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अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश का यह सौभाग्य है कि उसके पास दुनिया का सांतवा अजूबा ताजमहल मौजूद है, जिसको देखने देश भर से ही नहीं, पूरी दुनिया से लोग आते हैं। सफेद संगमरमर के पत्थरों पर की गई खूबसूरत नक्काशी पूरी दुनिया में आज भी बेजोड़ है तो मोहब्बत की निशानी के रूप में भी इसे याद किया जाता है। ताजमहल जितना खूबसूरत है, उतना ही विवादित भी है। इस शानदार मकबरे का निर्माण-कार्य पेचीदा, खर्चीला और कई वर्षों तक चला था। बीस हजार मजदूरों द्वारा 22 साल में इस इमारत का निर्माण संभव हुआ।

ताजमहल के बारे में जानने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि मुगल बादशाह शाहजहा कौन था। चंगेजखान का वंशज बाबर भारत का पहला मुगल बादशाह था। उसके द्वारा 1526 में इब्राहिम लोदी को पानीपत में पराजित कर दिल्ली पर कब्जा जमाया गया। उसके बाद उसके वंशजों ने 300 वर्षों तक भारत पर शासन किया। आम धारणा है कि ज्यादातर मुगल शासक क्रूर, जुनूनी और सत्ता-लोभी थे। कहा जाता है बाबर पराजित सैनिकों के सर कलम कर खोपड़ियों की मीनारें बनाया करता था. उसके वंशज भी उसके बाद सत्ता और सम्पत्ति में वृद्धि करते रहे। बाबर के बाद हुमायूं और फिर अकबर तथा बाद में जहाँगीर ने इतनी सम्पत्ति इकट्ठी की कि उसका कभी आंकड़ा जुटाना संभव नहीं हो सका।

जहांगीर के जीवित रहते ही उसका महत्वाकांक्षी पुत्र खुर्रम सत्ता के लिए अपने भाइयों का सफाया करने में लग गया था। एक भाई को खुद फांसी पर लटका दिया। एक को कैद कर आंखें फुड़वा दी। एक को उसी के सैनिकों द्वारा कत्ल करवा दिया।  अंत में ई.स. 1628 में मुगल शहंशाह बना तथा अपना नाम खुर्रम से शाहजहाँ रख लिया। एक बार उसने पराजित 8000 सैनिकों के सर-कलम कर उससे 260 मीनारें बनवायीं. वैसे तो क्रूरता और कला का कोई मेल नही है मगर यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि इसी शहंशाह ने संगमरमर की सबसे खूबसूरत इमारत का निर्माण भी करवाया था।

1631 में शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज की मृत्यु होने पर उसकी याद में  एक भव्य मकबरा बनाने का निर्णय लिया। वह भी महल-नुमा मकबरा। बादशाह एक शानदार मकबरे का निर्माण करवाना चाहता था और इसके लिए उसने सरकारी खजाने के दरवाजे खोल दिये थे। धन पानी की तरह बहाया गया था। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस मकबरे के निर्माण में करीब एक करोड़ रूपया खर्च हुआ था। आज इसकी गणना की जाये तो यह रकम करीब तीन सौ करोड़ बैठेगी। बगदाद से एक कारीगर बुलवाया गया जो पत्थर पर घुमावदार अक्षरों को तराश सकता था। मध्य एशिया के बुखारा शहर से जिस कारीगर को बुलवाया गया वह संगमरमर के पत्थर पर फूलों को तराशने में दक्ष था। विराट कद के गुम्बदो का निर्माण करने में दक्ष कारीगर तब तुर्की के शहर इस्तम्बुल में रहा करता था, उसे भी बुलवाया गया।

मीनारों के निर्माण कार्य के लिए समरकंद से कारीगर को बुलवाया गया। वहीं मुख्य शिल्पी कंधार का था। इस प्रकार छह महीनों में 37 दक्ष कारीगर इकट्ठे किये गये जिनकी देखरेख में बीस हजार मजदूर अगले 22 साल तक निर्माण कार्य में लगे रहे, तब यह पूरा हो पाया। निर्माण कार्य के लिए संगमरमर राजस्थान के मकराणा से तो अन्य चालीस प्रकार के कीमती पत्थर व रत्न बगदाद, अफगानिस्तान, तिब्बत, इजिप्त, रूस, ईरान जैसे देशों की खाक छान कर व भारी कीमत चुका कर इक्कठा किये गये थे।

भारी भरकम टनों के हिसाब से संगमरमर पत्थर मकराणा से आगरा तक लाना एक समस्या थी. दोनो स्थानों के बीच की दूरी 300 किमी जितनी है. ऐसे में सबसे पहले तो पत्थर की खदानों में बादशाह ने 1800 मजदूर काम पर लगाए. यहाँ सवा दो-दो टन भारी पत्थर के चौकोर टुकड़े काटे गये. रेगिस्तान की वजह से पहियों वाले वाहन काम आने वाले थे नहीं और ऊँट इतने भारी पत्थर उठा नहीं सकते थे। ऐसे में इस काम के लिए 1000 हाथियों तथा महावत व अन्य देखभाल के लिए 2500 लोगों को काम पर लगाया गया. हाथी रोज 30 किमी के हिसाब से दूरी तय करते और दस दिनों में मकराणा से पत्थर लिये आगरा पहुँचते।

ताज पर हुए बे-हिसाब खर्च से शाहजहां का पुत्र औरंगजेब नाराज था। एक और महल के निर्माण का सुन उसने षडयंत्र रचने शुरू किये. पिता की भांति ही उसने भी अपने भाइयों को रास्ते से हटाया और पिता को पद से हटा कर कैदी के रूप में आगरा भेज दिया. शाहजहाँ आगरा के किले से ताज को निहारा करता. ऐसे ही एक दिन पहरेदारों ने बादशाह शाहजहां को ताजमहल निहारने की मुद्रा में मृत अवस्था में पाया था।

ताजमहल का विवादों से गहरा नाता रहा है। कई हिन्दू संगठन और नेताओं का शुरू से मत रहा है कि ताजमहल का निर्माण शिवालय पर किया गया था। ताजमहल विवाद अदालत की चौखट तक भी पहुंच चुका है। ताजमहल के शिव मंदिर विवाद के मुकदमे के वादी हरिशंकर जैन कहते हैं, आजादी के बाद लेफ्टिस्‍ट इतिहासकारों ने यह भ्रम फैला दिया कि ताजमहल मुगल इमारत है। जबकि, बादशाहनामा के पेज नंबर 402 और 403 में जय सिंह से बिल्डिंग लेने का फरमान की बात लिखी हुई है। उस वक्‍त यह बिल्डिंग पॉंच सौ साल पुरानी हो चुकी थी। बटेश्‍वर शिलालेख में संस्‍कृत में श्‍लोक लिखे हैं और इससे पता चलता है कि ताजमहल में शिव और विष्‍णु का मंदिर था। ताजमहल पर रिसर्च करने का दावा करने वाले अशोक अठावले कहते हैं कि वह ताजमहल के नीचे के हिस्‍से में गए थे। वहां पर उन्‍हें मूर्तियां मिली थीं। उन्‍होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार और एएसआई को ताजमहल के नीचले हिस्‍से को खोलने में दिक्‍कत क्‍या है? अगर दिक्‍कत है तो साफ मतलब है कि यहॉं मंदिर के सबूत मौजूद हैं।

बहरहाल, इतिहास को छोड़ दिया जाये तो राजनीति में भी ताज के महत्व को इंकार नहीं किया जा सकता है। यहां तक की समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान तक ताजमहल पर प्रश्न चिह्न लगा चुके हैं तो अब ताजमहल पर बीजेपी विधायक संगीत सोम के विवादित बयान ने सियासी उबाल ला दिया है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक ताजमहल विवाद में रोटियां सेंकने में लग गई हैं। सपा विधायक आजम खान ने संगीत पर हमला बोलते हुए कहा कि वह कितनी निशानियों को मिटाएंगे? आजम ने चुनौती देते हुए कहा कि आगरा का ताजमहल ही क्यों दिल्ली का लाल किला, राष्ट्रपति भवन, कुतुबमीनार को भी गिरा देना चाहिए, क्योंकि ये सभी गुलामी की निशानियां हैं। आजम ने कहा कि वह पहले से ही इस राय में थे कि गुलामी की तमाम निशानियां मिटा दी जानी चाहिए, जिससे हमारी कमजोरी झलकती हो।

आजम के बयान से पहले हैदराबाद से सांसद असुद्दीन ओवैसी और जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अबदुल्ला ने भी संगीत सोम पर हमला बोला था। उन्होंने कहा था कि विकास अब पीछे छुट गया है। अब वो धरोहरें गिराएंगे। बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में ताजा पर्यटक लिस्ट जारी कर उसमें से ताजमहल को हटा दिया था। इसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सरधना से भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा था कि ताज महल भारतीय संस्कृति पर धब्बा है। उन्होंने कहा था कि ताज महल बनाने वाले मुगल शासक ने यूपी और पूरे देश में हिंदुओं के साथ अत्याचार किया है, ऐसे शासकों और उनकी इमारतों का नाम इतिहास में होगा तो उसे जरूर बदला जाएगा।

गौरतलब हो, हाल ही में यूपी सरकार ने एक नई ‘टूरिस्ट बुकलेट’ जारी की थी, जिसमें टूरिस्टों के लिए ताजमहल का नाम शामिल नहीं किया गया है। इस बार लिस्ट में गोरखनाथ मंदिर को जगह दी गई है। साथ ही गोरखपुर की देवी पर्यटन शक्ति पीठ को भी स्थान दिया गया है। इस बुकलेट के दो पेज सिर्फ गोरखधाम मंदिर को दिए गए हैं। इसमें गोरखधाम मंदिर का फोटो, उसका इतिहास और उसका महत्व लिखा है।

लब्बोलुआब यह है कि हमारे नेतागण जानते हैं कि वह ताजमहल की लोकप्रियता को कम तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन इसे वोट बैंक बढ़ाने और अपनी सियासी भूख मिटाने के लिये तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है। यही काम संगीत सोम भी कर रहे हैं। इस समय बीजेपी में वह हासिये पर पड़े हुए हैं। उनकी योगी मंत्रिमंडल में जगह पाने का सपना अधूरा रह गया है। जिला  पंचायत अध्यक्ष चुनाव में बीजेपी के अधिकृत प्रत्याशी का विरोध करने के कारण आलाकमान उनसे नाराज चल रहा है। वैसे, ताजमहल पर पहली बार किसी ने उंगली नहीं उठाई है। दुर्भाग्य है कि विश्व के सांतवे अजूबे ताजमहल को तमाम नेताओं की सियासती मजबूरी के कारण अक्सर विवादों में घिरा रहना पड़ता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.

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