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Anil Sinha : शनिवार की शाम उदासी में गुजरी। प्रेस क्लब गया था, चैनलों और अखबारों में चल रही छंटनी पर आयोजित सभा में भाग लेने। देख कर उदास हो गया कि मीडियाकर्मियों पर बेचारगी पूरी तरह हावी है। जयशंकर गुप्ता और उर्मिलेश जैसे वरिष्ठ साथियों ने संघर्ष और एकता के कुछ अच्छे तरीके जरूर बताए। सवाल यह है कि पत्रकारों की इस हालत के लिए क्या सिर्फ मीडिया संस्थान दोषी हैं? वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था के साथ उपभोक्तावाद ने पत्रकारों को इस तरह मोहित कर लिया कि वे भी बारात में बाजा बजाने लगे।

पत्रकारों की आमदनी इतनी बढ गई कि देश की गरीबी की चर्चा करने में उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने मजदूर यूनियनों और आंदोलन समूहों की खबरें छापना बंद कर दी। पहले पत्रकार लड़ाई के लिए उतरते थे तो वे यूनियन वाले लोग बिन बुलाए आ जाते थे। अब किस मुंह से आएंगे? कई वक्ताओं ने भावुकता भरी शिकायत रखी कि चैनल और अखबारों में लाखों पाने वाले संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह कम कर साथियों की नौकरी नहीं बचाई।

इस चर्चा का असर तो किसी पर शायद ही होगा, लेकिन इसमें बड़े मूल्यों की ओर लौटने की ललक जरूर दिखाई देती है। पत्रकार अगर अपनी जमीन पर लौट गए तो लोकतंत्र पर मंडरा रहा खतरा काफी कम हो जाएगा। पत्रकार जिस बेचारगी की मुद्रा में आ गए है, वह लोकतंत्र के ध्वंस के संकेत हैं। ऐसी स्थिति उस समय कभी नहीं आई जब पत्रकार इतना कम वेतन पाते थे कि उनका गुजारा भी मुश्किल से होता था। नैतिक ताकत ने उन्हें भारत को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने की ऊर्जा दी और इसी ताकत के बल पर वह इंदिरा गांधी के आापातकाल से लड़ पाए।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा की एफबी वॉल से.

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