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गुजरात चुनावों में राहुल गाँधी और हार्दिक पटेल की रैलियों में उमड़े जनसैलाब, अल्पेश, जिग्नेश के समर्थन में उठते स्वरों और सूरत जैसे शहरों में व्यापारियों के जीएसटी जैसे मुद्दे पर उभरे जबरदस्त विरोध के बावजूद कांग्रेस को वोट रूपी समर्थन नहीं मिला है। ऐसा चुनाव के तुरन्त बाद प्रसारित हुये टीवी चैनलों एक्जिट पोल के परिणामों में दिखाया गया है। 6 चैनलों एवं सर्वे एजंसियों ने जो आकंड़े सामने रखे हैं उनमें बीजेपी को जबरदस्त जीत मिल रही है। हो सके तो आप टीवी चैनलों के इन एक्जिट पोल पर आँख बंद करके भरोसा कर लीजिऐ। हालिया अनुभव बताता है कि यह सच साबित होने वाले हैं। जिस चैनल ने बीजेपी को सबसे ज्यादा सीटें दी हैं वह सौ फीसदी सच मानिये, और जिसने कम से कम सीटें दी हैं उसको 101 फीसदी। इससे पहले उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में चैनलों के एक्जिट पोल की भविष्यवाणी लगभग 100 प्रतिशत सच हो चुकी है।

टीवी चैनलों और सर्वे एजन्सियों की भविष्यवाणियाँ पहले इतनी सटीक साबित नहीं होती थी, जितनी अब होने लगी हैं। ना ही पहले की तरह अब खबरों में बेलेन्स रखने की मगजमारी की जाती है और ना ही पक्षपाती होने के आरोपों का डर है। सबसे तेज और सबसे पहले जैसे टीवी चैनलों के स्लोगन जुमले सरीखे लगते थे लेकिन अब यह सच होने लगे हैं। मतगणना में सबसे पहले नतीजे दिखाने का दावा करने वाले चैनल आज कितना आगे निकल गये हैं इसकी तस्वीर भी उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में साक्षात देखने को मिल चुकी है। मथुरा में तो एक चैनल पर आधी मतगणना पूर्ण होने से पहले ही बीजेपी के मेयर प्रत्याशी की जीत की घोषणा कर दी गयी थी, बाद में अन्य चैनलों ने भी वही खबर पूरे विश्वास से चला दी जबकि चैनलों के स्ट्रिगंर और क्षेत्रीय रिर्पोटर मौके पर संभावित जीत हार का आंकलन करने में ही व्यस्त थे।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया प्रिन्ट मीडिया से कितना आगे है इसके दर्शन मथुरा नगर निगम की मतगणना के दौरान कैसे हुये, वो देखिये। दोपहर लगभग 12 बजे का समय था। 5 चक्रों की मतगणना पूर्ण हुई थी और भाजपा के मेयर प्रत्याशी कांग्रेस के मेयर प्रत्याशी से मात्र 2394 वोटों से आगे चल रहे थे। जीत हार निश्चित करने के लिये यह कोई बड़ा अन्तर नहीं था। अभी 12 चक्रों की मतगणना बाकी थी जिसमें दूसरा प्रत्याशी आगे भी आ सकता था। चूंकि पहले से कुछ निश्चित नहीं था तो अन्तिम चक्र की मतगणना पूर्ण होने से पहले इस बात की घोषणा नहीं की जा सकती थी कि अमुक प्रत्याशी मथुरा का मेयर पद जीत गया है। अमूमन टीवी चैनल इस प्रकार की रिपोर्टिंग करते समय केवल यह बताते हैं कि अमुक प्रत्याशी इतने वोटों से आगे चल रहा है। मतगणना स्थल पर बनाये गये मीडिया सेन्टर पर प्रिन्ट और चैनल के तीन दर्जन से ज्यादा पत्रकार और कैमरामेन बैठे हुये थे बाकि मतगणना टेबलों के पास जमा थे। यहीं एक टीवी लगा हुआ था जिस पर एबीपी न्यूज चल रहा था। एबीपी पर स्टूडियो से उ.प्र. नगर निकाय के चुनाव परिणामों को सबसे पहले दिखाने का दावा करने वाला लाईव शो चल रहा था।

अभी सूचनाधिकारी पॉंचवें राउण्ड के मतगणना परिणाम की लिस्ट पत्रकारों को देकर ही गये थे कि तभी एबीपी पर मथुरा से बीजेपी प्रत्याशी की जीत की खबर चल गयी। यह देखर मीडिया सेन्टर में बैठे पत्रकारों में हड़कम्प मच गया। मतगणना अभी पूरी नहीं हुई थी और परिणाम सबसे पहले टीवी पर लाईव हो रहे थे। अन्य चैनलों के पत्रकार सम्बन्धित रिपोर्टर को गलत खबर चलने की सूचना देने के लिये फोन लगाने लगे। वहीं कुछ पुराने पत्रकार चुटकी ले रहे थे कि वोट यहाँ गिने जा रहे हैं और परिणाम दिल्ली में आ गया है. अब यहाँ बैठने से क्या फायदा। थोड़ी देर ही हुई थी कि अन्य चैनलों के स्ट्रिंगर भी परेशान हो गये। जी न्यूज, इंडिया टीवी, जैसे अन्य चैनलों पर भी बीजेपी के मथुरा सीट जीतने की खबर प्रमुखता से ब्रेकिंग हो रही थी। जबकि ठीक उसी समय मथुरा के लोकल चैनल नियो न्यूज पर बिना किसी प्रत्याशी की जीत की घोषणा या अनुमान लगाये, मतगणना की वास्तविक आंकेड़े दिखाये जा रहे थे। असल में 17 में से पाँचवे चरण पर किसी प्रत्याशी की जीत का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता था। सोशल मीडिया पर बीजेपी प्रत्याशी को बधाई का दौर चल पड़ा तो कुछ लोग खबर की पुष्टि करने के लिये मतगणना स्थल पर मौजूद अपने जानकारों को फोन लगा रहे थे।

मतगणना का 17 वाँ चरण इस घोषणा के लगभग तीन घंटे बाद दोपहर तीन बजे पूर्ण हुआ और बीजेपी प्रत्याशी को 22125 वोटों से विजयी घोषित किया गया। लेकिन जीत की यह खुशी अब तक कुछ घंटे पुरानी हो चुकी थी। प्रिन्ट मीडिया के पत्रकार ऐसी रिपोर्टिंग में पिछड़ चुके थे तो वहीं चैनलों के स्थानीय रिपोर्टर भी असहज महसूस कर रहे थे। यह नई पत्रकारिता थी, जिसके दर्शन पहली बार हो रहे थे। ना तो जिला सूचना कार्यालय से इस पर संज्ञान लिया गया और ना ही मतगणना में लगे हुये अधिकारियों ने इस पर आपत्ति जतायी। चुनावी जीत के जश्न में यह बात दब गयी। हारने वाली पार्टियां भी ईवीएम को कोसकर रह गयीं। वैसे राष्ट्रीय चैनलों पर किसी प्रदेश के नगर निकाय चुनावों के परिणामों को हद से ज्यादा समय मिलना भी पहली बार हुआ। बाद में पता चला कि नगर पालिका और नगर पंचायत के आकंड़ों को पीछे छोड़, जीते हुये मैयरों को शपथ से पहले गुजरात में यूपी फतह का डंका बजाना था। यह जीत बड़ी दिखानी थी, यह बीजेपी का चुनाव मैनेजमेंट था। इसमें कांग्रेस पहले ही हार गयी।

खैर.....गुजरात चुनावों की कवरेज में भी टीवी चैनलों ने कड़ी मेहनत की है। पुराने सी विमान को पूरे विश्वास के साथ नया अविष्कार दिखाना दम्भी पत्रकारिता के लिये इतना आसान नहीं है। कई बार पता नहीं लगता कि चैनलों के एंकर किसी पार्टी के प्रवक्ता हैं या जनता के। कांग्रेस के लिये भी कुछ मीडिया माध्यम दरियादिली दिखाकर उससे इस नई पत्रकारिता पर सवाल उठाने का अधिकार छीन लेते हैं। फिलहाल आप गुजरात जीत के लिये टीवी चैनलों की मेहनत पर पूरा इत्मिनान रखिये और जीत का जश्न मनाईये। अगर यह पूर्वानुमान गलत साबित होते हैं तो ईवीएम के साथ वीवीपेट मशीनों को अनिवार्य करने की मांग उठेगी नहीं तो कांग्रेस अपनी हार का ठीकरा फिर से ईवीएम के सर ही फोड़ेगी।

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’
मथुरा
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  • Guest - Insider journalist

    कांग्रेस के लिए कुछ माध्यम दरियादिली दिखाते है?? सच मे?

    हिंदुस्तान की मालकिन कांग्रेस MP, इंडियन एक्सप्रेस का चीफ एडिटर संजय झा (कांग्रेस का प्रवक्ता) का भाई, NDTV का मालिक ओसवाल जिंदल का ससुर, न्यूज़ 24 राजीव शुक्ला कांग्रेस MP की बीवी चलाती है, Todays Group जिसने केजरीवाल से लेके कन्हैया से हार्दिक को जेट से उड़ाया और स्टार बनाया, कौन चलाता है?? वृंदा करात और प्रणव ray का कनेक्शन क्या है?? ThePrint, Quient और Scroll बनाये ही किस purpose के लिए??

    कुछ माध्यम? छोड़िये भाई साहब, सबका एजेंडा है और आप दूध के धुले नही लगते

  • Guest - jagdish samandar

    चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, राजनैतिक पार्टियों के प्रवक्ता बनकर मीडिया संस्थान न तो जनता का भला करते हैं न लोकतन्त्र का और न ही पत्रकारिता का । वैसे फिलहाल तो अधिकतर चैनल भाजपा का ही राग गा रहे हैं ।

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