है। ये आभास भी होता रहा कि ये भाई दौड़ के जेल के अंदर जाते हैं और सब कुछ देख दौड़ के आते हैं और फिर कोर्ट मेँ क्या हो रहा है, बताते हैं। सांस फूला हुआ। हेयर स्टाइल अस्त व्यस्त। भाग कर जाने और उलटे पैर भाग कर आने मेँ ऐसा होना स्वाभाविक है।

ये तमाम जाँबाज, जो कोर्ट की कार्रवाई की लाइव कमेंट्री कर रहे थे, ये नहीं बता सके कि रेप के आरोप मेँ बाबा को सजा कितनी हुई। कोर्ट ने जुर्माना कितना लगाया। कई घंटे तक पहले मैं, पहले मैं करते हुए 10-10 साल की सजा परोसते रहे। अपने आप ही  पहले मैं बोल के, अपनी ही पीठ थपथपाते रहे। कई घंटे तक किसी ने भी फैसले की प्रति पढ़ने की  कोशिश नहीं की । बस, 10 के फेर मेँ लगे रहे। विवेचना, मीमांसा होती रही। कई घंटे तक सच की आड़ मेँ चैनल वाले झूठ का पाखंड रचते रहे। ठीक ऐसे जैसे बाबा धर्म के नाम पर पाखंड करते हैं। चैनलों के इस लाइव झूठ को सभी ने सच माना। ना मनाने का कोई सवाल नहीं था, क्योंकि मीडिया पर हर कोई विश्वास करता है। जैसे बाबाओं पर आस्था और श्रद्धा होती है वैसे ही मीडिया पर विश्वास होता है। जिस जिस बाबा के पाखंड की पोल खुली वह जेल मेँ पहुँच गया। लेकिन मीडिया तो मीडिया है। दादा तो घर में सबको लड़े, दादा को कौन लड़े! यही स्थिति है मीडिया की। वह किसी को कुछ भी कह सकता है, उसे कोई कुछ नहीं कह सकता। जो कहे उसकी ऐसी की तैसी। देता रहे बाद में सफाई।

जिस मुद्दे पर दुनिया भर की निगाह थी, उस पर ये झूठ बोलते रहे। करोड़ों लोगों के विश्वास से खेलते रहे। है कोई ऐसी संस्था जो इस झूठ के खिलाफ कोई एक्शन लेने की हिम्मत दिखाएगा! चैनलों के मालिक करेंगे कोई कार्रवाई अपने जाँबाज पत्रकारों के के खिलाफ! पहले मैं, पहले बस मैं की इस दौड़ मेँ सच का इंतजार किसी ने नहीं किया। सुना जाता है कि हजार दोषी छूट जाएं लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। यही बात मीडिया के लिए कुछ ऐसे कही जा सकती है कि खबर छूटे  तो छूट जाए। सच मेँ देरी हो तो हो, किन्तु झूठ किसी कीमत पर नहीं परोसेंगे। ना जाने ऐसा कब होगा! घर मेँ सभी को लताड़ लागने वाले दादा को लताड़ कौन लगाएगा, राम जाने। दो लाइन  पढ़ो-

कौन-सा पहली दफा है
जो तू मुझसे खफा है।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.

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