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Nitin Thakur : सुधीर सर ने जो इंटरव्यू लिया उसे जर्नलिज़्म के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए. छात्रों को वो हुनर सिखाया जाए कि एकतरफा संवाद करनेवाले नेता के भाषण के बीच में सवालनुमा टिप्पणी कुशलतापूर्वक घुसाकर कैसे इंटरव्यू होने का भ्रम पैदा किया जाता है. मोदी जी ने बाकायदा समझाया कि कैसे ज़ी न्यूज़ के बाहर पकौड़े तलनेवाले को 200 रुपए रोज़ाना का रोज़गार मोदीकाल में मिला है।

उन्होंने कायदे से ये भी बताकर कि ऐसे रोज़गार सरकारी आंकड़ो में नहीं आ पाते आगे तक की शंकाओं का समाधान कर दिया। अब कोई उनसे आंकड़े लेकर सवाल ना करे क्योंकि ये सब आंकड़ों में तो होता नहीं। सबसे अद्भुत तो वो दृश्य था जब मोदी जी इस अनर्थशास्त्र की आखिरी लाइन बोल रहे थे तो एंकर महोदय ने पूरी श्रद्धा से उनकी वो लाइन अपने शब्दों से पूरी की। आह... खेल लो बैडमिंटन.. जितनी देर खेलना चाहते हो.. लोग लंबे वक्त तक एक ही आदमी से मूर्ख नहीं बनते रह सकते। जिस दिन कुएं में डाली गई तुम्हारी अफीम का नशा टूटा ये ही तुम्हें दौड़ाएंगे.. फिर तुम पकौड़े तलना.. जैसे इतिहास के कई नायकों ने बाद में तले।

वैसे, टेक्निकली देखा जाए तो ज़ी के सामने कोई पकौड़े वाला नहीं खड़ा है. हर जगह सिर्फ अवैध अतिक्रमण किए ज़ी वालों की कारें पार्क रहती हैं. अगर कहीं कोई पकौड़े वाला है तो वो "आज तक" के सामने और "दैनिक भास्कर" के बगल में है. मोदी जी जब मिसाल दे रहे थे तो एंकर को उन्हें बताना चाहिए था कि सर हम तो किसी ठेलेवाले को खड़ा ही नहीं होने देते. यूं मोदी जी को एक दौरा फिल्मसिटी का भी करना चाहिए. उनके ढेरों छिपे-खुले प्रशंसक बड़ी मेहनत से चैनलों की नौकरी करते हुए बीजेपी की बेगार करते हैं. अब ये भी क्या बात हुई कि वो इंटरव्यू के लिए भी जाएं तो निर्जन में बसे इंडिया टीवी जाएं. हमारे यहां आएं.. दो सौ रुपए रोज़ की कमाई वाले पकौड़े वाले से लाकर पकौड़े मैं खिलाऊंगा.. चाय वो झा जी की पियेंगे या चंदू की वो तो उन्हें ही बताना पड़ेगा.

Anand Sharma : पकोड़ा जलेबी बेचने वाले हल्दीराम हैं। पैन कांटिनेंट ब्रांड। आप जैसे डिग्रीधारियों की फौज रोज़ सुबह लाला का चरणामृत करती है। बुरा न मानना पर उद्यमिता से आप का दूर दूर तक वास्ता नही क्यों कि उसमें लगता है जिगर जिसको आपने अपनी तनखा के लिए गिरवी रख दिया है। जिगर वाले रामदेव, गोपालजी मिल्क, सलोनी मस्टर्ड आयल, पारस मिल्क, घासीटाराम कराची हलवाई, MDH और शक्ति मसाला होते हैं, किसी प्लांट के सुपरवाइजर नहीं।

Sheetal P Singh : महान मोदी जी ने करीब पौने चार साल बिताने के बाद पहली बार एक तिहाड़ी पत्रकार को आमने सामने से उपकृत किया। वैसे मंच से तो वे रोज भाषण ठेले रहते हैं पर किसी असली पत्रकार से आमना सामना करने का साहस उनमें नहीं दिखता। कांग्रेस के राहुल गांधी ने इधर कुछ इम्प्रूव किया है वरना तो वे भी प्रायोजित प्रेस का ही सामना करते थे।

Rakesh Kayasth : किस्सा पुराना हो चुका है, लेकिन सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करता हुआ देखकर दोबारा याद आ गया। जयललिता जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, तब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए एक डिबेट कंपीटशन हुआ था। विषय था-- अम्मा ज्यादा hardworking हैं या फिर ज्यादा efficent. पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीले पेश की गईं। विजेता वह सरकारी कर्मचारी बना जिसने धारदार तर्कों के आधार पर साबित कर दिया कि अम्मा दोनो हैं।

Rajeev Ranjan Jha : संघ-भाजपा से 'जुड़े' पत्रकार जब तक वाम-कांग्रेस के अनुकूल सवाल पूछते हैं, तब तक ही वे खरे व सच्चे होते हैं। दूसरा कोई भी सवाल पूछते ही वापस संघी-भाजपाई हो जाते हैं। दूसरी ओर वाम-कांग्रेस के पत्रकार स्वाभाविक रूप से ही खरे व सच्चे होते हैं और कभी भी गलत सवाल नहीं पूछते हैं। वाम-कांग्रेस के पत्रकार कभी पक्षपात नहीं करते, क्योंकि पक्ष एकमात्र उन्हीं का है, दूसरों का कोई पक्ष नहीं होता। दूसरों का जो होता है, वह केवल गलत होता है। वाम-कांग्रेस की बातों को काटने वाला हमेशा अलोकतांत्रिक, फासीवादी, सांप्रदायिक, कट्टर, मनुवादी, ब्राह्मणवादी, प्रतिक्रियावादी होता है। और हाँ, कम समझ रखने वाला मूर्ख भी...

सौजन्य : फेसबुक

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  • Guest - Alok saxena

    Sir, AAJ ki tareekh main patrakar hain kahan Sab Dalal hain koi congress ka koi bjp ka koi Vaam party ka. Sab apanae self set agenda ya Boss ke agendae par hee kaam kartey hain.

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