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कवि, प्रोफ़ेसर और संपादक वीरेन डंगवाल आज होते तो अपना 74वां जन्मदिन मना रहे होते!

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हरीश पाठक-

प्रख्यात कवि वीरेंद्र डंगवाल का आज जन्मदिन है।साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वीरेंद्र जी यदि आज होते तो हम उनका 74वां जन्मदिन मना रहे होते।

उनकी जयंती पर उनकी एक कविता सादर।

पोस्टर:अनिल करमेले।

पंकज चतुर्वेदी-

कविता को लेकर वीरेन डंगवाल के निजी प्रतिमान बहुत सख़्त थे। कोई भी रचना सामने आने पर पूछते कि इसमें नयी बात क्या कही गयी या अद्वितीयता क्या है?

एक प्रदेश की राजधानी में रहनेवाले उनकी पीढ़ी के एक प्रमुख कवि के बारे में एक बार मैंने उनका अभिमत जानना चाहा, तो बोले : “वैसे तो अच्छे ही कवि हैं, मगर मुझे लगता है कि जितना बड़ा ड्रामा उस दौर में उनके चारों ओर घटित होता रहा, उतनी बड़ी कविता वह नहीं लिख पाये।”

वीरेन जी की एक चर्चित कविता ‘हमारा समाज’ की पंक्तियाँ हैं : “पर हमने यह कैसा समाज रच डाला है / इसमें जो दमक रहा, शर्तिया काला है।” जब शुरू में यह लिखी गयी थी, तो मैंने उनसे कहा : “इसमें ‘शर्तिया’ शब्द पर आप पुनर्विचार कर लीजिए, क्योंकि अपवाद के तौर पर कुछ अच्छे लोग भी हो सकते हैं, जो दमक रहे हों।”

उन्होंने तुरत जवाब दिया : “शर्तिया ही ठीक है।” निराला के शब्दों में कहें, तो वह ‘अपने प्रकाश में निःसंशय’ थे, यानी अपने अनुभूत सत्य को लेकर गहन और अविचलित आत्मविश्वास से सम्पन्न। इसीलिए उनकी कविता में अकाट्य नैतिक प्रभाव है, जिसकी बदौलत वह हमारी चेतना पर छा जाती है।

Viren dangwal

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