उपेन्द्र जल्द से जल्द सत्ता के इन घाघों के चंगुल से बाहर निकलें, यही कामना है

Satyendra PS : उपेन्द्र राय। मैं इनके बारे में 1995 के आसपास से सुनता आ रहा हूँ। मेरे तमाम मित्र इन्हें अपना बहुत करीबी बताते हैं। कुछ मित्रों ने कहा भी कि किसी रोज आपसे मिलवाते हैं, लेकिन कभी ऐसा संयोग नहीं मिला। उपेन्द्र राय के बारे में जो भी आलोचनाएं हैं, उनके आगे बढ़ने को लेकर हैं। तरह तरह की कहानियां गढ़ी जाती हैं, कुछ सही भी हो सकती हैं।

मैं उनके नाम से रूबरू हुआ तो वह लखनऊ के सहारा अखबार के कार्यालय में स्ट्रिंगर थे। उसी तरह थोड़ा सीनियर लोग उन्हें अपना निजी नौकर चाकर समझते थे,जैसे आज भी ठेका कर्मी, लगभग मुफ्त में काम करने वाले स्ट्रिंगरों को समझा जाता है।

उसके बाद सुनने में आया कि वह मुम्बई चले गए। पत्रकारिता जगत में फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनकी बुराई यह रही कि जो लोग उन्हें अपमानित करते थे, पद प्रतिष्ठा पाने के बाद उनका भी उन्होंने सम्मान किया। दरअसल उनका औरा इतना बढ़ चुका था कि छोटी छोटी खुंदको के लिए उनके पास समय नहीं था।

जैसे हर सफल पत्रकार करता है, उपेन्द्र राय ने भी वही किया। जिन स्रोतों से खबरें निकलती हैं वहां उपेन्द्र सम्बन्ध बनाते गए।

जब नीरा राडिया टेप सामने आया तो उपेन्द्र राय हिंदी जगत के एकमात्र धुरंधर थे, जिनकी आवाज टेप में सुनी गई। उनके अलावा जितने भी पत्रकार थे, नामी गिरामी अखबारों के बहुत बड़े पत्रकार, जिनके सामने एक गवई छोरा सिर उठाए खड़ा था। उस समय मुझे खुशी हुई और दुख भी कि जो लोग इस देश की नीतियों पर असर डालते हैं, उनकी बातचीत के टेप में सिर्फ एक हिंदी वाला व्यक्ति पहुँच सका है।

ऐसे में तमाम नेताओं, अधिकारियों, सहकर्मियों को उपेन्द्र राय से खुंदक होनी ही थी। एक सामान्य परिवार का, नौकरी की तलाश में अखबार में स्ट्रिंगर बनने आया गांव का बच्चा अगर उस पॉवर हब में घुस जाता है जो देश चलाते हैं तो उसे निशाने पर लिया जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

जहां तक अनुचित साधनों के सहारे की बात है, कौन ऐसा नाम है, जो कोयले की कोठरी में बेदाग है? उस पर बात करेंगे तो सभी नंगे हो जाएंगे।

उपेन्द्र राय के लिए यह संघर्ष का दौर है। उसी तरह के संघर्ष का दौर, जिससे आज हर ईमानदार,सत्ता विरोधी व्यक्ति जूझ रहा है।

उपेन्द्र जल्द से जल्द सत्ता के इन घाघों के चंगुल से बाहर निकलें, यही कामना है।

बिजनेस स्टैंडर्ड में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पीएस की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख देखें…

Deepak Kabir उसने 1990 में तो पत्रकारिता का प भी नहीं शुरू किया था, वो 95 के आसपास तो लखनऊ आया भाई,

Chandan Yadav इन्हे भी आदत है कुछ से कुछ लिखने की

Satyendra PS यादव जी, उपेन्द्र राय का लखनऊ आने के पहले भी अस्तित्व था। आप लोग कुछ का कुछ बनाने की बड़ी जल्दबाजी करते है। मैंने चर्चा वहां से शुरू की, जब एक गांव का बच्चा ग्रेजुएट होकर नौकरी की तलाश शुरू किया था, जिसका कोई रिश्तेदार मीडिया में नहीं था, आप लोग जल्दबाजी में काबिलियत दिखा गए!

Satyendra PS मैं सन गिनकर नही बैठा हूँ। 1995 ही सही होगा, 91 में मै इंटर में था। 95 में ग्रेजुएशन कर मैं भी बेरोजगार की पंक्ति में नया नया शामिल हुआ था। तभी से देख सुन रहा हूँ। डिस्क्लेमर/ उपेन्द्र राय से कभी मेरा व्यक्तिगत परिचय नही रहा, न ही लाभार्थी। सरकारों के सताए हर उस व्यक्ति का समर्थन जहां तक पार लगे, कर देता हूँ, अगर वह व्यक्ति मुझे अच्छा लगता है। मैंने 90 के आसपास लिखा था, 95 कर देता हूँ।

Deepak Kabir अन्यथा न लीजिये, मैंने केवल एक तथ्य पर ध्यान दिलाया, जितना भर मेरे संज्ञान में है,बाकी मैं गलत भी हो सकता हूँ भाई
Satyendra PS उसको मैंने आपके मुताबिक कर दिया,जो सही के ज्यादा करीब हो सकता है। मुझे सच मे याद नही है कि उपेन्द्र राय के बारे में 91, 92, 93, 94, 94 में कब सुना। उनका भी आईएएस बनने का सपना था शायद और कुछ साल विकासनगर रहकर पढ़े भी हों तो नहीं बता सकता। कभी व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं रहा।मित्रो से ही सुना। इस बार भी Yashwant Singh चिठिरसा बने।

Deepak Kabir मुझे याद है मैं उस दौरान यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में था, उपेन्द्र हमारे मित्र के कमरे में ही रहा था ,छोटा लड़का सा था, मुझे आर्टिकिल दिखाता और सही करवाता था। फिर बताता सहारा में छप गया भैया। मुझे सही लग रहा था, बाद में सहारा ने ही डिडकलेमर छापा कि ये आर्टिकिल चोरी के होते थे..तो मुझे झटका लगा। फिर इसने खुद को सुब्रत राय का भतीजा या नज़दीकी रिश्तेदार बता कर सहारा में जगह बनायी.. आगे पूरी यात्रा है… वैसे ये तो तय है बहुत बहुत लंबी छलांग लगायी है इसने , मिलूँगा एक रोज़…

Satyendra PS भाई Deepak Kabir ji, इस तरह के लोगों का सम्मान करता हूँ जो इतने कॉन्फिडेंट न हों कि उनका लिखा छप जाएगा और पत्रकारिता में शीर्ष मुकाम पा लें। ध्यान रहे कि पत्रकारिता लिखने नहीं, सोर्सेज का खेल है। जो व्यक्ति नीरा राडिया से बात करने की औकात रखता हो, निश्चित रूप से उसके सूत्र तगड़े होंगे.. बकिया यह भी सुनकर अच्छा लगता है कि लोग उपेन्द्र राय को चोर बेईमान तो बताते हैं, लेकिन एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जिसने कहा हो कि उपेन्द्र राय ने उसका निजी नुकसान कर दिया हो। लाभार्थी ही मिलते हैं। कोई नौकरी पा गया, कोई मुम्बई में अच्छे होटल में रहकर उसके पैसे से घूम लिया। मजे की बात यह है कि ऐसे तमाम लोग उपेन्द्र की बुराई भी करते हैं। इसी वजह से Yashwant ji की मूल पोस्ट में लिखा कि आदमी अच्छे नहीं चुन पाए उपेन्द्र राय।

Vijay Kumar उपेंद्र राय का क्या मसला है? क्या ये गिरफ्त में हैं?

Satyendra PS भाई Vijay Kumar ji, सुनने में आ रहा है कि एक भ्रष्ट अफसर से कुछ पंगा था। उसने दर्जनों केस करवा दिए।

Deepak Kabir भाई आपकी कसौटी आप जानें, मेरे लिये छोटे भाई जैसा ही था, चन्द मुलाकातें बस। सही – गलत,नैतिक अनैतिक पर मेरा क्या ज़ोर … सफ़र दिलचस्प है तो मिल के जानूंगा ज़रूर अगर सम्भावना बनी। बाकी मैंने सिर्फ तथ्य शेयर किये कोई जजमेंट नहीं… पर एक बात कहूँगा ..पत्रकारिता सिर्फ सोर्सेस का खेल नहीं होती वरना रविश, रोहित सरदाना और अर्णब से बहुत पीछे छूट जायेंगे… प्रचलित जुबान में कहूँ तो पत्रकारिता एक मर्द पेशा है (जेंडर एक्सपर्ट इस शब्द पर मुझे माफ़ करें)… ताकतवर और सोर्सेस के बरक्स खड़े हो जाने का…जिसके बूता हो उसी को करना चाहिये, बकिया जो भी है वो या तो बाबूगिरी है या दलाली।

Satyendra PS फिलहाल उपेन्द्र राय जो भी हों, उत्पीड़न किए जाने का विरोध है। उपेन्द्र राय आज उसी तरह सत्ताधीशों द्वारा फंसाकर मारे जा रहे हैं जैसे उदय प्रकाश का मोहनदास या वंचित तबके का कोई भी मार दिया जाता है। जर्नलिज्म को लेकर सबकी अपनी अपनी व्याख्याएं हैं। वो भी एक मसला है। बूता तो है उपेन्द्र राय में। अब तक दिखाया है। आगे भी चंगुल से निकल जाएं, यह कामना है।

Kukkoo Mohan कोई पत्रकार किसी द्वारा सिस्टम के इस्तेमाल से फँसाया गया। इस पर उस सिस्टम और फँसाने वाले को कटघरे में खड़ा करना बिल्कुल मुनासिब है।किसी के साथ अन्याय किया गया यह तो साफ है। मगर रायता फैलाने वाले लोग बात को कहीं से उठा कर कहीं ले जाते हैं।उसके सारे इतिहास भूगोल की समीक्षा के बाद विद्वान लोग न मानेंगे कि उसके साथ कुछ गलत हुआ।वेमुला की जाति ढूँढने जैसा शातिरपन। नकारात्मकता कूट कूट कर भरी है पत्रकारों के एक हिस्से में।ज़ाहिर है कि ये लोग वंचित वर्ग से नहीं आते हैं।इसलिए मसले को उलझाने या नज़रअंदाज करने का वर्गीय कर्तव्य निभाते हैं।

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