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Nitin Thakur : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस दिन कंगारुओं के प्रधानमंत्री के साथ अक्षरधाम में पिकनिक मना रहे थे, क्या उन्हें इल्म है कि ठीक उसी दिन नॉर्थ एवेन्यू पर इस देश के चार किसान नंग धड़ंग होकर प्रदर्शन कर रहे थे? वो पागल नहींं थे.. और ना ही वो किसी पब्लिसिटी के लिए आए थे.. वो तो बेचारे तमिलनाडु के अपने गांवों से हज़ारों किलोमीटर दूर पत्थर के इस शहर में अपनी गुहार लगाने पहुंचे थे।

28 दिनों तक वो बेचारे प्रदर्शन के लिए सरकारों द्वारा तय की गई जगह जंतर मंतर पर पड़े रहे। उन्हें लगा कि चेन्नई ना सही मगर दिल्ली उनकी आवाज़ ज़रूर सुनेगी। 28 दिनों तक तथाकथित प्रधानसेवक के दफ्तर से कोई उनसे बात करने जंतर मंतर नहीं आया। सब्र टूटा तो किसान खुद ही प्रधानमंत्री के दफ्तर जा पहुंचे लेकिन मैले-कुचैले और गंदे-से दिखनेवाले इन जीवों की वहां भला क्या बिसात.. आखिर वो लकदक और चमकदार नेताओं और साहब लोगों का गढ़ है। खैर, पुलिसवाले जीप में ठूंसकर इन किसानों को जंतर मंतर पर ही पटकने के लिए चल दिए। बस तभी मौका पाकर चारों जीप से कूदे और कपड़े उतारकर नारेबाज़ी करने लगे। उस दिन तो उन्हें किसी तरह घेरकर जंतर मंतर ले आया गया लेकिन आज वही लोग चारों तरफ से थक हार कर अपना पेशाब पीकर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

इससे पहले वो नरमुंड लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। दिखावे के इस लोकतंत्र में किसानों का ये झुंड पूरे अहिंसक तरीके से प्रदर्शन कर रहा है लेकिन ना बेशर्म मंत्री के पास इनकी बात सुनने का वक्त है और ना ही उनके नेता के लिए ये ज़रूरी हैं। हां तमिलनाडु में चुनाव होता तो ये ही प्रधानसेवक इन किसानों के ही नाम पर रोने का ढोंग करके 'मेरे किसान भाइयों को मत मारो' कहकर हमदर्दी और वोट लूट लेता। आजकल वो सूरत में हीरे के कारखानों का उद्घाटन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा वक्त निकालकर गुजरात के बड़े पूंजीपतियों के पुराने अहसान चुका रहे हैं। उनके 5 स्टार हॉस्पिटल के फीते काट रहे हैं जिन्होंने पुराने वक्त में फंड देकर करियर बनाने में मदद की।

मोदी जुलाई में इज़रायल जाने के लिए सामान पैक करने में जुटे हैं लेकिन चंद किलोमीटर पर खुदकुशी से चार कदम दूर किसानों से मिलने का उनके पास ना वक्त है और ना मन। मुझे नहीं लगता कि किसानों के पेशाब पीने से भी कोई सरकार पिघलेगी। वैसे बता दूं कि कंगारुओं के पीएम ने हमारे पीएम के साथ पिकनिक मनाई और सेल्फी तो ली... लेकिन फिर अपने देश में पहुंचते ही वो वीज़ा खत्म कर डाले जिनके सहारे हिंदुस्तान से लाखों बेरोज़गार ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करते थे। समझ से परे है कि खुद को प्रधानसेवक (ये शब्द भी नेहरू से चुराया है) कहने वाला ये शख्स आखिर सेवक है किसका? क्या सिर्फ उनका जिनको ऑस्ट्रेलिया में ठेके दिलाने के लिए वो टर्नबुल को मेट्रो में घुमाकर पटा रहा था?

Arun Khare : तमिलनाडु के किसान कर्ज माफी की मांग को लेकर पिछले सैतीस दिन से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं आज 22 तारीख को इन किसानों ने सरकार की अनदेखी के विरोध में मूत्रपान कर देश के जनमानस को हिला दिया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली की सरकार आंख कान बंद कर अन्नदाता को विरोध के ऐसे तरीकों के लिए मजबूर कर रही है । सरकार की इस चुप्पी और किसानों से आज तक बात न करने की घोर निंदा की जानी चाहिए।

इसी के साथ उत्तर भारत के उन किसान संगठनों की भी कडी और घोर निंदा की जानी चाहिए जो अपने दक्षिण भारतीय किसानों के इस संघर्ष में चुप बैठे हुए हैं। कहां है दिल्ली को किसानों से भर देने वाले किसान संगठन? क्या उनके आंदोलन किसी राजनीतिक दलों के हित साधक होते थे ? यदि नही तो ये तथाकथित बडे किसान संगठन क्यों नहीं तमिलनाडु के किसानों के साथ खडे नजर नहीं आ रहे । देश भर के किसानों को आपने स्तर पर अपने अपने तहसील और जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर दक्षिण भारतीय किसानों की मांग का समर्थन करना चाहिए।

Priyamvada Samarpan : ''आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को?'' हरिओम पवार जी के वीर रस की ये पंक्तियां उन्हें कैसे सोने देती होंगी? कविवर जंतर-मंतर पर से ऐसी ही हुंकार का वक्त है... अगर आप किसानों के साथ स्वर देंगे तो देश आपके साथ सुर मिलाएगा. सनद रहे अगर खामोश रह गए तो किसी भी मंच पर कोई बेबाक आईना दिखा देगा. कसम से तब नंगे नजर आएंगे. चुप्पी तोड़िए हुजूर.

Pankaj Chaturvedi : तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए, जिसमे प्रमुख सम्पूर्ण कर्जा माफी की है, के लिए गत 40 दिन से जतन कर रहे है। कभी आत्महत्या कर चुके किसानों के नर मुंड के साथ तो कभी नग्न हो कर। दिल्ली शहर नगर निगम पर कब्जे की जंग का कुरुक्षेत्र बना है और किसान का दर्द उसके लिए कोई मायने नही रखता। आज किसानों ने अपना ही मूत्र पिया और कल विष्ठा खाएंगे। मीडिया के लिए उसका महज फोटो जरूरी है। मेरी अपील है छात्रों, स्वयमसेवी संगठनों, युवाओं, लेखकों, पत्रकारों से कि वे इस प्रदर्शन को तमाशे के रूप में ना लें। उनके साथ खड़े हों। उनकी मांगों को समाज और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाएं और उन्हें मल खाने जैसा विरोध करने से रोकें। आज मूत्र पान की खबर के बाद मन व्यथित है। यकीन मानिए, लंच नही किया। सोचें कि आपका अन्न दाता पेशाब पी रहा है। घर से निकले। एक रविवार जंतर मंतर पर बिताए। उस नॉटंकी अन्ना और केजरी के पीछे तो बहुत भृमित हुए थे। इन किसानों में खुद को देखें।

पत्रकार नितिन ठाकुर, अरुण खरे, प्रियंवदा और पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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