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Om Thanvi : वायर, दायर और कायर... जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

बताइए, लोकतंत्र का कैसा दौर है। न्यायपालिका ही अन्याय कर रही है? बग़ैर मीडिया (लेखक, प्रकाशक/प्रसारक) को नोटिस पहुँचाए, बग़ैर मीडिया का पक्ष सुने स्टे का इकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) फ़ैसला दे दिया। यह आदेश भी अदालत ने बचाव पक्ष को नहीं भेजा। जय शाह के वकीलों ने भेजा है। न्याय तब मुकम्मल होता है जब दूसरे पक्ष को सुने बग़ैर उसके ख़िलाफ़ कोई स्टे आदि न दिया जाय। यहाँ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार ताक पर था।

मेरे वक़ील मित्रों का कहना है कि उन्हें इसमें ज़रा शक़ नहीं कि उच्च अदालत में यह इकतरफ़ा स्टे ख़ारिज हो जाएगा। मुझे भी न्यायपालिका से उच्च स्तर पर बड़ी उम्मीदें हैं। हालाँकि निचले स्तर पर भी न्यायप्रिय जज हैं। मगर ऊपरी अदालतों में अपीलों की तादाद बढ़ती ही है, घटती नहीं।

मज़ा देखिए छोटे शाह ने वायर पर फ़ौजदारी मुक़दमा मेट्रो कोर्ट में दायर किया है और सिविल मुक़दमा डिस्ट्रिक्ट (रूरल) कोर्ट में। जबकि जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दावा किया है, उन सबका पता दिल्ली का है। बहरहाल, द वायर को (सिर्फ़ वायर को!) आगे कुछ न लिखने-दिखाने से रोकने की इस दूरस्थ कोशिश को मीडिया का, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का गला मसोसने के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित संपादक रहे ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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