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भड़ास तहक़ीक़ात : राज्यसभा टीवी ने पिछले छः साल में एक धारदार और पेशेवर टीवी चैनल की पहचान बनायी है। लेकिन चैनल पर लगातार ख़र्च को ले कर आरोप लगते रहे हैं। WhatsApp पर लगातार मैसेज मिलते रहे हैं कि चैनल ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्च कर दिए। लेकिन पिछले हफ़्ते स्वयं वेंकैय्या नायडू के ऑफ़िस के हवाले से ख़बर आयी कि राज्यसभा टीवी पर सात साल में 1700 करोड़ रुपए नहीं मात्र 375 करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं।

इसी ख़बर ने भड़ास को जाँच के लिए प्रेरित किया और बहुत हैरान कर देने वाली जनकरियाँ मिलीं। भड़ास ने जाँच में पाया कि सात साल में जिन मद में ख़र्च हुआ, वो इस प्रकार है :

25 मई, 2010 से 31 जुलाई, 2017

  1. वेतन पर हुआ ख़र्च : 92.4 करोड़ रुपए
  2. किराए पर हुआ ख़र्च: 111.74 करोड़ रुपए (राज्यसभा टीवी ने NDMC से तालकटोरा स्टेडीयम प्रांगण में बिल्डिंग किराए पर ली हुई है)
  3. चैनल बनाने का कैपिटल ख़र्च: 67.2 करोड़ रुपए (जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संस्था BECIL को दिए गए। इसमें स्टूडियो, न्यूज़ रूम, संसद भवन में राज्यसभा में सीधे प्रसारण का सेटअप और चैनल का तमाम मशीनें, सिविल वर्क शामिल हैं)
  4. OB Van, Optical Fibre, ANI, PTI का ख़र्च : 22.8 करोड़ रुपए
  5. सिक्यरिटी, सफ़ाई, बिजली, जेनरेटर, कम्प्यूटर, फ़ोन, ऑफ़िस, रख रखाव का ख़र्च: 6.67 करोड़ रुपए
  6. प्रोग्रैमिंग का ख़र्च: 75.3 करोड़ रुपए ( जिसमें चैनल के सभी प्रोग्राम, समाचार बुलेटिन, संविधान का निर्माण, रागदेश का निर्माण शामिल है)
  7. कुल ख़र्च (2010-2017): 376.11 करोड़ रुपए

राज्य सभा टीवी जिस तालकटोरा स्टेडियम प्रांगण में स्थित है, उसकी तीन मंज़िल में 'भारतीय नेवी' का ऑफ़िस है। नेवी भी NDMC को उसी रेट पर किराया देती है, जिस रेट पर राज्यसभा टीवी को जगह दी गयी है। यही नहीं, Lutyens ज़ोन में NDMC के कई भवन विभिन्न सरकारी ऑफ़िसों को किराए पर दिए गए है, जिसका किराए का रेट स्वयं प्रधानमंत्री ऑफ़िस ने तय किया था। प्रमुख किराएदारों में रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कस्टम विभाग, इनकम टैक्स विभाग इत्यादि हैं।

राज्यसभा टीवी के ख़र्च को देख कर प्राइवेट चैनलों में काम कर रहे पत्रकार हैरान हैं। ये आम बात है कि किसी भी प्राइवेट चैनल का सालाना ख़र्च कई-कई सौ करोड़ रुपए है। साथ ही बनाने में ही तीन चार सौ करोड़ रुपए की लागत बताई जाती है। राज्यसभा टीवी की क्वालिटी, प्रोग्राम और इन्फ़्रस्ट्रक्चर किसी प्राइवट चैनल से काम नहीं है, लेकिन ख़र्च का हिसाब देख कर पत्रकार हैरान हैं कि क्या इतने काम ख़र्च में भी बेहतरीन चैनल बनाया और चलाया जा सकता है।

चैनल के ख़िलाफ़ लगातार दुष्प्रचार अभी भी जारी है। दो साल पहले DNA अख़बार और तहलका मैगज़ीन ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्चे जाने की ख़बर छापी थी। तब राज्य सभा की दस से ज़्यादा राजनीतिक दलों के क़रीब पचास सांसदों ने DNA और तहलका को लोगों को गुमराह करने के ख़िलाफ़ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव दिया था। बाद में दोनों ने ही ग़लत रिपोर्टिंग के लिए माफ़ी माँग ली और मामला समाप्त मान लिया गया। राज्यसभा की वेबसाइट पर पूरे मामले की रिपोर्ट मौजूद है।

लेकिन इस सब के बावजूद लगातार झूठे मैसेज प्रचारित किए जा रहे हैं। पूरे मामले को एक स्कैम की तरह पेश कर, चैनल को बदनाम करने की कोई बड़ी किवायद चलायी जा रही है।  भड़ास की जाँच में ये भी सामने आया है कि राज्यसभा टीवी में कभी किसी भी पत्रकार या ऑफ़िसर को सरकारी ख़र्च पर विदेश पढ़ने नहीं भेजा गया, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है।

यही नहीं, पिछले सात सालों के वजूद के दौरान राज्यसभा टीवी के ख़िलाफ़ कभी भी CAG की कोई रिपोर्ट नहीं आयी है। यही नहीं, जुलाई 2017 तक CAG का कोई भी सवाल राज्य सभा टीवी के पास अनुत्तरित नहीं था। सभी सवालों के जवाब संतोषजनक दिए गए थे और CAG ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार किया।

भड़ास ने सोशल मीडिया में लगाए जा रहे झूठे आरोपों पर राज्यसभा टीवी के नए सीईओ शशि शेखर वेमपति से आधिकारिक जवाब के लिए सम्पर्क किया, लेकिन उनका फोन 'नाट रीचेबल' बोलता रहा। राज्यसभा टीवी का नया प्रबंधन अगर इस मामले पर चाहे तो अपना पक्ष भड़ास4मीडिया तक This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए पहुंचा सकता है।

भड़ास4मीडिया के लिए राहुल सिंह की रिपोर्ट.

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